13 Aug जैव-ई3 नीति: जीवाश्म मुक्त अर्थव्यवस्था के लिए जैव-विनिर्माण की राह
✎ जैव-ई3 नीति भारत में जीवाश्म-आधारित कच्चे माल पर निर्भरता कम करने, जैव-आधारित समाधानों को बढ़ावा देने और नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक व्यापक जैव-विनिर्माण रणनीति है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था | GS Paper II — सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप
- Prelims: जैव-ई3 नीति, जैव-विनिर्माण, जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), सुजीविका पोर्टल, नेट-जीरो उत्सर्जन, चक्रीय अर्थव्यवस्था, बायोमास, हरित हाइड्रोजन मिशन
- Essay: भारत का नेट-जीरो लक्ष्य और चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में जैव-प्रौद्योगिकी की भूमिका, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक संवृद्धि के बीच संतुलन: जैव-आधारित समाधानों का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: जैव-ई3 नीति भारत में जीवाश्म-आधारित कच्चे माल पर निर्भरता कम करने, जैव-आधारित समाधानों को बढ़ावा देने और नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक व्यापक जैव-विनिर्माण रणनीति है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने हाल ही में जैव-ई3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी) नीति के पर्यावरणीय परिणामों और इसके कार्यान्वयन की प्रगति पर जानकारी प्रदान की। इस नीति का उद्देश्य जीवाश्म-आधारित कच्चे माल के स्थान पर जैव-आधारित विकल्पों को बढ़ावा देना और भारत की कार्बन उत्सर्जन में कमी तथा नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं में योगदान करना है।
पृष्ठभूमि
- भारत सरकार ने जीवाश्म-आधारित कच्चे माल पर आयात निर्भरता कम करने और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए जैव-आधारित समाधानों पर ध्यान केंद्रित किया है।
- जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) जैव-विनिर्माण (Biomanufacturing) समाधानों के विकास और विस्तार के लिए प्रौद्योगिकी विकास परियोजनाओं को सहायता प्रदान कर रहा है।
- डीबीटी ने ‘सुजीविका’ नामक एक डिजिटल पोर्टल लॉन्च किया है, जो आयात संबंधी आंकड़ों के आधार पर स्वदेशी जैव-आधारित उत्पादों की पहचान करने में मदद करता है।
- जैव-ई3 नीति कृषि अवशेषों, नगर निकायों के जैविक कचरे और औद्योगिक जैवजन्य अपशिष्ट को उन्नत ईंधन, रसायन और सामग्रियों में परिवर्तित करने हेतु अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देती है।
- सरकार विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच अंतर-मंत्रालयी समन्वय के माध्यम से जैव-ई3 नीति को लागू कर रही है, जिससे ‘संपूर्ण सरकारी दृष्टिकोण’ (Whole-of-Government Approach) अपनाया जा सके।
- इस नीति का लक्ष्य चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) और नेट-जीरो उत्सर्जन (Net-Zero Emissions) के सिद्धांतों के अनुरूप कम कार्बन अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है।
जैव-ई3 नीति क्या है?
- जैव-ई3 नीति का पूर्ण रूप ‘अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी’ है, जिसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा तैयार किया गया है।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य जीवाश्म-आधारित कच्चे माल के स्थान पर जैव-आधारित विकल्पों के जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देना है, जिससे आयात निर्भरता कम हो और आत्मनिर्भर भारत को प्रोत्साहन मिले।
- यह नीति प्रौद्योगिकी विकास और उसके विस्तार के लिए मापनीय लक्ष्य निर्धारित करती है, जिसमें पैमाने, उपज और प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (Technology Readiness Level) पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
- जैव-ई3 नीति कृषि अवशेषों, जैविक कचरे और औद्योगिक जैवजन्य अपशिष्ट जैसे विभिन्न बायोमास फीडस्टॉक के कुशल उपयोग पर जोर देती है, ताकि उन्हें उच्च-मूल्य वाले उत्पादों में परिवर्तित किया जा सके।
- यह नीति जैव-फाउंड्री (Bio-Foundry) और जैव-एआई (Bio-AI) केंद्र जैसे जैव-सक्षम तंत्रों के एकीकरण की दिशा में काम कर रही है, जिससे आवश्यक पैमाना और बायोमास आपूर्ति श्रृंखलाएं सुदृढ़ हो सकें।
- इसके प्रमुख पर्यावरणीय परिणामों में भूमि उपयोग को कम करने के लिए प्रौद्योगिकीय समाधान, नवीकरणीयता को बढ़ावा देना, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और अपशिष्ट से मूल्य सृजन शामिल हैं।
- डीबीटी इस नीति के तहत सुंदरबन जैसे क्षरित इकोसिस्टम के जैव-पुनर्स्थापन जैसी पहलों को सहायता प्रदान कर रहा है।
- यह नीति भारत की कार्बन उत्सर्जन में कमी और नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली संभावित जैव-प्रौद्योगिकी आधारित पहलों का आकलन करती है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| जैव-आधारित विकल्पों का जैव-विनिर्माण | जीवाश्म-आधारित कच्चे माल पर निर्भरता कम करना, आयात प्रतिस्थापन को बढ़ावा देना। |
| प्रौद्योगिकी विकास और विस्तार | पैमाने, उपज और प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर के आधार पर मापनीय लक्ष्य निर्धारित करना। |
| डिजिटल पोर्टल ‘सुजीविका’ | आयात संबंधी आंकड़ों के आधार पर स्वदेशी जैव-आधारित उत्पादों की पहचान करना, आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देना। |
| कृषि अवशेषों और कचरे का उपयोग | बायोमास को उन्नत ईंधन, रसायन और सामग्रियों में परिवर्तित करना, चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना। |
| अंतर-मंत्रालयी समन्वय | जैव-ई3 नीति के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए ‘संपूर्ण सरकारी दृष्टिकोण’ अपनाना। |
| जैव-फाउंड्री और जैव-एआई केंद्र | जैव-सक्षम तंत्रों का एकीकरण, उच्च-मूल्य वाले उत्पादों का व्यवसायीकरण। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- जीवाश्म-आधारित कच्चे माल पर आयात निर्भरता में कमी से विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- स्वदेशी जैव-आधारित उत्पादों के विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा, जिससे ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को गति मिलेगी।
- कृषि अवशेषों और जैविक कचरे के मूल्यवर्धन से किसानों और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को लाभ होगा।
पर्यावरणीय महत्व
- कार्बन उत्सर्जन में कमी और भारत की ‘नेट-ज़ीरो’ प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में योगदान।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को बढ़ावा मिलेगा, जिससे अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधनों में बदला जा सकेगा।
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और नवीकरणीयता को बढ़ावा मिलेगा।
सामरिक महत्व
- ऊर्जा सुरक्षा और रासायनिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।
- जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे भारत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकेगा।
- संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण और क्षरित पारिस्थितिकी तंत्रों के जैव-पुनर्स्थापन में मदद मिलेगी।
सामाजिक महत्व
- जैव-विनिर्माण क्षेत्र में नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
- एकल-उपयोग प्लास्टिक के विकल्पों के विकास से पर्यावरणीय प्रदूषण कम होगा, जिससे जन स्वास्थ्य में सुधार होगा।
चुनौतियाँ
1. प्रौद्योगिकी का पैमाना और व्यावसायीकरण
- प्रयोगशाला स्तर से औद्योगिक पैमाने तक प्रौद्योगिकियों का सफल विस्तार एक चुनौती है।
- जैव-आधारित उत्पादों के लिए बाजार स्वीकृति और लागत-प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी – नवाचार
2. कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला
- कृषि अवशेषों और जैविक कचरे की निरंतर और पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना।
- बायोमास के संग्रह, परिवहन और भंडारण से संबंधित लॉजिस्टिक चुनौतियाँ।
यूपीएससी लिंक: कृषि – संसाधन प्रबंधन
3. नियामक और नीतिगत ढाँचा
- जैव-विनिर्माण उत्पादों के लिए स्पष्ट और सुसंगत नियामक दिशानिर्देशों का अभाव।
- विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच प्रभावी समन्वय बनाए रखना।
यूपीएससी लिंक: शासन – नीति निर्माण
4. अनुसंधान एवं विकास में निवेश
- जैव-प्रौद्योगिकी में उच्च-जोखिम वाले अनुसंधान और विकास के लिए पर्याप्त वित्तपोषण की आवश्यकता।
- कुशल मानव संसाधन और विशेषज्ञता की कमी।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी – अनुसंधान
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| तकनीकी तत्परता | पायलट-स्तरीय परियोजनाओं को पूर्ण-स्तरीय वाणिज्यिक उत्पादन में बदलने में चुनौतियाँ। |
| लागत-प्रतिस्पर्धा | जैव-आधारित उत्पादों की लागत जीवाश्म-आधारित विकल्पों की तुलना में अधिक हो सकती है। |
| बुनियादी ढाँचा | जैव-रिफाइनरी और जैव-विनिर्माण सुविधाओं के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे का विकास। |
| जागरूकता और स्वीकृति | जैव-आधारित उत्पादों के लाभों के बारे में उपभोक्ताओं और उद्योगों के बीच जागरूकता बढ़ाना। |
| अपशिष्ट प्रबंधन | विभिन्न प्रकार के कृषि और औद्योगिक अपशिष्टों के कुशल प्रबंधन और उपयोग की जटिलताएँ। |
आगे की राह
- जैव-विनिर्माण प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान, विकास और व्यावसायीकरण के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना।
- बायोमास आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करने के लिए किसानों और अपशिष्ट संग्रहकर्ताओं के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करना।
- जैव-आधारित उत्पादों के लिए एक अनुकूल नियामक ढाँचा विकसित करना, जिसमें मानकीकरण और प्रमाणन शामिल हो।
- जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कौशल विकास और मानव संसाधन क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना।
- जैव-ई3 नीति के तहत विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच प्रभावी अंतर-मंत्रालयी समन्वय को मजबूत करना।
- जैव-आधारित उत्पादों के लिए बाजार प्रोत्साहन और वित्तीय सहायता प्रदान करना ताकि उनकी लागत-प्रतिस्पर्धा बढ़ाई जा सके।
- डिजिटल पोर्टल ‘सुजीविका’ जैसे प्लेटफार्मों का उपयोग करके डेटा-संचालित नीति निर्माण को बढ़ावा देना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जैव-ई3 नीति · जैव-विनिर्माण · चक्रीय अर्थव्यवस्था · नेट-जीरो उत्सर्जन · आत्मनिर्भर भारत · जैव-आधारित विकल्प · जीवाश्म-आधारित कच्चे माल · कार्बन उत्सर्जन में कमी · प्रौद्योगिकी विकास · जैव प्रौद्योगिकी विभाग
अवधारणा प्रवाह
जीवाश्म-आधारित कच्चे माल पर निर्भरता → जैव-ई3 नीति का निर्माण (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी) → जैव-विनिर्माण समाधानों का विकास (बायोमास का उपयोग) → आयात निर्भरता में कमी और कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण → चक्रीय अर्थव्यवस्था और नेट-ज़ीरो प्रतिबद्धताओं की प्राप्ति
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. जैव-ई3 नीति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करना है।
2. यह जीवाश्म-आधारित कच्चे माल पर आयात निर्भरता को कम करने पर केंद्रित है।
3. ‘सुजीविका’ पोर्टल जैव-ई3 नीति के तहत जैव-विनिर्माण समाधानों को बढ़ावा देता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि जैव-ई3 का पूर्ण रूप अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी है। कथन 2 सही है क्योंकि नीति का एक प्रमुख उद्देश्य जीवाश्म-आधारित कच्चे माल पर आयात निर्भरता कम करना है। कथन 3 सही है क्योंकि ‘सुजीविका’ पोर्टल जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित आयात संबंधी आंकड़े उपलब्ध कराकर स्वदेशी जैव-आधारित उत्पादों की पहचान करने में सहायता करता है, जिससे जैव-विनिर्माण समाधानों को बढ़ावा मिलता है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से जैव-ई3 नीति के तहत ‘चक्रीय अर्थव्यवस्था’ और ‘नेट-जीरो उत्सर्जन’ के सिद्धांतों के अनुरूप है/हैं?
1. भूमि उपयोग को कम करने के लिए प्रौद्योगिकीय समाधान।
2. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी।
3. अपशिष्ट से मूल्य सृजन संबंधी समाधान।
4. संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण के लिए आणविक टूल का विकास।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1, 2 और 3
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — कथन 1, 2 और 3 सीधे तौर पर चक्रीय अर्थव्यवस्था और नेट-जीरो उत्सर्जन के सिद्धांतों से संबंधित हैं, क्योंकि वे संसाधनों के कुशल उपयोग, प्रदूषण में कमी और अपशिष्ट पुनर्चक्रण पर केंद्रित हैं। कथन 4, संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण के लिए आणविक टूल का विकास, जैव-विविधता संरक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन यह सीधे तौर पर चक्रीय अर्थव्यवस्था या नेट-जीरो उत्सर्जन के सिद्धांतों से संबंधित नहीं है, हालांकि यह व्यापक पर्यावरणीय स्थिरता का हिस्सा है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ जैव-ई3 नीति क्या है और यह भारत की ‘नेट-जीरो’ प्रतिबद्धताओं को प्राप्त करने में किस प्रकार सहायक हो सकती है? इसके प्रमुख पर्यावरणीय परिणामों और चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में इसकी भूमिका का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: जैव-ई3 नीति (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी) का संक्षिप्त परिचय, इसके मुख्य उद्देश्य (जीवाश्म-आधारित कच्चे माल के स्थान पर जैव-आधारित विकल्पों का जैव-विनिर्माण) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) की भूमिका।
2. नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं में सहायता: नीति कैसे कार्बन उत्सर्जन में कमी, आयात निर्भरता में कमी और स्वदेशी स्वच्छ प्रौद्योगिकियों के विकास के माध्यम से भारत की नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं में योगदान करती है, इसका विस्तार।
3. प्रमुख पर्यावरणीय परिणाम: नीति के तहत निर्धारित और प्राप्त किए जा रहे विशिष्ट पर्यावरणीय परिणामों का उल्लेख, जैसे:
क. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी।
ख. अपशिष्ट से मूल्य सृजन (कृषि अवशेष, नगर निकायों से निकलने वाले जैविक कचरे का उपयोग)।
ग. भूमि उपयोग को कम करने के लिए प्रौद्योगिकीय समाधान।
घ. नवीकरणीयता को बढ़ावा देना।
ङ. एकल-उपयोग प्लास्टिक और पॉलिमर के विकल्प।
च. कार्बन कैप्चर उपयोग संबंधी एकीकृत जैव-विनिर्माण।
4. चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में भूमिका: नीति कैसे चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों (संसाधनों का कुशल उपयोग, अपशिष्ट न्यूनीकरण और पुनर्चक्रण) को एकीकृत करती है, इसका विश्लेषण। ‘सुजीविका’ पोर्टल और बायोमास आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करने जैसे प्रयासों का उल्लेख।
5. निष्कर्ष: जैव-ई3 नीति के महत्व का सारांश, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में इसकी क्षमता पर बल।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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