परिसीमन बिल: डीएमके का रुख संसद में बिल आने के बाद ही तय, दक्षिण राज्यों को मिलेगा क्या?

'संसद में बिल आने के बाद तय होगी रणनीति': परिसीमन पर DMK ने नहीं खोले पत्ते; दक्षिण के राज्यों को क्या मिलेगा? — diagram

परिसीमन बिल: डीएमके का रुख संसद में बिल आने के बाद ही तय, दक्षिण राज्यों को मिलेगा क्या?

परिसीमन प्रक्रियाविधेयक प्रस्तावसंसद में2026जनगणनाआंकड़े आधार2026 बादपरिसीमन अधिनियमअनुच्छेद 82प्रत्येक जनगणनाआयोगगठन1952, 1963, 1973, 2002स्थगन42वाँ संशोधन2000 तकविस्तार84वाँ संशोधन2026 तक
परिसीमन प्रक्रिया

✎ परिसीमन आयोग का मुख्य कार्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना है, ताकि 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को सुनिश्चित किया जा सके, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियां और विशेषाधिकार एवं इनसे उत्पन्न होने वाले विषय  |  GS Paper II — संघवाद: केंद्र-राज्य संबंध
  • Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, जनसंख्या नियंत्रण, लोकसभा सीटें, राज्य विधानसभा सीटें, जनगणना
  • Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और भविष्य, जनसंख्या नियंत्रण और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन आयोग का मुख्य कार्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना है, ताकि ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित किया जा सके, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, संसद में परिसीमन विधेयक 2026 को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी DMK (द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम) ने इस विधेयक पर अपना अंतिम रुख स्पष्ट करने से इनकार कर दिया है, यह कहते हुए कि वे संसद में आधिकारिक मसौदा पेश होने के बाद ही कोई निर्णय लेंगे। पार्टी ने पिछली बार दिए गए अपने सुझावों को नए बिल में शामिल किए जाने की संभावना पर भी विचार करने की बात कही है, जिससे यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है।

पृष्ठभूमि

  • परिसीमन (Delimitation) का अर्थ है किसी देश या एक विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों (लोकसभा या विधानसभा) की सीमाओं का निर्धारण या पुनःनिर्धारण करना।
  • भारत में परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या को यथासंभव समान करना है, ताकि ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित किया जा सके।
  • संविधान के अनुच्छेद 82 (Article 82) के तहत, प्रत्येक जनगणना के बाद संसद एक परिसीमन अधिनियम लागू करती है।
  • पहला परिसीमन आयोग 1952 में स्थापित किया गया था। अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया जा चुका है: 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
  • वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन (42nd Constitutional Amendment) के माध्यम से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या को वर्ष 2000 तक के लिए स्थिर कर दिया गया था, ताकि परिवार नियोजन कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जा सके।
  • बाद में, 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 (84th Constitutional Amendment Act, 2001) द्वारा इस स्थगन को 2026 तक बढ़ा दिया गया, जिसका अर्थ है कि अगली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन होगा, जो 2026 के बाद प्रभावी होगा।

परिसीमन क्या है और इससे जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

  • परिसीमन का अर्थ है किसी देश में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना। यह प्रक्रिया एक स्वतंत्र ‘परिसीमन आयोग’ द्वारा की जाती है, जिसके आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या में हुए परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या को समान बनाना है, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व में समानता सुनिश्चित हो सके।
  • परिसीमन आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) और संबंधित राज्य के निर्वाचन आयुक्त पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
  • दक्षिण भारतीय राज्यों को यह आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण आगामी परिसीमन में लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा।
  • यह चिंता संघवाद (Federalism) के सिद्धांत पर आधारित है, जहां राज्यों को उनकी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व मिलता है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित होने का डर है।
  • केंद्र सरकार ने हालांकि इन आशंकाओं को खारिज किया है और दावा किया है कि नए मॉडल से दक्षिणी राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
परिसीमन का आधार जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन। यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में लगभग समान जनसंख्या हो, जिससे ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का सिद्धांत कायम रहे।
पिछला परिसीमन भारत में अंतिम पूर्ण परिसीमन 2002 में हुआ था, जो 1991 की जनगणना पर आधारित था। 2002 के परिसीमन अधिनियम के तहत, सीटों की संख्या को 2026 तक स्थिर कर दिया गया था।
लोकसभा सीटों में प्रस्तावित वृद्धि अप्रैल 2026 के विधायी पैकेज में लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है। यह देश की बढ़ती जनसंख्या और प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को दर्शाता है।
दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता दक्षिण के राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण उन्हें कम संसदीय प्रतिनिधित्व मिलेगा, जबकि अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी।
DMK का रुख द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (DMK) ने विधेयक का मसौदा आने के बाद ही अपना अंतिम रुख तय करने का फैसला किया है। वे अपने पुराने सुझावों को बिल में शामिल किए जाने की उम्मीद कर रहे हैं।

महत्व

राजनीतिक महत्व

  • परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों में समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में निष्पक्षता बनी रहे।
  • यह राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति के संतुलन को प्रभावित कर सकता है, खासकर जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों के लिए।
  • परिसीमन के माध्यम से, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों का पुनर्गठन भी किया जाता है, ताकि उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया जा सके।

संघीय ढाँचे पर प्रभाव

  • जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफल रहे राज्यों को कम प्रतिनिधित्व मिलने की आशंका से संघवाद (Federalism) के सिद्धांतों पर बहस छिड़ सकती है।
  • यह केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव का कारण बन सकता है, यदि दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को प्रभावी ढंग से संबोधित नहीं किया जाता है।

सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ

  • कम प्रतिनिधित्व वाले राज्यों को राष्ट्रीय संसाधनों के आवंटन और नीति निर्माण में अपनी आवाज उठाने में कठिनाई हो सकती है, जिससे क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ सकती हैं।
  • जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को हतोत्साहित करने का एक अप्रत्यक्ष प्रभाव हो सकता है, यदि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक राजनीतिक लाभ मिलता है।

चुनौतियाँ

1. जनसंख्या नियंत्रण और प्रतिनिधित्व का संतुलन

  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों को डर है कि जनसंख्या-आधारित परिसीमन से उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, जबकि अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी।
  • यह एक ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जहाँ राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंडित किया जा रहा हो, जो दीर्घकालिक सामाजिक लक्ष्यों के विपरीत है।

2. राजनीतिक सहमति का अभाव

  • परिसीमन एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर विभिन्न राजनीतिक दलों और राज्यों के बीच आम सहमति बनाना मुश्किल है।
  • DMK जैसे क्षेत्रीय दल विधेयक के मसौदे का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं और अपने पुराने सुझावों को शामिल करने की मांग कर रहे हैं, जिससे राजनीतिक गतिरोध की संभावना है।

3. संसदीय सीटों में वृद्धि का प्रभाव

  • लोकसभा सीटों की संख्या में प्रस्तावित वृद्धि (543 से 816) संसद के कामकाज, बुनियादी ढांचे और सदस्यों के बीच प्रभावी संचार को प्रभावित कर सकती है।
  • बड़ी संख्या में सांसदों के साथ सदन का प्रबंधन और बहस की गुणवत्ता बनाए रखना एक चुनौती हो सकती है।

4. निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन

  • परिसीमन से मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में महत्वपूर्ण बदलाव आएंगे, जिससे मतदाताओं और प्रतिनिधियों के बीच स्थापित संबंध प्रभावित हो सकते हैं।
  • यह स्थानीय पहचान और क्षेत्रीय भावनाओं को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में असंतोष पैदा हो सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जनसंख्या बनाम प्रतिनिधित्व जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को कम प्रतिनिधित्व मिलने का डर, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को लाभ।
संघीय असंतुलन दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक शक्ति में संभावित कमी से केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव।
राजनीतिक ध्रुवीकरण परिसीमन पर विभिन्न राजनीतिक दलों और क्षेत्रीय हितों के बीच तीव्र मतभेद और गतिरोध की संभावना।
संसदीय क्षमता लोकसभा सीटों में भारी वृद्धि से संसद के प्रभावी कामकाज और प्रबंधन पर दबाव।
स्थानीय पहचान का क्षरण निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन से स्थानीय पहचान और सामुदायिक संबंधों पर संभावित नकारात्मक प्रभाव।

आगे की राह

  • परिसीमन विधेयक पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने के लिए सभी हितधारकों, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के साथ गहन परामर्श और संवाद किया जाना चाहिए।
  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को उनके प्रयासों के लिए दंडित न करने के तरीके खोजे जाने चाहिए, जैसे कि प्रतिनिधित्व के लिए एक ‘फ्रीजिंग मैकेनिज्म’ या वैकल्पिक मापदंडों पर विचार करना।
  • एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है जो परिसीमन के विभिन्न मॉडलों और उनके प्रभावों का अध्ययन करे, जिसमें जनसंख्या के अलावा अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों को भी शामिल किया जा सके।
  • परिसीमन के सिद्धांतों और उद्देश्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि सभी राज्यों और नागरिकों को प्रक्रिया की निष्पक्षता पर विश्वास हो।
  • संसद के भीतर और बाहर एक स्वस्थ बहस को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जहाँ विभिन्न दृष्टिकोणों को सुना जाए और रचनात्मक समाधान खोजे जा सकें।
  • संविधान में आवश्यक संशोधन करने से पहले, इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर गहन विचार-विमर्श किया जाना चाहिए, ताकि देश के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखा जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

परिसीमन आयोग · अनुच्छेद 82 · जनसंख्या प्रतिनिधित्व · संघवाद · लोकसभा सीटें · राज्यों का प्रतिनिधित्व · जनसांख्यिकीय लाभांश · संवैधानिक प्रावधान · समान प्रतिनिधित्व · दक्षिण भारतीय राज्य

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘विधानसभा सीटों का परिसीमन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 330’, ‘note’: ‘SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 332’, ‘note’: ‘राज्यों की विधानसभाओं में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण’}

अवधारणा प्रवाह

जनसंख्या वृद्धि में राज्यों के बीच असमानता  →  जनसंख्या आधारित परिसीमन का प्रस्ताव  →  दक्षिणी राज्यों द्वारा प्रतिनिधित्व घटने की आशंका  →  केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव की संभावना  →  विधेयक पर राजनीतिक दलों के बीच गतिरोध  →  संसदीय सीटों के पुनर्गठन की आवश्यकता

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम लागू किया जाता है।
2. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन को वर्ष 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया गया था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 भी सही है क्योंकि परिसीमन आयोग के आदेश अंतिम होते हैं और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। कथन 3 गलत है क्योंकि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा सीटों के परिसीमन को वर्ष 2000 तक के लिए स्थगित किया गया था, लेकिन बाद में 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इसे 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया।

Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
1. आयोग में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त, संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त और सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश शामिल होते हैं।
2. परिसीमन आयोग का मुख्य कार्य लोकसभा और राज्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2

उत्तर: केवल 2 — कथन 1 गलत है। परिसीमन आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश या वर्तमान न्यायाधीश (अध्यक्ष के रूप में), मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते हैं। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की बजाय वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष होते हैं। कथन 2 सही है क्योंकि परिसीमन आयोग का प्राथमिक कार्य जनसंख्या परिवर्तन के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या का समान प्रतिनिधित्व हो सके।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में परिसीमन प्रक्रिया के संवैधानिक प्रावधानों और इसके महत्व पर चर्चा कीजिए। साथ ही, दक्षिण भारतीय राज्यों द्वारा व्यक्त की जा रही चिंताओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** परिसीमन की संक्षिप्त परिभाषा और इसका उद्देश्य।
2. **संवैधानिक प्रावधान:**
* अनुच्छेद 82: संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार।
* अनुच्छेद 170: राज्यों को विधानसभा सीटों के लिए परिसीमन।
* अनुच्छेद 330 और 332: अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण।
* 84वां संविधान संशोधन (2001): लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन पर 2026 तक रोक।
3. **परिसीमन का महत्व:**
* समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
* जनसंख्या परिवर्तनों को समायोजित करना।
* लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखना।
* आरक्षित सीटों का उचित निर्धारण।
4. **दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं:**
* **जनसंख्या नियंत्रण में सफलता:** जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें कम प्रतिनिधित्व मिलने का डर।
* **संघवाद पर प्रभाव:** राज्यों के बीच शक्ति संतुलन में बदलाव की आशंका।
* **आर्थिक विकास का संबंध:** जनसंख्या नियंत्रण को आर्थिक विकास से जोड़ते हुए, सफल राज्यों को दंडित न करने की मांग।
* **राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी:** लोकसभा में सीटों की संख्या कम होने से राष्ट्रीय राजनीति में उनकी आवाज कमजोर होने की आशंका।
5. **समालोचनात्मक परीक्षण:**
* जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व का लोकतांत्रिक सिद्धांत।
* जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को पुरस्कृत करने के वैकल्पिक तरीके (जैसे वित्तीय प्रोत्साहन)।
* संघीय संतुलन बनाए रखने के लिए संभावित समाधान (जैसे राज्यसभा में प्रतिनिधित्व का पुनर्गठन या लोकसभा सीटों के लिए एक अलग फार्मूला)।
* सरकार के तर्क कि आनुपातिक हिस्सेदारी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।
6. **निष्कर्ष:** परिसीमन की आवश्यकता और राज्यों की चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: amarujala.com


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