नया डिजिटल सिल्क रोड: कैसे भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) वैश्विक सॉफ्ट पावर को फिर से परिभाषित कर रहा है

नया डिजिटल सिल्क रोड: कैसे भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) वैश्विक सॉफ्ट पावर को फिर से परिभाषित कर रहा है

दशकों तक, किसी भी देश का वैश्विक प्रभाव उसकी सैन्य ताकत, व्यापार या सांस्कृतिक निर्यात से मापा जाता था। लेकिन आज, ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power) का एक नया हथियार उभर कर सामने आया है: डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI)। जहां अमेरिका ने निजी तकनीकी कंपनियों (Big Tech) को बढ़ावा दिया और चीन ने निगरानी तकनीक (Surveillance Tech) का निर्यात किया, वहीं भारत ने एक तीसरा और अनूठा रास्ता अपनाया है।
‘इंडिया स्टैक’ (India Stack) के जरिए भारत ने न केवल अपने देश में वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) की क्रांति ला दी है, बल्कि अब वह इस मॉडल को दुनिया भर (विशेषकर विकासशील देशों) में निर्यात भी कर रहा है।
‘इंडिया स्टैक’ का उदय
DPI का अर्थ उन बुनियादी डिजिटल प्रणालियों से है जो आवश्यक सार्वजनिक और निजी सेवाओं को जनता तक आसानी से पहुँचाती हैं। पश्चिमी देशों में, यह बुनियादी ढांचा निजी कंपनियों (जैसे क्रेडिट कार्ड नेटवर्क) के पास है। इसके विपरीत, भारत ने इसे ‘सार्वजनिक भलाई’ (Public Good) के रूप में बनाया, जिससे निजी कंपनियां इसके ऊपर अपने इनोवेशन कर सकें।
इंडिया स्टैक मुख्य रूप से तीन परतों पर बना है:
पहचान (Aadhaar): 1.3 अरब से अधिक भारतीयों को एक अनूठी, बायोमेट्रिक डिजिटल पहचान प्रदान करना।
)भुगतान (UP: यह एक रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम है। आज UPI हर महीने अरबों लेनदेन को प्रोसेस करता है, जो वैश्विक रियल-टाइम डिजिटल भुगतान का एक बहुत बड़ा हिस्सा है।भुगतान (UP: यह एक रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम है। आज UPI हर महीने अरबों लेनदेन को प्रोसेस करता है, जो वैश्विक रियल-टाइम डिजिटल भुगतान का एक बहुत बड़ा हिस्सा है।
डेटा सशक्तिकरण (DEPA): डिजिलॉकर (DigiLocker) और अकाउंट एग्रीगेटर जैसी प्रणालियां नागरिकों को अपनी सहमति से अपने सत्यापित दस्तावेजों और वित्तीय डेटा को सुरक्षित रूप से साझा करने की अनुमति देती हैं।
भू-राजनीतिक संपत्ति के रूप में DPI (DPI as a Geopolitical Asset)
जो भारत की नौकरशाही की कमियों को दूर करने के लिए शुरू हुआ था, वह आज एक रणनीतिक कूटनीतिक संपत्ति बन गया है। अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान, भारत ने DPI ढांचे को वैश्विक स्तर पर अपनाने पर जोर दिया और खुद को विकासशील देशों (Global South) के ‘टेक-मेंटर’ के रूप में स्थापित किया।
भारतीय मॉडल का निर्यात
भारत सक्रिय रूप से अपने DPI का अंतर्राष्ट्रीयकरण कर रहा है:
खाड़ी और दक्षिण पूर्व एशिया: यूएई (UAE), सिंगापुर और भूटान जैसे देशों ने भारतीय प्रवासियों के लिए सीमा पार लेनदेन को आसान बनाने के लिए UPI प्रणालियों को अपनाया है।

पश्चिमी बाज़ार: फ्रांस के एफिल टावर पर UPI की शुरुआत एक प्रतीकात्मक जीत थी, जिसने साबित किया कि भारत का डिजिटल ढांचा विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी पैठ बना सकता है।

ग्लोबल साउथ: MOSIP (Modular Open Source Identity Platform) जैसी ओपन-सोर्स पहलों के माध्यम से, भारत अफ्रीका और एशिया (जैसे फिलीपींस और मोरक्को) के देशों को आधार-जैसी प्रणालियां बनाने में मदद कर रहा है, ताकि वे पश्चिमी या चीनी तकनीकी दिग्गजों के महंगे जाल में न फंसें।
डेटा निजता (Data Privacy): भारत ने हाल ही में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट पारित किया है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत निजता के बीच संतुलन बनाना अभी भी एक चुनौती है।
साइबर सुरक्षा (Cybersecurity): केंद्रीकृत डेटाबेस साइबर हमलों के मुख्य लक्ष्य होते हैं। हाल ही में स्वास्थ्य डेटाबेस में हुई सेंधमारी ने मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचे की तत्काल आवश्यकता को उजागर किया है।
डिजिटल डिवाइड (Digital Divide): यद्यपि शहरी क्षेत्रों में UPI हर जगह है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता, स्मार्टफोन की सामर्थ्य और स्थिर इंटरनेट कनेक्टिविटी से संबंधित बाधाएं अभी भी मौजूद हैं।
निष्कर्ष 
भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर शासन में तकनीक के इस्तेमाल का एक नया प्रतिमान है। अमेरिका और चीन के मॉडलों के सामने एक स्केलेबल, ओपन-सोर्स और समावेशी विकल्प पेश करके, भारत ग्लोबल साउथ के तकनीकी नेता के रूप में अपनी भूमिका पक्की कर रहा है। 21वीं सदी में, कूटनीति केवल संधियों से नहीं, बल्कि इंडिया स्टैक जैसे तकनीकी कोड्स (Codes) से भी लिखी जा रही है।
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