29 Jul कोच्चि शिपयार्ड ने भारतीय नौसेना के लिए सातवीं पनडुब्बी रोधी युद्धपोत का किया जलावतरण, जानिए खासियतें
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा और रक्षा | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; स्वदेशीकरण
- Prelims: माहे-श्रेणी के ASW शैलो वाटर क्राफ्ट, मछलीपट्टनम, कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL), भारतीय नौसेना, पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW), आत्मनिर्भर भारत, रक्षा अधिग्रहण
- Essay: आत्मनिर्भर भारत और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण का महत्व, भारत की समुद्री सुरक्षा चुनौतियाँ और नौसेना की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा ‘मछलीपट्टनम’ का जलावतरण, जो माहे-श्रेणी का सातवां पनडुब्बी रोधी शैलो वाटर क्राफ्ट है, भारतीय नौसेना की तटीय जल में पनडुब्बी रोधी क्षमताओं को बढ़ाता है और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत रक्षा स्वदेशीकरण को बढ़ावा देता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) ने भारतीय नौसेना के लिए निर्मित किए जा रहे आठ पनडुब्बी रोधी युद्धपोतों (Anti-Submarine Warfare – ASW) की श्रृंखला में सातवें पोत ‘मछलीपट्टनम’ का जलावतरण किया है। यह कदम भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और समुद्री सुरक्षा को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह पोत ‘माहे-श्रेणी’ के ASW शैलो वाटर क्राफ्ट का हिस्सा है, जिसे विशेष रूप से तटीय जल में पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए डिज़ाइन किया गया है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय नौसेना अपनी क्षमताओं को बढ़ाने और ‘आत्मनिर्भर भारत’ (Self-Reliant India) के दृष्टिकोण को साकार करने के लिए स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर जोर दे रही है।
- पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW) शत्रु पनडुब्बियों का पता लगाने, उन पर नज़र रखने और उन्हें नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किए गए विशेष नौसैनिक पोत हैं।
- शैलो वाटर क्राफ्ट (Shallow Water Craft) उथले पानी में संचालन के लिए अनुकूलित होते हैं, जो तटीय क्षेत्रों और संकरे जलमार्गों में महत्वपूर्ण होते हैं।
- कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) भारत के प्रमुख शिपयार्डों में से एक है, जो भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल के लिए विभिन्न प्रकार के जहाजों का निर्माण करता है।
- यह परियोजना ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) पहल के तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने के सरकार के प्रयासों का एक हिस्सा है।
- इस श्रेणी के पोतों का नाम भारत के पुराने बंदरगाह शहरों के नाम पर रखा गया है, जैसे ‘मछलीपट्टनम’ आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक बंदरगाह शहर है।
माहे-श्रेणी के पनडुब्बी रोधी शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW-SWC) क्या हैं?
- ये भारतीय नौसेना के लिए डिज़ाइन किए गए विशेष युद्धपोत हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य तटीय जल में पनडुब्बी रोधी अभियान चलाना है।
- इन पोतों की लंबाई 78.0 मीटर और चौड़ाई 11.36 मीटर है, जिसका विस्थापन लगभग 900 टन है।
- इनकी अधिकतम गति 25 समुद्री मील (knots) और सहनशक्ति 1,800 समुद्री मील है, जो इन्हें विस्तारित अभियानों के लिए उपयुक्त बनाती है।
- इनका उपयोग कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों (Low-Intensity Maritime Operations) और माइन बिछाने (Mine Laying Operations) सहित उपसतह निगरानी (Subsurface Surveillance) के लिए भी किया जा सकता है।
- ये पोत अत्याधुनिक सोनार (Sonar) और हथियार प्रणालियों से लैस होंगे, जो उन्हें पनडुब्बियों का प्रभावी ढंग से पता लगाने और उन्हें बेअसर करने में सक्षम बनाएंगे।
- इस परियोजना में कुल आठ पोतों का निर्माण शामिल है, जिनमें से ‘मछलीपट्टनम’ सातवां पोत है, जो भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
- इनका निर्माण ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत किया जा रहा है, जो रक्षा उत्पादन में स्वदेशी क्षमताओं को बढ़ावा देता है और आयात पर निर्भरता कम करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मछलीपत्तनम (Machilipatnam) पोत | यह माहे-श्रेणी के आठ पनडुब्बी रोधी युद्धक शैलो वाटर क्राफ्ट (ASW-SWC) जहाजों में से सातवाँ है, जिसे भारतीय नौसेना के लिए कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) द्वारा निर्मित किया गया है। |
| डिज़ाइन और उद्देश्य | इसे तटीय जल में पनडुब्बी रोधी अभियानों, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और माइन बिछाने के अभियानों के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसमें उप-सतह निगरानी भी शामिल है। |
| तकनीकी विशिष्टताएँ | यह 78.0 मीटर लंबा, 11.36 मीटर चौड़ा है, जिसका ड्राफ्ट 2.7 मीटर है। इसका विस्थापन लगभग 900 टन है, अधिकतम गति 25 समुद्री मील और सहनशक्ति 1,800 समुद्री मील है। |
| आत्मनिर्भरता | यह भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल को बढ़ावा देता है, जिससे नौसेना की परिचालन क्षमता में वृद्धि होती है। |
| नामकरण | इस पोत का नाम आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित भारत के पूर्वी तट पर एक पुराने बंदरगाह शहर ‘मछलीपत्तनम’ के नाम पर रखा गया है। |
महत्व
सामरिक महत्व
- यह पोत भारतीय नौसेना की पनडुब्बी रोधी युद्ध (ASW) क्षमताओं को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएगा, विशेष रूप से तटीय जल और उथले पानी में, जहाँ पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें बेअसर करना चुनौतीपूर्ण होता है।
- यह भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूत करेगा और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को सुदृढ़ करेगा, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
- यह भारत की ‘ब्लू इकोनॉमी’ (Blue Economy) और समुद्री हितों की रक्षा में सहायक होगा, जिसमें अपतटीय ऊर्जा संसाधन और व्यापार मार्ग शामिल हैं।
आर्थिक महत्व
- कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) जैसे घरेलू शिपयार्ड द्वारा इन जहाजों का निर्माण ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) और ‘आत्मनिर्भर भारत’ (Atmanirbhar Bharat) पहलों को बढ़ावा देता है, जिससे घरेलू रक्षा विनिर्माण को प्रोत्साहन मिलता है।
- यह परियोजना रक्षा क्षेत्र में रोजगार सृजन को बढ़ावा देती है और संबद्ध उद्योगों जैसे इस्पात, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग में निवेश को आकर्षित करती है।
- यह भारत को रक्षा निर्यात के लिए एक संभावित केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद करता है, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जित करने की क्षमता बढ़ती है।
तकनीकी और औद्योगिक महत्व
- इस तरह के उन्नत युद्धपोतों का निर्माण भारत की इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षमताओं को प्रदर्शित करता है, जिससे रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता बढ़ती है।
- यह परियोजना अनुसंधान और विकास (R&D) को बढ़ावा देती है, जिससे नई प्रौद्योगिकियों और नवाचारों का विकास होता है, जो भविष्य के रक्षा परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- यह भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण और तकनीकी उन्नयन में योगदान देता है, जिससे उसे समकालीन समुद्री खतरों का प्रभावी ढंग से सामना करने में मदद मिलती है।
चुनौतियाँ
1. रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में देरी
- अक्सर, रक्षा अधिग्रहण प्रक्रियाएँ जटिल और लंबी होती हैं, जिससे परियोजनाओं के पूरा होने में देरी होती है और लागत में वृद्धि होती है।
- यह देरी नौसेना की क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है और उसे बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के अनुकूल होने में बाधा डाल सकती है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा, रक्षा प्रौद्योगिकी
2. तकनीकी आत्मनिर्भरता और आयात पर निर्भरता
- कुछ महत्वपूर्ण घटकों और प्रौद्योगिकियों के लिए अभी भी आयात पर निर्भरता बनी हुई है, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को चुनौती देती है।
- यह निर्भरता आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और भू-राजनीतिक दबावों के प्रति भेद्यता पैदा कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान और प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था
3. मानव संसाधन और कौशल विकास
- उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों के संचालन और रखरखाव के लिए कुशल मानव संसाधनों की कमी एक चुनौती हो सकती है।
- विशेषज्ञता और प्रशिक्षण की आवश्यकता है ताकि इन जटिल प्रणालियों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सके।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन विकास, रक्षा
4. बढ़ती लागत और बजटीय बाधाएँ
- आधुनिक युद्धपोतों के निर्माण की लागत बहुत अधिक होती है, और रक्षा बजट पर लगातार दबाव रहता है।
- बजटीय बाधाएँ भविष्य की परियोजनाओं और आधुनिकीकरण योजनाओं को प्रभावित कर सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: सरकारी बजट, रक्षा वित्त
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| परियोजना की समय-सीमा | रक्षा परियोजनाओं में अक्सर देरी होती है, जिससे लागत बढ़ती है और नौसेना की तैयारियों पर असर पड़ता है। |
| घटक आयात पर निर्भरता | महत्वपूर्ण घटकों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता ‘आत्मनिर्भरता’ के लक्ष्य को कमजोर करती है और आपूर्ति श्रृंखला जोखिम पैदा करती है। |
| अनुसंधान और विकास में निवेश | रक्षा प्रौद्योगिकी में नवाचार और आत्मनिर्भरता के लिए पर्याप्त अनुसंधान और विकास (R&D) निवेश की आवश्यकता है, जो अक्सर अपर्याप्त होता है। |
| कुशल कार्यबल की कमी | उन्नत रक्षा प्रणालियों के डिजाइन, निर्माण और रखरखाव के लिए आवश्यक विशेषज्ञता और कुशल कार्यबल की कमी एक चुनौती है। |
| बजटीय आवंटन | रक्षा आधुनिकीकरण की बढ़ती आवश्यकताओं के मुकाबले बजटीय आवंटन की सीमाएँ परियोजनाओं की गति को धीमा कर सकती हैं। |
आगे की राह
- रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और तेज करना चाहिए ताकि परियोजनाओं में देरी को कम किया जा सके और लागत दक्षता सुनिश्चित की जा सके।
- घरेलू रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश बढ़ाना चाहिए।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें रक्षा उत्पादन में अधिक भूमिका निभाने के लिए अनुकूल माहौल प्रदान करना चाहिए।
- रक्षा क्षेत्र में कौशल विकास और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को मजबूत करना चाहिए ताकि उन्नत प्रौद्योगिकियों के लिए कुशल कार्यबल तैयार किया जा सके।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) को रणनीतिक रूप से उपयोग करना चाहिए ताकि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों तक पहुँच प्राप्त की जा सके और घरेलू क्षमताओं का निर्माण किया जा सके।
- रक्षा बजट का प्रभावी ढंग से आवंटन करना चाहिए और दीर्घकालिक योजना बनानी चाहिए ताकि नौसेना के आधुनिकीकरण की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
- साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में निवेश करना चाहिए ताकि भविष्य के युद्धों के लिए नौसेना को तैयार किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
आत्मनिर्भर भारत · रक्षा विनिर्माण · नौसेना आधुनिकीकरण · मेक इन इंडिया · कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड · पनडुब्बी रोधी युद्धपोत · रक्षा अधिग्रहण · रणनीतिक स्वायत्तता · तटीय सुरक्षा · समुद्री क्षमता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (d)’, ‘note’: ‘राष्ट्र की सेवा करने का कर्तव्य’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ सूची में रक्षा विषय’}
अवधारणा प्रवाह
पनडुब्बी रोधी युद्धपोत का प्रक्षेपण → भारतीय नौसेना की क्षमता वृद्धि → समुद्री सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण → आत्मनिर्भर भारत और रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा → क्षेत्रीय स्थिरता और भू-राजनीतिक प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ‘मछलीपट्टनम’ भारतीय नौसेना के लिए निर्मित सातवां पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW) है।
2. इस पोत का निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) द्वारा ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत किया गया है।
3. ASW उथले पानी के क्राफ्ट केवल पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए डिज़ाइन किए गए हैं और समुद्री खदान बिछाने में सक्षम नहीं हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। ‘मछलीपट्टनम’ आठ ASW उथले पानी के क्राफ्ट की श्रृंखला में सातवां है। कथन 2 भी सही है, क्योंकि CSL भारत में रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली एक प्रमुख इकाई है। कथन 3 गलत है, क्योंकि ASW उथले पानी के क्राफ्ट तटीय जल में पनडुब्बी रोधी अभियानों, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और समुद्री खदान बिछाने सहित उपसतह निगरानी के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) द्वारा निर्मित ‘मछलीपट्टनम’ पोत की विशेषताओं का सबसे अच्छा वर्णन करता है?
- यह एक गहरे पानी का पनडुब्बी रोधी युद्धपोत है जिसकी विस्थापन क्षमता 5000 टन से अधिक है।
- यह एक तटीय निगरानी पोत है जो मुख्य रूप से खोज और बचाव अभियानों के लिए डिज़ाइन किया गया है।
- यह एक पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW) उथले पानी का क्राफ्ट है जिसकी विस्थापन क्षमता लगभग 900 टन है और यह तटीय जल में संचालन के लिए है।
- यह एक विमानवाहक पोत है जिसे भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाएगा।
उत्तर: यह एक पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW) उथले पानी का क्राफ्ट है जिसकी विस्थापन क्षमता लगभग 900 टन है और यह तटीय जल में संचालन के लिए है। — मछलीपट्टनम एक पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW) उथले पानी का क्राफ्ट है, जिसका विस्थापन लगभग 900 टन है और यह तटीय जल में पनडुब्बी रोधी अभियानों, कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और खदान बिछाने के अभियानों के लिए डिज़ाइन किया गया है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता को बढ़ाने में स्वदेशी जहाज निर्माण की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के संदर्भ में यह भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण के लिए कितना महत्वपूर्ण है? (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: स्वदेशी जहाज निर्माण और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता का संक्षिप्त परिचय।
मुख्य भाग:
1. स्वदेशी जहाज निर्माण की भूमिका:
क. रक्षा आत्मनिर्भरता: आयात पर निर्भरता कम करना, रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाना।
ख. आर्थिक संवृद्धि: रोजगार सृजन, MSME क्षेत्र को बढ़ावा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण।
ग. तकनीकी उन्नति: अनुसंधान एवं विकास में निवेश, अत्याधुनिक तकनीकों का विकास।
घ. भू-राजनीतिक लाभ: क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में भूमिका, निर्यात क्षमता।
2. भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण के लिए महत्व:
क. बेड़े का विस्तार: युद्धपोतों, पनडुब्बियों और सहायक जहाजों की संख्या बढ़ाना।
ख. विशिष्ट क्षमताएं: पनडुब्बी रोधी युद्धपोत (ASW) जैसे विशिष्ट जहाजों का निर्माण।
ग. सुरक्षा चुनौतियां: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती समुद्री सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना।
घ. ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का योगदान: रक्षा उत्पादन में स्थानीयकरण, निजी क्षेत्र की भागीदारी।
3. चुनौतियां और आगे का मार्ग:
क. अनुसंधान एवं विकास में निवेश की आवश्यकता।
ख. निजी क्षेत्र की भागीदारी को और बढ़ाना।
ग. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता कम करना।
घ. कुशल कार्यबल का विकास।
निष्कर्ष: भारत की समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक हितों के लिए स्वदेशी जहाज निर्माण के महत्व को रेखांकित करते हुए एक संतुलित निष्कर्ष।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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