07 Aug डीएमके ने सीमांकन विधेयक के लिए रखीं शर्तें, जानिए क्या हैं मांगें
✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण कर 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है, जिसका भारतीय संघवाद पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ | GS Paper II — संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय
- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, जनसंख्या जनगणना, लोकसभा सीटों का निर्धारण, संवैधानिक संशोधन, संघवाद, प्रतिनिधित्व
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और भविष्य, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और जनसंख्या नीति का संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण कर ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है, जिसका भारतीय संघवाद पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने केंद्र सरकार द्वारा लाए जा रहे परिसीमन विधेयक को समर्थन देने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। इन शर्तों में 1976 के संवैधानिक संशोधन के आधार पर सीटों के निर्धारण को अगले 25 वर्षों के लिए यथावत रखना और सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि करना शामिल है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार विपक्ष से समर्थन जुटाने का प्रयास कर रही है।
पृष्ठभूमि
- परिसीमन (Delimitation) का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
- भारत में, परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के समान वर्गों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना है।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है।
- अनुच्छेद 170 राज्यों की विधानसभाओं में सीटों के निर्धारण से संबंधित है।
- वर्तमान में, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया है, जिसे नवीनतम जनगणना पूरी होने के बाद समाप्त होना है, जिसके 2027 में पूरा होने की उम्मीद है।
- अगली जनगणना 2027 में पूरी होने की उम्मीद है, जिसके बाद नया परिसीमन अभ्यास होने की संभावना है।
- दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि यदि सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो उनकी सीटें कम हो सकती हैं, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
परिसीमन क्या है?
- परिसीमन का अर्थ है विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण।
- यह प्रक्रिया एक स्वतंत्र निकाय, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा की जाती है, जिसके आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या में परिवर्तन के कारण निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को समायोजित करना है ताकि सभी नागरिकों को समान प्रतिनिधित्व मिल सके।
- भारत में, परिसीमन आयोग का गठन संसद द्वारा बनाए गए परिसीमन अधिनियम के तहत किया जाता है।
- आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं।
- परिसीमन के दौरान, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या और स्थान भी निर्धारित किए जाते हैं।
- यह प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का सिद्धांत कायम रहे।
- परिसीमन का प्रभाव राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन पर पड़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| परिसीमन पर संवैधानिक रोक | वर्तमान में 1971 की जनगणना पर आधारित सीटों की संख्या पर रोक है, जो 2027 में समाप्त होने वाली है। DMK इसे अगले 25 वर्षों तक जारी रखने की मांग कर रही है। |
| लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि | DMK सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में 50% की एकमुश्त वृद्धि चाहती है, जैसा कि गृह मंत्री ने पहले मौखिक रूप से वादा किया था। |
| राज्यों के लिए सीटों की अनुसूची | DMK चाहती है कि विधायी पैकेज में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की संख्या की एक अनुसूची (Schedule) शामिल की जाए। |
| संविधान संशोधन विधेयक | केंद्र सरकार एक नए परिसीमन अभ्यास के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाने पर विचार कर रही है। |
| DMK का समर्थन | DMK ने विधेयक में आवश्यक बदलाव होने पर समर्थन देने की शर्त रखी है। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- परिसीमन (Delimitation) भारतीय राजनीति में एक संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि यह राज्यों के बीच शक्ति संतुलन और प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है।
- दक्षिणी राज्यों की चिंताएँ, विशेष रूप से जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण सीटों के संभावित नुकसान को लेकर, इस मुद्दे को और जटिल बनाती हैं।
- केंद्र सरकार के लिए संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने हेतु विपक्षी दलों का समर्थन महत्वपूर्ण है, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
संघवाद पर प्रभाव
- परिसीमन का मुद्दा संघवाद (Federalism) के सिद्धांतों से जुड़ा है, जहाँ राज्यों को केंद्र में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
- जनसंख्या वृद्धि के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे संघीय ढाँचे में असंतुलन पैदा हो सकता है।
संवैधानिक निहितार्थ
- परिसीमन पर रोक हटाने या बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी, जो एक जटिल प्रक्रिया है।
- यह मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) के गठन और उसके कार्यों से संबंधित है।
चुनौतियाँ
1. जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व
- जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों को डर है कि नए परिसीमन से उनकी लोकसभा सीटों की संख्या कम हो सकती है, जिससे उनका राजनीतिक प्रभाव घट जाएगा।
- यह ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत और जनसंख्या नियंत्रण के प्रोत्साहन के बीच संतुलन बनाने की चुनौती प्रस्तुत करता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत
- संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जिसे प्राप्त करना सरकार के लिए एक चुनौती है।
- विपक्षी दलों के बीच आम सहमति बनाना और उनके समर्थन को सुरक्षित करना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: संशोधन प्रक्रिया
3. राज्यों के बीच असंतुलन
- यदि परिसीमन 2027 की जनगणना पर आधारित होता है, तो अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को अधिक सीटें मिल सकती हैं, जिससे राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति का असंतुलन पैदा हो सकता है।
- यह क्षेत्रीय असमानताओं और प्रतिनिधित्व में विसंगतियों को बढ़ा सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजनीति: क्षेत्रीय असमानताएँ
4. राजनीतिक सहमति का अभाव
- परिसीमन एक अत्यधिक राजनीतिक और संवेदनशील मुद्दा है, जिस पर विभिन्न राजनीतिक दलों के अलग-अलग हित और दृष्टिकोण हैं।
- एक सर्वसम्मत समाधान तक पहुँचना और सभी हितधारकों को संतुष्ट करना कठिन है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजनीति: राजनीतिक दल और हित समूह
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| दक्षिणी राज्यों की सीटें | जनसंख्या नियंत्रण के कारण लोकसभा में सीटों की हिस्सेदारी कम होने का डर। |
| संवैधानिक बहुमत | संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करने की चुनौती। |
| संघीय असंतुलन | जनसंख्या वृद्धि के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से राज्यों के बीच शक्ति असंतुलन। |
| राजनीतिक सहमति | परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति का अभाव। |
| 1971 की जनगणना पर रोक | वर्तमान रोक के समाप्त होने पर दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व पर संभावित नकारात्मक प्रभाव। |
आगे की राह
- केंद्र सरकार को सभी राजनीतिक दलों, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श करना चाहिए।
- एक ऐसा फार्मूला विकसित किया जाना चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित न करे और साथ ही ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को भी बनाए रखे।
- परिसीमन के प्रभावों का आकलन करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है, जिसमें विभिन्न दृष्टिकोणों के विशेषज्ञ शामिल हों।
- संविधान संशोधन विधेयक में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए और सभी हितधारकों को विधेयक के मसौदे पर अपनी राय व्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए।
- सीटों के पुनर्वितरण के लिए एक हाइब्रिड मॉडल पर विचार किया जा सकता है, जिसमें जनसंख्या के साथ-साथ अन्य कारकों (जैसे भौगोलिक क्षेत्र) को भी ध्यान में रखा जाए।
- राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने के लिए लोकसभा सीटों में एक निश्चित वृद्धि पर विचार किया जा सकता है, जैसा कि DMK द्वारा प्रस्तावित है, लेकिन इसे न्यायसंगत तरीके से लागू किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटें · संवैधानिक संशोधन · जनगणना · संघवाद · प्रतिनिधित्व · जनसांख्यिकीय लाभांश · दक्षिण भारतीय राज्य · संसदीय लोकतंत्र · राजनीतिक प्रतिनिधित्व · अनुच्छेद 82 · समान प्रतिनिधित्व
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘राज्यों की विधानसभाओं में सीटों का परिसीमन’}
अवधारणा प्रवाह
जनसंख्या नियंत्रण में दक्षिणी राज्यों की सफलता → जनसंख्या वृद्धि के आधार पर परिसीमन की संभावना → दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटों में कमी का डर → DMK द्वारा परिसीमन पर रोक जारी रखने की मांग → केंद्र सरकार द्वारा संविधान संशोधन विधेयक लाने का प्रयास → विधेयक पारित करने के लिए राजनीतिक सहमति की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है।
2. 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन को 2001 की जनगणना तक के लिए स्थगित कर दिया था।
3. परिसीमन आयोग एक उच्चाधिकार प्राप्त निकाय है जिसके आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 गलत है। 42वें संशोधन ने सीटों के परिसीमन को 2001 की जनगणना तक के लिए स्थगित कर दिया था, लेकिन यह 1971 की जनगणना पर आधारित था। कथन 3 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. परिसीमन आयोग की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
2. आयोग में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त, संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त और सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश शामिल होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: केवल 1 — कथन 1 सही है। परिसीमन आयोग की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। कथन 2 गलत है। आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश (जो अध्यक्ष होते हैं), मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया भारतीय संघवाद और राज्यों के प्रतिनिधित्व के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ रखती है। इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए और चर्चा कीजिए कि दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं क्यों जायज हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: परिसीमन की परिभाषा और संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 82) दें। भारतीय संघवाद पर इसके प्रभावों का विश्लेषण करें, विशेषकर जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर। दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को विस्तार से बताएं: जनसंख्या नियंत्रण में सफलता, सीटों में संभावित कमी, वित्तीय हस्तांतरण पर प्रभाव, और राष्ट्रीय राजनीति में घटता प्रभाव। इन चिंताओं की वैधता का मूल्यांकन करें और संभावित समाधानों पर चर्चा करें, जैसे सीटों में वृद्धि या 1971 की जनगणना पर आधारित फ्रीज को जारी रखना।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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