कन्नूर के निजी मैंग्रोव भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव क्यों अटका हुआ है? UPSC दृष्टिकोण

Proposal to acquire Kannur’s private mangrove land in limbo — labelled illustration

कन्नूर के निजी मैंग्रोव भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव क्यों अटका हुआ है? UPSC दृष्टिकोण

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3D cutaway: Proposal to acquire Kannur’s private mangrove land in limbo

✎ मैंग्रोव वन तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण घटक हैं जो जैव विविधता, तटीय सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन शमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और इनका संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल)  |  GS Paper II — शासन (सरकारी नीतियां और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे)  |  GS Paper III — पर्यावरण (पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन)
  • Prelims: मैंग्रोव वन, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र, अंतर्राष्ट्रीय मैंग्रोव दिवस, केरल के मैंग्रोव, वन संरक्षण अधिनियम, भूमि अधिग्रहण
  • Essay: पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास: एक संतुलनकारी कार्य, भारत में तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्व और संरक्षण चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: मैंग्रोव वन तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण घटक हैं जो जैव विविधता, तटीय सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन शमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और इनका संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

यह खबर चर्चा में क्यों?

अंतर्राष्ट्रीय मैंग्रोव दिवस (International Mangrove Day) के अवसर पर, केरल के कन्नूर जिले में निजी स्वामित्व वाली सैकड़ों हेक्टेयर मैंग्रोव भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव नीतिगत पंगुता (policy paralysis) का शिकार बना हुआ है। किसान अपनी भूमि सरकार को सौंपने के लिए वर्षों से सरकारी अनुमोदन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जबकि इस बीच मैंग्रोव का अंधाधुंध विनाश जारी है। वन विभाग का यह प्रस्ताव राज्य सरकार के पास लंबित है, जिससे संरक्षण प्रयासों और भूमि मालिकों दोनों को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।

पृष्ठभूमि

  • पिछले 30 वर्षों में, कन्नूर में मैंग्रोव का आवरण 24 वर्ग किमी से घटकर 12.47 वर्ग किमी हो गया है, जो गंभीर चिंता का विषय है।
  • कन्नूर जिले में केरल के मैंग्रोव आवरण का लगभग 75% (1,670 हेक्टेयर) हिस्सा है, लेकिन केवल 100 हेक्टेयर से अधिक सरकारी स्वामित्व वाले पैच को ही आरक्षित वन (reserve forests) के रूप में अधिसूचित किया गया है।
  • यह मुद्दा 2002 का है, जब राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को निजी स्वामित्व वाली मैंग्रोव भूमि का अधिग्रहण करने और उसे हस्तांतरित करने के लिए केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय (Union Ministry of Environment and Forests) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
  • इस समझौते के तहत, केंद्र सरकार को कासरगोड, कन्नूर, कोझिकोड, मलप्पुरम, पालक्काड और वायनाड जिलों में भूमिहीन आदिवासी परिवारों के पुनर्वास के लिए 7,693.2257 हेक्टेयर वन भूमि प्रदान करनी थी, लेकिन यह समझौता अभी तक लागू नहीं हुआ है।
  • रीबिल्ड केरल इनिशिएटिव (Rebuild Kerala Initiative) के तहत, राज्य ने पूरे केरल में 1,200 हेक्टेयर मैंग्रोव भूमि के अधिग्रहण के लिए प्रशासनिक स्वीकृति दी थी, जिसमें कन्नूर के 284 भूमि मालिक अपनी भूमि सौंपने को तैयार थे, लेकिन अधिग्रहण प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं हुई है।
  • भूमि मालिकों का कहना है कि लंबे समय से हो रही देरी ने कई परिवारों को संकट में डाल दिया है, क्योंकि वे अपनी भूमि का विकास नहीं कर सकते, स्वतंत्र रूप से खेती नहीं कर सकते और न ही उन्हें मुआवजा मिल रहा है।

मैंग्रोव वन क्या हैं?

  • मैंग्रोव उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले अद्वितीय तटीय पारिस्थितिकी तंत्र (coastal ecosystem) हैं, जो खारे पानी में पनपने वाले पेड़ों और झाड़ियों से बने होते हैं।
  • ये वन तटीय क्षेत्रों को चक्रवातों, सुनामी और मृदा अपरदन (soil erosion) से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • मैंग्रोव कई समुद्री प्रजातियों के लिए नर्सरी, प्रजनन स्थल और भोजन का स्रोत प्रदान करते हैं, जिससे जैव विविधता (biodiversity) को बढ़ावा मिलता है।
  • ये कार्बन पृथक्करण (carbon sequestration) में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन (climate change) के प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है।
  • भारत में, मैंग्रोव मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, गुजरात, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गोवा और केरल के तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
  • सुंदरबन (पश्चिम बंगाल) भारत में सबसे बड़ा मैंग्रोव वन क्षेत्र है, जिसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) के रूप में भी मान्यता प्राप्त है।
  • मैंग्रोव वनों का संरक्षण पर्यावरण संतुलन, तटीय समुदायों की आजीविका और जलवायु परिवर्तन शमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
मैंग्रोव वन तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण घटक, समुद्री जैव विविधता के संरक्षक।
निजी स्वामित्व केरल में 496 हेक्टेयर मैंग्रोव निजी स्वामित्व में हैं, जिससे संरक्षण प्रयासों में बाधा आती है।
कन्नूर जिला केरल के कुल मैंग्रोव आवरण का लगभग 75% (1,670 हेक्टेयर) यहीं है।
वन विभाग का प्रस्ताव निजी मैंग्रोव भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव राज्य सरकार के पास लंबित है।
भूमि अधिग्रहण में देरी किसानों को अपनी भूमि छोड़ने की इच्छा के बावजूद वर्षों से सरकारी मंजूरी का इंतजार है।
मैंग्रोव आवरण में कमी पिछले 30 वर्षों में मैंग्रोव आवरण 24 वर्ग किमी से घटकर 12.47 वर्ग किमी हो गया है।

महत्व

पर्यावरण और पारिस्थितिकी

  • मैंग्रोव तटीय कटाव को रोकते हैं और तूफान तथा सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाव करते हैं।
  • ये कई समुद्री प्रजातियों के लिए नर्सरी और प्रजनन स्थल के रूप में कार्य करते हैं, जैव विविधता को बनाए रखते हैं।
  • कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक हैं।

सामाजिक और आर्थिक

  • स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका का स्रोत (मछली पकड़ना, लकड़ी आदि)।
  • भूमि मालिकों की आजीविका मैंग्रोव भूमि पर निर्भर करती है, जिससे अधिग्रहण में देरी से संकट उत्पन्न होता है।
  • संरक्षण में देरी से मैंग्रोव का विनाश जारी है, जिससे दीर्घकालिक पारिस्थितिक और आर्थिक नुकसान हो रहा है।

शासन और नीति

  • राज्य और केंद्र सरकार के बीच 2002 के समझौते का कार्यान्वयन लंबित है।
  • नीतिगत पक्षाघात (Policy Paralysis) के कारण संरक्षण प्रयास और भूमि मालिक दोनों अधर में लटके हैं।
  • पुनर्निर्माण केरल पहल (Rebuild Kerala Initiative) के तहत भी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है, जो सरकारी योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन पर सवाल उठाता है।

चुनौतियाँ

1. भूमि अधिग्रहण में देरी

  • निजी मैंग्रोव भूमि के अधिग्रहण में वर्षों की देरी हो रही है, जिससे संरक्षण और भूमि मालिकों दोनों को नुकसान हो रहा है।
  • किसानों को अपनी भूमि विकसित करने या उस पर खेती करने की स्वतंत्रता नहीं है, न ही उन्हें मुआवजा मिल रहा है।

2. नीतिगत पक्षाघात

  • राज्य सरकार के पास वन विभाग का अधिग्रहण प्रस्ताव लंबित है, जिससे निर्णय लेने में गतिरोध है।
  • केंद्र और राज्य के बीच 2002 के समझौते का कार्यान्वयन न होना एक बड़ी चुनौती है।

3. पर्यावरणीय क्षरण

  • अंधाधुंध मैंग्रोव विनाश जारी है, जिससे पिछले 30 वर्षों में मैंग्रोव आवरण में भारी कमी आई है।
  • संरक्षण प्रयासों में देरी से पारिस्थितिकी तंत्र को अपरिवर्तनीय क्षति हो रही है।

4. आजीविका का संकट

  • जिन परिवारों की आजीविका इन मैंग्रोव संपत्तियों पर निर्भर करती है, उन्हें अधिग्रहण में देरी के कारण संकट का सामना करना पड़ रहा है।
  • मुआवजे या भूमि के उपयोग पर स्पष्टता न होने से अनिश्चितता बनी हुई है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
निजी मैंग्रोव भूमि का अधिग्रहण किसानों की सहमति के बावजूद वर्षों से लंबित प्रक्रिया, जिससे उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है।
नीतिगत पक्षाघात राज्य सरकार द्वारा वन विभाग के अधिग्रहण प्रस्ताव पर निर्णय न लेना, जिससे संरक्षण प्रयास बाधित हो रहे हैं।
मैंग्रोव आवरण में कमी अंधाधुंध विनाश के कारण पिछले 30 वर्षों में मैंग्रोव क्षेत्र में 50% से अधिक की कमी आई है।
केंद्र-राज्य समझौता 2002 में हुए समझौते का अभी तक कार्यान्वयन न होना, जिससे आदिवासी पुनर्वास और मैंग्रोव संरक्षण दोनों प्रभावित हैं।
पुनर्निर्माण केरल पहल इस पहल के तहत भी मैंग्रोव भूमि अधिग्रहण की प्रशासनिक मंजूरी के बावजूद प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है।
स्थानीय समुदायों पर प्रभाव भूमि मालिकों को न तो अपनी भूमि का उपयोग करने की अनुमति है और न ही उन्हें मुआवजा मिल रहा है, जिससे वे संकट में हैं।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • पुनर्निर्माण केरल पहल (Rebuild Kerala Initiative)

आगे की राह

  • राज्य सरकार को निजी मैंग्रोव भूमि अधिग्रहण प्रस्ताव को प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी देनी चाहिए।
  • केंद्र और राज्य सरकारों को 2002 के समझौते को तत्काल लागू करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।
  • भूमि मालिकों को उचित और समय पर मुआवजा प्रदान करने के लिए एक पारदर्शी तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।
  • मैंग्रोव संरक्षण के लिए एक व्यापक नीति तैयार की जानी चाहिए, जिसमें निजी भूमि मालिकों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
  • अवैध मैंग्रोव विनाश को रोकने के लिए सख्त प्रवर्तन और निगरानी तंत्र स्थापित किए जाने चाहिए।
  • मैंग्रोव के पारिस्थितिक महत्व के बारे में जन जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए।
  • संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मैंग्रोव संरक्षण · भूमि अधिग्रहण · पर्यावरण नीति · नीतिगत पक्षाघात · तटीय पारिस्थितिकी · पुनर्वास · राज्य-केंद्र संबंध · सतत विकास · वन अधिकार · पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और सुधार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (g)’, ‘note’: ‘पर्यावरण की रक्षा और सुधार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ और राज्य के बीच विधायी संबंध’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 300A’, ‘note’: ‘कानून के प्राधिकार के बिना संपत्ति से वंचित न करना’}

अवधारणा प्रवाह

मैंग्रोव का पारिस्थितिक महत्व और विनाश  →  निजी स्वामित्व और भूमि अधिग्रहण का प्रस्ताव  →  नीतिगत पक्षाघात और सरकारी मंजूरी में देरी  →  भूमि मालिकों की आजीविका का संकट और मैंग्रोव का निरंतर क्षरण  →  पर्यावरण और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों में वृद्धि

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मैंग्रोव वनस्पति खारे पानी में उगने वाले पेड़ों और झाड़ियों का एक समूह है।
2. मैंग्रोव तटीय कटाव को रोकने और तूफानों से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
3. भारत में मैंग्रोव का सबसे बड़ा क्षेत्र सुंदरबन में पाया जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। मैंग्रोव विशिष्ट प्रकार की वनस्पति है जो खारे और अर्ध-खारे तटीय वातावरण में पनपती है। कथन 2 सही है। मैंग्रोव अपनी मजबूत जड़ प्रणालियों के कारण तटीय कटाव को कम करने और तूफानों तथा सुनामी से सुरक्षा प्रदान करने में महत्वपूर्ण हैं। कथन 3 सही है। भारत में मैंग्रोव का सबसे बड़ा और सघन क्षेत्र पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में है, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी है।

Q2. मैंग्रोव वनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
1. मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
2. मैंग्रोव की जड़ें कई समुद्री जीवों के लिए नर्सरी मैदान का काम करती हैं।
3. मैंग्रोव वन केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 2
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 सही है। मैंग्रोव ‘ब्लू कार्बन’ पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं और वायुमंडल से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित तथा संग्रहीत करते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन को कम करने में मदद मिलती है। कथन 2 सही है। मैंग्रोव की जटिल जड़ प्रणालियाँ मछली, केकड़ों और अन्य समुद्री जीवों के लिए सुरक्षित प्रजनन और पालन-पोषण का स्थान प्रदान करती हैं। कथन 3 गलत है। मैंग्रोव मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं, लेकिन कुछ प्रजातियाँ समशीतोष्ण क्षेत्रों में भी पाई जाती हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के महत्व पर चर्चा कीजिए। भारत में मैंग्रोव संरक्षण से संबंधित प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए और इन चुनौतियों से निपटने के लिए संभावित उपायों का सुझाव दीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** मैंग्रोव वनों का संक्षिप्त परिचय और उनके पारिस्थितिक महत्व का उल्लेख।
2. **मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र का महत्व:**
* **पारिस्थितिक महत्व:** तटीय कटाव की रोकथाम, तूफान और सुनामी से सुरक्षा, जैव विविधता का संरक्षण (मछली, पक्षी, सरीसृप आदि के लिए आवास), कार्बन पृथक्करण (ब्लू कार्बन), जल गुणवत्ता में सुधार।
* **आर्थिक महत्व:** स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका (मछली पकड़ना, लकड़ी, शहद), पर्यटन को बढ़ावा।
3. **मैंग्रोव संरक्षण से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ:**
* **भूमि अधिग्रहण में देरी:** निजी स्वामित्व वाली मैंग्रोव भूमि के अधिग्रहण में नीतिगत पक्षाघात और प्रशासनिक देरी (केरल के कन्नूर का उदाहरण)।
* **अवैध कटाई और अतिक्रमण:** कृषि, जलीय कृषि, शहरीकरण और औद्योगिक विकास के लिए मैंग्रोव का विनाश।
* **प्रदूषण:** औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज और प्लास्टिक प्रदूषण का मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव।
* **जलवायु परिवर्तन:** समुद्र के स्तर में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाएँ।
* **जागरूकता की कमी:** स्थानीय समुदायों और नीति निर्माताओं के बीच मैंग्रोव के महत्व के बारे में अपर्याप्त जागरूकता।
* **अंतर-विभागीय समन्वय का अभाव:** विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी।
4. **चुनौतियों से निपटने के लिए संभावित उपाय:**
* **त्वरित भूमि अधिग्रहण:** निजी स्वामित्व वाली मैंग्रोव भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और तेज करना, उचित मुआवजा सुनिश्चित करना।
* **कठोर कानूनी प्रवर्तन:** मैंग्रोव के विनाश और अतिक्रमण को रोकने के लिए मौजूदा कानूनों का प्रभावी ढंग से कार्यान्वयन।
* **सामुदायिक भागीदारी:** स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों में शामिल करना और उन्हें वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान करना।
* **जागरूकता कार्यक्रम:** मैंग्रोव के महत्व के बारे में जन जागरूकता बढ़ाना।
* **अनुसंधान और निगरानी:** मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन और प्रभावी प्रबंधन रणनीतियाँ विकसित करना।
* **अंतर-राज्यीय और केंद्र-राज्य समन्वय:** संरक्षण प्रयासों के लिए बेहतर समन्वय तंत्र स्थापित करना (जैसे 2002 का केंद्र-राज्य समझौता)।
* **राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) जैसे सतत विकास लक्ष्यों के साथ एकीकरण।**
5. **निष्कर्ष:** मैंग्रोव संरक्षण के महत्व को रेखांकित करते हुए एक संतुलित और सतत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देना।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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