कर्नाटक उच्च न्यायालय का फैसला: राजवंशीय संपत्तियों पर उत्तराधिकार कानून लागू नहीं, जानिए पूरी कहानी

Protection for certain royal estates from succession law still valid despite abolition of privy purses and privileges: K — concept mind map

कर्नाटक उच्च न्यायालय का फैसला: राजवंशीय संपत्तियों पर उत्तराधिकार कानून लागू नहीं, जानिए पूरी कहानी

Royal estate succession rulesHindu Succession Act 1956Section 5(ii)Excludes certain royal estatesPrincely States Merger1947-1950Agreements included privy pursesConstitution Articles291, 362Guaranteed privy purses26th Amendment 1971Removed Articles 291, 362Added Article 363-AKarnataka HC Ruling2024Section 5(ii) remains valid
Royal estate succession rules

✎ कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पुष्टि की है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii), जो पूर्व शाही परिवारों की कुछ अविभाज्य संपदाओं को विभाजन से छूट देती है, प्रिवी पर्स और शाही विशेषाधिकारों के उन्मूलन के बावजूद वैध बनी हुई…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, संविधान और सामाजिक न्याय  |  GS Paper I — भारतीय इतिहास
  • Prelims: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 291, अनुच्छेद 362, अनुच्छेद 363-A, 26वाँ संविधान संशोधन, प्रिवी पर्स, शाही विशेषाधिकार, राजगद्दी, अविभाज्य संपदा
  • Essay: भारत में संवैधानिक विकास और रियासतों का एकीकरण, न्यायिक सक्रियता और संवैधानिक नैतिकता

त्वरित पुनरावृत्ति: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पुष्टि की है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii), जो पूर्व शाही परिवारों की कुछ अविभाज्य संपदाओं को विभाजन से छूट देती है, प्रिवी पर्स और शाही विशेषाधिकारों के उन्मूलन के बावजूद वैध बनी हुई है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला सुनाया है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii) अभी भी वैध है। यह धारा पूर्व शाही परिवारों की कुछ संपदाओं को अधिनियम के तहत विभाजन से बाहर रखती है। न्यायालय ने यह निर्णय प्रिवी पर्स (Privy Purses) और शाही विशेषाधिकारों (Royal Privileges) के उन्मूलन के पाँच दशक से अधिक समय बाद भी इस प्रावधान की प्रासंगिकता पर दिया है, जो संविधान में संशोधन के माध्यम से समाप्त कर दिए गए थे। यह निर्णय मैसूर और संदूर के पूर्व शाही परिवारों के सदस्यों के बीच संपत्ति विभाजन संबंधी विवादों से संबंधित याचिकाओं पर आया है।

पृष्ठभूमि

  • भारत की स्वतंत्रता के बाद, विभिन्न रियासतों (Princely States) का भारतीय संघ में विलय किया गया था।
  • विलय समझौतों (Merger Agreements) के तहत, तत्कालीन शासकों को प्रिवी पर्स (एक निश्चित वार्षिक भुगतान) और कुछ व्यक्तिगत अधिकारों व विशेषाधिकारों की गारंटी दी गई थी।
  • संविधान के अनुच्छेद 291 और अनुच्छेद 362 इन प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों से संबंधित थे।
  • वर्ष 1971 में, 26वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 291 और अनुच्छेद 362 को समाप्त कर दिया गया तथा अनुच्छेद 363-A को जोड़ा गया, जिससे प्रिवी पर्स और शाही विशेषाधिकारों का अंत हो गया।
  • इस संशोधन का उद्देश्य भारतीय समाज में समानता स्थापित करना और पूर्व शासकों को प्राप्त विशेष दर्जे को समाप्त करना था।
  • याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों के उन्मूलन के साथ, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 5(ii) भी अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii) क्या है?

  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act, 1956) हिंदुओं के बीच संपत्ति के उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला एक महत्वपूर्ण कानून है।
  • यह अधिनियम मिताक्षरा और दयाभाग जैसे पारंपरिक हिंदू कानून के विभिन्न स्कूलों द्वारा शासित उत्तराधिकार के नियमों को संहिताबद्ध करता है।
  • धारा 5(ii) अधिनियम के उन प्रावधानों में से एक है जो कुछ विशिष्ट संपदाओं पर लागू नहीं होते हैं।
  • यह धारा विशेष रूप से उन संपदाओं का उल्लेख करती है जो किसी भारतीय राज्य के शासक द्वारा भारत सरकार के साथ किए गए किसी भी समझौते या अनुबंध की शर्तों के अनुसार, या इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले पारित किसी भी अधिनियम की शर्तों के अनुसार, एकल उत्तराधिकारी को प्राप्त होती हैं।
  • ऐसी संपदाओं को ‘अविभाज्य संपदा’ (Impartible Estate) के रूप में जाना जाता है, जिसका अर्थ है कि उन्हें परिवार के सदस्यों के बीच विभाजित नहीं किया जा सकता है।
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 291 और 362 का उन्मूलन केवल प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों से संबंधित था, न कि शासकों की निजी संपत्तियों और राजगद्दी (Gaddi) से।
  • न्यायालय के अनुसार, विलय समझौतों में प्रिवी पर्स, निजी संपत्तियों और राजगद्दी के उत्तराधिकार को अलग-अलग संबोधित किया गया था।
  • अतः, 26वें संशोधन का धारा 5(ii) की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii) यह प्रावधान कुछ शाही संपदाओं को अधिनियम के विभाजन के दायरे से बाहर रखता है, जिससे वे अविभाज्य बनी रहती हैं।
प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों का उन्मूलन संविधान के 26वें संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 291 और 362 को हटाकर पूर्व शासकों के प्रिवी पर्स और विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए थे।
गद्दी (राजगद्दी) का महत्व अदालत ने माना कि गद्दी का औपचारिक महत्व भले ही कम हो गया हो, लेकिन प्रथागत और व्यावहारिक दृष्टिकोण से यह अभी भी प्रासंगिक है।
विलय समझौते मैसूर और संदूर रियासतों के भारत सरकार के साथ हुए विलय समझौतों में प्रिवी पर्स, निजी संपत्तियों और गद्दी के उत्तराधिकार को अलग-अलग संबोधित किया गया था।
न्यायालय का निर्णय कर्नाटक उच्च न्यायालय ने माना कि प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों के उन्मूलन का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 5(ii) की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

महत्व

कानूनी और संवैधानिक महत्व

  • यह निर्णय संविधान के 26वें संशोधन के बाद भी शाही संपदाओं के उत्तराधिकार से संबंधित विशेष प्रावधानों की निरंतर वैधता को स्थापित करता है।
  • यह हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii) की व्याख्या और उसके संवैधानिक प्रावधानों के साथ संबंध को स्पष्ट करता है।

सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व

  • यह निर्णय भारत में रियासतों के विलय के बाद उत्पन्न हुए संपत्ति विवादों और उनके निपटान के लिए कानूनी ढांचे को समझने में मदद करता है।
  • यह पूर्व शाही परिवारों की संपत्तियों के प्रबंधन और उत्तराधिकार से संबंधित प्रथागत कानूनों और आधुनिक कानूनों के बीच के जटिल संबंधों को दर्शाता है।

शासन और प्रशासन

  • यह सरकार द्वारा किए गए समझौतों और संवैधानिक संशोधनों के दीर्घकालिक प्रभावों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है।
  • यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति को दर्शाता है, जहाँ न्यायालय संवैधानिक संशोधनों के बावजूद मौजूदा कानूनों की वैधता की जांच करता है।

चुनौतियाँ

1. कानूनी अस्पष्टता और व्याख्या

  • संविधान के 26वें संशोधन के बाद भी कुछ शाही संपदाओं के लिए विशेष कानूनी प्रावधानों की निरंतरता पर अस्पष्टता बनी हुई थी।
  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 5(ii) और संवैधानिक संशोधनों के बीच संबंध की सटीक व्याख्या एक चुनौती थी।

2. रियासतों के विलय के बाद की चुनौतियाँ

  • भारत में रियासतों के विलय के बाद उनके शासकों की निजी संपत्ति, प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों से संबंधित मुद्दों का समाधान करना एक जटिल प्रक्रिया थी।
  • विलय समझौतों में उल्लिखित विभिन्न प्रावधानों की व्याख्या और उनके वर्तमान कानूनी प्रभाव को समझना।

3. प्रथागत बनाम आधुनिक कानून

  • शाही परिवारों में उत्तराधिकार के प्रथागत नियमों और आधुनिक हिंदू उत्तराधिकार कानून के बीच सामंजस्य स्थापित करना।
  • ‘गद्दी’ जैसी अवधारणाओं का आधुनिक कानूनी संदर्भ में महत्व और प्रासंगिकता निर्धारित करना।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
धारा 5(ii) की प्रासंगिकता याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रिवी पर्स के उन्मूलन के बाद यह प्रावधान अप्रासंगिक हो गया है।
गद्दी की अवधारणा याचिकाकर्ताओं का दावा था कि गद्दी की अवधारणा अपना अर्थ और उद्देश्य खो चुकी है।
संवैधानिक संशोधन का प्रभाव यह निर्धारित करना कि अनुच्छेद 291 और 362 को हटाने और अनुच्छेद 363-ए को जोड़ने का धारा 5(ii) की वैधता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
संपत्ति का विभाजन शाही परिवारों के सदस्यों के बीच संपत्ति के विभाजन को लेकर विवाद, विशेष रूप से अविभाज्य संपदाओं के संबंध में।

आगे की राह

  • न्यायिक निर्णयों के माध्यम से संवैधानिक प्रावधानों और व्यक्तिगत कानूनों की स्पष्ट व्याख्या जारी रखी जाए।
  • रियासतों के विलय से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों और समझौतों का गहन अध्ययन किया जाए ताकि कानूनी विवादों को सुलझाया जा सके।
  • व्यक्तिगत कानूनों में आवश्यक सुधारों पर विचार किया जाए ताकि वे बदलते सामाजिक परिवेश के अनुरूप हों, जबकि ऐतिहासिक संदर्भों का भी सम्मान किया जाए।
  • जनता को संवैधानिक संशोधनों और उनके प्रभावों के बारे में शिक्षित किया जाए ताकि कानूनी जागरूकता बढ़े।
  • भविष्य के संपत्ति विवादों को कम करने के लिए पूर्व शाही परिवारों की संपत्तियों के संबंध में एक स्पष्ट और व्यापक कानूनी ढांचा विकसित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 · राजसी संपदा · प्रिवी पर्स · शाही विशेषाधिकार · संविधान का 26वां संशोधन · अनुच्छेद 363-ए · एकल उत्तराधिकारी · विलय समझौते · न्यायिक समीक्षा · संघवाद

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 291’, ‘note’: ‘प्रिवी पर्स के भुगतान की गारंटी’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 362’, ‘note’: ‘शासकों के अधिकारों और विशेषाधिकारों की सुरक्षा’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 363-ए’, ‘note’: ‘शासकों की मान्यता और प्रिवी पर्स का उन्मूलन’}
  • {‘article’: ’26वां संवैधानिक संशोधन’, ‘note’: ‘प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों का उन्मूलन’}

अवधारणा प्रवाह

पूर्व रियासतों का भारत में विलय  →  विलय समझौतों में प्रिवी पर्स, निजी संपत्ति, गद्दी का उल्लेख  →  संविधान के अनुच्छेद 291, 362 द्वारा प्रिवी पर्स, विशेषाधिकारों की गारंटी  →  26वां संवैधानिक संशोधन: अनुच्छेद 291, 362 का उन्मूलन, अनुच्छेद 363-ए का समावेश  →  हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii) द्वारा कुछ शाही संपदाओं का अविभाज्य रहना  →  न्यायालय का निर्णय: प्रिवी पर्स उन्मूलन के बावजूद धारा 5(ii) वैध

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रिवी पर्स और शाही विशेषाधिकारों का उन्मूलन संविधान के 26वें संशोधन द्वारा किया गया था।
2. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii) कुछ शाही संपदाओं को अधिनियम के दायरे से बाहर रखती है।
3. कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में माना है कि प्रिवी पर्स के उन्मूलन के बावजूद धारा 5(ii) अब वैध नहीं है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। प्रिवी पर्स और शाही विशेषाधिकारों को 26वें संविधान संशोधन द्वारा समाप्त किया गया था। कथन 2 भी सही है। धारा 5(ii) कुछ शाही संपदाओं को विभाजन से छूट देती है। कथन 3 गलत है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने माना है कि धारा 5(ii) अभी भी वैध है, प्रिवी पर्स के उन्मूलन के बावजूद।

Q2. सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए और सूचियों के नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
सूची-I (संवैधानिक प्रावधान)
A. अनुच्छेद 291
B. अनुच्छेद 362
C. अनुच्छेद 363-ए
सूची-II (विषय)
1. शासकों के प्रिवी पर्स की राशि
2. शासकों के अधिकार और विशेषाधिकार
3. शासकों की मान्यता का उन्मूलन और प्रिवी पर्स की समाप्ति
कूट:
A B C

  1. 1 2 3
  2. 2 1 3
  3. 3 2 1
  4. 1 3 2

उत्तर: 1 2 3 — अनुच्छेद 291 शासकों के प्रिवी पर्स की राशि से संबंधित था। अनुच्छेद 362 शासकों के अधिकार और विशेषाधिकारों से संबंधित था। अनुच्छेद 363-ए को 26वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया था और इसने शासकों की मान्यता को समाप्त कर दिया तथा प्रिवी पर्स को समाप्त कर दिया।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ हाल ही में कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्णय के आलोक में, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii) की संवैधानिक वैधता और पूर्व रियासतों की संपदाओं पर इसके निहितार्थों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या प्रिवी पर्स और शाही विशेषाधिकारों के उन्मूलन के बाद भी ऐसी विशेष व्यवस्थाओं का औचित्य बना रहता है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** कर्नाटक उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का संक्षिप्त उल्लेख, जिसमें हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 5(ii) की वैधता को बरकरार रखा गया है।
2. **धारा 5(ii) का प्रावधान:** स्पष्ट रूप से बताएं कि यह धारा किस प्रकार कुछ शाही संपदाओं को अधिनियम के विभाजन प्रावधानों से छूट देती है, विशेष रूप से उन संपदाओं को जो किसी समझौते या अधिनियम के तहत एकल उत्तराधिकारी को मिलती हैं।
3. **प्रिवी पर्स और विशेषाधिकारों का उन्मूलन:**
* संविधान के 26वें संशोधन का उल्लेख, जिसने अनुच्छेद 291 (प्रिवी पर्स) और 362 (अधिकार और विशेषाधिकार) को निरस्त किया और अनुच्छेद 363-ए को जोड़ा।
* बताएं कि यह उन्मूलन कैसे पूर्व शासकों के ‘राजसी’ दर्जे और वित्तीय लाभों को समाप्त करने के उद्देश्य से था।
4. **न्यायालय का तर्क:**
* उच्च न्यायालय के तर्क को स्पष्ट करें कि अनुच्छेद 291 और 362 का उन्मूलन केवल प्रिवी पर्स और व्यक्तिगत विशेषाधिकारों से संबंधित था, न कि शासकों की निजी संपत्तियों या गद्दी (पैतृक सिंहासन) से।
* विलय समझौतों का उल्लेख करें, जिन्होंने प्रिवी पर्स, निजी संपत्तियों और गद्दी के उत्तराधिकार को अलग-अलग निपटाया था।
* न्यायालय ने कैसे माना कि धारा 5(ii) का उद्देश्य प्रिवी पर्स के उन्मूलन से अप्रभावित रहता है।
5. **औचित्य का समालोचनात्मक परीक्षण:**
* **पक्ष में तर्क:** ऐतिहासिक संदर्भ, विलय समझौतों की शर्तों का सम्मान, निजी संपत्ति के अधिकारों की सुरक्षा, और यह कि धारा 5(ii) का संबंध ‘राजसी’ स्थिति से नहीं बल्कि विशिष्ट उत्तराधिकार पैटर्न से है।
* **विपक्ष में तर्क:** समानता के सिद्धांत का उल्लंघन, ‘शाही’ अवधारणाओं का आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में प्रासंगिकता खोना, और विशेष विशेषाधिकारों को जारी रखने का नैतिक प्रश्न।
* संविधान के मूल ढांचे और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के साथ इस प्रावधान की संगति पर विचार।
6. **निष्कर्ष:** एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें, जिसमें न्यायालय के निर्णय की कानूनी सुदृढ़ता और आधुनिक भारत में ऐसे प्रावधानों की निरंतर प्रासंगिकता पर बहस को संक्षेप में प्रस्तुत किया जाए।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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