03 Sep एल नीनो के कारण सूखे से बचाने के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने उठाए कदम
✎ अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के गर्म होने से उत्पन्न होती है और भारत में मानसूनी वर्षा को कमजोर कर सूखे की स्थिति पैदा कर सकती है, जिससे कृषि और जल संसाधनों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, भारत का भूगोल) | GS Paper III — आपदा प्रबंधन, कृषि, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
- Prelims: अल नीनो, ला नीना, भारतीय मानसून, कृषि विविधीकरण, सूखा प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन
- Essay: जलवायु परिवर्तन के युग में कृषि अनुकूलन और खाद्य सुरक्षा, जल संकट: चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के गर्म होने से उत्पन्न होती है और भारत में मानसूनी वर्षा को कमजोर कर सूखे की स्थिति पैदा कर सकती है, जिससे कृषि और जल संसाधनों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
अल नीनो (El Nino) के प्रभाव के कारण आंध्र प्रदेश में सामान्य से 52% कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे राज्य में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। राज्य सरकार ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि एक भी एकड़ कृषि भूमि सूखे से प्रभावित न हो। इसके लिए किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर मोड़ने, बीज सब्सिडी प्रदान करने और पीने के पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।
पृष्ठभूमि
- अल नीनो एक जटिल मौसम पैटर्न है जो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से उत्पन्न होता है।
- यह वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करता है और भारत में मानसूनी वर्षा को कमजोर कर सकता है, जिससे सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है।
- आंध्र प्रदेश में इस वर्ष सामान्य से काफी कम वर्षा हुई है, जिससे लगभग 90% की तुलना में केवल 60-65% कृषि क्षेत्र ही बुवाई के अधीन आ पाया है।
- राज्य सरकार ने किसानों को धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों के बजाय कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों को अपनाने की सलाह दी है।
- सूखे की स्थिति से निपटने के लिए बीज सब्सिडी, चारे की कमी को पूरा करने और बागवानी फसलों की सुरक्षा के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।
- राज्य में पीने के पानी की संभावित कमी को दूर करने के लिए भी योजनाएँ तैयार की जा रही हैं, जिसमें बोरवेल और टैंकरों का उपयोग शामिल है।
अल नीनो क्या है और यह भारत को कैसे प्रभावित करता है?
- अल नीनो दक्षिणी दोलन (El Nino-Southern Oscillation – ENSO) का एक गर्म चरण है, जो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में आवधिक भिन्नता को दर्शाता है।
- यह आमतौर पर हर 2 से 7 साल में होता है और 9 से 12 महीने तक रह सकता है, लेकिन कभी-कभी इससे भी अधिक समय तक।
- अल नीनो के दौरान, मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में सतही जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है।
- यह वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर्न को बदल देता है, जिससे दुनिया भर में मौसम पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।
- भारत के संदर्भ में, अल नीनो अक्सर दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है, जिससे देश के कई हिस्सों में कम वर्षा और सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।
- कम मानसूनी वर्षा कृषि उत्पादन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है, जिससे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।
- इसके विपरीत, ला नीना (La Nina) ENSO का ठंडा चरण है, जो आमतौर पर भारत में मजबूत मानसून और अच्छी वर्षा से जुड़ा होता है।
- अल नीनो के प्रभावों को कम करने के लिए सरकारें फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और किसानों को वित्तीय सहायता जैसे उपाय करती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| एल नीनो का प्रभाव | कम वर्षा और सूखे की स्थिति, जिससे कृषि उत्पादन और पेयजल आपूर्ति प्रभावित होती है। |
| फसल विविधीकरण (Crop Diversification) | कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना ताकि पानी की कमी के बावजूद कृषि उत्पादकता बनी रहे। |
| बीज सब्सिडी और वितरण | किसानों को कम पानी वाली फसलों के बीज उपलब्ध कराना, जिससे उन्हें नई फसलें अपनाने में प्रोत्साहन मिले। |
| चारा संकट का समाधान | पशुधन के लिए चारे की कमी को दूर करना और चारा उत्पादन को बढ़ावा देना। |
| सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) | ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों को अपनाना, जिससे पानी का कुशल उपयोग हो सके। |
| पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना | राज्य भर में पेयजल की कमी को दूर करने के लिए बोरवेल, टैंकरों का उपयोग और अन्य राज्यों से टैंकरों की व्यवस्था। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कृषि उत्पादन में स्थिरता: फसल विविधीकरण और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने से सूखे की स्थिति में भी कृषि उत्पादन को बनाए रखने में मदद मिलेगी, जिससे किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित नहीं होगी।
- खाद्य सुरक्षा: कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने से खाद्य उत्पादन में कमी को रोका जा सकेगा, जिससे राज्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
- राजकोषीय स्थिरता: सूखे से निपटने के लिए अग्रिम उपाय करने से आपदा राहत पर होने वाले बड़े खर्चों को कम किया जा सकता है, जिससे राज्य के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) पर दबाव कम होगा।
सामाजिक महत्व
- किसानों की आजीविका की सुरक्षा: फसल विविधीकरण और बीज सब्सिडी जैसी पहल किसानों को सूखे के प्रतिकूल प्रभावों से बचाकर उनकी आजीविका को सुरक्षित रखने में मदद करेगी।
- पेयजल उपलब्धता: राज्य सरकार द्वारा पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदम नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
- ग्रामीण पलायन में कमी: कृषि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने से ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर होने वाले पलायन को रोकने में मदद मिलेगी, क्योंकि किसानों को अपने गांवों में ही रोजगार के अवसर मिलेंगे।
पर्यावरणीय महत्व
- जल संरक्षण: सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों (जैसे ड्रिप सिंचाई) को बढ़ावा देने और कम पानी वाली फसलों की खेती से भूजल और सतही जल संसाधनों का संरक्षण होगा।
- जलवायु परिवर्तन अनुकूलन: एल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं के बढ़ते प्रभाव के बीच, ये उपाय राज्य को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने और भविष्य के सूखे के लिए तैयार करने में मदद करेंगे।
शासन और नीतिगत महत्व
- आपदा प्रबंधन: यह घटना राज्य सरकार की आपदा प्रबंधन क्षमताओं को मजबूत करने और भविष्य की प्राकृतिक आपदाओं के लिए एक प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र विकसित करने का अवसर प्रदान करती है।
- अंतर-विभागीय समन्वय: कृषि, जल संसाधन और ग्रामीण विकास जैसे विभिन्न विभागों के बीच समन्वय से सूखे से निपटने के लिए एक व्यापक और एकीकृत दृष्टिकोण सुनिश्चित होगा।
चुनौतियाँ
1. किसानों का प्रतिरोध
- परंपरागत फसलों से नई, कम पानी वाली फसलों में बदलाव के लिए किसानों को राजी करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, विशेषकर यदि नई फसलों की बाजार मांग या लाभप्रदता के बारे में अनिश्चितता हो।
- नई कृषि पद्धतियों और तकनीकों को अपनाने के लिए किसानों को पर्याप्त प्रशिक्षण और जागरूकता की आवश्यकता होगी।
यूपीएससी लिंक: कृषि नीतियाँ और योजनाएँ
2. बुनियादी ढाँचा और संसाधन
- सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढाँचे और वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होगी।
- चारा उत्पादन को बढ़ावा देने और पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भी पर्याप्त निवेश और कुशल प्रबंधन की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढाँचा, संसाधन जुटाना
3. जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव
- एल नीनो जैसी मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि भविष्य में सूखे की स्थिति को और गंभीर बना सकती है, जिससे दीर्घकालिक समाधानों की आवश्यकता होगी।
- अनिश्चित वर्षा पैटर्न के कारण कृषि योजना और जल संसाधन प्रबंधन में चुनौतियाँ बढ़ेंगी।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन
4. केंद्र-राज्य समन्वय
- सूखे से निपटने और सहायता प्राप्त करने के लिए केंद्र सरकार के साथ प्रभावी समन्वय महत्वपूर्ण है।
- वित्तीय सहायता और तकनीकी विशेषज्ञता के लिए केंद्र पर निर्भरता एक चुनौती हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| एल नीनो का प्रभाव | कम वर्षा, सूखे की स्थिति, कृषि उत्पादन में कमी और पेयजल संकट। |
| फसल विविधीकरण | किसानों को पारंपरिक फसलों से कम पानी वाली फसलों में बदलने के लिए प्रेरित करना और नई फसलों के लिए बाजार सुनिश्चित करना। |
| जल संसाधन प्रबंधन | उपलब्ध जल संसाधनों का कुशल उपयोग, भूजल स्तर का गिरना और सिंचाई के लिए पानी की कमी। |
| चारा संकट | पशुधन के लिए चारे की कमी, जिससे पशुधन स्वास्थ्य और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। |
| वित्तीय बोझ | सूखे से निपटने के लिए आवश्यक उपायों, जैसे बीज सब्सिडी, सिंचाई परियोजनाओं और पेयजल आपूर्ति पर राज्य सरकार पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ। |
| जागरूकता और प्रशिक्षण | किसानों को नई कृषि तकनीकों और फसल विकल्पों के बारे में शिक्षित करना और उन्हें प्रशिक्षित करना। |
आगे की राह
- फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाएँ और किसानों को कम पानी वाली, अधिक लाभदायक फसलों के बारे में जानकारी दी जाए।
- सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) तकनीकों जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को अपनाने के लिए किसानों को वित्तीय सहायता और तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
- जल निकायों, जैसे तालाबों और झीलों के पुनरुद्धार और नए जल संचयन ढाँचों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाए ताकि भूजल स्तर को बढ़ाया जा सके।
- पशुधन के लिए चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु चारा फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जाए और चारा बैंक स्थापित किए जाएँ।
- कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के माध्यम से सूखे प्रतिरोधी और कम पानी वाली फसल किस्मों के विकास और प्रसार पर जोर दिया जाए।
- केंद्र सरकार के साथ सक्रिय रूप से समन्वय स्थापित किया जाए ताकि सूखे से निपटने के लिए अतिरिक्त वित्तीय सहायता और विशेषज्ञता प्राप्त की जा सके।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने और भविष्य की आपदाओं के लिए एक मजबूत आपदा प्रबंधन योजना विकसित करने के लिए एक राज्य-स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अल नीनो प्रभाव · फसल विविधीकरण · जल-कुशल कृषि · सूखा प्रबंधन · राज्य आपदा प्रतिक्रिया · कृषि सब्सिडी · जलवायु परिवर्तन अनुकूलन · सूक्ष्म सिंचाई · चारा उत्पादन · पेयजल सुरक्षा
अवधारणा प्रवाह
एल नीनो घटना → कम वर्षा और सूखे की स्थिति → कृषि उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर प्रभाव → फसल विविधीकरण और जल संरक्षण के उपाय → खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका की सुरक्षा
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अल नीनो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है।
2. अल नीनो भारत में सामान्यतः कम वर्षा और सूखे की स्थिति से जुड़ा है।
3. ला नीना अल नीनो के विपरीत प्रभाव डालता है और भारत में अच्छी मानसूनी वर्षा से संबंधित है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अल नीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है। कथन 2 सही है। अल नीनो अक्सर भारतीय उपमहाद्वीप में कमजोर मानसून और सूखे की स्थिति से जुड़ा होता है। कथन 3 सही है। ला नीना अल नीनो के विपरीत है, जिसमें प्रशांत महासागर का सतही जल ठंडा हो जाता है, और यह आमतौर पर भारत में मजबूत मानसून और अधिक वर्षा से संबंधित है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से उपाय सूखे की स्थिति से निपटने के लिए कृषि क्षेत्र में अपनाए जा सकते हैं?
1. कम पानी वाली फसलों की खेती को बढ़ावा देना।
2. ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर (Sprinkler) जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को प्रोत्साहित करना।
3. फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को बढ़ावा देना।
4. किसानों को बीज सब्सिडी प्रदान करना।
सही विकल्प चुनें:
- केवल 1 और 2
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1, 3 और 4
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — दिए गए सभी उपाय सूखे की स्थिति से निपटने के लिए कृषि क्षेत्र में प्रभावी हो सकते हैं। कम पानी वाली फसलों की खेती, सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का उपयोग, फसल विविधीकरण और बीज सब्सिडी प्रदान करना, ये सभी किसानों को सूखे के प्रभावों को कम करने में मदद करते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं के कारण उत्पन्न सूखे की स्थिति से निपटने में फसल विविधीकरण और जल-कुशल कृषि पद्धतियाँ किस प्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं? भारत में कृषि क्षेत्र में इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने में आने वाली चुनौतियों और उनके समाधान पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: अल नीनो और सूखे के संदर्भ में फसल विविधीकरण और जल-कुशल कृषि का संक्षिप्त परिचय।
मुख्य भाग:
1. फसल विविधीकरण की भूमिका: कम पानी वाली फसलों (जैसे बाजरा, दालें) की खेती, आय सुरक्षा, मृदा स्वास्थ्य में सुधार।
2. जल-कुशल कृषि पद्धतियों की भूमिका: ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर, वर्षा जल संचयन, मृदा नमी संरक्षण तकनीकों का महत्व।
3. महत्व: जल उपयोग दक्षता में वृद्धि, किसानों की आय में स्थिरता, खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन।
4. चुनौतियाँ: किसानों में जागरूकता की कमी, प्रारंभिक निवेश लागत, तकनीकी ज्ञान का अभाव, बाजार संपर्क की समस्या, पारंपरिक कृषि पद्धतियों से जुड़ाव।
5. समाधान: सरकारी सब्सिडी और प्रोत्साहन (जैसे बीज सब्सिडी), कृषि विश्वविद्यालयों और विस्तार सेवाओं के माध्यम से प्रशिक्षण, सूक्ष्म सिंचाई पर ध्यान केंद्रित करने वाली योजनाएँ (जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना), फसल बीमा योजनाएँ, बाजार लिंकेज को मजबूत करना।
निष्कर्ष: सूखे के प्रति लचीली कृषि प्रणाली बनाने के लिए इन उपायों के एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण का महत्व।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
Related guides on our sites
- Best geography optional coaching
- Best geography optional coaching
- Best geography optional teacher
- Best geography optional teacher
- पीएम-एसईटीयू योजना की सफलता के लिए सार्वजनिक-निजी क्षेत्रों का सक्रिय सहयोग आवश्यक: एम.बी. पाटिल - September 5, 2026
- PM-SETU Scheme: Why Public-Private Partnership is Critical for ITI Upgrades - September 5, 2026
- आईआईटी मद्रास ने लॉन्च किए भारतीय भाषाओं के लिए एआई मॉडल, यूपीएससी परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण - September 5, 2026

No Comments