क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर है ?

क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर है ?

पाठ्यक्रम संबंध (Syllabus Mapping) : इतिहास की तुकबंदी, पश्चिम एशिया का संकट और वैश्विक शक्ति-संतुलन की नई परीक्षा

प्रारंभिक परीक्षा हेतु :  Axis of Resistance, NATO, BRICS, प्रॉक्सी युद्ध, हाइब्रिड युद्ध,
मुख्य परीक्षा हेतु:
GS–1: विश्व इतिहास, प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि, अंतरयुद्ध काल
GS–2: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, पश्चिम एशिया, भारत के हितों पर वैश्विक संघर्षों का प्रभाव, महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता, वैश्विक संस्थाएँ
GS–3: आंतरिक सुरक्षा, हाइब्रिड युद्ध, साइबर एवं ड्रोन युद्ध, ऊर्जा सुरक्षा, सामरिक आपूर्ति शृंखलाएँ

चर्चा में क्यों?

विश्व राजनीति इस समय बहु-स्तरीय तनाव के दौर से गुजर रही है। रूस–यूक्रेन युद्ध ने यूरोपीय सुरक्षा ढाँचे को चुनौती दी है, पश्चिम एशिया में ईरान–इजरायल–अमेरिका तनाव ने क्षेत्रीय संघर्ष को वैश्विक संकट से जोड़ दिया है, जबकि ताइवान प्रश्न को लेकर चीन–अमेरिका प्रतिद्वंद्विता ने इंडो-पैसिफिक को भी अस्थिर बना रखा है।इसी पृष्ठभूमि में हेनी ओजी कुकियर का विश्लेषण यह प्रश्न उठाता है कि क्या वर्तमान विश्व-व्यवस्था उन ऐतिहासिक पैटर्न्स की पुनरावृत्ति की ओर बढ़ रही है, जिन्होंने अतीत में विश्व युद्धों को जन्म दिया था। सामाजिक विखंडन, आर्थिक राष्ट्रवाद, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सैन्य गठबंधनों की सक्रियता—ये सभी संकेत बताते हैं कि दुनिया एक गहरे संक्रमणकाल से गुजर रही है।

यद्यपि वर्तमान स्थिति को सीधे “तृतीय विश्व युद्ध” कहना अभी जल्दबाजी होगी, फिर भी यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि विश्व एक ऐसे उच्च-जोखिम वाले दौर में प्रवेश कर चुका है, जहाँ क्षेत्रीय संकट व्यापक अंतर्राष्ट्रीय अस्थिरता को जन्म दे सकते हैं।

विषय की पृष्ठभूमि

इतिहास हमें यह सिखाता है कि बड़े युद्ध अचानक नहीं होते; वे लंबे समय से विकसित हो रहे सामाजिक तनाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक उग्रता और सैन्य गठबंधनों के सम्मिलित परिणाम होते हैं। प्रथम विश्व युद्ध से पहले यूरोप में राष्ट्रवाद, साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता और जटिल सैन्य संधियों ने एक विस्फोटक स्थिति पैदा की थी। द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व आर्थिक मंदी, फासीवाद, तुष्टिकरण और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विफलता ने शांति-व्यवस्था को कमजोर कर दिया था।
आज का विश्व निश्चित रूप से 1914 या 1939 जैसा नहीं है, लेकिन कुछ ऐसी संरचनात्मक समानताएँ दिखाई देती हैं जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए गंभीर चेतावनी का कार्य करती हैं। इसीलिए वर्तमान वैश्विक संकट को केवल घटनाओं के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक ऐतिहासिक-सामरिक प्रक्रिया के रूप में समझना आवश्यक है।

वैश्विक अस्थिरता के प्रमुख आयाम

1. सामाजिक आयाम: तकनीकी परिवर्तन और सामाजिक विखंडन

आधुनिक समाजों में तकनीकी क्रांति जितनी तीव्र हुई है, उतना ही गहरा सामाजिक तनाव भी उभरा है। प्रथम विश्व युद्ध से पहले औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन, श्रम और सामाजिक संबंधों को बदल दिया था। इससे बड़े पैमाने पर विस्थापन, असमानता और असुरक्षा की भावना बढ़ी।
आज AI, ऑटोमेशन, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने इसी प्रकार की नई असुरक्षा को जन्म दिया है। तकनीकी बेरोजगारी का डर, एल्गोरिद्मिक नियंत्रण, दुष्प्रचार और सूचनात्मक अराजकता ने कई समाजों में विश्वास-संकट पैदा किया है। सोशल मीडिया ने नागरिक भागीदारी को बढ़ाया अवश्य है, लेकिन साथ ही इसने समाजों को वैचारिक खाँचों में बाँटकर “डिजिटल ध्रुवीकरण” को भी तेज किया है। जब समाज भीतर से विखंडित होते हैं, तब उनके लिए बाहरी संघर्षों और आक्रामक राष्ट्रवाद की राजनीति का शिकार होना अधिक आसान हो जाता है।

2. आर्थिक आयाम: परस्पर निर्भरता बनाम आर्थिक राष्ट्रवाद

यह मान्यता लंबे समय तक प्रभावी रही कि जितना अधिक व्यापार होगा, युद्ध की संभावना उतनी कम होगी। परंतु इतिहास ने यह दिखाया है कि आर्थिक संपर्क शांति की गारंटी नहीं है। 1914 से पहले यूरोपीय देशों के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत थे, फिर भी वे युद्ध की ओर बढ़ गए। कारण स्पष्ट था—राज्य केवल समृद्धि नहीं चाहते, वे अपने प्रतिद्वंद्वी की तुलना में अधिक शक्ति भी चाहते हैं। यही “सापेक्ष शक्ति” की राजनीति है।
समकालीन विश्व में महामारी, रूस–यूक्रेन युद्ध, ऊर्जा संकट और तकनीकी प्रतिस्पर्धा ने आर्थिक वैश्वीकरण के स्थान पर “रणनीतिक अर्थव्यवस्था” को आगे बढ़ाया है। अब देशों की प्राथमिकता केवल व्यापार नहीं, बल्कि आपूर्ति शृंखला सुरक्षा, तकनीकी स्वावलंबन और आर्थिक स्वायत्तता भी है। ईरान पर प्रतिबंध, रूस पर आर्थिक दंड, तथा वैकल्पिक आर्थिक मंचों की खोज यह दर्शाती है कि अर्थव्यवस्था अब भू-राजनीति से पृथक क्षेत्र नहीं रही। वह शक्ति-संतुलन का सक्रिय उपकरण बन चुकी है।

3. राजनीतिक आयाम: ध्रुवीकरण, वैधता-संकट और उग्र राष्ट्रवाद

  • राजनीतिक व्यवस्थाएँ तब सबसे अधिक असुरक्षित हो जाती हैं जब वे समझौते और सहमति की क्षमता खो देती हैं। प्रथम विश्व युद्ध से पहले यूरोप में राष्ट्रवादी उन्माद और राजनीतिक हिंसा तेज हो रही थी। द्वितीय विश्व युद्ध से पहले लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी ने चरमपंथी ताकतों को उभार दिया।
  • आज भी अनेक देशों में राजनीतिक ध्रुवीकरण, चुनावी अविश्वास, संस्थाओं पर संदेह और दुष्प्रचार-आधारित राजनीति बढ़ रही है। इससे नीति-निर्माण अधिक प्रतिक्रियावादी और विदेश नीति अधिक आक्रामक बन सकती है। ईरान–इजरायल संघर्ष को भी केवल सामरिक प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह वैचारिक पहचान, सुरक्षा-चिंता और क्षेत्रीय वैधता का संघर्ष भी है। जब संघर्ष “अस्तित्व” और “प्रतिरोध” की भाषा में व्यक्त होने लगता है, तब समझौते की संभावना स्वतः कम हो जाती है।

4. सैन्य आयाम: गठबंधन-राजनीति, प्रॉक्सी युद्ध और क्षेत्रीय ट्रिगर

  • विश्व युद्ध अक्सर क्षेत्रीय संकट से प्रारंभ होते हैं और गठबंधनों के कारण फैलते हैं। 1914 में ऑस्ट्रिया–सर्बिया का संकट यही उदाहरण था ।
  • आज की दुनिया में भी यही तर्क नए रूप में उपस्थित है। रूस–यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में ईरान–इजरायल–अमेरिका तनाव और ताइवान को लेकर चीन–अमेरिका प्रतिस्पर्धा—ये तीनों संकट-क्षेत्र अलग दिखते हैं, पर इनके बीच रणनीतिक जुड़ाव के तत्व मौजूद हैं। ईरान अपने प्रभाव का विस्तार प्रत्यक्ष सैन्य शक्ति के साथ-साथ प्रॉक्सी नेटवर्कों के माध्यम से भी करता है। हिज्बुल्लाह, हमास, हूती और अन्य संबद्ध समूह यह दर्शाते हैं कि आधुनिक युद्ध अब राज्य बनाम राज्य की सरल परिभाषा से आगे बढ़ चुका है। इजरायल इस पूरे सुरक्षा परिवेश को अस्तित्वगत खतरे के रूप में देखता है, जबकि अमेरिका क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और समुद्री मार्गों की सुरक्षा के कारण संलिप्त रहता है। यदि ऐसे संकट ऊर्जा अवसंरचना, समुद्री व्यापार या खाड़ी क्षेत्र तक फैलते हैं, तो उनके वैश्विक प्रभाव अत्यंत गंभीर हो सकते हैं।

क्या वर्तमान परिस्थिति विश्व युद्ध-पूर्व काल से मिलती-जुलती है?

समानताएँ

-शक्ति-संतुलन की तीव्र राजनीति
-आर्थिक राष्ट्रवाद और प्रतिबंध-आधारित दबाव
-सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण
-सैन्य गठबंधनों तथा सुरक्षा ब्लॉकों की पुनर्सक्रियता
-क्षेत्रीय संघर्षों का वैश्विक रणनीतिक अर्थ ग्रहण करना

महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ

-परमाणु प्रतिरोध प्रत्यक्ष महायुद्ध के विरुद्ध एक मजबूत अवरोध है
-संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय संस्थाएँ अभी भी मौजूद हैं
-आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था कहीं अधिक गहराई से जुड़ी हुई है
-शक्तियाँ पूर्ण युद्ध के बजाय सीमित, प्रॉक्सी या हाइब्रिड संघर्ष को प्राथमिकता देती हैं

अतः यह निष्कर्ष अधिक उपयुक्त होगा कि वर्तमान स्थिति विश्व युद्ध की अनिवार्य पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि एक उच्च-जोखिम वाली वैश्विक अस्थिरता है।

ईरान–इजरायल–अमेरिका तनाव: संकट की धुरी क्यों?

पश्चिम एशिया लंबे समय से ऊर्जा, धर्म, भू-राजनीति और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। वर्तमान ईरान–इजरायल–अमेरिका तनाव इसी क्षेत्रीय जटिलता का सबसे खतरनाक रूप बन चुका है। ईरान स्वयं को क्षेत्रीय प्रतिरोध की शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है और अपने प्रभाव को प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों माध्यमों से बढ़ाता है। इजरायल अपनी सुरक्षा को अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न मानता है और किसी भी संभावित घेरेबंदी को दीर्घकालिक खतरे के रूप में देखता है। अमेरिका इस पूरे परिदृश्य में सामरिक स्थिरता, सहयोगी देशों की सुरक्षा और ऊर्जा मार्गों के संरक्षण के कारण सक्रिय भूमिका निभाता है। इस त्रिकोणीय तनाव की विशेषता यह है कि इसमें प्रत्यक्ष युद्ध, प्रॉक्सी संघर्ष, मिसाइल हमले, ड्रोन, साइबर व्यवधान, समुद्री दबाव और ऊर्जा आपूर्ति संकट—सभी शामिल हो सकते हैं। यही इसे एक स्थानीय संघर्ष से आगे बढ़ाकर वैश्विक व्यवस्था का संकट बनाता है।

भारत के लिए निहितार्थ

1. ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव
भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग आयात-आधारित है। पश्चिम एशिया में तनाव और Hormuz क्षेत्र में अस्थिरता भारत के आयात बिल और मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकती है।

2. प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा
खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं। युद्ध या अस्थिरता की स्थिति में उनकी सुरक्षा, निकासी और आजीविका महत्त्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।

3. समुद्री व्यापार और संपर्क
भारत का बड़ा व्यापार पश्चिम एशियाई समुद्री मार्गों से जुड़ा है। इन मार्गों पर खतरा आपूर्ति शृंखलाओं और वाणिज्यिक हितों को प्रभावित करेगा।

4. संतुलित कूटनीति की आवश्यकता
भारत के अमेरिका, इजरायल, ईरान, खाड़ी देशों और रूस—सभी के साथ महत्त्वपूर्ण संबंध हैं। अतः भारत को अत्यंत विवेकपूर्ण और संतुलित विदेश नीति अपनानी होगी।

5. सुरक्षा ढाँचे का आधुनिकीकरण
ड्रोन, साइबर हमले, दुष्प्रचार, मिसाइल रक्षा और प्रॉक्सी युद्ध जैसी चुनौतियाँ यह संकेत देती हैं कि भारत को अपनी सुरक्षा अवधारणा को और अधिक व्यापक बनाना होगा।

आगे की राह

1. बहुपक्षीय कूटनीति को पुनर्जीवित करना
क्षेत्रीय संकटों के विस्तार को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और मध्यस्थता तंत्रों को अधिक प्रभावी बनाना होगा।

2. लोकतांत्रिक समाजों की आंतरिक मजबूती
घरेलू ध्रुवीकरण और संस्थागत अविश्वास बाहरी अस्थिरता को बढ़ाते हैं। मजबूत लोकतंत्र वैश्विक संकटों से बेहतर ढंग से निपट सकते हैं।

3. हाइब्रिड युद्ध के युग में नई सुरक्षा-समझ
सुरक्षा को केवल सैन्य शक्ति तक सीमित न रखकर साइबर, ऊर्जा, सूचना और आपूर्ति शृंखला सुरक्षा से भी जोड़ना होगा।

4. क्षेत्रीय संघर्षों का समय रहते प्रबंधन
इतिहास बताता है कि आरंभिक स्तर पर नियंत्रित न किए गए क्षेत्रीय संकट बाद में व्यापक युद्ध में बदल सकते हैं।

5. भारत के लिए रणनीतिक स्वायत्तता
भारत को किसी कठोर गुटीय राजनीति में फँसे बिना बहुध्रुवीय विश्व में अपने हितों के अनुसार संतुलित कूटनीति अपनानी होगी।

निष्कर्ष

दुनिया आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ क्षेत्रीय संघर्ष, महाशक्ति प्रतिस्पर्धा और आंतरिक राजनीतिक संकट एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि विश्व निश्चित रूप से तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रहा है, लेकिन यह कहना भी कठिन है कि वर्तमान संकट केवल स्थानीय और असंबद्ध घटनाएँ हैं। हेनी ओजी कुकियर का विश्लेषण इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि वह इतिहास की उन संरचनात्मक प्रक्रियाओं की ओर ध्यान दिलाता है, जिन्होंने अतीत में विश्व को विनाशकारी युद्धों की ओर धकेला था। सामाजिक विखंडन, आर्थिक राष्ट्रवाद, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सैन्य गठबंधनों की कठोरता—ये सभी संकेत आज भी मौजूद हैं। भारत और विश्व समुदाय के लिए चुनौती यही है कि वे इतिहास की तुकबंदी को नियति न बनने दें। कूटनीति, संतुलित शक्ति-राजनीति, मजबूत संस्थाएँ और समय रहते संकट-प्रबंधन ही इस दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय होंगे।

 

प्रारंभिक परीक्षा हेतु प्रश्न

‘Axis of Resistance’ शब्द का संबंध किससे है?
(a) NATO की यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था
(b) ईरान-समर्थित या ईरान-संबद्ध क्षेत्रीय प्रतिरोध नेटवर्क
(c) BRICS का सैन्य गठबंधन
(d) संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना
उत्तर: (b)

मुख्य परीक्षा हेतु प्रश्न

1. “इतिहास स्वयं को दोहराता नहीं, बल्कि तुकबंदी करता है।” वर्तमान वैश्विक संकटों के संदर्भ में इस कथन की प्रासंगिकता का परीक्षण कीजिये।
2. “आर्थिक परस्पर निर्भरता युद्ध के विरुद्ध कोई पूर्ण गारंटी नहीं है।” प्रथम विश्व युद्ध तथा समकालीन वैश्विक राजनीति के उदाहरणों सहित विश्लेषण कीजिये।
3. ईरान–इजरायल–अमेरिका तनाव को एक क्षेत्रीय संघर्ष, प्रॉक्सी युद्ध और वैश्विक व्यवस्था-संकट—तीनों रूपों में स्पष्ट कीजिये। भारत के हितों पर इसके प्रभावों का मूल्यांकन कीजिये।

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