नेपाल के पीएम ने ‘हिमालयी सुनामी’ के बाद जलवायु न्याय की पुकार लगाई

Nepal PM urges climate justice after ‘Himalayan tsunami’ devastates country — labelled illustration

नेपाल के पीएम ने ‘हिमालयी सुनामी’ के बाद जलवायु न्याय की पुकार लगाई

✎ जलवायु न्याय इस सिद्धांत पर आधारित है कि जलवायु परिवर्तन के लिए ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार देशों को इसके प्रभावों से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देशों को वित्त और प्रौद्योगिकी सहायता प्रदान करनी चाहिए।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध  |  GS Paper III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन
  • Prelims: जलवायु न्याय, UNFCCC, हानि और क्षति कोष, ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
  • Essay: जलवायु परिवर्तन: एक वैश्विक चुनौती और न्यायपूर्ण समाधान की आवश्यकता, छोटे विकासशील देशों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: जलवायु न्याय इस सिद्धांत पर आधारित है कि जलवायु परिवर्तन के लिए ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार देशों को इसके प्रभावों से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देशों को वित्त और प्रौद्योगिकी सहायता प्रदान करनी चाहिए।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए ‘जलवायु न्याय’ (Climate Justice) की पुरजोर वकालत की। उन्होंने नेपाल में आई विनाशकारी ‘भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा’ को ‘हिमालयी सुनामी’ बताते हुए कहा कि यह जलवायु परिवर्तन के मानवीय और आर्थिक प्रभावों का एक स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से उन देशों की मदद करने का आग्रह किया जो जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं, लेकिन इसके परिणामों से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

पृष्ठभूमि

  • नेपाल, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में 0.1 प्रतिशत से भी कम का योगदान देता है, फिर भी यह जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है।
  • हिमालयी क्षेत्र में तेजी से पिघलते ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost) भूस्खलन, बाढ़ और हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) जैसी आपदाओं के जोखिम को बढ़ा रहे हैं।
  • भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा ने उत्तरी नेपाल में भारी तबाही मचाई, जिसमें 1,400 से अधिक लोगों की जान चली गई और 6,000 से अधिक लोग लापता हो गए। इस आपदा से देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 10 प्रतिशत नुकसान होने का अनुमान है।
  • नेपाल के प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ‘हिमालयी जलवायु सुदृढ़ता तंत्र’ (Himalayan Climate Resilience Mechanism) स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, जिसमें नेपाल, भारत और चीन शामिल हों।
  • उन्होंने ‘हानि और क्षति कोष’ (Loss and Damage Fund) तथा ‘ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी’ (Global Environment Facility) जैसे मौजूदा जलवायु वित्तपोषण तंत्रों को ‘अत्यंत अपर्याप्त’ बताया और अनुदान-आधारित जलवायु वित्तपोषण की आवश्यकता पर बल दिया।
  • यह संबोधन ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं और विकासशील देश विकसित देशों से अधिक जलवायु वित्त और तकनीकी सहायता की मांग कर रहे हैं।

जलवायु न्याय क्या है?

  • जलवायु न्याय एक अवधारणा है जो मानती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, विशेष रूप से गरीब और हाशिए पर पड़े समुदायों पर, असमान रूप से पड़ते हैं।
  • यह इस विचार पर आधारित है कि जलवायु परिवर्तन कोई केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक नैतिक और राजनीतिक मुद्दा भी है।
  • जलवायु न्याय का सिद्धांत इस बात पर जोर देता है कि जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है, उनकी जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों की मदद करने की अधिक जिम्मेदारी है।
  • इसमें जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन (Adaptation) और शमन (Mitigation) के लिए वित्त, प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण तक न्यायसंगत पहुंच सुनिश्चित करना शामिल है।
  • यह उन समुदायों के अधिकारों को मान्यता देता है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से विस्थापित या प्रभावित हुए हैं, और उन्हें पुनर्निर्माण और पुनर्वास में सहायता प्रदान करने की वकालत करता है।
  • जलवायु न्याय का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि जलवायु संबंधी नीतियों और कार्यों में मानवाधिकारों, समानता और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी जाए।
  • इसमें ‘हानि और क्षति’ (Loss and Damage) की अवधारणा भी शामिल है, जो उन अपरिवर्तनीय नुकसानों और क्षतिपूर्ति को संदर्भित करती है जो जलवायु परिवर्तन के कारण होते हैं और जिन्हें अनुकूलन उपायों से भी नहीं रोका जा सकता।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
जलवायु न्याय (Climate Justice) यह सिद्धांत कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से सबसे कम जिम्मेदार देशों को सबसे अधिक नुकसान होता है, और उन्हें क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए।
हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (Himalayan Ecosystem) पिघलते ग्लेशियरों, पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost) और अस्थिर पर्वतीय ढलानों के कारण अत्यधिक संवेदनशील, जिससे बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा बढ़ रहा है।
सीमा-पार आपदाएँ (Cross-border Disasters) जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाएँ (जैसे बाढ़) भौगोलिक सीमाओं को नहीं पहचानतीं, जिससे क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है।
वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान नेपाल का योगदान 0.1 प्रतिशत से भी कम है, फिर भी वह जलवायु परिवर्तन के गंभीर परिणामों का सामना कर रहा है।
बहुपक्षवाद (Multilateralism) छोटे और गरीब देशों के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों पर अपनी आवाज़ उठाने और न्यायपूर्ण परिणाम प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन।

महत्व

पर्यावरणीय महत्व

  • हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता: पिघलते ग्लेशियर और पर्माफ्रॉस्ट के कारण बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी आपदाओं का बढ़ता खतरा, जो पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियाँ पैदा करता है।
  • जलवायु परिवर्तन के स्थानीय प्रभाव: नेपाल जैसे देशों में अत्यधिक वर्षा और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएँ स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्रों और जैव विविधता को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं।

सामाजिक-आर्थिक महत्व

  • मानवीय लागत: जलवायु संबंधी आपदाओं से जान-माल का भारी नुकसान होता है, जिससे विस्थापन, आजीविका का नुकसान और गरीबी में वृद्धि होती है।
  • आर्थिक क्षति: आपदाएँ बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) को नष्ट कर देती हैं और पुनर्निर्माण के लिए भारी ऋण की आवश्यकता होती है, जिससे देश की GDP का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित होता है।
  • खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाएँ: जलवायु भेद्यता (Climate Vulnerability) उर्वरक, ईंधन और सड़क निर्माण सामग्री जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करती है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

भू-राजनीतिक महत्व

  • क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता: जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाएँ सीमा-पार होती हैं, जिससे नेपाल, भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों के बीच सहयोग और डेटा साझाकरण की आवश्यकता होती है।
  • जलवायु न्याय की वैश्विक माँग: नेपाल जैसे छोटे देश जलवायु परिवर्तन के लिए अपनी न्यूनतम जिम्मेदारी के बावजूद इसके गंभीर परिणामों का सामना कर रहे हैं, जिससे वैश्विक मंचों पर जलवायु न्याय और अनुदान-आधारित वित्तपोषण की माँग बढ़ रही है।
  • बहुपक्षीय संस्थानों की भूमिका: संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंच छोटे और गरीब देशों को अपनी चिंताओं को उठाने और वैश्विक समाधान खोजने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं।

चुनौतियाँ

1. जलवायु वित्तपोषण की अपर्याप्तता

  • मौजूदा तंत्र जैसे लॉस एंड डैमेज फंड (Loss and Damage Fund) और ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी (Global Environment Facility) आपदाओं से निपटने और पुनर्निर्माण के लिए पर्याप्त अनुदान-आधारित वित्तपोषण प्रदान करने में विफल रहे हैं।
  • आपदा के समय जटिल आवेदन प्रक्रियाएँ और नौकरशाही बाधाएँ त्वरित सहायता में देरी करती हैं।

2. सीमा-पार आपदा प्रबंधन में समन्वय की कमी

  • जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाएँ (जैसे बाढ़) अक्सर सीमा-पार होती हैं, लेकिन पड़ोसी देशों के बीच उपग्रह डेटा, विशेषज्ञता और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को साझा करने में समन्वय की कमी होती है।
  • आपदा सहायता और पुनर्निर्माण प्रयासों में प्रभावी क्षेत्रीय सहयोग का अभाव।

3. हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की बढ़ती भेद्यता

  • बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों का पिघलना, पर्माफ्रॉस्ट का अस्थिर होना और पर्वतीय ढलानों का क्षरण, जिससे भूस्खलन, हिमस्खलन और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बढ़ रहा है।
  • इस क्षेत्र में बुनियादी ढाँचे (सड़कें, पुल) का निर्माण भी इन आपदाओं के प्रति अधिक संवेदनशील है।

4. अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली में असमानताएँ

  • गरीब और विकासशील देश उन संघर्षों और निर्णयों से बाधित होते हैं जो उनके नियंत्रण से बाहर होते हैं, जैसे कि ईंधन और उर्वरक की कमी।
  • वैश्विक संसाधनों का वितरण अक्सर युद्ध और सैन्य उद्देश्यों के लिए अधिक होता है, जबकि मानवीय सहायता और विकास के लिए कम।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
जलवायु वित्तपोषण पर्याप्त अनुदान-आधारित वित्तपोषण की कमी और जटिल प्रक्रियाएँ।
आपदा प्रबंधन सीमा-पार सहयोग और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में समन्वय का अभाव।
हिमालयी संवेदनशीलता पिघलते ग्लेशियरों और अस्थिर ढलानों से बढ़ती आपदाएँ।
वैश्विक असमानता गरीब देशों पर बाहरी संघर्षों और नीतियों का प्रतिकूल प्रभाव।
बुनियादी ढाँचा आपदाओं से बार-बार नुकसान और पुनर्निर्माण के लिए ऋण पर निर्भरता।

आगे की राह

  • जलवायु वित्तपोषण को सुव्यवस्थित करना: लॉस एंड डैमेज फंड और अन्य तंत्रों को अधिक सुलभ, पर्याप्त और अनुदान-आधारित बनाना, विशेषकर उन देशों के लिए जो जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
  • हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र (Himalayan Climate Resilience Mechanism) विकसित करना: नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में एक तंत्र स्थापित करना जो उपग्रह डेटा, विशेषज्ञता साझा करे, खतरनाक ग्लेशियल झीलों की निगरानी करे और सीमा-पार आपदा सहायता का समन्वय करे।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना: हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन के लिए अत्याधुनिक प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को विकसित और तैनात करना, जिसमें समुदाय-आधारित दृष्टिकोण शामिल हों।
  • जलवायु अनुकूल बुनियादी ढाँचे का निर्माण: आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचे (जैसे सड़कें, पुल और भवन) के निर्माण में निवेश करना जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर सकें।
  • बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देना: संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों को मजबूत करना ताकि छोटे और विकासशील देशों की आवाज़ सुनी जा सके और जलवायु न्याय सहित वैश्विक चुनौतियों के लिए न्यायपूर्ण और प्रभावी समाधान खोजे जा सकें।
  • क्षमता निर्माण और ज्ञान साझाकरण: स्थानीय समुदायों और सरकारी एजेंसियों की आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) और अनुकूलन (Adaptation) रणनीतियों को विकसित करने की क्षमता को बढ़ाना।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता बढ़ाना: वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के मानवीय और आर्थिक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाना ताकि नीति निर्माताओं और जनता को कार्रवाई के लिए प्रेरित किया जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जलवायु न्याय · हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र · ग्लेशियर पिघलना · जलवायु वित्तपोषण · लॉस एंड डैमेज फंड · बहुपक्षवाद · आपदा प्रबंधन · सीमा पार सहयोग · ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन · जलवायु भेद्यता

अवधारणा प्रवाह

वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि  →  पृथ्वी का तापमान बढ़ना और जलवायु परिवर्तन  →  हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना और पर्माफ्रॉस्ट का अस्थिर होना  →  अत्यधिक वर्षा, अचानक बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी आपदाएँ  →  जान-माल का नुकसान, बुनियादी ढाँचे का विनाश और आर्थिक क्षति  →  जलवायु न्याय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. नेपाल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 0.1 प्रतिशत से भी कम योगदान देता है।
2. लॉस एंड डैमेज फंड (Loss and Damage Fund) जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से प्रभावित विकासशील देशों को सहायता प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है।
3. हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र (Himalayan Climate Resilience Mechanism) का प्रस्ताव नेपाल, भारत और चीन के बीच उपग्रह डेटा साझा करने और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने के लिए किया गया है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि नेपाल का वैश्विक GHG उत्सर्जन में योगदान 0.1% से कम है। कथन 2 सही है क्योंकि लॉस एंड डैमेज फंड का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से पीड़ित विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। कथन 3 सही है क्योंकि नेपाल के प्रधानमंत्री ने हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र का प्रस्ताव किया है जिसमें नेपाल, भारत और चीन शामिल होंगे ताकि डेटा साझा किया जा सके और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत किया जा सके।

Q2. अभिकथन (A): जलवायु परिवर्तन हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को अस्थिर कर रहा है, जिससे भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है।
कारण (R): पिघलते हुए पर्माफ्रॉस्ट (permafrost) अस्थिर पर्वतीय ढलानों में योगदान करते हैं।
सही विकल्प चुनें:

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन हिमालयी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ा रहा है, जिससे आपदाएं बढ़ रही हैं। कारण (R) भी सही है क्योंकि पिघलते हुए पर्माफ्रॉस्ट पर्वतीय ढलानों को अस्थिर करते हैं, जिससे भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ता है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या भी है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ जलवायु न्याय (Climate Justice) की अवधारणा की व्याख्या करें और चर्चा करें कि विकासशील देशों के लिए इसका क्या महत्व है। हाल की ‘हिमालयी सुनामी’ जैसी घटनाओं के आलोक में, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बहुपक्षीय सहयोग की आवश्यकता का भी मूल्यांकन करें। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** जलवायु न्याय की परिभाषा दें – यह विचार कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और प्रतिक्रियाएं नैतिक और न्यायसंगत होनी चाहिए, विशेषकर उन लोगों के लिए जो इसके लिए कम से कम जिम्मेदार हैं लेकिन सबसे अधिक प्रभावित हैं।
2. **जलवायु न्याय का महत्व (विकासशील देशों के लिए):**
* **ऐतिहासिक उत्तरदायित्व:** विकसित देशों द्वारा ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन।
* **भेद्यता:** विकासशील देशों की जलवायु आपदाओं के प्रति अधिक भेद्यता (कमजोर बुनियादी ढाँचा, सीमित संसाधन)।
* **क्षतिपूर्ति:** ‘लॉस एंड डैमेज’ (Loss and Damage) की अवधारणा और इसके लिए वित्तपोषण की आवश्यकता।
* **विकास का अधिकार:** जलवायु कार्रवाई के बोझ से उनके विकास के अधिकार का बाधित न होना।
3. **’हिमालयी सुनामी’ और बहुपक्षीय सहयोग की आवश्यकता:**
* **घटना का संदर्भ:** नेपाल में हाल की विनाशकारी बाढ़ (भोटेकोशी-त्रिशूली आपदा) का उल्लेख करें, जो जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में हुई।
* **सीमा पार प्रभाव:** बताएं कि कैसे जलवायु परिवर्तन की घटनाएं सीमाओं को नहीं पहचानतीं (नेपाल, चीन, भारत पर प्रभाव)।
* **बहुपक्षीय सहयोग के क्षेत्र:**
* **डेटा साझाकरण:** उपग्रह डेटा और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान (जैसे प्रस्तावित हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र)।
* **प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली:** आपदाओं के लिए प्रभावी पूर्व-चेतावनी प्रणालियों का विकास और साझाकरण।
* **आपदा सहायता:** सीमा पार आपदा सहायता और समन्वय।
* **जलवायु वित्तपोषण:** अनुदान-आधारित जलवायु वित्तपोषण की अपर्याप्तता और इसे मजबूत करने की आवश्यकता (जैसे लॉस एंड डैमेज फंड)।
* **तकनीकी हस्तांतरण:** अनुकूलन और शमन प्रौद्योगिकियों का हस्तांतरण।
4. **निष्कर्ष:** जलवायु न्याय और प्रभावी बहुपक्षवाद के माध्यम से ही वैश्विक जलवायु संकट का समाधान संभव है, विशेषकर उन देशों के लिए जो सबसे अधिक जोखिम में हैं।

स्रोत: news.un.org


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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