10 Aug केरल के आपदा प्रबंधन ढांचे में बड़ी खामियां: संसदीय पैनल की चिंताजनक रिपोर्ट
✎ आपदा प्रबंधन में प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का अंतिम-मील तक प्रसार और स्थानीय स्तर पर नियमों का सख्त प्रवर्तन आपदा जोखिमों को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल) | GS Paper III — आपदा एवं आपदा प्रबंधन
- Prelims: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA), स्थानीय स्वशासन, पश्चिमी घाट, तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ), भूस्खलन, बाढ़, चक्रवात, KaWaCHaM प्रणाली
- Essay: आपदा प्रबंधन में विकेन्द्रीकरण की भूमिका, जलवायु परिवर्तन और भारत में आपदा जोखिम, सतत विकास और पर्यावरणीय संवेदनशीलता
त्वरित पुनरावृत्ति: आपदा प्रबंधन में प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का अंतिम-मील तक प्रसार और स्थानीय स्तर पर नियमों का सख्त प्रवर्तन आपदा जोखिमों को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, गृह मामलों संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने केरल के आपदा प्रबंधन ढाँचे में महत्वपूर्ण कमियों को उजागर किया है। समिति ने भूस्खलन-संभावित और दूरदराज के क्षेत्रों में प्रारंभिक चेतावनी के अंतिम-मील तक प्रसार में अंतराल पर विशेष चिंता व्यक्त की है, जबकि केरल बाढ़, भूस्खलन, तटीय क्षरण और चक्रवाती घटनाओं सहित कई खतरों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
पृष्ठभूमि
- केरल अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति के कारण कई आपदाओं के प्रति संवेदनशील है, जिसमें एक संकीर्ण तटीय पेटी, घनी नदी प्रणाली, पारिस्थितिक रूप से नाजुक पश्चिमी घाट और उच्च जनसंख्या घनत्व शामिल हैं।
- राज्य का लगभग 14.5% क्षेत्र बाढ़-संभावित है, 14.4% भूस्खलन-संभावित है, और इसकी आधी से अधिक तटरेखा तटीय खतरों के प्रति संवेदनशील है।
- राज्य में लगातार मानसून के मौसम में बार-बार चरम मौसमी घटनाएँ घटित हो रही हैं, जिससे जान-माल का भारी नुकसान होता है।
- समिति ने अति-स्थानीय मौसम पूर्वानुमान, भूस्खलन प्रारंभिक चेतावनी की सटीकता और वास्तविक समय में बाढ़-जलमग्नता मॉडलिंग जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सीमाओं को चिह्नित किया है।
- उच्च जनसंख्या घनत्व, पर्यावरणीय क्षरण और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में शहरी अतिक्रमण आपदा जोखिमों को बढ़ा रहे हैं।
- समिति ने भवन विनियमों, भूमि-उपयोग नियोजन मानदंडों और तटीय विनियमन प्रावधानों के प्रवर्तन में असमानता का भी उल्लेख किया है, विशेषकर स्थानीय स्तर पर।
भारत में आपदा प्रबंधन ढाँचा क्या है?
- भारत में आपदा प्रबंधन का प्राथमिक कानून आपदा प्रबंधन अधिनियम (Disaster Management Act), 2005 है, जो आपदाओं के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक संस्थागत तंत्र प्रदान करता है।
- यह अधिनियम राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों की स्थापना का प्रावधान करता है: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में, और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) जिला कलेक्टर/मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में।
- NDMA आपदा प्रबंधन के लिए नीतियाँ, योजनाएँ और दिशानिर्देश तैयार करता है। SDMA राज्य-विशिष्ट योजनाओं को लागू करता है, और DDMA जिला स्तर पर आपदा प्रतिक्रिया और शमन गतिविधियों का समन्वय करता है।
- आपदा प्रबंधन में विकेन्द्रीकरण एक महत्वपूर्ण पहलू है, जिसमें स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government – LSG) निकायों को आपदा प्रबंधन योजनाओं को तैयार करने और लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ (Early Warning Systems) आपदा प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण घटक हैं, जो संभावित खतरों के बारे में समय पर जानकारी प्रदान करके जान-माल के नुकसान को कम करने में मदद करती हैं।
- केरल ने अपनी विकेन्द्रीकृत आपदा प्रबंधन प्रणाली के लिए प्रशंसा प्राप्त की है, जहाँ राज्य, जिला और स्थानीय स्वशासन स्तरों पर आपदा प्रबंधन योजनाएँ तैयार की जाती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| केरल का अद्वितीय भूगोल | संकीर्ण तटीय पट्टी, सघन नदी नेटवर्क, पश्चिमी घाट और उच्च जनसंख्या घनत्व के कारण आपदा जोखिमों का अतिव्यापीकरण। |
| बहु-खतरा भेद्यता | बाढ़, भूस्खलन, तटीय कटाव, बिजली गिरने और चक्रवाती घटनाओं के प्रति राज्य की उच्च संवेदनशीलता। |
| विकेन्द्रीकृत आपदा प्रबंधन ढाँचा | राज्य, जिला और स्थानीय स्व-शासन (LSG) स्तरों पर आपदा प्रबंधन योजनाओं का निर्माण और वार्षिक अद्यतन। |
| ‘ऑरेंज बुक’ | एक परिचालन दस्तावेज़ जो प्रतिक्रिया रणनीतियों, वित्तीय प्रावधानों और विभागीय जिम्मेदारियों को एकीकृत करता है। |
| ‘केरल चेतावनी, संकट और खतरा प्रबंधन’ (KaWaCHaM) प्रणाली | बाढ़, भूस्खलन, तूफान और सुनामी सहित बहु-खतरा अलर्ट को एकीकृत करने वाली उन्नत चेतावनी प्रणाली। |
| सामुदायिक स्वयंसेवकों की भूमिका | आपदा मित्र स्वयंसेवकों और बड़े पैमाने पर स्वयंसेवा के माध्यम से आपदा प्रतिक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान। |
महत्व
आपदा प्रबंधन में शासन
- संसदीय समिति की रिपोर्ट आपदा प्रबंधन (Disaster Management) में शासन की कमियों को उजागर करती है, विशेषकर अंतिम-मील चेतावनी प्रसार में।
- यह राज्य और स्थानीय स्तर पर आपदा तैयारियों और प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल देती है।
- यह सुझाव देती है कि प्रभावी आपदा प्रबंधन के लिए मजबूत नियामक प्रवर्तन और जन जागरूकता महत्वपूर्ण है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- उच्च जनसंख्या घनत्व, पर्यावरणीय क्षरण और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में शहरी अतिक्रमण आपदा जोखिमों को बढ़ाता है।
- तटीय विनियमन प्रावधानों और भूमि-उपयोग नियोजन मानदंडों का असमान प्रवर्तन पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करता है।
- पश्चिमी घाट जैसे पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्रों की सुरक्षा का महत्व उजागर होता है।
संघवाद और राज्य-केंद्र संबंध
- आपदा प्रबंधन में राज्य की भूमिका और केंद्र सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सहायता व मार्गदर्शन का महत्व।
- संसदीय समिति की रिपोर्ट राज्यों को आपदा प्रबंधन ढाँचे को मजबूत करने के लिए प्रेरित करती है।
- यह संघवाद (Federalism) के सिद्धांत को दर्शाती है, जहाँ राज्य आपदा प्रतिक्रिया के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार होते हैं, जबकि केंद्र सहायता प्रदान करता है।
चुनौतियाँ
1. अंतिम-मील चेतावनी प्रसार
- भूस्खलन-प्रवण और दूरदराज के क्षेत्रों में प्रारंभिक चेतावनियों के प्रसार में अंतराल।
- तकनीकी सीमाओं के कारण हाइपर-लोकल मौसम की भविष्यवाणी और भूस्खलन की प्रारंभिक चेतावनी की सटीकता में कमी।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन: संस्थागत ढाँचा
2. तकनीकी सीमाएँ
- हाइपर-लोकल मौसम की भविष्यवाणी, भूस्खलन की प्रारंभिक चेतावनी की सटीकता और वास्तविक समय में बाढ़-जलमग्नता मॉडलिंग में तकनीकी चुनौतियाँ।
- उन्नत प्रौद्योगिकियों के प्रभावी उपयोग और उनके एकीकरण की आवश्यकता।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भूमिका
3. पर्यावरणीय क्षरण और शहरी अतिक्रमण
- उच्च जनसंख्या घनत्व, पर्यावरणीय क्षरण और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में शहरी अतिक्रमण आपदा जोखिमों को बढ़ाता है।
- अनियमित विकास और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण: मानव गतिविधियों का प्रभाव
4. नियामक प्रवर्तन में असमानता
- भवन विनियमों, भूमि-उपयोग नियोजन मानदंडों और तटीय विनियमन प्रावधानों का असमान प्रवर्तन, विशेषकर स्थानीय स्तर पर।
- कानूनों और नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन में कमी।
यूपीएससी लिंक: शासन: नियामक ढाँचा
5. जन जागरूकता की कमी
- बहु-खतरा चेतावनी प्रणालियों पर सार्वजनिक जागरूकता को मजबूत करने की आवश्यकता।
- समुदाय की भागीदारी और तैयारी का अभाव।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन: सामुदायिक भागीदारी
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अंतिम-मील चेतावनी प्रसार | भूस्खलन-प्रवण और दूरदराज के क्षेत्रों में प्रारंभिक चेतावनियों का प्रभावी ढंग से न पहुँचना। |
| तकनीकी सीमाएँ | हाइपर-लोकल मौसम की भविष्यवाणी और भूस्खलन की प्रारंभिक चेतावनी की सटीकता में कमी। |
| पर्यावरणीय क्षरण | उच्च जनसंख्या घनत्व और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में शहरी अतिक्रमण से आपदा जोखिमों में वृद्धि। |
| नियामक प्रवर्तन | भवन विनियमों और भूमि-उपयोग नियोजन मानदंडों का असमान और अपर्याप्त प्रवर्तन। |
| जन जागरूकता | बहु-खतरा चेतावनी प्रणालियों और आपदा तैयारियों पर सार्वजनिक जागरूकता की कमी। |
| अतिव्यापी खतरा जोखिम | केरल के अद्वितीय भूगोल के कारण बाढ़, भूस्खलन और तटीय खतरों का एक साथ अनुभव। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (National Disaster Management Plan)
- राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (National Disaster Response Force – NDRF)
- आपदा मित्र योजना (Aapda Mitra Scheme)
आगे की राह
- भूस्खलन-प्रवण और दूरदराज के क्षेत्रों में अंतिम-मील चेतावनी प्रसार तंत्र को मजबूत करना।
- हाइपर-लोकल मौसम की भविष्यवाणी और भूस्खलन की प्रारंभिक चेतावनी की सटीकता में सुधार के लिए तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाना।
- भवन विनियमों, भूमि-उपयोग नियोजन मानदंडों और तटीय विनियमन प्रावधानों के प्रवर्तन को सुदृढ़ करना।
- पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यावरणीय क्षरण और शहरी अतिक्रमण को नियंत्रित करने के लिए कड़े उपाय लागू करना।
- बहु-खतरा चेतावनी प्रणालियों और आपदा तैयारियों पर सार्वजनिक जागरूकता और शिक्षा कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।
- आपदा प्रबंधन योजनाओं की वार्षिक समीक्षा और अद्यतन प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाना।
- समुदाय-आधारित आपदा प्रबंधन प्रयासों को प्रोत्साहित करना और स्वयंसेवकों की भूमिका को मजबूत करना।
- राज्य और केंद्र सरकार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना ताकि आपदा प्रबंधन में समग्र दृष्टिकोण अपनाया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
आपदा प्रबंधन · संसदीय स्थायी समिति · पूर्व चेतावनी प्रणाली · भूस्खलन · तटीय अपरदन · जलवायु परिवर्तन · शहरी अतिक्रमण · विकेन्द्रीकृत आपदा प्रबंधन · आपदा जोखिम न्यूनीकरण · पश्चिमी घाट · तटीय विनियमन · सामुदायिक स्वयंसेवक
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘सातवीं अनुसूची के तहत आपदा प्रबंधन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 257’, ‘note’: ‘राज्यों पर संघ का नियंत्रण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 282’, ‘note’: ‘संघ और राज्यों द्वारा व्यय’}
अवधारणा प्रवाह
अद्वितीय भूगोल और उच्च भेद्यता → बार-बार चरम मौसमी घटनाएँ → आपदा प्रबंधन ढाँचे में अंतराल → अंतिम-मील चेतावनी प्रसार की चुनौतियाँ → बढ़ते आपदा जोखिम और क्षति → बेहतर तैयारी और प्रतिक्रिया की आवश्यकता → शासन और नियामक सुधारों का महत्व
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन किया गया था।
2. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
3. संसदीय स्थायी समितियाँ केवल लोकसभा के सदस्यों से बनी होती हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 ने NDMA की स्थापना की। कथन 2 सही है। NDRF गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। कथन 3 गलत है। संसदीय स्थायी समितियों में लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य शामिल होते हैं।
Q2. कथन (A): केरल में आपदा जोखिम उच्च जनसंख्या घनत्व, पर्यावरणीय क्षरण और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में शहरी अतिक्रमण के कारण बढ़ गया है।
कारण (R): केरल की अनूठी भौगोलिक स्थिति, जिसमें एक संकीर्ण तटीय पट्टी, सघन नदी नेटवर्क और पारिस्थितिक रूप से नाजुक पश्चिमी घाट शामिल हैं, मानसून के दौरान जोखिमों को बढ़ाती है।
- कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।
- कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, लेकिन कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
- कथन (A) सही है, लेकिन कारण (R) गलत है।
- कथन (A) गलत है, लेकिन कारण (R) सही है।
उत्तर: कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है। — कथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं, और कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है। केरल की भौगोलिक स्थिति और मानवीय गतिविधियाँ दोनों ही आपदा जोखिमों को बढ़ाने में योगदान करती हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ केरल के आपदा प्रबंधन ढांचे में संसदीय स्थायी समिति द्वारा उजागर की गई महत्वपूर्ण कमियों का समालोचनात्मक परीक्षण करें। इन कमियों को दूर करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. परिचय: केरल की भौगोलिक संवेदनशीलता और हाल की आपदाओं का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए, संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट का संदर्भ दें।
2. उजागर की गई कमियाँ:
क. अंतिम-मील तक पूर्व चेतावनी का प्रसार: विशेष रूप से भूस्खलन-प्रवण और दूरदराज के क्षेत्रों में।
ख. तकनीकी सीमाएँ: हाइपर-लोकल मौसम पूर्वानुमान, भूस्खलन पूर्व चेतावनी की सटीकता और वास्तविक समय बाढ़-जलमग्नता मॉडलिंग में।
ग. मानवीय कारक: उच्च जनसंख्या घनत्व, पर्यावरणीय क्षरण, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में शहरी अतिक्रमण।
घ. नियामक प्रवर्तन: भवन नियमों, भूमि-उपयोग नियोजन मानदंडों और तटीय विनियमन प्रावधानों का असमान प्रवर्तन, विशेषकर स्थानीय स्तर पर।
3. केरल के मजबूत पहलू (संतुलित दृष्टिकोण के लिए):
क. विकेन्द्रीकृत ढाँचा: राज्य, जिला और स्थानीय स्व-सरकारी (LSG) स्तरों पर आपदा प्रबंधन योजनाएँ।
ख. ‘ऑरेंज बुक’: वार्षिक अद्यतन और समीक्षा।
ग. उन्नत चेतावनी प्रणाली: ‘केरल चेतावनी, संकट और खतरा प्रबंधन’ (KaWaCHaM) प्रणाली।
घ. प्रौद्योगिकी का उपयोग: GIS-आधारित खतरा मानचित्रण, रिमोट सेंसिंग, बाढ़ मॉडलिंग।
ङ. सामुदायिक भागीदारी: आपदा मित्र स्वयंसेवक और बड़े पैमाने पर स्वयंसेवा।
4. कमियों को दूर करने के उपाय:
क. प्रौद्योगिकी उन्नयन: हाइपर-लोकल पूर्वानुमान, AI/ML आधारित भूस्खलन मॉडल।
ख. क्षमता निर्माण: अंतिम-मील तक चेतावनी प्रसार के लिए स्थानीय समुदायों और स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण।
ग. सख्त नियामक प्रवर्तन: भवन संहिता, भूमि-उपयोग और CRZ नियमों का कड़ाई से पालन।
घ. जन जागरूकता: बहु-खतरा चेतावनी प्रणालियों और निकासी प्रक्रियाओं पर।
ङ. पारिस्थितिक बहाली: पर्यावरणीय क्षरण को रोकना और संवेदनशील क्षेत्रों का संरक्षण।
च. अंतर-एजेंसी समन्वय: राज्य और स्थानीय स्तर पर बेहतर समन्वय।
5. निष्कर्ष: आपदा प्रबंधन में एक समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देते हुए, प्रौद्योगिकी, सामुदायिक भागीदारी और मजबूत नियामक ढांचे के महत्व को रेखांकित करें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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