पल्लिकारनई आर्द्रभूमि के आसपास निर्माण पर प्रतिबंध नहीं, केवल नियमन संभव: तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण

Construction activities around Pallikaranai marshland can be regulated, not banned: TNSWA tells Madras High Court — diagram

पल्लिकारनई आर्द्रभूमि के आसपास निर्माण पर प्रतिबंध नहीं, केवल नियमन संभव: तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण

Map of Tamil Nadu highlighted on the map of India — पल्लिकारनई आर्द्रभूमि निर्माण नियमन
मानचित्र व माइंड-मैप: पल्लिकरणाई दलदली क्षेत्र के आसपास निर्माण गतिविधियों का विनियमन

✎ पल्लिकरनई आर्द्रभूमि के आसपास निर्माण गतिविधियों को विनियमित करने के लिए 'प्रभाव क्षेत्र' (ZoI) का निर्धारण आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत पर्यावरण संरक्षण और शहरी विकास के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता  |  GS Paper II — शासन, नीतियां और हस्तक्षेप
  • Prelims: पल्लिकरनई आर्द्रभूमि, आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (TNSWA), नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट (NCSCM), प्रभाव क्षेत्र (Zone of Influence – ZoI)
  • Essay: पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन, शहरीकरण और आर्द्रभूमि संरक्षण: चुनौतियाँ और समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: पल्लिकरनई आर्द्रभूमि के आसपास निर्माण गतिविधियों को विनियमित करने के लिए ‘प्रभाव क्षेत्र’ (ZoI) का निर्धारण आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत पर्यावरण संरक्षण और शहरी विकास के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (TNSWA) ने मद्रास उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि चेन्नई में पल्लिकरनई आर्द्रभूमि के आसपास निर्माण गतिविधियों को विनियमित किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह से प्रतिबंधित करने की आवश्यकता नहीं है। यह बयान नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा आर्द्रभूमि के चारों ओर 1 किलोमीटर के दायरे में निर्माण पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में आया है। TNSWA ने नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट (NCSCM) द्वारा तैयार किए गए एक प्रस्तावित अंतरिम ‘प्रभाव क्षेत्र’ (Zone of Influence – ZoI) का भी सुझाव दिया है, जो आर्द्रभूमि-शहरी इंटरफ़ेस के विषम चरित्र को दर्शाता है।

पृष्ठभूमि

  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने पल्लिकरनई आर्द्रभूमि के चारों ओर 1 किलोमीटर के दायरे में नई इमारतों के निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।
  • कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CREDAI) – चेन्नई चैप्टर और अन्य ने इस कंबल प्रतिबंध को चुनौती देते हुए मद्रास उच्च न्यायालय में रिट याचिकाएँ दायर की थीं।
  • पल्लिकरनई आर्द्रभूमि चेन्नई में 1,247.54 हेक्टेयर में फैली एक महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि है।
  • तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (TNSWA) ने मद्रास उच्च न्यायालय को बताया कि निर्माण गतिविधियों को विनियमित किया जा सकता है, प्रतिबंधित नहीं।
  • नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट (NCSCM) ने एक अंतरिम ‘प्रभाव क्षेत्र’ (ZoI) के सीमांकन के लिए एक योजना प्रस्तुत की है, जो साइट-विशिष्ट दृष्टिकोण का समर्थन करती है।

आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 और प्रभाव क्षेत्र (ZoI)

  • आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 भारत में आर्द्रभूमियों के संरक्षण और बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं।
  • ये नियम आर्द्रभूमि के प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक नियामक ढाँचा प्रदान करते हैं, जिसमें उनके पारिस्थितिक चरित्र को बनाए रखना शामिल है।
  • इन नियमों के तहत, प्रत्येक राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में एक राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (State Wetlands Authority) का गठन किया जाता है, जो आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए जिम्मेदार होता है।
  • नियमों के अनुसार, आर्द्रभूमि के ‘प्रभाव क्षेत्र’ (Zone of Influence – ZoI) की पहचान करना महत्वपूर्ण है, जो आर्द्रभूमि के पारिस्थितिक चरित्र को प्रभावित करने वाली विकासात्मक गतिविधियों वाले क्षेत्र को संदर्भित करता है।
  • ZoI का निर्धारण वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर किया जाता है, जिसमें हाइड्रोलॉजिकल और भूमि उपयोग विशेषताओं का विश्लेषण शामिल होता है।
  • ZoI के भीतर की गतिविधियों को विनियमित किया जाता है ताकि आर्द्रभूमि पर नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके। इसमें निर्माण, औद्योगिक विस्तार और अन्य विकासात्मक परियोजनाएं शामिल हो सकती हैं।
  • नियमों का उद्देश्य आर्द्रभूमि के आसपास के क्षेत्रों में सतत विकास को बढ़ावा देना है, जबकि उनके पारिस्थितिक महत्व को बनाए रखना भी है।
  • पल्लिकरनई जैसी शहरी आर्द्रभूमियों के लिए, ZoI का निर्धारण विशेष रूप से जटिल होता है क्योंकि उन्हें शहरीकरण के दबाव का सामना करना पड़ता है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
पल्लीकरनई आर्द्रभूमि (Pallikaranai marshland) चेन्नई में स्थित एक महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि, पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण।
प्रभाव क्षेत्र (Zone of Influence – ZoI) आर्द्रभूमि के आसपास का वह क्षेत्र जहाँ विकासात्मक गतिविधियों को विनियमित किया जा सकता है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण संरक्षण और संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए स्थापित एक न्यायिक निकाय।
तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (TNSWA) राज्य स्तर पर आर्द्रभूमि के संरक्षण और प्रबंधन के लिए जिम्मेदार प्राधिकरण।
राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र (NCSCM) तटीय क्षेत्रों के सतत प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक अध्ययन और सलाह प्रदान करने वाला संस्थान।

महत्व

पर्यावरणिक महत्व

  • पल्लीकरनई आर्द्रभूमि चेन्नई के लिए एक महत्वपूर्ण कार्बन सिंक के रूप में कार्य करती है और बाढ़ नियंत्रण में सहायक है।
  • यह कई प्रवासी पक्षियों और स्थानीय वन्यजीवों के लिए एक महत्वपूर्ण निवास स्थान है, जो जैव विविधता के संरक्षण में योगदान करती है।

शासन और नीतिगत महत्व

  • यह मामला आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के प्रभावी कार्यान्वयन और शहरी विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को संतुलित करने की चुनौती को दर्शाता है।
  • अदालत का निर्णय और विभिन्न प्राधिकरणों की भूमिका पर्यावरण शासन में न्यायिक निकायों, राज्य प्राधिकरणों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय के महत्व को उजागर करती है।

सामाजिक-आर्थिक महत्व

  • निर्माण गतिविधियों के विनियमन या प्रतिबंध का हजारों संपत्ति मालिकों और रियल एस्टेट क्षेत्र पर सीधा प्रभाव पड़ता है, जिससे आर्थिक हितों और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन की आवश्यकता होती है।

चुनौतियाँ

1. शहरीकरण बनाम पर्यावरण संरक्षण

  • तेजी से शहरीकरण और बढ़ती आबादी के दबाव के कारण आर्द्रभूमि जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों पर अतिक्रमण का खतरा बढ़ रहा है।
  • शहरी विकास की आवश्यकताओं और पर्यावरणीय अखंडता को बनाए रखने के बीच एक स्थायी संतुलन स्थापित करना एक बड़ी चुनौती है।

2. प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण

  • आर्द्रभूमि के लिए एक उपयुक्त ‘प्रभाव क्षेत्र’ (ZoI) का वैज्ञानिक रूप से निर्धारण करना जटिल है, क्योंकि इसमें जल विज्ञान, भूमि उपयोग और पारिस्थितिक संवेदनशीलता जैसे विभिन्न कारकों को ध्यान में रखना होता है।
  • एक समान प्रतिबंध के बजाय साइट-विशिष्ट दृष्टिकोण अपनाना, विभिन्न हितधारकों की आवश्यकताओं को समायोजित करने में सहायक हो सकता है।

3. नियामक ढाँचे का कार्यान्वयन

  • आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 जैसे नियामक ढाँचे मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी और न्यायसंगत कार्यान्वयन सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण है।
  • अदालती हस्तक्षेप अक्सर तब आवश्यक हो जाता है जब नियामक निकाय अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहते हैं या उनके निर्णयों को चुनौती दी जाती है।

4. हितधारकों का समन्वय

  • सरकार, स्थानीय प्राधिकरण, वैज्ञानिक संस्थान, रियल एस्टेट डेवलपर्स और नागरिक समाज जैसे विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय स्थापित करना और उनके हितों को संतुलित करना एक जटिल प्रक्रिया है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
आर्द्रभूमि पर अतिक्रमण शहरी विस्तार के कारण आर्द्रभूमि के आकार में कमी और पारिस्थितिक कार्यों का ह्रास।
वैज्ञानिक डेटा की आवश्यकता प्रभाव क्षेत्र के निर्धारण के लिए व्यापक और विश्वसनीय वैज्ञानिक अध्ययनों की कमी।
विकास बनाम संरक्षण का संतुलन आर्थिक विकास की आवश्यकताओं और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच सही संतुलन खोजना।
कानूनी और नियामक अस्पष्टता कभी-कभी नियमों की व्याख्या और उनके कार्यान्वयन में भिन्नता या अस्पष्टता।

आगे की राह

  • आर्द्रभूमि के ‘प्रभाव क्षेत्र’ (ZoI) के निर्धारण के लिए व्यापक और साइट-विशिष्ट वैज्ञानिक अध्ययन किए जाने चाहिए, जिसमें जल विज्ञान, जैव विविधता और भूमि उपयोग पैटर्न का विश्लेषण शामिल हो।
  • आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए और राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरणों को सशक्त बनाया जाना चाहिए।
  • शहरी नियोजन में आर्द्रभूमि के संरक्षण को एकीकृत किया जाना चाहिए, जिसमें बफर जोन का स्पष्ट सीमांकन और अतिक्रमण विरोधी उपायों को शामिल किया जाए।
  • हितधारकों, जैसे स्थानीय समुदायों, रियल एस्टेट डेवलपर्स और पर्यावरणविदों के साथ परामर्श और उनकी भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि सर्वसम्मत समाधान तक पहुँचा जा सके।
  • पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से आर्द्रभूमि के पारिस्थितिक महत्व के बारे में जनता को शिक्षित किया जाना चाहिए।
  • पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन के लिए प्रभावी प्रवर्तन और दंड प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि निवारक प्रभाव सुनिश्चित हो सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पल्लीकरनई आर्द्रभूमि · आर्द्रभूमि संरक्षण · पर्यावरण संरक्षण अधिनियम · राष्ट्रीय हरित अधिकरण · सतत विकास · पर्यावरण प्रभाव आकलन · तटीय विनियमन क्षेत्र · वेटलैंड्स (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 · पारिस्थितिक संवेदनशीलता · शहरीकरण और पर्यावरण · न्यायिक समीक्षा · पर्यावरण शासन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48क’, ‘note’: ‘पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 51क (छ)’, ‘note’: ‘पर्यावरण की रक्षा और सुधार’}

अवधारणा प्रवाह

राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने पल्लीकरनई आर्द्रभूमि के आसपास निर्माण पर प्रतिबंध लगाया।  →  रियल एस्टेट डेवलपर्स ने इस प्रतिबंध को मद्रास उच्च न्यायालय में चुनौती दी।  →  तमिलनाडु राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण ने विनियमन का प्रस्ताव रखा, पूर्ण प्रतिबंध का नहीं।  →  राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र ने अंतरिम ‘प्रभाव क्षेत्र’ (ZoI) की रिपोर्ट प्रस्तुत की।  →  रिपोर्ट में आर्द्रभूमि-शहरी इंटरफेस की विषम प्रकृति के कारण चर-चौड़ाई वाले ZoI का सुझाव दिया गया।  →  उच्च न्यायालय अब वैज्ञानिक रिपोर्ट और नियामक दिशानिर्देशों के आधार पर निर्णय लेगा।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लीकरनई आर्द्रभूमि तमिलनाडु में स्थित एक महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि है।
2. आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी किए गए हैं।
3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मामलों में न्यायिक समीक्षा की शक्ति रखता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि पल्लीकरनई आर्द्रभूमि चेन्नई, तमिलनाडु में स्थित है और एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र है। कथन 2 भी सही है क्योंकि आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 भारत में आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किए गए हैं। कथन 3 भी सही है क्योंकि NGT को पर्यावरण से संबंधित कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन और व्यक्तियों तथा संपत्ति को हुए नुकसान के लिए राहत एवं मुआवजा प्रदान करने के लिए स्थापित किया गया है, जिसमें न्यायिक समीक्षा की शक्ति निहित है।

Q2. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. NGT की स्थापना एक सांविधिक निकाय के रूप में राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई थी।
2. यह पर्यावरण संरक्षण और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिए स्थापित किया गया है।
3. NGT का निर्णय भारत के किसी भी उच्च न्यायालय में चुनौती नहीं दिया जा सकता।
उपरोक्त में से कौन से कथन सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 और 2 सही हैं। NGT की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत एक सांविधिक निकाय के रूप में की गई थी, जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मामलों का त्वरित निपटान करना है। कथन 3 गलत है क्योंकि NGT के निर्णयों को भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण के महत्व पर चर्चा कीजिए और आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के प्रमुख प्रावधानों का विश्लेषण कीजिए। शहरीकरण के दबावों के बीच इन नियमों के प्रभावी कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** आर्द्रभूमि की परिभाषा और पारिस्थितिक महत्व का संक्षिप्त परिचय।
2. **आर्द्रभूमि का महत्व:** पारिस्थितिकीय सेवाओं (जैव विविधता, जल शोधन, बाढ़ नियंत्रण, जलवायु विनियमन) और आर्थिक लाभों (मत्स्य पालन, पर्यटन) पर प्रकाश डालें।
3. **आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017:**
* **उद्देश्य:** आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक नियामक ढांचा प्रदान करना।
* **प्रमुख प्रावधान:**
* राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरणों (State Wetlands Authorities) की स्थापना।
* केंद्रीय आर्द्रभूमि समिति (Central Wetlands Committee) की भूमिका।
* निषिद्ध गतिविधियाँ (जैसे अतिक्रमण, औद्योगिक अपशिष्ट डालना)।
* आर्द्रभूमि के ‘उपयोग के क्षेत्र’ (Zone of Influence) का निर्धारण।
* एकीकृत प्रबंधन योजनाएँ (Integrated Management Plans) तैयार करना।
* ‘वेटलैंड हेल्थ कार्ड’ (Wetland Health Card) की अवधारणा।
4. **कार्यान्वयन में चुनौतियाँ:**
* **शहरीकरण और अतिक्रमण:** बढ़ती जनसंख्या और शहरी विस्तार के कारण आर्द्रभूमि पर दबाव।
* **डेटा की कमी:** आर्द्रभूमि की सटीक सीमांकन और उनके पारिस्थितिकीय स्थिति पर पर्याप्त वैज्ञानिक डेटा का अभाव।
* **समन्वय का अभाव:** विभिन्न सरकारी विभागों और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय की कमी।
* **जागरूकता की कमी:** स्थानीय समुदायों और हितधारकों के बीच संरक्षण के महत्व की कम समझ।
* **प्रवर्तन की समस्याएँ:** नियमों के उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई का अभाव।
* **पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) की चुनौतियाँ:** परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का उचित मूल्यांकन न होना।
5. **निष्कर्ष:** आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता, जिसमें वैज्ञानिक अध्ययन, सामुदायिक भागीदारी, मजबूत नियामक ढांचा और प्रभावी प्रवर्तन शामिल हो।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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