21 Jul केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष पद के लिए चयन समिति का गठन
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय
- Prelims: बाल अधिकार संरक्षण आयोग, संरचना, कार्यकाल, नियुक्ति, बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005, संवैधानिक निकाय
- Essay: भारत में बाल अधिकारों का संरक्षण: चुनौतियाँ और समाधान, बाल कल्याण में सांविधिक निकायों की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: बाल अधिकार संरक्षण आयोग बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उनके उल्लंघन से संबंधित मामलों की जाँच के लिए बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत स्थापित एक सांविधिक निकाय है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल सरकार ने केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष के चयन के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। वर्तमान अध्यक्ष के.वी. मनोज कुमार का कार्यकाल 17 अगस्त को समाप्त हो रहा है। यह समिति नए अध्यक्ष का चयन करेगी, जिसमें महिला एवं बाल विकास मंत्री, महिला एवं बाल विकास विशेष सचिव और विधि सचिव शामिल हैं। यह घटना बाल अधिकार संरक्षण आयोगों के महत्व और उनकी कार्यप्रणाली को रेखांकित करती है।
पृष्ठभूमि
- भारत में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा मौजूद है।
- बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 (Commissions for Protection of Child Rights Act, 2005) के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की स्थापना की गई है।
- ये आयोग बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करते हैं और उनके संरक्षण के लिए सिफारिशें करते हैं।
- केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का गठन 3 जून, 2013 को हुआ था।
- आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो महिलाएँ होनी चाहिए।
- इन आयोगों का मुख्य उद्देश्य बच्चों के सर्वोत्तम हितों को सुनिश्चित करना और उनके अधिकारों को बढ़ावा देना है।
- ये निकाय बच्चों से संबंधित कानूनों, नीतियों और कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन की निगरानी करते हैं।
- इन आयोगों को सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जिससे वे साक्ष्य एकत्र कर सकते हैं और गवाहों को बुला सकते हैं।
- वे बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जाँच करते हैं और आवश्यक कार्रवाई की सिफारिश करते हैं।
बाल अधिकार संरक्षण आयोग क्या है?
- बाल अधिकार संरक्षण आयोग (CPCR) भारत में बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के लिए स्थापित एक सांविधिक निकाय (Statutory Body) है।
- इसका गठन बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत किया गया है, जिसका उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उनके उल्लंघन से संबंधित मामलों की जाँच करना है।
- राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य स्तर पर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR) कार्य करते हैं।
- प्रत्येक आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो महिलाएँ होनी अनिवार्य हैं।
- अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार (NCPCR के मामले में) या राज्य सरकार (SCPCR के मामले में) द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है।
- आयोग बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की जाँच करता है, बाल-हितैषी कानूनों के कार्यान्वयन की निगरानी करता है और सरकार को नीतिगत सिफारिशें प्रस्तुत करता है।
- इसे सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त हैं, जिससे यह साक्ष्य एकत्र कर सकता है, गवाहों को समन कर सकता है और दस्तावेजों की माँग कर सकता है।
- आयोग बच्चों के अधिकारों से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों के कार्यान्वयन की भी निगरानी करता है.
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (State Commission for Protection of Child Rights) का गठन | बच्चों के अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन हेतु राज्य स्तर पर एक समर्पित संस्था। यह बाल अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करता है और आवश्यक कार्रवाई की सिफारिश करता है। |
| अध्यक्ष और सदस्यों की संरचना | आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो महिलाएँ होनी चाहिए। यह सुनिश्चित करता है कि आयोग में लैंगिक प्रतिनिधित्व हो और विभिन्न दृष्टिकोणों को शामिल किया जा सके। |
| अध्यक्ष का कार्यकाल | अध्यक्ष का कार्यकाल निर्धारित होता है (सामान्यतः तीन वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो)। यह पद की स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित करता है। |
| चयन समिति का गठन | अध्यक्ष के चयन के लिए एक समिति का गठन किया जाता है, जिसमें संबंधित मंत्री और सचिव शामिल होते हैं। यह चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और विशेषज्ञता सुनिश्चित करता है। |
| बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 (Commissions for Protection of Child Rights Act, 2005) के तहत स्थापना | यह आयोग संसद द्वारा पारित एक अधिनियम के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है, जो इसे कानूनी वैधता और अधिकार प्रदान करता है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह बच्चों के अधिकारों की रक्षा और उनके सर्वोत्तम हितों को सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण तंत्र प्रदान करता है।
- यह बाल श्रम, बाल दुर्व्यवहार, बाल तस्करी और शिक्षा के अधिकार जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है, जिससे समाज में बच्चों की स्थिति में सुधार होता है।
- यह बाल-केंद्रित नीतियों और कार्यक्रमों के निर्माण तथा कार्यान्वयन में राज्य सरकार को सलाह देता है।
शासनिक महत्व
- यह राज्य में बाल अधिकारों से संबंधित कानूनों और नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन की निगरानी करता है।
- यह सुनिश्चित करता है कि बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के प्रावधानों का सही ढंग से पालन किया जाए।
- यह राज्य सरकार को बाल अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों में जवाबदेह ठहराने में मदद करता है।
नैतिक और मानवाधिकार महत्व
- यह बच्चों को समाज के सबसे कमजोर वर्ग के रूप में मान्यता देता है और उनके विशेष संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है।
- यह संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन (UN Convention on the Rights of the Child) के सिद्धांतों को राज्य स्तर पर लागू करने में सहायक है।
- यह बच्चों को गरिमापूर्ण जीवन जीने और अपनी पूरी क्षमता का विकास करने का अवसर प्रदान करने के लिए एक नैतिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
चुनौतियाँ
1. आयोग की स्वायत्तता और स्वतंत्रता
- अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकारी हस्तक्षेप की संभावना आयोग की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकती है।
- पर्याप्त वित्तीय संसाधनों और स्टाफ की कमी आयोग के प्रभावी कामकाज में बाधा डाल सकती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही
2. जागरूकता और पहुँच का अभाव
- ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में बच्चों और उनके परिवारों के बीच आयोग के कार्यों और अधिकारों के बारे में जागरूकता की कमी।
- शिकायत दर्ज करने और न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया जटिल और दुर्गम हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, कमजोर वर्ग
3. कार्यान्वयन में चुनौतियाँ
- आयोग की सिफारिशों को लागू करने में राज्य सरकार और अन्य एजेंसियों की इच्छाशक्ति और सहयोग का अभाव।
- बाल अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों की जाँच और निपटान में देरी।
यूपीएससी लिंक: नीति निर्माण और कार्यान्वयन
4. समन्वय की कमी
- पुलिस, न्यायपालिका, शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य विभाग जैसे विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय का अभाव।
- गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और नागरिक समाज के साथ प्रभावी साझेदारी स्थापित करने में कठिनाई।
यूपीएससी लिंक: शासन के विभिन्न आयाम
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अध्यक्ष/सदस्यों का चयन | चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्यता के बजाय राजनीतिक विचारों का प्रभाव। |
| कार्यकाल की समाप्ति | नए अध्यक्ष की नियुक्ति में देरी से आयोग के कामकाज में व्यवधान और निर्णय लेने की प्रक्रिया का धीमा होना। |
| संसाधनों की कमी | आयोग के पास पर्याप्त वित्तीय, मानव और तकनीकी संसाधनों का अभाव, जिससे उसकी क्षमता प्रभावित होती है। |
| सिफारिशों का कार्यान्वयन | आयोग द्वारा की गई सिफारिशों को संबंधित सरकारी विभागों द्वारा गंभीरता से न लेना या लागू करने में देरी। |
| जागरूकता का स्तर | आम जनता, विशेषकर बच्चों और उनके अभिभावकों के बीच आयोग की भूमिका और कार्यों के बारे में कम जागरूकता। |
आगे की राह
- अध्यक्ष और सदस्यों के चयन के लिए एक पारदर्शी, योग्यता-आधारित और समयबद्ध प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए।
- आयोग को पर्याप्त वित्तीय और मानव संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ ताकि वह अपने कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सके।
- आयोग की सिफारिशों को गंभीरता से लिया जाए और उनके कार्यान्वयन के लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए।
- बच्चों और आम जनता के बीच आयोग की भूमिका और बाल अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाएँ।
- विभिन्न सरकारी विभागों, गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के साथ आयोग के समन्वय को मजबूत किया जाए।
- बाल अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों की त्वरित जाँच और निपटान के लिए प्रक्रियागत दक्षता में सुधार किया जाए।
- आयोग की स्वायत्तता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक वैधानिक और प्रशासनिक उपाय किए जाएँ।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
बाल अधिकार संरक्षण · राज्य आयोग · सांविधिक निकाय · बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम · महिला एवं बाल विकास मंत्रालय · बाल कल्याण · संरक्षण तंत्र · न्यायिक समीक्षा · संघवाद · सामाजिक न्याय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21A’, ‘note’: ‘शिक्षा का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 24’, ‘note’: ‘बाल श्रम का प्रतिषेध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 39(f)’, ‘note’: ‘बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसर’}
अवधारणा प्रवाह
बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत राज्य आयोग का गठन। → केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की स्थापना। → आयोग के अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होना। → नए अध्यक्ष के चयन हेतु समिति का गठन। → समिति द्वारा अध्यक्ष का चयन और नियुक्ति। → आयोग द्वारा बच्चों के अधिकारों का संरक्षण और संवर्धन।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह अधिनियम केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की स्थापना का प्रावधान करता है।
2. राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है।
3. राज्य आयोग में कम से कम दो महिला सदस्य होना अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1 सही है क्योंकि अधिनियम केंद्र में राष्ट्रीय आयोग और राज्यों में राज्य आयोगों की स्थापना का प्रावधान करता है। कथन 2 सही है क्योंकि राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है। कथन 3 भी सही है, जैसा कि केरल राज्य आयोग के गठन से स्पष्ट है, जिसमें कम से कम दो महिला सदस्य होना अनिवार्य है।
Q2. भारत में बाल अधिकारों के संरक्षण से संबंधित निम्नलिखित में से कौन-सा/से निकाय सांविधिक (Statutory) है/हैं?
1. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR)
2. राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR)
3. किशोर न्याय बोर्ड (JJB)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 2 — राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR) बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत स्थापित सांविधिक निकाय हैं। किशोर न्याय बोर्ड (JJB) किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत स्थापित एक न्यायिक निकाय है, न कि सांविधिक आयोग।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत स्थापित राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCRs) बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में कितनी प्रभावी भूमिका निभाते हैं? इस संदर्भ में, इन आयोगों के समक्ष आने वाली प्रमुख चुनौतियों और उनके समाधान हेतु आवश्यक उपायों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में, SCPCRs की भूमिका और उनके महत्व पर प्रकाश डालें, जैसे कि बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की जांच, नीतियों की समीक्षा और जागरूकता बढ़ाना। दूसरे भाग में, उनकी चुनौतियों का विश्लेषण करें, जिनमें धन की कमी, जनशक्ति का अभाव, स्वायत्तता का मुद्दा और सिफारिशों के गैर-बाध्यकारी स्वरूप शामिल हो सकते हैं। अंत में, इन चुनौतियों से निपटने के लिए सुझाव दें, जैसे कि पर्याप्त वित्तीय आवंटन, स्वतंत्र चयन प्रक्रिया, क्षमता निर्माण और उनकी सिफारिशों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कानूनी प्रावधान।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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