08 Aug केरल उच्च न्यायालय ने काजू आयात घोटाले के आरोपी के खिलाफ याचिका पर सीबीआई और राज्य सरकार से जवाब तलब किया
✎ केरल उच्च न्यायालय का यह मामला सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार, जवाबदेही और नैतिक आचरण के महत्व पर प्रकाश डालता है, जहाँ न्यायिक समीक्षा के माध्यम से सरकारी नियुक्तियों की सत्यनिष्ठा की जाँच की जा रही है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, शासन और सामाजिक न्याय | GS Paper IV — नैतिकता, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि
- Prelims: भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), सार्वजनिक पद, नैतिकता और शासन, न्यायिक समीक्षा, राज्य सतर्कता आयोग
- Essay: भ्रष्टाचार मुक्त शासन: चुनौतियाँ और समाधान, सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और जवाबदेही का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: केरल उच्च न्यायालय का यह मामला सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार, जवाबदेही और नैतिक आचरण के महत्व पर प्रकाश डालता है, जहाँ न्यायिक समीक्षा के माध्यम से सरकारी नियुक्तियों की सत्यनिष्ठा की जाँच की जा रही है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय ने ₹600 करोड़ के काजू आयात घोटाले के आरोपी केरल राज्य काजू विकास निगम (Kerala State Cashew Development Corporation – KSCDC) के पूर्व प्रबंध निदेशक के.ए. रतीश को महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त करने के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सीबीआई द्वारा आरोप-पत्रित व्यक्ति को सरकारी पदों पर नियुक्त करना सार्वजनिक सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता के स्थापित मानदंडों का उल्लंघन है।
पृष्ठभूमि
- के.ए. रतीश पर 2006 से 2015 के बीच KSCDC द्वारा कच्चे काजू के आयात में कथित गबन का आरोप है।
- सीबीआई ने रतीश और निगम के पूर्व अध्यक्ष आर. चंद्रशेखरन के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिसमें उन पर अधिक दरों पर काजू खरीदने के लिए एक निजी आपूर्तिकर्ता को बेईमानी से ठेके देने का आरोप है।
- याचिकाकर्ता, पूर्व मुख्यमंत्री के अतिरिक्त निजी सचिव के.एम. शाहजहाँ ने आरोप लगाया है कि रतीश वर्तमान में केरल खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड (Kerala Khadi and Village Industries Board) के सचिव, RUTRONIX के प्रबंध निदेशक और केरल खादी श्रमिक कल्याण निधि बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं।
- याचिका में राज्य सरकार से यह सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई है कि रतीश को चल रहे भ्रष्टाचार के मामले के मद्देनजर महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त न किया जाए।
- यह मामला सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार और जवाबदेही के मुद्दों को उजागर करता है, विशेष रूप से उन व्यक्तियों की नियुक्ति के संबंध में जिनके खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) भारत की प्रमुख जाँच एजेंसी है, जो कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय (Ministry of Personnel, Public Grievances and Pensions) के अधीन है।
- यह भ्रष्टाचार, आर्थिक अपराधों और गंभीर एवं संगठित अपराधों से संबंधित मामलों की जाँच करती है। इसकी स्थापना संथानम समिति (Santhanam Committee) की सिफारिशों पर की गई थी।
- सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का अर्थ है सार्वजनिक पद धारण करने वाले व्यक्तियों द्वारा उच्च नैतिक मानकों का पालन करना, जिसमें सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता, जवाबदेही और निस्वार्थता शामिल है।
- भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार को रोकने और दंडित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) न्यायपालिका की वह शक्ति है जिसके तहत वह विधायिका द्वारा पारित कानूनों और कार्यपालिका द्वारा जारी आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करती है। इस मामले में, उच्च न्यायालय सरकार के निर्णय की वैधता की जाँच कर रहा है।
- सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियों में पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करना सुशासन (Good Governance) का एक महत्वपूर्ण पहलू है, ताकि जनता का विश्वास बना रहे और हितों के टकराव से बचा जा सके।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सार्वजनिक पद पर भ्रष्टाचार के आरोप | भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद एक व्यक्ति का महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर बने रहना सार्वजनिक नैतिकता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। |
| केरल उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप | उच्च न्यायालय द्वारा CBI और राज्य सरकार से जवाब मांगना न्यायिक सक्रियता को दर्शाता है और भ्रष्टाचार के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है। |
| CBI द्वारा आरोपपत्र | CBI द्वारा आरोपपत्र दाखिल किया जाना और अभियोजन स्वीकृति मिलना मामले की गंभीरता तथा प्रथम दृष्टया साक्ष्य की उपलब्धता को इंगित करता है। |
| घोटाले का वित्तीय पैमाना | 600 करोड़ रुपये काजू आयात घोटाला राज्य के संसाधनों के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग को दर्शाता है, जिसका सीधा असर सार्वजनिक वित्त पर पड़ता है। |
| संघीय जांच एजेंसी की भूमिका | CBI की भूमिका केंद्र और राज्य के बीच संबंधों में संघीय जांच एजेंसियों के महत्व को रेखांकित करती है, विशेषकर भ्रष्टाचार के मामलों में। |
| मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले बोर्ड में आरोपी | मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले बोर्ड में आरोपी का पद पर होना राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही के मुद्दों को उठाता है। |
महत्व
शासन और नैतिकता
- यह मामला सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों और पारदर्शिता के महत्व को उजागर करता है।
- भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त करने या बनाए रखने से शासन की विश्वसनीयता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- यह सिविल सेवकों और सार्वजनिक पदाधिकारियों के लिए आचार संहिता (Code of Conduct) तथा सत्यनिष्ठा (Integrity) के सिद्धांतों के पालन की आवश्यकता पर बल देता है।
न्यायिक जवाबदेही
- उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप भ्रष्टाचार के मामलों में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
- यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के सिद्धांत को पुष्ट करता है, जिसके तहत न्यायालय प्रशासनिक निर्णयों की वैधता और औचित्य की जांच कर सकते हैं।
- यह नागरिकों को न्यायपालिका के माध्यम से सरकार से जवाबदेही मांगने का अवसर प्रदान करता है।
आर्थिक और वित्तीय प्रभाव
- 600 करोड़ रुपये का घोटाला राज्य के खजाने को हुए बड़े नुकसान को दर्शाता है, जिसका उपयोग जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए किया जा सकता था।
- सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (Public Sector Undertakings) में भ्रष्टाचार से उनकी दक्षता और वित्तीय स्थिरता प्रभावित होती है।
- यह सार्वजनिक खरीद (Public Procurement) प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देता है ताकि धन का दुरुपयोग रोका जा सके।
संघीय ढाँचा और जांच एजेंसियां
- CBI जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका केंद्र और राज्य के बीच सहयोग तथा संघीय ढांचे में उनकी स्वायत्तता के महत्व को दर्शाती है।
- यह भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में CBI की विशेषज्ञता और अधिकार क्षेत्र को रेखांकित करता है, विशेषकर जब मामला अंतर-राज्यीय या बड़े पैमाने पर हो।
चुनौतियाँ
1. सार्वजनिक पदों पर सत्यनिष्ठा
- भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त करना या बनाए रखना सार्वजनिक सत्यनिष्ठा के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
- यह जनता के विश्वास को कमजोर करता है और प्रशासन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
यूपीएससी लिंक: शासन, नैतिकता और सत्यनिष्ठा
2. जवाबदेही और पारदर्शिता का अभाव
- सरकारी निर्णयों और नियुक्तियों में पारदर्शिता की कमी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।
- जवाबदेही तंत्र की शिथिलता भ्रष्ट अधिकारियों को दंड से बचने में मदद करती है।
यूपीएससी लिंक: शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही
3. कानूनी प्रक्रिया में देरी
- भ्रष्टाचार के मामलों में जांच और अभियोजन में अक्सर अत्यधिक देरी होती है, जिससे न्याय मिलने में बाधा आती है।
- लंबे समय तक चलने वाले कानूनी मामले आरोपी व्यक्तियों को महत्वपूर्ण पदों पर बने रहने का अवसर देते हैं।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका की कार्यप्रणाली
4. राजनीतिक हस्तक्षेप
- उच्च पदों पर राजनीतिक हस्तक्षेप या संरक्षण भ्रष्टाचार के मामलों को कमजोर कर सकता है या आरोपी व्यक्तियों को बचाने का प्रयास कर सकता है।
- यह निष्पक्ष जांच और निर्णय लेने की प्रक्रिया को बाधित करता है।
यूपीएससी लिंक: राजनीति और प्रशासन में संबंध
5. सार्वजनिक धन का दुरुपयोग
- काजू आयात घोटाले जैसे मामले सार्वजनिक धन के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग को दर्शाते हैं।
- यह राज्य के संसाधनों को कमजोर करता है और विकास परियोजनाओं के लिए उपलब्ध धन को कम करता है।
यूपीएससी लिंक: सार्वजनिक वित्त और लेखा परीक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| भ्रष्टाचार के आरोपी का पद पर बने रहना | सार्वजनिक नैतिकता और पारदर्शिता का उल्लंघन, जनता के विश्वास में कमी। |
| CBI आरोपपत्र के बावजूद नियुक्ति | कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक मानदंडों की अवहेलना, जवाबदेही का अभाव। |
| 600 करोड़ रुपये का घोटाला | राज्य के संसाधनों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग, आर्थिक नुकसान। |
| सार्वजनिक खरीद में अनियमितताएं | सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी, अनुचित लाभ और भ्रष्टाचार को बढ़ावा। |
| न्यायिक प्रक्रिया में देरी | भ्रष्टाचार के मामलों में न्याय में देरी, आरोपी को पद पर बने रहने का अवसर। |
| मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले बोर्ड में आरोपी | राजनीतिक जवाबदेही और प्रशासनिक सत्यनिष्ठा पर प्रश्नचिह्न। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- केरल खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड (Kerala Khadi and Village Industries Board)
- RUTRONIX (Kerala State Rural Women’s Electronics Industrial Co-operative Federation Ltd)
- केरल खादी श्रमिक कल्याण निधि बोर्ड (Kerala Khadi Workers’ Welfare Fund Board)
आगे की राह
- भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को महत्वपूर्ण सार्वजनिक पदों से तत्काल हटाया जाना चाहिए।
- सार्वजनिक नियुक्तियों और पदोन्नति के लिए स्पष्ट और कड़े सत्यनिष्ठा मानदंड (Integrity Criteria) स्थापित किए जाएं।
- भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और अभियोजन में तेजी लाने के लिए विशेष न्यायालयों और प्रक्रियाओं को मजबूत किया जाए।
- सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ई-प्रोक्योरमेंट (e-Procurement) और थर्ड-पार्टी ऑडिट (Third-Party Audit) जैसे उपायों को अनिवार्य किया जाए।
- व्हिसलब्लोअर संरक्षण (Whistleblower Protection) कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए ताकि भ्रष्टाचार की जानकारी देने वालों को सुरक्षा मिल सके।
- लोकपाल और लोकायुक्त (Lokpal and Lokayuktas) जैसी भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं को मजबूत और स्वायत्त बनाया जाए।
- सार्वजनिक पदाधिकारियों के लिए एक मजबूत आचार संहिता विकसित की जाए और उसके उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
- जनता में भ्रष्टाचार के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए और उन्हें शिकायत दर्ज करने के लिए आसान मंच उपलब्ध कराए जाएं।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
भ्रष्टाचार · लोक अखंडता · पारदर्शिता · केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) · राज्य सतर्कता · सरकारी नियुक्तियाँ · उच्च न्यायालय · न्यायिक समीक्षा · सार्वजनिक पद · नैतिक शासन · संघवाद · आपराधिक मामले
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘Article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘टिप्पणी’: ‘विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण।’}
- {‘Article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘टिप्पणी’: ‘गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार, जिसमें स्वच्छ शासन भी शामिल है।’}
- {‘Article’: ‘अनुच्छेद 226’, ‘टिप्पणी’: ‘उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति।’}
- {‘Article’: ‘अनुच्छेद 311’, ‘टिप्पणी’: ‘सिविल सेवकों को पदच्युत करने, हटाने या रैंक में कम करने संबंधी प्रक्रिया।’}
अवधारणा प्रवाह
काजू आयात में कथित घोटाला → CBI द्वारा आरोपपत्र दाखिल करना → आरोपी का महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर बने रहना → याचिकाकर्ता द्वारा उच्च न्यायालय में चुनौती → उच्च न्यायालय द्वारा CBI और राज्य सरकार से जवाब मांगना → सार्वजनिक सत्यनिष्ठा और जवाबदेही पर प्रश्न
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) एक सांविधिक निकाय है जो दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 से अपनी शक्तियाँ प्राप्त करता है।
2. CBI कार्मिक मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
3. राज्य सरकार की सहमति के बिना CBI किसी राज्य में किसी मामले की जाँच नहीं कर सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। CBI एक सांविधिक निकाय नहीं है, बल्कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 से अपनी शक्तियाँ प्राप्त करता है। कथन 2 सही है। CBI कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। कथन 3 गलत है। उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय राज्य सरकार की सहमति के बिना भी CBI को किसी मामले की जाँच का आदेश दे सकते हैं।
Q2. भारत में लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के पास लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने की शक्ति है।
- CBI को केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामलों की जाँच करने का अधिकार है।
- राज्य सतर्कता ब्यूरो केवल राज्य सरकार के कर्मचारियों से जुड़े मामलों की जाँच कर सकते हैं।
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 केंद्र और राज्यों में भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल संस्थाओं की स्थापना का प्रावधान करता है।
उत्तर: लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 केंद्र और राज्यों में भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल संस्थाओं की स्थापना का प्रावधान करता है। — विकल्प (d) सही है। लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की स्थापना का प्रावधान करता है, जो भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करते हैं। विकल्प (a) गलत है, CVC जाँच नहीं करता, बल्कि भ्रष्टाचार निवारण पर निगरानी रखता है। विकल्प (b) गलत है, CBI राज्य सरकार की सहमति से या न्यायिक आदेश पर राज्य के मामलों की भी जाँच कर सकता है। विकल्प (c) गलत है, राज्य सतर्कता ब्यूरो राज्य सरकार के कर्मचारियों के साथ-साथ राज्य के भीतर भ्रष्टाचार से जुड़े अन्य मामलों की भी जाँच कर सकते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त करने से सार्वजनिक अखंडता और पारदर्शिता के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका पर चर्चा कीजिए। (15 अंक)
रूपरेखा: उत्तर की शुरुआत भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों को सार्वजनिक पदों पर नियुक्त करने से जुड़े नैतिक और कानूनी मुद्दों की संक्षिप्त व्याख्या से करें।
**भाग 1: कथन का समालोचनात्मक परीक्षण**
* **सार्वजनिक अखंडता और पारदर्शिता का उल्लंघन:** स्पष्ट करें कि कैसे ऐसी नियुक्तियाँ जनता के विश्वास को कमजोर करती हैं, शासन में पारदर्शिता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं और संभावित रूप से भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं।
* **सुशासन पर प्रभाव:** चर्चा करें कि कैसे ये नियुक्तियाँ प्रशासनिक दक्षता और निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती हैं।
* **कानूनी और नैतिक मानक:** उन स्थापित मानदंडों और दिशा-निर्देशों का उल्लेख करें जो सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति के लिए उच्च नैतिक मानकों की वकालत करते हैं (जैसे कि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णय, सरकारी आचार संहिता)।
* **विपरीत तर्क/जटिलताएँ:** उन तर्कों पर विचार करें जो ऐसी नियुक्तियों का समर्थन करते हैं, जैसे कि ‘दोषी साबित होने तक निर्दोष’ का सिद्धांत, या योग्यता और अनुभव का महत्व। यह भी उल्लेख करें कि केवल आरोप लगना ही हमेशा अयोग्यता का आधार नहीं हो सकता, जब तक कि आरोप गंभीर न हों या अभियोजन की मंजूरी न मिल गई हो।
**भाग 2: न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका**
* **न्यायिक समीक्षा का सिद्धांत:** भारतीय संविधान के तहत न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के सिद्धांत की व्याख्या करें, जो उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय को कार्यपालिका के निर्णयों की वैधता की जाँच करने की शक्ति देता है।
* **संवैधानिक प्रावधान:** अनुच्छेद 32, 226 और 227 का उल्लेख करें, जो नागरिकों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन या अन्य कानूनी अधिकारों के लिए न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने की अनुमति देते हैं।
* **उदाहरण और निर्णय:** उन प्रमुख न्यायिक निर्णयों का उल्लेख करें जहाँ न्यायालयों ने सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियों में पारदर्शिता और अखंडता सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप किया है (जैसे कि ‘विनीत नारायण बनाम भारत संघ’ मामला, या अन्य संबंधित मामले जहाँ न्यायालयों ने दागी व्यक्तियों की नियुक्तियों पर टिप्पणी की है)।
* **न्यायिक सक्रियता और सीमाएँ:** न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) की अवधारणा और ऐसे मामलों में इसकी भूमिका पर चर्चा करें, साथ ही न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं पर भी प्रकाश डालें (जैसे कि नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप से बचना)।
**निष्कर्ष:** एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें जो सार्वजनिक अखंडता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल दे, और सुशासन सुनिश्चित करने में न्यायिक निगरानी के महत्व को रेखांकित करे।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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