कुल्लू: NHPC की पार्वती-2 परियोजना के खिलाफ एफआईआर, 12 सदस्यीय जांच समिति गठित

कुल्लू: टनल रिसाव पर परियोजना प्रबंधन के खिलाफ एफआईआर, जांच के लिए कमेटी गठित, पांच दिन में देनी होगी रिपोर्ट — diagram

कुल्लू: NHPC की पार्वती-2 परियोजना के खिलाफ एफआईआर, 12 सदस्यीय जांच समिति गठित

पार्वती-II सुरंग रिसावसुरंगपार्वती नदी पर निर्मितरिसावजल निकायों को प्रभावितFIRप्रबंधन के खिलाफजांच समिति12 सदस्यीय, 5 दिन में रिपोर्टSOPअनुपालन की समीक्षाक्षति आकलनमलबे, मिट्टी कटाव
पार्वती-II सुरंग रिसाव

✎ जलविद्युत परियोजनाएँ ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके निर्माण और संचालन में कठोर सुरक्षा मानकों तथा पर्यावरणीय नियमों का पालन आवश्यक है ताकि पर्यावरणीय क्षति और आपदा जोखिमों को कम किया जा सके।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, भारत का भूगोल)  |  GS Paper III — आपदा प्रबंधन, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी, आधारभूत संरचना (ऊर्जा)
  • Prelims: पार्वती परियोजना-II, NHPC, जलविद्युत परियोजनाएँ, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA), आपदा प्रबंधन, सुरक्षा मानक
  • Essay: विकास बनाम पर्यावरण: संतुलन की चुनौती, भारत में आधारभूत संरचना परियोजनाओं का पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव

त्वरित पुनरावृत्ति: जलविद्युत परियोजनाएँ ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके निर्माण और संचालन में कठोर सुरक्षा मानकों तथा पर्यावरणीय नियमों का पालन आवश्यक है ताकि पर्यावरणीय क्षति और आपदा जोखिमों को कम किया जा सके।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में NHPC (नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड) की पार्वती परियोजना-II की सुरंग में रिसाव का मामला सामने आया है। इस घटना के बाद रैला पंचायत के उपप्रधान की शिकायत पर परियोजना प्रबंधन के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। प्रशासन ने घटना के कारणों का पता लगाने और हुए नुकसान का आकलन करने के लिए एक 12 सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है, जिसे पांच दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।

पृष्ठभूमि

  • पार्वती परियोजना-II हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित एक प्रमुख जलविद्युत परियोजना है, जिसका संचालन NHPC द्वारा किया जाता है। यह परियोजना पार्वती नदी पर निर्मित है और देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • जलविद्युत परियोजनाएँ (Hydroelectric Projects) नदियों के जल का उपयोग करके विद्युत उत्पादन करती हैं। ये परियोजनाएँ देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके निर्माण और संचालन से पर्यावरणीय तथा सामाजिक प्रभाव भी पड़ सकते हैं।
  • बड़ी आधारभूत संरचना परियोजनाओं, विशेषकर पहाड़ी और भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में, निर्माण और संचालन के दौरान कठोर सुरक्षा मानकों (Safety Standards) और मानक संचालन प्रक्रियाओं (Standard Operating Procedures – SOPs) का पालन करना अनिवार्य होता है।
  • किसी भी बड़ी परियोजना के निर्माण से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) किया जाता है, ताकि परियोजना के संभावित पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन किया जा सके और उन्हें कम करने के उपाय सुझाए जा सकें।
  • सुरंगों और बांधों जैसी संरचनाओं में रिसाव या क्षति जैसी घटनाएँ न केवल संपत्ति को नुकसान पहुँचा सकती हैं, बल्कि मानव जीवन के लिए भी खतरा पैदा कर सकती हैं और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं।
  • ऐसी घटनाओं की स्थिति में, प्रशासन द्वारा त्वरित जांच और जवाबदेही तय करने के लिए समितियों का गठन किया जाता है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जा सकें।

भारत में जलविद्युत परियोजनाएँ और उनके पर्यावरणीय प्रभाव

  • भारत में जलविद्युत ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता में योगदान करती है।
  • इन परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य विद्युत उत्पादन के साथ-साथ सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और पेयजल आपूर्ति जैसे बहुउद्देशीय लाभ प्रदान करना भी होता है।
  • हालांकि, बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण से कई पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, जिनमें वनों की कटाई, जैव विविधता का नुकसान, नदी पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तन और स्थानीय आबादी का विस्थापन शामिल है।
  • पहाड़ी क्षेत्रों में, विशेष रूप से हिमालय जैसे भूगर्भीय रूप से अस्थिर क्षेत्रों में, सुरंगों और बांधों का निर्माण भूस्खलन, भूकंपीय गतिविधियों और जल रिसाव के जोखिम को बढ़ा सकता है।
  • इन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearance) प्राप्त करना अनिवार्य है, जिसमें EIA रिपोर्ट के आधार पर परियोजना के प्रभावों का मूल्यांकन किया जाता है और शमन उपायों (Mitigation Measures) का प्रस्ताव किया जाता है।
  • परियोजनाओं के संचालन के दौरान सुरक्षा मानकों और SOPs का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि किसी भी प्रकार की दुर्घटना या क्षति को रोका जा सके।
  • आपदा प्रबंधन (Disaster Management) योजनाओं का होना भी महत्वपूर्ण है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया दी जा सके और जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।
  • सरकार और नियामक निकाय इन परियोजनाओं की निगरानी करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे पर्यावरणीय नियमों और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कर रही हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
सुरंग रिसाव की घटना कुल्लू जिले में NHPC की पार्वती परियोजना-II की सुरंग में पानी और मलबे का रिसाव, जिससे आसपास के क्षेत्रों में नुकसान हुआ।
FIR दर्ज परियोजना प्रबंधन के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई, जो जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
जांच समिति का गठन उपमंडलाधिकारी बंजार द्वारा 12 सदस्यीय जांच समिति का गठन, जिसमें विभिन्न विभागों के विशेषज्ञ शामिल हैं, ताकि घटना के कारणों और प्रभावों की व्यापक जांच की जा सके।
रिपोर्ट प्रस्तुत करने की समय-सीमा समिति को पांच दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश, जो त्वरित कार्रवाई और समाधान की आवश्यकता को दर्शाता है।
मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) की जांच समिति द्वारा परियोजना में निर्धारित SOP के पालन की जांच की जाएगी, जो सुरक्षा मानकों और नियमों के अनुपालन के महत्व को उजागर करता है।
भविष्य के लिए सिफारिशें समिति भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए आवश्यक उपायों की सिफारिश करेगी, जिससे दीर्घकालिक सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित होगी।

महत्व

पर्यावरण और पारिस्थितिकी

  • सुरंग रिसाव से जल निकायों, कृषि भूमि और वन क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो सकता है।
  • मलबे के बहाव से मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है और नदी प्रणालियों में गाद जमा हो सकती है, जिससे जलीय जीवन प्रभावित हो सकता है।

सामाजिक और मानवीय

  • प्रभावित क्षेत्रों में मकानों, सड़कों और कृषि-बागवानी भूमि को नुकसान से स्थानीय निवासियों की आजीविका और जीवनशैली पर सीधा असर पड़ता है।
  • ऐसी घटनाओं से विस्थापन और पुनर्वास की आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है, जिससे सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।

शासन और जवाबदेही

  • परियोजना प्रबंधन के खिलाफ FIR दर्ज होना और जांच समिति का गठन, सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
  • जांच से तकनीकी खामियों और SOP के उल्लंघन का पता चलने पर भविष्य में ऐसी परियोजनाओं के लिए बेहतर नियामक ढांचा तैयार करने में मदद मिलेगी।

आर्थिक प्रभाव

  • परियोजना को हुए नुकसान और मरम्मत कार्य पर अतिरिक्त लागत आ सकती है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
  • कृषि और बागवानी भूमि को हुए नुकसान से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि ये क्षेत्र अक्सर स्थानीय आय का मुख्य स्रोत होते हैं।

चुनौतियाँ

1. पहाड़ी क्षेत्रों में अवसंरचना विकास

  • हिमालयी क्षेत्र में भूवैज्ञानिक अस्थिरता और भूकंपीय गतिविधि के कारण सुरंग निर्माण जैसी बड़ी परियोजनाओं में उच्च जोखिम होता है।
  • पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के लिए कठोर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और शमन रणनीतियों की आवश्यकता होती है।

2. परियोजना प्रबंधन और सुरक्षा मानक

  • बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं में निर्धारित मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
  • तकनीकी खामियों और मानव त्रुटियों को रोकने के लिए निरंतर निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण और नियमित रखरखाव आवश्यक है।

3. आपदा प्रतिक्रिया और शमन

  • अप्रत्याशित घटनाओं जैसे सुरंग रिसाव या भूस्खलन के लिए प्रभावी आपदा प्रतिक्रिया तंत्र और शमन योजनाएं तैयार रखना महत्वपूर्ण है।
  • स्थानीय समुदायों को ऐसी घटनाओं के जोखिमों और उनसे निपटने के तरीकों के बारे में जागरूक करना आवश्यक है।

4. नियामक और कानूनी ढांचा

  • पर्यावरण संरक्षण और परियोजना सुरक्षा से संबंधित कानूनों और विनियमों का प्रभावी प्रवर्तन सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
  • परियोजना डेवलपर्स और सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय और जवाबदेही तय करने में स्पष्टता का अभाव हो सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
भूवैज्ञानिक जोखिम हिमालयी क्षेत्र की अस्थिर भूवैज्ञानिक संरचना सुरंग जैसी परियोजनाओं के लिए उच्च जोखिम पैदा करती है।
पर्यावरण प्रभाव बड़ी अवसंरचना परियोजनाओं का स्थानीय पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाला दीर्घकालिक प्रभाव।
सुरक्षा मानकों का अनुपालन परियोजनाओं में निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल और मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) का उचित कार्यान्वयन।
जवाबदेही का निर्धारण घटनाओं के लिए जिम्मेदार पक्षों की पहचान करना और उन्हें जवाबदेह ठहराना।
क्षति का आकलन और मुआवजा प्रभावित संपत्तियों और आजीविका को हुए नुकसान का सटीक आकलन और समय पर उचित मुआवजा प्रदान करना।
भविष्य की रोकथाम ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए प्रभावी शमन रणनीतियाँ और तकनीकी सुधार लागू करना।

आगे की राह

  • पहाड़ी क्षेत्रों में अवसंरचना परियोजनाओं के लिए कठोर भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और जोखिम आकलन अनिवार्य किया जाए।
  • परियोजनाओं के निर्माण और संचालन के दौरान मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) और सुरक्षा प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
  • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को और अधिक मजबूत बनाया जाए तथा शमन उपायों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
  • परियोजना प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित किए जाएं।
  • आपदा प्रतिक्रिया योजनाओं को अद्यतन किया जाए और स्थानीय समुदायों को आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
  • तकनीकी नवाचारों और उन्नत इंजीनियरिंग समाधानों का उपयोग करके सुरंग निर्माण और रखरखाव में सुरक्षा मानकों को बढ़ाया जाए।
  • प्रभावित व्यक्तियों और समुदायों को समय पर और पर्याप्त मुआवजा सुनिश्चित करने के लिए एक स्पष्ट नीतिगत ढांचा विकसित किया जाए।
  • भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जांच समिति की सिफारिशों को गंभीरता से लागू किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

परियोजना प्रबंधन · पर्यावरणीय प्रभाव आकलन · सतत विकास · आपदा प्रबंधन · बुनियादी ढांचा परियोजनाएं · उत्तरदायित्व · जवाबदेही · मानक संचालन प्रक्रिया · राष्ट्रीय जलविद्युत परियोजना · जांच समिति

अवधारणा प्रवाह

सुरंग में रिसाव और मलबा  →  परियोजना प्रबंधन पर आरोप  →  FIR दर्ज और जांच समिति का गठन  →  क्षति का आकलन और कारणों की जांच  →  SOP के अनुपालन की समीक्षा  →  रिपोर्ट और भविष्य की सिफारिशें  →  जवाबदेही और सुधारात्मक कार्रवाई

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय जलविद्युत शक्ति निगम (NHPC) भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है।
2. NHPC का मुख्य उद्देश्य जलविद्युत परियोजनाओं की योजना, संवर्धन और विकास करना है।
3. भारत में जलविद्युत परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अनिवार्य किया गया है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 और 2 सही हैं। NHPC भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है, जिसका मुख्य उद्देश्य जलविद्युत परियोजनाओं की योजना, संवर्धन और विकास करना है। कथन 3 भी सही है। भारत में जलविद्युत परियोजनाओं सहित विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अनिवार्य किया गया है ताकि उनके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन किया जा सके।

Q2. जलविद्युत परियोजनाओं के संदर्भ में, ‘मानक संचालन प्रक्रिया’ (Standard Operating Procedure – SOP) का क्या महत्व है?

  1. यह परियोजना के वित्तीय प्रबंधन के लिए दिशानिर्देश प्रदान करती है।
  2. यह परियोजना के कर्मचारियों के लिए वेतनमान निर्धारित करती है।
  3. यह परियोजना के सुरक्षित और कुशल संचालन के लिए चरण-दर-चरण निर्देश प्रदान करती है।
  4. यह परियोजना के लिए आवश्यक भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है।

उत्तर: यह परियोजना के सुरक्षित और कुशल संचालन के लिए चरण-दर-चरण निर्देश प्रदान करती है। — मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) किसी भी परियोजना, विशेषकर जलविद्युत जैसी जटिल परियोजनाओं में, सुरक्षित, कुशल और सुसंगत तरीके से कार्यों को निष्पादित करने के लिए विस्तृत, चरण-दर-चरण निर्देश प्रदान करती है। यह दुर्घटनाओं को रोकने और गुणवत्ता मानकों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कार्यान्वयन में परियोजना प्रबंधन और पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों के अनुपालन के महत्व का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, ऐसी परियोजनाओं से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को कम करने में जांच समितियों की भूमिका पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** भारत में बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (जैसे जलविद्युत परियोजनाएं, सड़कें, सुरंगें) के महत्व को रेखांकित करें, साथ ही उनके संभावित पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख करें।
2. **परियोजना प्रबंधन का महत्व:**
* कुशल योजना और निष्पादन।
* लागत और समय-सीमा का पालन।
* तकनीकी खामियों की रोकथाम।
* सुरक्षा प्रोटोकॉल का कार्यान्वयन।
3. **पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों का अनुपालन:**
* पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) की अनिवार्यता (पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986)।
* वन मंजूरी, वन्यजीव मंजूरी आदि का महत्व।
* स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता पर प्रभाव को कम करना।
* सतत विकास लक्ष्यों के साथ संरेखण।
* आपदाओं (जैसे भूस्खलन, बाढ़) की रोकथाम में भूमिका।
4. **जोखिमों को कम करने में जांच समितियों की भूमिका:**
* घटनाओं के वास्तविक कारणों का पता लगाना (तकनीकी, मानवीय त्रुटि, SOP का उल्लंघन)।
* प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान का आकलन।
* उत्तरदायित्व और जवाबदेही तय करना।
* भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक उपायों और सिफारिशों का सुझाव देना।
* पारदर्शिता और विश्वास बहाली।
5. **चुनौतियाँ और सुझाव:** परियोजना प्रबंधन में कमियाँ, पर्यावरणीय नियमों का कमजोर प्रवर्तन, जांच समितियों की सिफारिशों का कार्यान्वयन। निगरानी तंत्र को मजबूत करने और हितधारकों की भागीदारी बढ़ाने के सुझाव।
6. **निष्कर्ष:** संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें, जिसमें विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया जाए।

स्रोत: amarujala.com


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