19 Jul दिल्ली पुलिस ने सीजेपी के संसद मार्च को दी मंजूरी से इनकार, जानिए कानूनी पहलू
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली; सरकार के मंत्रालय और विभाग; दबाव समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था
- Prelims: अनुच्छेद 19(1)(b), भारत का संविधान, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), धारा 163 BNSS (पूर्ववर्ती धारा 144 CrPC), भारतीय न्याय संहिता (BNS), धारा 223 BNS, जंतर मंतर, विरोध प्रदर्शन का अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था
- Essay: लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों की भूमिका और सीमाएँ, अधिकारों और कर्तव्यों का संतुलन: एक लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला
त्वरित पुनरावृत्ति: लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार मौलिक है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने के लिए इस पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 जैसे उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
दिल्ली पुलिस ने ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ (CJP) द्वारा संसद तक प्रस्तावित मार्च के लिए अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यह मार्च NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा था। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 का स्थान लेती है) के तहत निषेधाज्ञा लागू है, जिसके अनुसार जंतर मंतर को छोड़कर किसी भी अन्य स्थान पर पांच या अधिक व्यक्तियों के इकट्ठा होने, विरोध प्रदर्शन करने या जुलूस निकालने पर प्रतिबंध है। पुलिस ने चेतावनी दी है कि अनधिकृत मार्च में भाग लेने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पृष्ठभूमि
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के इकट्ठा होने का अधिकार प्रदान करता है। हालांकि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है और अनुच्छेद 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, संप्रभुता और अखंडता के हित में इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
- दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163) एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट को किसी क्षेत्र में पांच या अधिक व्यक्तियों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार देती है, यदि उसे लगता है कि इससे सार्वजनिक शांति भंग होने या किसी खतरे की आशंका है।
- ऐतिहासिक रूप से, भारत में विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों ने सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम से लेकर हाल के नागरिक अधिकारों के आंदोलनों तक, विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग रहे हैं।
- दिल्ली में, विशेष रूप से संसद और महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों के आसपास, सुरक्षा कारणों और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए विरोध प्रदर्शनों पर अक्सर प्रतिबंध लगाए जाते हैं। जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए एक निर्दिष्ट स्थल के रूप में नामित किया गया है।
- हाल के वर्षों में, सार्वजनिक परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों और विभिन्न संगठनों द्वारा देशव्यापी विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं, जिससे सरकार पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ा है।
विरोध प्रदर्शन का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था
- विरोध प्रदर्शन का अधिकार: यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत नागरिकों को प्राप्त शांतिपूर्वक इकट्ठा होने के मौलिक अधिकार का एक महत्वपूर्ण पहलू है। यह लोकतंत्र में नागरिकों को अपनी राय व्यक्त करने और सरकार की नीतियों पर असहमति जताने का अवसर प्रदान करता है।
- उचित प्रतिबंध: अनुच्छेद 19(3) के अनुसार, राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, भारत की संप्रभुता और अखंडता या नैतिकता के हित में इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है। इन प्रतिबंधों का उद्देश्य अधिकारों और सामाजिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करना है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163: यह धारा (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट को तत्काल मामलों में या संभावित खतरे को रोकने के लिए निषेधाज्ञा जारी करने का अधिकार देती है। इसके तहत किसी क्षेत्र में लोगों के इकट्ठा होने, जुलूस निकालने या प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
- धारा 163 का उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक शांति भंग होने, दंगे होने या किसी व्यक्ति को चोट लगने की आशंका को रोकना है। यह एक निवारक उपाय है जो कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उपयोग किया जाता है।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223: यह धारा उन व्यक्तियों के लिए दंड का प्रावधान करती है जो किसी वैध आदेश, जैसे कि धारा 163 BNSS के तहत जारी निषेधाज्ञा, का उल्लंघन करते हैं। इसमें कारावास या जुर्माने का प्रावधान हो सकता है।
- जंतर मंतर: दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए एक निर्दिष्ट स्थल है। अधिकारियों से पूर्व अनुमति प्राप्त करने के बाद ही यहां विरोध प्रदर्शनों की अनुमति दी जाती है, ताकि सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
- न्यायिक समीक्षा: धारा 163 BNSS के तहत जारी किए गए आदेशों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में इस धारा के दुरुपयोग को रोकने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने पर जोर दिया है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध | दिल्ली पुलिस ने नई दिल्ली जिले में धारा 163 BNSS (पूर्व में धारा 144 CrPC) के तहत निषेधाज्ञा लागू की है, जो पाँच या अधिक व्यक्तियों के जमावड़े, विरोध मार्च और प्रदर्शनों पर रोक लगाती है। |
| जंतर-मंतर अपवाद | जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए एक निर्दिष्ट स्थल के रूप में अनुमति दी गई है, बशर्ते अधिकारियों से पूर्व अनुमति प्राप्त की गई हो। |
| अनाधिकृत मार्च पर कार्रवाई | पुलिस ने चेतावनी दी है कि अनाधिकृत मार्च में भाग लेने वाले व्यक्तियों को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 और अन्य लागू कानूनों के तहत कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। |
| संसद सत्र का आरंभ | यह निषेधाज्ञा संसद के मानसून सत्र के उद्घाटन दिवस से ठीक पहले लागू की गई है, जिसके दौरान महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। |
| NEET अनियमितताओं का मुद्दा | कॉकराच जनता पार्टी (CJP) का प्रस्तावित मार्च NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग से संबंधित है। |
महत्व
लोकतंत्र और नागरिक अधिकार
- यह घटना विरोध करने के अधिकार (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक पहलू) और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की शक्ति के बीच संतुलन को दर्शाती है।
- यह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्दिष्ट स्थलों के महत्व को उजागर करता है, जैसे कि जंतर-मंतर, जहां नागरिक अपनी शिकायतें व्यक्त कर सकते हैं।
कानून और व्यवस्था
- यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) जैसे नए आपराधिक कानूनों के कार्यान्वयन और उनके व्यावहारिक निहितार्थों को दर्शाता है।
- यह सार्वजनिक सुरक्षा, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और संसद सत्र के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए पुलिस द्वारा किए गए उपायों को रेखांकित करता है।
शासन और जवाबदेही
- NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं पर सार्वजनिक विरोध सरकार पर जवाबदेही सुनिश्चित करने और सार्वजनिक परीक्षाओं की अखंडता बनाए रखने के महत्व को दर्शाता है।
- यह दर्शाता है कि कैसे नागरिक समाज और राजनीतिक दल सार्वजनिक नीति और शासन के मुद्दों पर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए विरोध प्रदर्शनों का उपयोग करते हैं।
चुनौतियाँ
1. विरोध के अधिकार का संतुलन
- नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की जिम्मेदारी के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखना।
- यह सुनिश्चित करना कि निषेधाज्ञा का उपयोग मनमाने ढंग से न किया जाए और वैध विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए इसका दुरुपयोग न हो।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक तत्व
2. कानून प्रवर्तन और नए कानून
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) जैसे नए आपराधिक कानूनों के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से और निष्पक्ष रूप से लागू करना।
- पुलिस बल को नए कानूनों के बारे में प्रशिक्षित करना और यह सुनिश्चित करना कि वे उनके तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप करें।
यूपीएससी लिंक: शासन: कानून और व्यवस्था, आपराधिक न्याय प्रणाली
3. सार्वजनिक परीक्षाओं की अखंडता
- NEET जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को संबोधित करना और उनकी पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना।
- छात्रों और अभिभावकों के बीच विश्वास बहाल करना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रणालीगत सुधार लागू करना।
यूपीएससी लिंक: शासन: पारदर्शिता और जवाबदेही, शिक्षा क्षेत्र
4. संसद सत्र के दौरान सुरक्षा
- संसद सत्र के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना ताकि किसी भी संभावित व्यवधान या खतरों को रोका जा सके।
- यह सुनिश्चित करना कि विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करते समय सांसदों, सरकारी प्रतिष्ठानों और आम जनता की सुरक्षा बनी रहे।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा: कानून और व्यवस्था, सुरक्षा चुनौतियाँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार के संभावित उल्लंघन की चिंता। |
| अनाधिकृत मार्च पर कानूनी कार्रवाई | विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले व्यक्तियों पर गंभीर कानूनी परिणाम थोपने की संभावना। |
| NEET अनियमितताएं | लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित करने वाली सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी। |
| नए आपराधिक कानून | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत शक्तियों के संभावित दुरुपयोग की चिंता। |
| संसद सत्र की सुरक्षा | महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों और सार्वजनिक हस्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता। |
आगे की राह
- विरोध प्रदर्शनों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और प्रक्रियाएं स्थापित करना, जो संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करते हुए सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखें।
- जंतर-मंतर जैसे निर्दिष्ट विरोध स्थलों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना और वहां विरोध प्रदर्शनों के लिए अनुमति प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना।
- नए आपराधिक कानूनों, विशेष रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों के बारे में पुलिस कर्मियों को व्यापक प्रशिक्षण प्रदान करना।
- सार्वजनिक परीक्षाओं की अखंडता सुनिश्चित करने के लिए प्रणालीगत सुधार लागू करना, जिसमें पेपर लीक को रोकने के लिए मजबूत तंत्र और अनियमितताओं के लिए त्वरित जवाबदेही शामिल है।
- सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद के चैनलों को बढ़ावा देना ताकि मुद्दों को शांतिपूर्ण ढंग से हल किया जा सके और अनावश्यक टकराव से बचा जा सके।
- नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य की शक्तियों के बारे में शिक्षित करना।
- संसद सत्रों के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल की नियमित समीक्षा और अद्यतन करना ताकि उभरते खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
विरोध प्रदर्शन का अधिकार · अनुच्छेद 19 · युक्तियुक्त निर्बंधन · सार्वजनिक व्यवस्था · भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) · भारतीय न्याय संहिता (BNS) · धारा 163 BNSS · धारा 223 BNS · जंतर मंतर · लोकतंत्र में विरोध की भूमिका · कानून का शासन · संवैधानिक नैतिकता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(a)’, ‘note’: ‘भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(b)’, ‘note’: ‘शांतिपूर्ण और निहत्थे इकट्ठा होने का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
NEET परीक्षा में अनियमितताओं के आरोप → कॉकराच जनता पार्टी (CJP) द्वारा विरोध मार्च का आह्वान → दिल्ली पुलिस द्वारा निषेधाज्ञा (धारा 163 BNSS) लागू करना → संसद सत्र के कारण सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करना → अनाधिकृत मार्च पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी → विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मेलन के अधिकार की गारंटी देता है।
2. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163, जो दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 का स्थान लेती है, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए निषेधाज्ञा जारी करने का अधिकार देती है।
3. विरोध प्रदर्शन का अधिकार एक पूर्ण अधिकार है और इस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 2
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्ण और निरायुध सम्मेलन का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। BNSS की धारा 163 (जो CrPC की धारा 144 का स्थान लेती है) सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका पर निषेधाज्ञा जारी करने का प्रावधान करती है। कथन 3 गलत है। विरोध प्रदर्शन का अधिकार पूर्ण नहीं है और इस पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और भारत की संप्रभुता व अखंडता के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन (reasonable restrictions) लगाए जा सकते हैं।
Q2. हाल ही में समाचारों में रही ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS) और ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) का स्थान लेती है।
2. भारतीय न्याय संहिता (BNS) भारतीय दंड संहिता (IPC) का स्थान लेती है।
3. BNSS और BNS दोनों का उद्देश्य भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली को आधुनिक बनाना है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1 सही है। BNSS ने CrPC का स्थान लिया है। कथन 2 सही है। BNS ने IPC का स्थान लिया है। कथन 3 सही है। इन दोनों संहिताओं को भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक कुशल और समकालीन बनाने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में विरोध प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता के बीच संतुलन स्थापित करना एक जटिल चुनौती है। इस संदर्भ में, हाल ही में लागू की गई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए कि वे विरोध प्रदर्शन के अधिकार को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में, विरोध प्रदर्शन के अधिकार के संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 19) और उस पर लगाए जा सकने वाले युक्तियुक्त निर्बंधनों की चर्चा करें। दूसरे भाग में, BNSS की धारा 163 (निषेधाज्ञा) और BNS की धारा 223 (गैरकानूनी सभा में शामिल होने पर दंड) जैसे प्रावधानों का उल्लेख करते हुए बताएं कि ये सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में कैसे सहायक हैं। अंत में, इन प्रावधानों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें कि क्या वे विरोध प्रदर्शन के अधिकार को अनावश्यक रूप से प्रतिबंधित कर सकते हैं, और लोकतंत्र में विरोध की भूमिका तथा कानून के शासन के महत्व पर जोर देते हुए एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें।
स्रोत: Mint
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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