थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना: आयात पर निर्भरता घटाने की दिशा में बड़ा कदम

थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना — diagram

थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना: आयात पर निर्भरता घटाने की दिशा में बड़ा कदम

Map of Andhra Pradesh, Gujarat, Haryana, Himachal Pradesh, Jammu an highlighted on the map of India — PLI scheme for bulk…
मानचित्र व माइंड-मैप: थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना: राज्यवार अनुमोदित परियोजनाएं

✎ थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना का लक्ष्य भारत को महत्वपूर्ण फार्मास्युटिकल इनपुट के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना और आयात निर्भरता को कम करना है, जिससे घरेलू विनिर्माण और निवेश को प्रोत्साहन मिले।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप, स्वास्थ्य  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ
  • Prelims: उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, थोक दवाएँ (Bulk Drugs), सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयव (API), महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्री (KSM), औषधि मध्यवर्ती (DI), फार्मास्युटिकल उद्योग, आत्मनिर्भर भारत अभियान
  • Essay: आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सरकारी योजनाओं की भूमिका, भारत का फार्मास्युटिकल क्षेत्र: चुनौतियाँ और अवसर

त्वरित पुनरावृत्ति: थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना का लक्ष्य भारत को महत्वपूर्ण फार्मास्युटिकल इनपुट के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना और आयात निर्भरता को कम करना है, जिससे घरेलू विनिर्माण और निवेश को प्रोत्साहन मिले।

यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत सरकार ने थोक दवाओं के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के तहत 48 परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य देश में महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्रियों (KSM), औषधि मध्यवर्ती (DI) और सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयवों (API) के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है। इस योजना के लिए 6,940 करोड़ रुपये का परिव्यय स्वीकृत किया गया है और मार्च 2026 तक 5,070.45 करोड़ रुपये का निवेश हासिल किया जा चुका है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हुई है और घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन मिला है।

पृष्ठभूमि

  • थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना का लक्ष्य भारत को फार्मास्युटिकल उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना, आयात निर्भरता को कम करना और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की स्थिति को मजबूत करना है।

उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना क्या है?

  • उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भारत सरकार द्वारा शुरू की गई एक पहल है जिसका उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना और आयात निर्भरता को कम करना है।
  • थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना विशेष रूप से महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्रियों (KSM), औषधि मध्यवर्ती (DI) और सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयवों (API) के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
  • इस योजना के तहत, पात्र निर्माताओं को उनके उत्पादन और बिक्री में वृद्धि के आधार पर वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है।
  • यह योजना फार्मास्युटिकल क्षेत्र में भारत की आयात निर्भरता को कम करने और देश को फार्मास्युटिकल उत्पादन का एक वैश्विक केंद्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
  • योजना का लक्ष्य घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करना और भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
घरेलू उत्पादन को बढ़ावा महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्रियों (केएसएम), औषधि मध्यवर्ती (डीआई) और सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयवों (एपीआई) के आयात पर निर्भरता कम करना।
48 परियोजनाओं को मंजूरी देश भर में फार्मास्युटिकल विनिर्माण क्षमता का विस्तार और विविधीकरण।
6,940 करोड़ रुपये का परिव्यय फार्मास्युटिकल क्षेत्र में पर्याप्त सरकारी निवेश, जो आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है।
5,070.45 करोड़ रुपये का निवेश योजना के तहत प्रतिबद्ध निवेश लक्ष्यों को पार करना, जो उद्योग के उत्साह को दर्शाता है।
18 एपीआई का उत्पादन शुरू पेनिसिलिन जी, डेक्सामेथासोन, एटोरवास्टेटिन जैसे महत्वपूर्ण एपीआई का घरेलू उत्पादन, जिससे दवाओं की उपलब्धता और सामर्थ्य सुनिश्चित होगी।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन मिलने से फार्मास्युटिकल क्षेत्र में आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) होगी और रोज़गार के अवसर सृजित होंगे।
  • आयात पर निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी और व्यापार घाटा (Trade Deficit) कम होगा।
  • उत्पादन क्षमता में वृद्धि से फार्मास्युटिकल उत्पादों की लागत प्रभावीता बढ़ेगी, जिससे आम जनता को सस्ती दवाएँ मिल सकेंगी।

सामरिक महत्व

  • दवाओं और उनके घटकों के लिए आत्मनिर्भरता (Self-Reliance) सुनिश्चित होगी, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में व्यवधानों का प्रभाव कम होगा।
  • भारत ‘दुनिया की फार्मेसी’ के रूप में अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा में योगदान मिलेगा।
  • महत्वपूर्ण दवाओं के उत्पादन में आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, विशेषकर महामारी जैसी स्थितियों में।

सामाजिक महत्व

  • आवश्यक दवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित होगी, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा।
  • सस्ती दवाओं तक पहुँच बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाएँ अधिक समावेशी बनेंगी।
  • गुणवत्तापूर्ण दवाओं के घरेलू उत्पादन से जनता का स्वास्थ्य बेहतर होगा।

चुनौतियाँ

1. अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश की कमी

  • भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग अभी भी नए अणुओं (New Molecules) और उन्नत प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान और विकास में पीछे है।
  • पीएलआई योजना मुख्य रूप से मौजूदा उत्पादों के उत्पादन पर केंद्रित है, न कि मौलिक नवाचार पर।

2. पर्यावरणीय अनुपालन और स्थिरता

  • बल्क ड्रग्स के उत्पादन में अक्सर रासायनिक प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं जो पर्यावरणीय प्रदूषण का कारण बन सकती हैं।
  • कठोर पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित करना और सतत उत्पादन विधियों को अपनाना एक चुनौती है।

3. कौशल विकास और जनशक्ति

  • फार्मास्युटिकल विनिर्माण के लिए उच्च कुशल जनशक्ति की आवश्यकता होती है, विशेषकर उन्नत प्रौद्योगिकियों के संचालन के लिए।
  • उद्योग की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी हो सकती है।

4. गुणवत्ता नियंत्रण और नियामक चुनौतियाँ

  • अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप गुणवत्ता नियंत्रण बनाए रखना महत्वपूर्ण है ताकि भारतीय उत्पादों की वैश्विक स्वीकार्यता बनी रहे।
  • नियामक प्रक्रियाओं में जटिलता और देरी नए उत्पादों के बाजार में आने में बाधा डाल सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
आयात पर अत्यधिक निर्भरता महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्रियों (केएसएम) और सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयवों (एपीआई) के लिए चीन जैसे देशों पर निर्भरता, जो आपूर्ति श्रृंखला को कमजोर करती है।
प्रौद्योगिकी अंतराल कुछ उन्नत विनिर्माण प्रक्रियाओं और उच्च-मूल्य वाले एपीआई के उत्पादन में तकनीकी विशेषज्ञता की कमी।
आधारभूत संरचना की कमी फार्मास्युटिकल विनिर्माण के लिए आवश्यक विश्व स्तरीय आधारभूत संरचना (जैसे विशेष औद्योगिक पार्क, परीक्षण सुविधाएँ) की अपर्याप्तता।
प्रतिस्पर्धात्मकता वैश्विक बाजार में अन्य देशों के साथ मूल्य प्रतिस्पर्धा में बने रहने की चुनौती, विशेषकर जब उत्पादन लागत अधिक हो।
दीर्घकालिक स्थिरता प्रोत्साहन योजना समाप्त होने के बाद घरेलू उत्पादन की निरंतरता और प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखना।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना (बल्क ड्रग्स के लिए)

आगे की राह

  • अनुसंधान और विकास (R&D) में सार्वजनिक और निजी निवेश को बढ़ावा देना ताकि नए अणुओं और उन्नत विनिर्माण प्रौद्योगिकियों का विकास हो सके।
  • फार्मास्युटिकल क्षेत्र के लिए विशेष कौशल विकास कार्यक्रम शुरू करना ताकि उद्योग की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिए कुशल जनशक्ति तैयार की जा सके।
  • पर्यावरणीय अनुपालन को मजबूत करना और हरित रसायन (Green Chemistry) सिद्धांतों को बढ़ावा देना ताकि सतत उत्पादन सुनिश्चित हो सके।
  • नियामक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाना ताकि अनुमोदन में लगने वाले समय को कम किया जा सके और नवाचार को बढ़ावा मिल सके।
  • बल्क ड्रग पार्कों जैसी समर्पित आधारभूत संरचनाओं का विकास करना ताकि विनिर्माण लागत को कम किया जा सके और दक्षता बढ़ाई जा सके।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को प्रोत्साहित करना ताकि उन्नत विनिर्माण तकनीकों तक पहुँच प्राप्त की जा सके।
  • घरेलू विनिर्माताओं को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन प्रदान करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना · थोक दवाएं · महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्री (केएसएम) · औषधि मध्यवर्ती (डीआई) · सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयव (एपीआई) · घरेलू उत्पादन · आत्मनिर्भर भारत · आयात निर्भरता में कमी · फार्मास्युटिकल क्षेत्र · विनिर्माण प्रोत्साहन · आर्थिक संवृद्धि · रोजगार सृजन

अवधारणा प्रवाह

भारत की आयात पर निर्भरता  →  घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता  →  उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना का शुभारंभ  →  घरेलू विनिर्माण क्षमता में वृद्धि  →  आयात निर्भरता में कमी और आत्मनिर्भरता  →  आर्थिक संवृद्धि और स्वास्थ्य सुरक्षा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. थोक दवाओं के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस योजना का मुख्य उद्देश्य भारत में महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्रियों (केएसएम), औषधि मध्यवर्ती (डीआई) और सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयवों (एपीआई) के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है।
2. इस योजना के तहत स्वीकृत परियोजनाओं के लिए कुल परिव्यय 6,940 करोड़ रुपये है।
3. यह योजना केवल किण्वन-आधारित उत्पादों के उत्पादन को प्रोत्साहित करती है, रासायनिक संश्लेषण-आधारित उत्पादों को नहीं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि योजना का मुख्य उद्देश्य भारत में महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्रियों (केएसएम), औषधि मध्यवर्ती (डीआई) और सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयवों (एपीआई) के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना है। कथन 2 भी सही है क्योंकि योजना के लिए स्वीकृत परिव्यय 6,940 करोड़ रुपये है। कथन 3 गलत है क्योंकि योजना किण्वन-आधारित और रासायनिक संश्लेषण-आधारित दोनों प्रकार के उत्पादों को प्रोत्साहित करती है, जैसा कि अनुलग्नक-बी में सूचीबद्ध उत्पादों से स्पष्ट है। अतः, केवल दो कथन सही हैं।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से उत्पाद थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना के तहत घरेलू उत्पादन के लिए अनुमोदित किया गया/किए गए है/हैं?
1. पेनिसिलिन जी
2. डेक्सामेथासोन
3. एटोरवास्टेटिन
4. रिफैम्पिसिन
सही विकल्प चुनिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2, 3 और 4
  3. केवल 1, 3 और 4
  4. 1, 2, 3 और 4

उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — अनुलग्नक-बी में सूचीबद्ध अनुमोदित उत्पादों में पेनिसिलिन जी, डेक्सामेथासोन, एटोरवास्टेटिन और रिफैम्पिसिन सभी शामिल हैं। अतः, सभी चार उत्पाद अनुमोदित किए गए हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ थोक दवाओं के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के उद्देश्यों और इसके तहत अब तक की प्रगति का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। भारत के फार्मास्युटिकल क्षेत्र पर इसके संभावित दीर्घकालिक प्रभावों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना का संक्षिप्त परिचय दें, इसके लॉन्च का संदर्भ और प्राथमिक उद्देश्य बताएं। (जैसे: आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत, फार्मास्युटिकल क्षेत्र में आयात निर्भरता कम करना।)
2. **योजना के उद्देश्य:** योजना के प्रमुख उद्देश्यों को विस्तार से बताएं, जैसे: महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्री (केएसएम), औषधि मध्यवर्ती (डीआई) और सक्रिय फार्मास्युटिकल अवयवों (एपीआई) के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना; विनिर्माण क्षमता का सृजन; निवेश आकर्षित करना; रोजगार सृजन; वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की स्थिति मजबूत करना।
3. **अब तक की प्रगति का समालोचनात्मक परीक्षण:**
* **सकारात्मक पहलू:** स्वीकृत परियोजनाओं की संख्या (48), स्वीकृत परिव्यय (6,940 करोड़ रुपये), प्राप्त निवेश (5,070.45 करोड़ रुपये), सृजित उत्पादन क्षमता (28 एपीआई/केएसएम/डीआई के लिए), वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करने वाले उत्पादों की संख्या (18 एपीआई), और आयात निर्भरता में कमी के उदाहरण (जैसे पेनिसिलिन जी, डेक्सामेथासोन)। राज्य-वार विवरण से कुछ प्रमुख राज्यों (जैसे आंध्र प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना) में निवेश और उत्पादन का उल्लेख करें।
* **चुनौतियाँ/कमियाँ:** उन 10 उत्पादों का उल्लेख करें जिन्होंने अभी तक वाणिज्यिक उत्पादन हासिल नहीं किया है। कुछ राज्यों (जैसे हरियाणा, जम्मू-कश्मीर) में परियोजनाओं के चालू होने के चरण में होने का जिक्र करें। प्रोत्साहन वितरण की वर्तमान स्थिति (87.70 करोड़ रुपये) की तुलना कुल परिव्यय से करें। योजना के कार्यान्वयन में संभावित बाधाओं (जैसे भूमि अधिग्रहण, नियामक अनुमोदन, तकनीकी विशेषज्ञता की कमी) पर संक्षिप्त चर्चा करें।
4. **दीर्घकालिक प्रभाव:**
* **आर्थिक प्रभाव:** घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा, निर्यात में वृद्धि, विदेशी मुद्रा की बचत, आर्थिक संवृद्धि में योगदान।
* **सामरिक प्रभाव:** फार्मास्युटिकल सुरक्षा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में लचीलापन, भू-राजनीतिक निर्भरता में कमी।
* **सामाजिक प्रभाव:** रोजगार सृजन, सस्ती दवाओं की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में सुधार।
* **तकनीकी प्रभाव:** अनुसंधान एवं विकास (R&D) को प्रोत्साहन, नवाचार, तकनीकी आत्मनिर्भरता।
5. **निष्कर्ष:** योजना के महत्व को दोहराएं और भारत को ‘दुनिया की फार्मेसी’ के रूप में मजबूत करने में इसकी भूमिका पर प्रकाश डालें, साथ ही भविष्य में चुनौतियों का समाधान करने और योजना की पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए आगे के कदमों का सुझाव दें।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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