09 Mar नागरिक चेतना (CIVIC SENSE) का संकट और भारत की वैश्विक छवि : “ग्रॉस डोमेस्टिक बिहेवियर” की चुनौती और सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता
मुख्य परीक्षा –सामान्य अध्ययन के अंतर्गत
GS–1 : भारतीय समाज, सामाजिक व्यवहार, सामाजिक सुधार, सार्वजनिक संस्कृति
GS–2 : शासन व्यवस्था, नागरिकों की भूमिका, सॉफ्ट पावर, प्रवासी भारतीय
GS–4 : नैतिकता, सार्वजनिक जीवन में मूल्य, नागरिक जिम्मेदारी, सामाजिक उत्तरदायित्व
प्रारंभिक परीक्षा के लिये : Civic Sense, Soft Power, Diaspora Diplomacy, Public Hygiene, Digital Ethics, Social Responsibility
चर्चा में क्यों ?
हाल के वर्षों में विदेशों में भारतीय पर्यटकों से जुड़ी कुछ घटनाएँ—जैसे सार्वजनिक स्थानों पर अनुशासनहीन व्यवहार, कतार नियमों का उल्लंघन या सार्वजनिक स्वच्छता की अनदेखी—सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुई हैं। इन घटनाओं ने भारत की नागरिक संस्कृति (Civic Sense) और उसकी वैश्विक छवि पर गंभीर बहस को जन्म दिया है।
वैश्वीकरण और डिजिटल युग में किसी देश की प्रतिष्ठा केवल उसकी आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता या कूटनीतिक प्रभाव से ही नहीं तय होती, बल्कि उसके नागरिकों के व्यवहार से भी निर्धारित होती है। इसी संदर्भ में “ग्रॉस डोमेस्टिक बिहेवियर (Gross Domestic Behavior – GDB)” की अवधारणा सामने आती है, जो यह बताती है कि किसी राष्ट्र की सामाजिक परिपक्वता उसके नागरिकों के सार्वजनिक व्यवहार में दिखाई देती है।
भारत जहाँ स्वयं को ‘विश्व गुरु’ के रूप में स्थापित करने की आकांक्षा रखता है, वहीं नागरिक अनुशासन की कमी उसकी वैश्विक छवि को प्रभावित कर सकती है।
नागरिक व्यवहार और वैश्विक प्रतिष्ठा का संबंध
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में नागरिकों का व्यवहार भी सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है। जब कोई नागरिक विदेश यात्रा करता है तो वह केवल एक व्यक्ति नहीं रहता, बल्कि अपने देश की संस्कृति, मूल्यों और सामाजिक व्यवहार का प्रतिनिधि बन जाता है।किसी देश की सकारात्मक वैश्विक छवि बनाने में निम्न कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं—
सार्वजनिक अनुशासन
स्वच्छता के प्रति जागरूकता
सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान
सामाजिक शिष्टाचार
यदि इन मूल्यों की कमी दिखाई देती है तो वह देश की सॉफ्ट पावर को कमजोर कर सकती है।
घरेलू व्यवहार और वैश्विक छवि का संबंध
यह समझना महत्वपूर्ण है कि विदेशों में दिखाई देने वाला नागरिक व्यवहार वास्तव में घरेलू सामाजिक संस्कारों का ही विस्तार होता है। भारत में अक्सर यह देखा जाता है कि लोग अपने घरों को तो साफ-सुथरा रखते हैं, परंतु सार्वजनिक स्थानों के प्रति वही जिम्मेदारी नहीं दिखाते।
इस मानसिकता के कारण—
सड़कों पर कूड़ा फेंकना
सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना
यातायात नियमों की अनदेखी
कतार अनुशासन का उल्लंघन
जैसी समस्याएँ व्यापक रूप से देखने को मिलती हैं।
यह समस्या केवल बुनियादी ढाँचे की कमी से नहीं बल्कि व्यवहारिक संस्कृति से भी जुड़ी हुई है।
सामाजिक संरचना और नागरिक चेतना
भारत में नागरिक व्यवहार की समस्या को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक सामाजिक ढाँचे पर भी विचार करना आवश्यक है।भारतीय समाज में लंबे समय तक जाति आधारित श्रम विभाजन मौजूद रहा, जिसमें स्वच्छता और सफाई से जुड़े कार्य कुछ विशेष समुदायों तक सीमित कर दिए गए थे। इस ऐतिहासिक व्यवस्था ने धीरे-धीरे एक मानसिकता को जन्म दिया— “सफाई करना किसी और का काम है।”
इस सोच के कारण समाज के बड़े हिस्से में सार्वजनिक स्वच्छता के प्रति व्यक्तिगत जिम्मेदारी की भावना कमजोर रही। इसके विपरीत कई विकसित समाजों में यह विचार मजबूत है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कचरे और सार्वजनिक व्यवहार के लिए स्वयं जिम्मेदार है।
शिक्षा प्रणाली और नागरिक मूल्यों का अभाव
भारतीय शिक्षा प्रणाली पर भी अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वह करियर निर्माण पर अधिक ध्यान देती है और चरित्र निर्माण पर कम। विद्यालयों में ‘नागरिक शास्त्र (Civics)’ विषय पढ़ाया तो जाता है, लेकिन उसका स्वरूप अधिकतर सैद्धांतिक होता है। छात्र संविधान, न्यायपालिका और प्रशासनिक संरचनाओं के बारे में पढ़ते हैं, परंतु उन्हें व्यवहारिक नागरिकता के मूल्य पर्याप्त रूप से नहीं सिखाए जाते।
उदाहरण के लिए—
कतार में खड़े रहने का अनुशासन
सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता
सामूहिक संसाधनों का सम्मान
सामाजिक शिष्टाचार जैसे
मूल्यों को शिक्षा प्रणाली में अधिक महत्व दिए जाने की आवश्यकता है। यदि प्रारंभिक शिक्षा में ही नागरिक जिम्मेदारी का संस्कार विकसित किया जाए तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव हो सकता है।
डिजिटल युग और वैश्विक छवि का संकट
इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में नागरिक व्यवहार का प्रभाव पहले से कहीं अधिक व्यापक हो गया है। आज किसी भी सार्वजनिक घटना का वीडियो कुछ ही मिनटों में पूरी दुनिया में फैल सकता है। कुछ मामलों में सोशल मीडिया पर लोकप्रियता पाने के लिए लोग अजीब या अनुचित व्यवहार भी करते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण—
देश की नकारात्मक छवि बन सकती है
सांस्कृतिक रूढ़ियाँ (stereotypes) मजबूत हो सकती हैं
प्रवासी भारतीयों को सामाजिक पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ सकता है
इसलिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते समय नैतिक जिम्मेदारी और संयम आवश्यक है।
प्रवासी भारतीय और राष्ट्रीय छवि
भारत का प्रवासी समुदाय दुनिया के सबसे बड़े प्रवासी समुदायों में से एक है। यह समुदाय विभिन्न देशों में भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालाँकि जब कुछ नागरिक अनुशासनहीन व्यवहार करते हैं तो उसका प्रभाव पूरे समुदाय पर पड़ सकता है। कई बार विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिक स्वयं इस बात को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं कि कुछ घटनाएँ उनके वर्षों के सामाजिक प्रयासों को प्रभावित कर सकती हैं। इस दृष्टि से प्रत्येक नागरिक को यह समझना आवश्यक है कि उसका व्यवहार केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व का भी प्रतीक है।
नागरिक चेतना के निर्माण की दिशा में कदम
भारत में नागरिक चेतना को मजबूत बनाने के लिए दीर्घकालिक सामाजिक प्रयास आवश्यक हैं –
1. नागरिकता की नई समझ : समाज में यह भावना विकसित करनी होगी कि सार्वजनिक स्थान भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना निजी घर। “सार्वजनिक संपत्ति हमारी सामूहिक संपत्ति है।”
2. शिक्षा में नागरिक मूल्यों का समावेश : विद्यालयों में व्यावहारिक नागरिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जैसे— स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक अनुशासन, सामुदायिक सेवा
3. सामाजिक जिम्मेदारी का विकास : सामाजिक अभियान और जनजागरूकता कार्यक्रम नागरिकों में जिम्मेदारी की भावना को मजबूत कर सकते हैं।
4. डिजिटल नैतिकता : सोशल मीडिया उपयोग के दौरान यह समझ विकसित करनी होगी कि हर गतिविधि राष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर सकती है।
निष्कर्ष
किसी राष्ट्र की प्रतिष्ठा केवल उसकी आर्थिक प्रगति या सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि उसके नागरिकों के दैनिक व्यवहार से भी निर्धारित होती है। सच्चा राष्ट्रवाद केवल प्रतीकों और नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन में अनुशासन, स्वच्छता और सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में प्रकट होता है। भारत यदि वैश्विक मंच पर एक सम्मानित और प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरना चाहता है, तो उसे केवल आर्थिक विकास पर ही नहीं बल्कि नागरिक संस्कृति के विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। नागरिक चेतना का सुदृढ़ीकरण ही वह आधार है जिस पर भारत की सकारात्मक वैश्विक छवि और स्थायी सामाजिक विकास का निर्माण संभव है।

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