ओडिशा का राजकोषीय घाटा 23.6 हजार करोड़ रुपये पार, जानिए कारण और प्रभाव

State fiscal deficit crosses Rs 23.6K crore — diagram

ओडिशा का राजकोषीय घाटा 23.6 हजार करोड़ रुपये पार, जानिए कारण और प्रभाव

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✎ राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उधार को छोड़कर उसकी कुल प्राप्तियों के बीच का अंतर है, जो सरकार की उधारी की आवश्यकता को दर्शाता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ।
  • Prelims: राजकोषीय घाटा, राजस्व घाटा, राजस्व अधिशेष, पूंजीगत व्यय, सार्वजनिक ऋण, केंद्र सरकार के अनुदान, राज्य वित्त आयोग
  • Essay: राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और संघवाद की चुनौतियाँ, सतत विकास के लिए राजकोषीय प्रबंधन का महत्व

त्वरित पुनरावृत्ति: राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उधार को छोड़कर उसकी कुल प्राप्तियों के बीच का अंतर है, जो सरकार की उधारी की आवश्यकता को दर्शाता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

ओडिशा के प्रधान महालेखाकार (PAG) द्वारा वित्त विभाग को प्रस्तुत एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025-26 में राज्य का राजकोषीय घाटा 23,650.89 करोड़ रुपये रहा। यह पिछले वर्ष (2024-25) के 25,042 करोड़ रुपये से मामूली रूप से कम है, लेकिन राज्य की वित्तीय स्थिति पर लगातार दबाव बना हुआ है। केंद्रीय अनुदानों में कमी और स्वयं के राजस्व स्रोतों से अपेक्षा से कम संग्रहण को इस स्थिति का प्रमुख कारण बताया गया है।

पृष्ठभूमि

  • राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) सरकार के कुल व्यय और कुल प्राप्तियों (उधार को छोड़कर) के बीच का अंतर होता है। यह दर्शाता है कि सरकार को अपने खर्चों को पूरा करने के लिए कितनी उधारी की आवश्यकता है।
  • राजस्व प्राप्तियाँ (Revenue Receipts) सरकार की वे प्राप्तियाँ हैं जिनसे न तो सरकार की देनदारी बढ़ती है और न ही उसकी परिसंपत्तियाँ घटती हैं। इनमें कर राजस्व (जैसे आयकर, GST) और गैर-कर राजस्व (जैसे लाभांश, ब्याज प्राप्तियाँ) शामिल हैं।
  • राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) सरकार का वह व्यय है जिससे न तो परिसंपत्तियों का निर्माण होता है और न ही देनदारियों में कमी आती है। इसमें वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और सब्सिडी शामिल हैं।
  • पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) सरकार का वह व्यय है जिससे परिसंपत्तियों का निर्माण होता है (जैसे सड़कें, अस्पताल, स्कूल) या देनदारियों में कमी आती है (जैसे ऋणों का पुनर्भुगतान)। इसे अक्सर विकासोन्मुखी व्यय माना जाता है।
  • राजस्व अधिशेष (Revenue Surplus) तब होता है जब सरकार की राजस्व प्राप्तियाँ उसके राजस्व व्यय से अधिक होती हैं। यह एक स्वस्थ वित्तीय स्थिति का संकेत माना जाता है, क्योंकि इसका अर्थ है कि सरकार अपने नियमित खर्चों को अपनी नियमित आय से पूरा कर रही है।
  • राज्यों को केंद्र सरकार से विभिन्न योजनाओं और वित्त आयोग की सिफारिशों के तहत अनुदान (Grants) प्राप्त होते हैं। ये अनुदान राज्यों के राजस्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और उनकी वित्तीय स्थिति को प्रभावित करते हैं।
  • सार्वजनिक ऋण (Public Debt) सरकार द्वारा विभिन्न स्रोतों से ली गई कुल उधारी को संदर्भित करता है, जिसमें आंतरिक उधारी और केंद्र सरकार से ऋण शामिल हैं।

राजकोषीय घाटा और इसके निहितार्थ

  • राजकोषीय घाटा सरकार के वित्तीय स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। उच्च राजकोषीय घाटा यह दर्शाता है कि सरकार अपनी आय से अधिक खर्च कर रही है और उसे इस अंतर को पूरा करने के लिए उधार लेना पड़ रहा है।
  • राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के प्रतिशत के रूप में व्यक्त किया जाता है ताकि विभिन्न अवधियों या विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं के बीच तुलना की जा सके।
  • राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने के लिए सरकार या तो बाज़ार से उधार लेती है (सरकारी बॉन्ड जारी करके) या केंद्रीय बैंक से उधार लेती है (जो अक्सर मुद्रास्फीति का कारण बन सकता है)।
  • लगातार उच्च राजकोषीय घाटा भविष्य की पीढ़ियों पर ऋण का बोझ बढ़ा सकता है, क्योंकि सरकार को इन ऋणों पर ब्याज का भुगतान करना पड़ता है।
  • पूंजीगत व्यय के लिए लिया गया उधार अक्सर उत्पादक माना जाता है, क्योंकि यह भविष्य में आर्थिक विकास को बढ़ावा दे सकता है। हालांकि, राजस्व व्यय के लिए उधार लेना चिंता का विषय हो सकता है।
  • राज्यों के राजकोषीय घाटे पर राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम जैसे कानूनों के माध्यम से सीमाएँ लगाई जाती हैं, ताकि वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित किया जा सके।
  • राज्यों के लिए अपने स्वयं के राजस्व स्रोतों को बढ़ाना (जैसे कर आधार का विस्तार, कर संग्रह दक्षता में सुधार) और व्यय प्रबंधन में सुधार करना महत्वपूर्ण है ताकि राजकोषीय घाटे को नियंत्रित किया जा सके।
  • केंद्र सरकार से प्राप्त अनुदानों में कमी राज्यों के राजकोषीय घाटे को बढ़ा सकती है, खासकर उन राज्यों के लिए जो इन अनुदानों पर अधिक निर्भर हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) यह सरकार की कुल आय (उधार को छोड़कर) और कुल व्यय के बीच का अंतर है। उच्च घाटा वित्तीय अस्थिरता का संकेत दे सकता है।
राजस्व घाटा (Revenue Deficit) राजस्व प्राप्तियों की तुलना में राजस्व व्यय का अधिक होना। यह दर्शाता है कि सरकार अपने दिन-प्रतिदिन के खर्चों को पूरा करने के लिए उधार ले रही है।
पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) सड़क, पुल, अस्पताल जैसी परिसंपत्तियों के निर्माण पर किया गया व्यय। यह दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा देता है।
केंद्रीय अनुदान (Central Grants) केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के लिए दिया गया वित्तीय हस्तांतरण। यह राज्य के राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत होता है।
राजस्व संग्रहण (Revenue Collection) राज्य सरकार द्वारा करों और गैर-कर स्रोतों से अर्जित आय। यह राज्य की वित्तीय आत्मनिर्भरता का सूचक है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • उच्च राजकोषीय घाटा राज्य की उधार लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है और भविष्य में ब्याज भुगतान का बोझ बढ़ा सकता है।
  • पूंजीगत व्यय में कमी या अपर्याप्त उपयोग दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि और अवसंरचना (Infrastructure) विकास को बाधित कर सकता है।

राजकोषीय प्रबंधन

  • राजस्व संग्रहण के लक्ष्यों को पूरा न कर पाना और व्यय का प्रभावी प्रबंधन न होना राज्य के राजकोषीय स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है।
  • केंद्रीय अनुदानों में कमी राज्यों को अपने स्वयं के राजस्व स्रोतों पर अधिक निर्भर रहने के लिए प्रेरित करती है, जिससे वित्तीय स्वायत्तता का महत्व बढ़ जाता है।

शासन और विकास

  • बजटीय आवंटन का प्रभावी ढंग से उपयोग न होना विकास कार्यक्रमों, विशेषकर अवसंरचना निर्माण में बाधा डालता है।
  • राजकोषीय दबाव के कारण राज्य सरकारें कल्याणकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं पर खर्च कम करने के लिए मजबूर हो सकती हैं।

चुनौतियाँ

1. घटते केंद्रीय अनुदान

  • केंद्र सरकार से प्राप्त होने वाले अनुदानों में लगातार कमी राज्यों के वित्तीय संसाधनों पर दबाव डाल रही है।
  • यह राज्यों को अपने विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने और कल्याणकारी योजनाओं को बनाए रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करने पर मजबूर करता है।

2. अपर्याप्त राजस्व संग्रहण

  • राज्य द्वारा अपने स्वयं के राजस्व स्रोतों से अपेक्षित संग्रहण न कर पाना राजकोषीय घाटे का एक प्रमुख कारण है।
  • यह कर आधार के विस्तार, कर अनुपालन में सुधार और गैर-कर राजस्व स्रोतों के प्रभावी दोहन की आवश्यकता को उजागर करता है।

3. पूंजीगत व्यय का प्रबंधन

  • राजस्व अधिशेष (Revenue Surplus) होने के बावजूद पूंजीगत व्यय के कारण राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है।
  • यह दर्शाता है कि पूंजीगत परियोजनाओं के लिए धन का प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं हो रहा है या वे योजनाबद्ध तरीके से निष्पादित नहीं हो रही हैं।

4. राजकोषीय अनुशासन का अभाव

  • दीर्घकालिक योजना की कमी और बजटीय आवंटन का अक्षम उपयोग राजकोषीय अनुशासन की चुनौती को दर्शाता है।
  • यह राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए सख्त व्यय नियंत्रण और राजस्व वृद्धि उपायों की आवश्यकता पर बल देता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
राजकोषीय घाटा ₹23,650 करोड़ से अधिक राज्य की वित्तीय स्थिरता और भविष्य में उधार लेने की क्षमता पर दबाव।
केंद्रीय अनुदानों में लगातार कमी राज्य के राजस्व स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाना और विकास परियोजनाओं के लिए धन की कमी।
राजस्व संग्रहण लक्ष्य से कम राज्य की वित्तीय आत्मनिर्भरता और विकास कार्यक्रमों के लिए आंतरिक संसाधनों की कमी।
पूंजीगत व्यय के बावजूद घाटा विकास परियोजनाओं के लिए प्रभावी धन उपयोग की कमी और दीर्घकालिक संवृद्धि पर संभावित नकारात्मक प्रभाव।
प्रशासकीय अक्षमता बजटीय आवंटन का उपयोग न कर पाना, जिससे विकास कार्यक्रमों और अवसंरचना निर्माण में बाधा।

आगे की राह

  • राजस्व संग्रहण में सुधार के लिए कर आधार का विस्तार करना और कर अनुपालन (Tax Compliance) को मजबूत करना।
  • गैर-कर राजस्व स्रोतों की पहचान करना और उनका प्रभावी ढंग से दोहन करना।
  • व्यय प्रबंधन में सुधार करना, विशेष रूप से अनावश्यक राजस्व व्यय पर नियंत्रण रखना।
  • पूंजीगत व्यय परियोजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन और समय पर पूरा होने को सुनिश्चित करना।
  • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के प्रावधानों का सख्ती से पालन करना।
  • केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर केंद्रीय अनुदानों के प्रवाह को स्थिर करने का प्रयास करना।
  • दीर्घकालिक वित्तीय योजना और बजटीय अनुशासन को बढ़ावा देना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राजकोषीय घाटा · राजस्व घाटा · राजस्व अधिशेष · पूंजीगत व्यय · राजस्व प्राप्तियां · राजस्व व्यय · केंद्र सरकार से अनुदान · सार्वजनिक ऋण · राजकोषीय समेकन · राज्य वित्त

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 280’, ‘note’: ‘वित्त आयोग (Finance Commission) का गठन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 282’, ‘note’: ‘केंद्र या राज्य द्वारा अनुदान (Grants) देना’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 292’, ‘note’: ‘भारत सरकार द्वारा उधार लेना’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 293’, ‘note’: ‘राज्यों द्वारा उधार लेना’}

अवधारणा प्रवाह

केंद्रीय अनुदानों में कमी  →  राजस्व संग्रहण लक्ष्य से कम  →  राजस्व व्यय का अधिक होना  →  पूंजीगत व्यय में वृद्धि  →  राजकोषीय घाटे में वृद्धि  →  राज्य की वित्तीय स्थिरता पर दबाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उसकी कुल प्राप्तियों (उधार को छोड़कर) के बीच का अंतर होता है।
2. राजस्व घाटा तब होता है जब सरकार का राजस्व व्यय उसकी राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो जाता है।
3. पूंजीगत व्यय में परिसंपत्तियों का निर्माण और ऋणों का पुनर्भुगतान शामिल होता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। राजकोषीय घाटा सरकार की उधार आवश्यकताओं को दर्शाता है। कथन 2 सही है। यह सरकार की राजस्व आय और व्यय के बीच असंतुलन को दर्शाता है। कथन 3 गलत है। पूंजीगत व्यय में परिसंपत्तियों का निर्माण और ऋणों का भुगतान शामिल होता है, लेकिन ऋणों का पुनर्भुगतान पूंजीगत व्यय का हिस्सा नहीं होता, बल्कि यह सार्वजनिक ऋण के प्रबंधन से संबंधित है।

Q2. राजकोषीय घाटे के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

  1. उच्च राजकोषीय घाटा हमेशा अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होता है।
  2. राजकोषीय घाटा सरकार की कुल प्राप्तियों में वृद्धि का संकेत देता है।
  3. राजकोषीय घाटा सरकार की उधार आवश्यकताओं को दर्शाता है।
  4. राजकोषीय घाटा केवल राजस्व व्यय में वृद्धि के कारण होता है।

उत्तर: राजकोषीय घाटा सरकार की उधार आवश्यकताओं को दर्शाता है। — राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उधार को छोड़कर उसकी कुल प्राप्तियों के बीच का अंतर होता है। यह सरकार की उधार आवश्यकताओं को दर्शाता है, जिसे वह बाजार से या अन्य स्रोतों से उधार लेकर पूरा करती है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ राजकोषीय घाटा क्या है और यह राज्य के वित्त पर किस प्रकार प्रभाव डालता है? हाल के समय में राज्यों के बढ़ते राजकोषीय घाटे के कारणों और इसके संभावित प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: राजकोषीय घाटे की परिभाषा और इसके घटकों का संक्षिप्त विवरण।
मुख्य भाग:
1. राजकोषीय घाटा और राज्य वित्त पर इसका प्रभाव: समझाएं कि राजकोषीय घाटा राज्य के वित्त को कैसे प्रभावित करता है, जैसे ऋण में वृद्धि, ब्याज भुगतान का बोझ, विकास व्यय में कमी।
2. हाल के समय में राज्यों के बढ़ते राजकोषीय घाटे के कारण:
क. केंद्र सरकार से अनुदान में कमी।
ख. स्वयं के राजस्व स्रोतों से कम संग्रहण।
ग. राजस्व व्यय में वृद्धि (वेतन, पेंशन, सब्सिडी)।
घ. पूंजीगत व्यय में वृद्धि (बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर खर्च)।
ङ. अप्रभावी वित्तीय प्रबंधन और दीर्घकालिक योजना का अभाव।
3. संभावित प्रभाव:
क. ऋण-GDP अनुपात में वृद्धि।
ख. भविष्य की पीढ़ियों पर वित्तीय बोझ।
ग. विकास परियोजनाओं के लिए संसाधनों की कमी।
घ. राज्य की ऋण चुकाने की क्षमता पर संदेह।
ङ. मुद्रास्फीति और ब्याज दरों पर दबाव।
निष्कर्ष: राजकोषीय समेकन (Fiscal Consolidation) के महत्व पर जोर दें और राजस्व बढ़ाने तथा व्यय को युक्तिसंगत बनाने के लिए उपायों का सुझाव दें।

स्रोत: orissapost.com


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