01 Sep नेपाल के पीएम शाह ने जलवायु परिवर्तन को विनाशकारी बाढ़ का कारण बताया
✎ हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान वृद्धि से ग्लेशियर पिघलने और चट्टान हिमस्खलन जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं, जिससे अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, जिसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीतियाँ आवश्यक…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, जलवायु परिवर्तन) | GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन | GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध (पर्यावरण कूटनीति)
- Prelims: जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलना, अचानक आई बाढ़ (Flash Floods), हिमालयी क्षेत्र, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
- Essay: जलवायु परिवर्तन: एक वैश्विक चुनौती और स्थानीय प्रभाव, आपदा प्रबंधन में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता
त्वरित पुनरावृत्ति: हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान वृद्धि से ग्लेशियर पिघलने और चट्टान हिमस्खलन जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं, जिससे अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, जिसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीतियाँ आवश्यक हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
इस घटना ने हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते जोखिमों और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
पृष्ठभूमि
- हिमालयी क्षेत्र, जिसे ‘तीसरा ध्रुव’ भी कहा जाता है, दुनिया के सबसे बड़े ग्लेशियरों और बर्फ के भंडारों में से एक है, जो लाखों लोगों के लिए पानी का स्रोत है।
- वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि वैश्विक औसत से अधिक दर पर हिमालयी ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे ग्लेशियर झीलों के फटने (Glacial Lake Outburst Floods – GLOFs) और अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि से पर्वतीय ढलानों पर बर्फ और चट्टानों की स्थिरता प्रभावित होती है, जिससे हिमस्खलन और भूस्खलन की घटनाएँ अधिक बार होती हैं।
- नेपाल जैसे पर्वतीय देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं, जहाँ चरम मौसमी घटनाएँ (extreme weather events) जैसे भारी वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन आम हो गए हैं।
- आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) और अनुकूलन (Adaptation) रणनीतियाँ हिमालयी देशों के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके लिए पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता की आवश्यकता है।
- अंतर्राष्ट्रीय समुदाय जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और विकासशील देशों को अनुकूलन प्रयासों में सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध है, जैसा कि पेरिस समझौते (Paris Agreement) में परिलक्षित होता है।
जलवायु परिवर्तन और हिमालयी आपदाएँ
- जलवायु परिवर्तन वैश्विक तापमान में दीर्घकालिक परिवर्तन को संदर्भित करता है, जिसका मुख्य कारण मानवीय गतिविधियाँ, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन का जलना है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
- हिमालयी क्षेत्र में, जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान वृद्धि की दर वैश्विक औसत से अधिक है, जिससे ग्लेशियर और बर्फ के आवरण तेजी से पिघल रहे हैं।
- ग्लेशियरों के पिघलने से ग्लेशियर झीलों का निर्माण होता है या मौजूदा झीलों का आकार बढ़ता है, जिनके फटने से अचानक और विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।
- बढ़ते तापमान से पर्वतीय ढलानों पर पर्माफ्रॉस्ट (permafrost) पिघलता है, जिससे चट्टानें अस्थिर हो जाती हैं और हिमस्खलन, भूस्खलन और चट्टान हिमस्खलन (rock ice avalanche) का खतरा बढ़ जाता है।
- ये घटनाएँ नदियों में बड़ी मात्रा में मलबा और पानी लाती हैं, जिससे अचानक बाढ़ (flash floods) आती है जो निचले इलाकों में भारी तबाही मचाती है।
- जलवायु परिवर्तन वर्षा पैटर्न को भी प्रभावित करता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और अन्य में सूखे की स्थिति बन सकती है, दोनों ही आपदाओं का कारण बन सकते हैं।
- इन आपदाओं का स्थानीय समुदायों, कृषि, बुनियादी ढांचे और जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जिससे आजीविका और विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है।
- इन चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, बेहतर आपदा प्रबंधन रणनीतियों, जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| जलवायु परिवर्तन का प्रभाव | नेपाल के प्रधानमंत्री ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान (1.8 डिग्री सेल्सियस) को विनाशकारी बाढ़ का मुख्य कारण बताया है, जो वैश्विक जलवायु परिवर्तन के स्थानीय प्रभावों को रेखांकित करता है। |
| ग्लेशियर पिघलना और हिमस्खलन | विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में चट्टानी-बर्फीले हिमस्खलन (rock ice avalanche) और ग्लेशियरों के बड़े हिस्से के पिघलने से अचानक बाढ़ (flash floods) की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे जान-माल का भारी नुकसान हो रहा है। |
| अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता | नेपाल ने जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मजबूत समर्थन और वैश्विक प्रतिक्रिया की आवश्यकता पर बल दिया है, क्योंकि यह एक साझा वैश्विक चुनौती है। |
| आपदा प्रबंधन और राहत कार्य | नेपाल सरकार बचाव, राहत और पुनर्वास कार्यों के साथ-साथ चिकित्सा उपचार और मनोवैज्ञानिक परामर्श प्रदान करने में सक्रिय रूप से लगी हुई है, जो आपदा प्रबंधन की तात्कालिकता को दर्शाता है। |
| भारत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्र | भोटेकोशी नदी में आई बाढ़, जो तिब्बत सीमा से रासुवा में प्रवेश करती है, भारत के लिए भी चिंता का विषय है क्योंकि हिमालयी नदियाँ निचले मैदानी इलाकों में भी बाढ़ का कारण बन सकती हैं। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- यह घटना हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (Himalayan ecosystem) पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर और प्रत्यक्ष प्रभावों को उजागर करती है, जिसमें ग्लेशियरों का पिघलना और चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति में वृद्धि शामिल है।
- यह पर्वतीय क्षेत्रों में जैव विविधता (biodiversity) और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की तात्कालिकता पर जोर देता है, जो इन आपदाओं से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
सामाजिक-आर्थिक महत्व
- बाढ़ जैसी आपदाएँ कृषि, बुनियादी ढांचे और आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं, जिससे आर्थिक नुकसान होता है और गरीबी बढ़ती है।
- विस्थापन, जान-माल का नुकसान और मनोवैज्ञानिक आघात समुदायों पर दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव डालते हैं, जिससे पुनर्वास और पुनर्निर्माण की चुनौती बढ़ जाती है।
भू-राजनीतिक महत्व
- नेपाल द्वारा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से सहायता की अपील जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए क्षेत्रीय और वैश्विक सहयोग की आवश्यकता को दर्शाती है।
- भारत और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों के बीच सीमा पार नदियों और आपदा प्रबंधन में सहयोग की आवश्यकता को मजबूत करता है, क्योंकि हिमालयी नदियाँ दोनों देशों को प्रभावित करती हैं।
चुनौतियाँ
1. जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और शमन
- हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण बाढ़, हिमस्खलन और भूस्खलन जैसी आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति से निपटना।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति संवेदनशील समुदायों और बुनियादी ढांचे को अनुकूलित करने के लिए प्रभावी रणनीतियों का विकास और कार्यान्वयन।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन
2. आपदा जोखिम न्यूनीकरण
- पहाड़ी और नदी बेसिन क्षेत्रों में अचानक बाढ़ और भूस्खलन के जोखिमों का सटीक आकलन और पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना।
- आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे का निर्माण और स्थानीय समुदायों को आपदा प्रतिक्रिया और तैयारी के लिए प्रशिक्षित करना।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन, पर्यावरण
3. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और वित्तपोषण
- जलवायु परिवर्तन से प्रभावित विकासशील देशों को अनुकूलन और शमन प्रयासों के लिए पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता जुटाना।
- सीमा पार आपदाओं से निपटने के लिए क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सहयोग तंत्र को मजबूत करना।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, पर्यावरण नीति
4. पुनर्वास और पुनर्निर्माण
- आपदा प्रभावित क्षेत्रों में विस्थापित आबादी के लिए तत्काल राहत, चिकित्सा सहायता और मनोवैज्ञानिक परामर्श प्रदान करना।
- दीर्घकालिक पुनर्वास योजनाएँ बनाना जो आजीविका पुनर्स्थापन और समुदाय के लचीलेपन पर ध्यान केंद्रित करें।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन, सामाजिक न्याय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| हिमालयी तापमान वृद्धि | 1.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और जल स्तर में वृद्धि, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। |
| चट्टानी-बर्फीले हिमस्खलन | पहाड़ी ढलानों पर अस्थिरता के कारण अचानक हिमस्खलन, जो नदी के प्रवाह को अवरुद्ध कर सकता है और अचानक बाढ़ का कारण बन सकता है। |
| कमजोर बुनियादी ढांचा | पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कें, पुल और बस्तियाँ अक्सर चरम मौसमी घटनाओं के प्रति संवेदनशील होती हैं, जिससे क्षति और जान-माल का नुकसान होता है। |
| सीमित संसाधन | नेपाल जैसे विकासशील देशों के पास जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने और बड़े पैमाने पर आपदा राहत कार्यों के लिए सीमित वित्तीय और तकनीकी संसाधन हैं। |
| सीमा पार प्रभाव | नेपाल में उत्पन्न होने वाली बाढ़ और अन्य आपदाएँ निचले मैदानी इलाकों में स्थित भारत के राज्यों को भी प्रभावित कर सकती हैं, जिससे क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है। |
आगे की राह
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का मुकाबला करने के लिए हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों और जल विज्ञान पर गहन वैज्ञानिक अनुसंधान और निगरानी को बढ़ावा देना।
- आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction – DRR) रणनीतियों को मजबूत करना, जिसमें पूर्व चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक तैयारी और आपदा-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे का निर्माण शामिल है।
- जलवायु परिवर्तन अनुकूलन (Climate Change Adaptation) और शमन (Mitigation) के लिए राष्ट्रीय नीतियों और योजनाओं को एकीकृत करना, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना और वन आवरण बढ़ाना शामिल है।
- जलवायु परिवर्तन से प्रभावित विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और जलवायु वित्तपोषण तंत्र को मजबूत करना।
- भारत और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों के बीच सीमा पार नदियों के प्रबंधन और आपदा प्रतिक्रिया में सहयोग के लिए संयुक्त तंत्र स्थापित करना।
- स्थानीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आपदाओं से निपटने के लिए आवश्यक कौशल और संसाधनों से लैस करना।
- आपदा के बाद के पुनर्वास और पुनर्निर्माण प्रयासों में स्थायी और लचीले समाधानों को प्राथमिकता देना, ताकि भविष्य की आपदाओं के प्रति भेद्यता कम हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जलवायु परिवर्तन · हिमालयी क्षेत्र · आपदा जोखिम न्यूनीकरण · ग्लेशियर पिघलना · अचानक आई बाढ़ · अंतर्राष्ट्रीय सहयोग · सतत विकास · पर्यावरण संरक्षण · आपदा प्रबंधन · जलवायु अनुकूलन
अवधारणा प्रवाह
हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि (1.8 डिग्री सेल्सियस) → ग्लेशियरों का पिघलना और चट्टानी-बर्फीले हिमस्खलन → भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ (Flash Floods) → उत्तरी और मध्य नेपाल में भारी तबाही → जान-माल का नुकसान और विस्थापन → अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से सहायता की अपील
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि का संबंध ग्लेशियरों के पिघलने से है, जिससे अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
2. राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Risk Reduction and Management Authority) भारत में आपदा प्रबंधन के लिए जिम्मेदार शीर्ष निकाय है।
3. जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली आपदाओं से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह प्रत्येक देश की आंतरिक समस्या है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि से ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, जिससे अचानक बाढ़ (Flash Floods) और भूस्खलन जैसी आपदाएँ आती हैं। कथन 2 गलत है। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) नेपाल का निकाय है, भारत में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) है। कथन 3 गलत है। जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है और इससे निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
Q2. अभिकथन (A): नेपाल के प्रधानमंत्री ने हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया है।
कारण (R): हिमालयी क्षेत्र में तापमान में 1.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की पुष्टि हुई है, जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और भूस्खलन हो रहा है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि नेपाल के प्रधानमंत्री ने बाढ़ के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराया है। कारण (R) भी सही है, क्योंकि हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि और ग्लेशियर पिघलना बाढ़ का एक प्रमुख कारण है, जैसा कि समाचार में भी बताया गया है। R, A की सही व्याख्या भी करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता पर चर्चा कीजिए। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत और पड़ोसी देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग के महत्व का भी विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना: उत्तर को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जाना चाहिए।
भाग 1: जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता पर चर्चा। इसमें निम्नलिखित बिंदु शामिल होने चाहिए:
* हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता: युवा वलित पर्वत श्रृंखला, भूकंपीय रूप से सक्रिय, नाजुक पारिस्थितिकी।
* जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: वैश्विक तापमान वृद्धि, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स – GLOFs), अचानक बाढ़ (Flash Floods), भूस्खलन (Landslides), बादल फटना (Cloudbursts)।
* बढ़ते जोखिम: जान-माल का नुकसान, बुनियादी ढांचे को क्षति, आजीविका पर प्रभाव, विस्थापन।
* वैज्ञानिक प्रमाण: तापमान वृद्धि के आंकड़े (जैसे समाचार में उल्लिखित 1.8 डिग्री सेल्सियस)।
भाग 2: इन चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत और पड़ोसी देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग के महत्व का विश्लेषण। इसमें निम्नलिखित बिंदु शामिल होने चाहिए:
* साझा पारिस्थितिकी तंत्र: हिमालयी नदियाँ कई देशों से होकर गुजरती हैं, आपदाओं का सीमा-पार प्रभाव होता है।
* आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली: साझा डेटा और सूचना विनिमय (जैसे नदी जल स्तर, मौसम पूर्वानुमान)।
* संयुक्त अनुसंधान और क्षमता निर्माण: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन, अनुकूलन और शमन रणनीतियों का विकास।
* आपदा प्रतिक्रिया और राहत: सीमा-पार समन्वय, खोज और बचाव कार्यों में सहयोग, मानवीय सहायता।
* अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर साझा प्रतिनिधित्व: जलवायु न्याय और वित्त के लिए एकजुट होकर आवाज उठाना।
* उदाहरण: सार्क (SAARC) जैसे क्षेत्रीय मंचों की भूमिका, द्विपक्षीय समझौते।
निष्कर्ष में, एक समग्र और सतत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देना चाहिए जो क्षेत्रीय सहयोग को प्राथमिकता दे।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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