08 Aug नागरjunासागर श्रीशैलम टाइगर रिजर्व में एक और बाघ की मृत्यु, कारणों की जांच शुरू
✎ नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य में बाघों की मृत्यु ने भारत में बाघ संरक्षण के समक्ष अवैध शिकार, पर्यावास विखंडन और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियों को उजागर किया है, जिसके लिए मजबूत निगरानी और सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता | GS Paper III — आपदा प्रबंधन
- Prelims: नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य, बाघ संरक्षण, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA), प्रोजेक्ट टाइगर, जैव विविधता हॉटस्पॉट
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास, मानव-वन्यजीव संघर्ष और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य में बाघों की मृत्यु ने भारत में बाघ संरक्षण के समक्ष अवैध शिकार, पर्यावास विखंडन और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी चुनौतियों को उजागर किया है, जिसके लिए मजबूत निगरानी और सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य (Nagarjunasagar Srisailam Tiger Reserve – NSTR) में कुछ ही दिनों के भीतर दो बाघ मृत पाए गए। इनमें से एक बाघ के पंजे और नाखून गायब थे, जिससे शिकार की आशंका बढ़ गई है। आंध्र प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री और वन मंत्री ने इस घटना पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए व्यापक और पारदर्शी जांच के आदेश दिए हैं, और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए वन क्षेत्रों में गश्त बढ़ाने तथा निगरानी मजबूत करने के निर्देश दिए हैं।
पृष्ठभूमि
- नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य भारत का सबसे बड़ा बाघ अभयारण्य है, जो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में फैला हुआ है।
- यह अभयारण्य नल्लामाला पहाड़ियों के एक बड़े हिस्से को कवर करता है और कृष्णा नदी इसके बीच से होकर गुजरती है।
- भारत में बाघों की आबादी दुनिया में सबसे अधिक है, और देश ने बाघ संरक्षण में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है, जैसा कि ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के माध्यम से देखा गया है।
- बाघों की मृत्यु प्राकृतिक कारणों, जैसे उम्र, बीमारी, या क्षेत्रीय संघर्ष के कारण हो सकती है, लेकिन अवैध शिकार, जहर देना और मानव-वन्यजीव संघर्ष भी प्रमुख खतरे हैं।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) बाघों सहित विभिन्न वन्यजीव प्रजातियों के संरक्षण के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority – NTCA) भारत में बाघ संरक्षण प्रयासों की निगरानी और समन्वय के लिए एक वैधानिक निकाय है।
भारत में बाघ संरक्षण की स्थिति और चुनौतियाँ
- भारत में बाघ संरक्षण ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ (Project Tiger) के तहत एक प्रमुख पहल है, जिसे 1973 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य देश में बाघों की व्यवहार्य आबादी सुनिश्चित करना है।
- NTCA, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत, प्रोजेक्ट टाइगर के कार्यान्वयन की देखरेख करता है और बाघ अभयारण्यों के प्रबंधन के लिए दिशानिर्देश जारी करता है।
- बाघों की संख्या में वृद्धि के बावजूद, उनके आवासों का विखंडन, मानव बस्तियों का अतिक्रमण और अवैध शिकार अभी भी गंभीर चुनौतियाँ हैं।
- बाघों के शरीर के अंगों की अंतरराष्ट्रीय अवैध तस्करी एक बड़ा खतरा है, जिससे शिकारी बाघों को निशाना बनाते हैं।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) तब बढ़ता है जब बाघ अपने प्राकृतिक आवास से बाहर निकलकर मानव बस्तियों में प्रवेश करते हैं, जिससे जान-माल का नुकसान होता है और प्रतिशोध में बाघों को मारा जाता है।
- जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई भी बाघों के आवासों को प्रभावित कर रही है, जिससे उनके शिकार आधार और पानी के स्रोतों पर दबाव पड़ रहा है।
- संरक्षण प्रयासों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी, अवैध शिकार विरोधी गश्त को मजबूत करना, और वैज्ञानिक निगरानी विधियों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है।
- बाघों के लिए पर्याप्त शिकार आधार सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है, जिसके लिए शाकाहारी जानवरों की आबादी का प्रबंधन आवश्यक है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| बाघों की मृत्यु दर में वृद्धि | नागार्जुनसागर श्रीशैलम टाइगर रिजर्व (NSTR) में कम समय में दो बाघों की मृत्यु चिंताजनक है, जो बाघ संरक्षण प्रयासों पर सवाल उठाती है। |
| अंगों का गायब होना | मृत बाघ के पंजे सहित अंगों का गायब होना अवैध शिकार (Poaching) की संभावना को इंगित करता है, जो वन्यजीव अपराधों की गंभीरता को दर्शाता है। |
| राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के SOPs का पालन | मृत्यु के कारणों की जांच के लिए NTCA के मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) और दिशानिर्देशों का पालन किया जा रहा है, जो जांच की पारदर्शिता और वैज्ञानिकता सुनिश्चित करता है। |
| वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत मामला दर्ज | यह अधिनियम भारत में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी ढाँचा प्रदान करता है और ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई का आधार बनता है। |
| गश्त और निगरानी बढ़ाने का निर्देश | उपमुख्यमंत्री द्वारा वन क्षेत्रों में गश्त और क्षेत्र-स्तरीय निगरानी बढ़ाने का निर्देश भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सक्रिय उपायों की आवश्यकता को दर्शाता है। |
| आंध्र प्रदेश में गौर लाने की योजना | नल्लामाला के बाघों के लिए शिकार आधार बढ़ाने हेतु मध्य भारत से गौर (Gaur) लाने की योजना, जो पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने का एक प्रयास है। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- बाघ खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर स्थित एक प्रमुख प्रजाति (Keystone Species) है। इनकी मृत्यु से पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे अन्य प्रजातियों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
- बाघों की संख्या में कमी जैव विविधता (Biodiversity) के लिए खतरा है, जो वन पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का संकेतक है।
सामाजिक और नैतिक
- वन्यजीवों का संरक्षण हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। बाघों की मृत्यु से समाज में वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता कम हो सकती है।
- अवैध शिकार और वन्यजीव अपराध स्थानीय समुदायों के लिए भी खतरा पैदा करते हैं, क्योंकि वे अक्सर वन संसाधनों पर निर्भर होते हैं।
प्रशासनिक और कानूनी
- बाघों की मृत्यु, विशेष रूप से अवैध शिकार के संदेह में, वन विभाग की प्रभावशीलता और कानून प्रवर्तन क्षमताओं पर सवाल उठाती है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत मामलों का पंजीकरण और जांच, वन्यजीव अपराधों से निपटने में कानूनी ढांचे के महत्व को रेखांकित करता है।
आर्थिक
- वन्यजीव पर्यटन (Wildlife Tourism) कई क्षेत्रों के लिए राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। बाघों की संख्या में कमी पर्यटन को प्रभावित कर सकती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
- संरक्षण प्रयासों पर खर्च होने वाला धन, यदि अवैध शिकार या अन्य खतरों के कारण बाघों की मृत्यु होती है, तो वह व्यर्थ हो सकता है।
चुनौतियाँ
1. अवैध शिकार और वन्यजीव अपराध
- बाघों के अंगों की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उच्च मांग के कारण अवैध शिकार एक बड़ा खतरा बना हुआ है।
- वन्यजीव अपराध सिंडिकेट संगठित और अच्छी तरह से वित्तपोषित होते हैं, जिससे उनका मुकाबला करना मुश्किल हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन
2. पर्यावास का नुकसान और विखंडन
- मानवीय गतिविधियों जैसे कृषि, शहरीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास के कारण बाघों के प्राकृतिक पर्यावास सिकुड़ रहे हैं।
- पर्यावासों का विखंडन (Habitat Fragmentation) बाघों के लिए शिकार, प्रजनन और सुरक्षित आवागमन को बाधित करता है।
यूपीएससी लिंक: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण
3. मानव-वन्यजीव संघर्ष
- वन्यजीवों के पर्यावास में मानव बस्तियों के विस्तार से मानव-बाघ संघर्ष बढ़ रहा है, जिससे दोनों पक्षों को नुकसान होता है।
- यह संघर्ष अक्सर बाघों के प्रति नकारात्मक धारणाओं को जन्म देता है और संरक्षण प्रयासों को बाधित करता है।
यूपीएससी लिंक: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण
4. अपर्याप्त निगरानी और प्रवर्तन
- वन क्षेत्रों की विशालता और दुर्गमता के कारण प्रभावी गश्त और निगरानी एक चुनौती है।
- वन कर्मचारियों की कमी, प्रशिक्षण का अभाव और आधुनिक उपकरणों की अनुपलब्धता प्रवर्तन को कमजोर करती है।
यूपीएससी लिंक: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण
5. जलवायु परिवर्तन
- जलवायु परिवर्तन से बाघों के पर्यावासों में बदलाव आ रहा है, जिससे उनके शिकार आधार और प्रजनन पैटर्न प्रभावित हो रहे हैं।
- अत्यधिक मौसम की घटनाएं और प्राकृतिक आपदाएं भी बाघों के लिए खतरा पैदा करती हैं।
यूपीएससी लिंक: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अवैध शिकार का संदेह | मृत बाघ के अंगों का गायब होना अवैध शिकार की ओर इशारा करता है, जो वन्यजीव अपराधों के बढ़ते खतरे को दर्शाता है। |
| वन्यजीव अपराध सिंडिकेट | संगठित वन्यजीव अपराध सिंडिकेट बाघों के संरक्षण प्रयासों के लिए एक गंभीर चुनौती हैं। |
| पर्याप्त गश्त और निगरानी का अभाव | वन क्षेत्रों की विशालता और सीमित संसाधनों के कारण प्रभावी निगरानी में कमी, जिससे अवैध गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है। |
| मानव-वन्यजीव संघर्ष | वन्यजीवों के पर्यावास में मानवीय अतिक्रमण से संघर्ष बढ़ रहा है, जिससे बाघों के जीवन को खतरा है। |
| पर्यावास का क्षरण | विकास परियोजनाओं और अतिक्रमण के कारण बाघों के प्राकृतिक पर्यावासों का निरंतर सिकुड़ना और विखंडन। |
| जांच और अभियोजन में देरी | वन्यजीव अपराधों की जांच में देरी और दोषियों को दंडित करने में विफलता से अपराधियों का मनोबल बढ़ता है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger)
आगे की राह
- वन क्षेत्रों में गश्त और निगरानी को आधुनिक तकनीक (जैसे ड्रोन, थर्मल इमेजिंग) का उपयोग करके मजबूत किया जाए।
- वन कर्मचारियों को वन्यजीव अपराधों की जांच और फोरेंसिक विश्लेषण के लिए विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
- स्थानीय समुदायों को वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में शामिल किया जाए और उन्हें वैकल्पिक आजीविका के अवसर प्रदान किए जाएं ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष कम हो।
- अवैध शिकार विरोधी अभियानों को तेज किया जाए और वन्यजीव अपराधों में शामिल अपराधियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
- बाघों के पर्यावासों को संरक्षित और बहाल किया जाए, साथ ही उनके लिए सुरक्षित गलियारों (Corridors) का निर्माण किया जाए।
- वैज्ञानिक अनुसंधान और डेटा संग्रह को बढ़ावा दिया जाए ताकि बाघों की आबादी और उनके सामने आने वाली चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
- अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जाए ताकि वन्यजीव अपराध सिंडिकेट का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सके।
- जन जागरूकता अभियान चलाए जाएं ताकि वन्यजीव संरक्षण के महत्व के बारे में लोगों को शिक्षित किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
बाघ संरक्षण · वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 · राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) · नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य (NSTR) · बाघों की मृत्यु के कारण · मानव-वन्यजीव संघर्ष · वन्यजीव अपराध · पर्यावरण संतुलन · जैव विविधता संरक्षण · वन गश्त और निगरानी · संरक्षण रणनीतियाँ · वन्यजीव प्रबंधन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 48A’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
- {‘अनुच्छेद 51A (g)’: ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन’}
- {‘सातवीं अनुसूची (समवर्ती सूची)’: ‘वन्यजीवों और पक्षियों का संरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
बाघों की मृत्यु (अवैध शिकार का संदेह) → वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत मामला दर्ज → NTCA SOPs के अनुसार जांच और फोरेंसिक विश्लेषण → वन विभाग द्वारा गश्त और निगरानी बढ़ाने का निर्देश → अवैध शिकार और पर्यावास क्षरण की चुनौतियों का सामना → बाघ संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने का प्रयास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत में बाघों की सर्वाधिक संख्या नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य में पाई जाती है।
2. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक सांविधिक निकाय है।
3. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में सूचीबद्ध प्रजातियों को अधिकतम कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। भारत में बाघों की सर्वाधिक संख्या मध्य प्रदेश में पाई जाती है, न कि नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य में। नागार्जुनसागर-श्रीशैलम भारत का सबसे बड़ा बाघ अभयारण्य है, लेकिन बाघों की संख्या के मामले में यह शीर्ष पर नहीं है।
कथन 2 सही है। NTCA वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत गठित एक सांविधिक निकाय है।
कथन 3 सही है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में सूचीबद्ध प्रजातियों को उच्चतम स्तर का संरक्षण प्राप्त है और इनके शिकार या नुकसान पर कठोर दंड का प्रावधान है।
Q2. अभिकथन (A): बाघ संरक्षण भारत में जैव विविधता के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।
कारण (R): बाघ खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर स्थित एक प्रमुख प्रजाति (Keystone species) है, और इसका संरक्षण पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को इंगित करता है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि बाघ संरक्षण भारत में जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कारण (R) भी सही है क्योंकि बाघ एक प्रमुख प्रजाति है और इसका संरक्षण पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का सूचक है। बाघों के आवासों का संरक्षण अन्य कई प्रजातियों के संरक्षण में भी मदद करता है। इस प्रकार, कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।
Q3. निम्नलिखित में से कौन सा अधिनियम भारत में वन्यजीवों के अवैध शिकार और व्यापार को रोकने के लिए प्राथमिक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है?
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980
- जैव विविधता अधिनियम, 2002
उत्तर: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 — वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 भारत में वन्यजीवों, पक्षियों और पौधों के संरक्षण के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है। यह अवैध शिकार, उनके आवासों के विनाश और वन्यजीवों के अवैध व्यापार को नियंत्रित करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य में हाल ही में बाघों की मृत्यु की घटनाओं के आलोक में, भारत में बाघों के संरक्षण के समक्ष प्रमुख चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों और आवश्यक भावी रणनीतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: नागार्जुनसागर-श्रीशैलम बाघ अभयारण्य में बाघों की मृत्यु की हालिया घटनाओं का उल्लेख करते हुए बाघ संरक्षण के महत्व पर संक्षिप्त प्रकाश डालें।
2. बाघ संरक्षण के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ (समालोचनात्मक परीक्षण):
क. अवैध शिकार और वन्यजीव अपराध: अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजारों में बाघ उत्पादों की मांग, संगठित गिरोहों की भूमिका।
ख. मानव-वन्यजीव संघर्ष: वन क्षेत्रों के पास बढ़ती मानव आबादी, कृषि विस्तार, मवेशियों का शिकार, प्रतिशोधी हत्याएँ।
ग. आवास का नुकसान और विखंडन: विकास परियोजनाओं (सड़क, रेल, खनन), अतिक्रमण, वन भूमि का अन्य उपयोगों में परिवर्तन।
घ. जलवायु परिवर्तन: बदलते मौसम पैटर्न, जल स्रोतों पर प्रभाव, शिकार आधार में कमी।
ङ. अपर्याप्त निगरानी और प्रवर्तन: वन कर्मचारियों की कमी, आधुनिक तकनीक का अभाव, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।
च. आनुवंशिक विविधता का नुकसान: छोटे, अलग-थलग आबादी में अंतःप्रजनन की समस्या।
3. सरकार द्वारा उठाए गए कदम:
क. कानूनी ढाँचा: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (संशोधन सहित)।
ख. संस्थागत ढाँचा: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की स्थापना, प्रोजेक्ट टाइगर।
ग. संरक्षण कार्यक्रम: बाघ अभयारण्यों का नेटवर्क, कोर-बफर रणनीति, विशेष बाघ संरक्षण बल (STPF)।
घ. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: CITES (वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन) का पालन।
ङ. निगरानी: M-STrIPES (मॉनिटरिंग सिस्टम फॉर टाइगर्स इंटेंसिव प्रोटेक्शन एंड इकोलॉजिकल स्टेटस) जैसी तकनीकें।
च. पुनर्वास और स्थानांतरण कार्यक्रम।
4. आवश्यक भावी रणनीतियाँ:
क. सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रयासों में शामिल करना, वैकल्पिक आजीविका प्रदान करना।
ख. प्रौद्योगिकी का उपयोग: ड्रोन, AI आधारित निगरानी, उपग्रह इमेजरी।
ग. अंतर-राज्यीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: वन्यजीव अपराधों से निपटने के लिए।
घ. पर्यावास कनेक्टिविटी: गलियारों का संरक्षण और निर्माण।
ङ. क्षमता निर्माण: वन कर्मचारियों का प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरणों से लैस करना।
च. वैज्ञानिक अनुसंधान: बाघों की आबादी, स्वास्थ्य और व्यवहार का अध्ययन।
5. निष्कर्ष: बाघ संरक्षण के लिए एक समग्र, बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देते हुए, मानव और वन्यजीवों के सह-अस्तित्व के महत्व को रेखांकित करें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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