पश्चिम बंगाल का ‘एंटी-गुंडा’ बिल राष्ट्रपति की सहमति से बाहर, जानें पूरा मामला

‘Anti-Goonda’ Bill fails to get President’s nod over overlap with Central legislation — diagram

पश्चिम बंगाल का ‘एंटी-गुंडा’ बिल राष्ट्रपति की सहमति से बाहर, जानें पूरा मामला

Map of West Bengal highlighted on the map of India — Anti-Goonda Bill President's nod NDPS Act conflict
मानचित्र व माइंड-मैप: अध्यक्ष ने पश्चिम बंगाल के ‘गुंडा विरोधी विधेयक’ को क्यों लौटा दिया

✎ राष्ट्रपति की सहमति राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को अधिनियम बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया है, विशेषकर जब वे समवर्ती सूची के विषयों से संबंधित हों और केंद्रीय कानूनों के साथ विरोध की संभावना हो।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ; स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ
  • Prelims: अनुच्छेद 200, अनुच्छेद 201, अनुच्छेद 254, राष्ट्रपति की सहमति, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम, 1985, निवारक निरोध (Preventive Detention), PITNDPS अधिनियम, 1988, राज्य विधानमंडल
  • Essay: भारतीय संघवाद की चुनौतियाँ और संवैधानिक संतुलन, विधायी समवर्ती सूची: संघ और राज्यों के बीच सामंजस्य और टकराव

त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रपति की सहमति राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों को अधिनियम बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया है, विशेषकर जब वे समवर्ती सूची के विषयों से संबंधित हों और केंद्रीय कानूनों के साथ विरोध की संभावना हो।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार ने इस विधेयक के कुछ प्रावधानों को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम, 1985 और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस में अवैध व्यापार की रोकथाम (PITNDPS) अधिनियम, 1988 के साथ अतिव्यापी (overlap) बताया है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत ‘विरोध’ (repugnancy) का मुद्दा उठ सकता है।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय संविधान के तहत, राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कोई भी विधेयक राज्यपाल की सहमति के बिना अधिनियम नहीं बन सकता।
  • संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक पर सहमति देने, उसे रोकने या राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • जब राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करता है, तो अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति उस पर अपनी सहमति दे सकते हैं, उसे रोक सकते हैं या राज्यपाल को पुनर्विचार के लिए लौटाने का निर्देश दे सकते हैं।
  • यदि राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाते हैं, तो राज्य विधानमंडल को विधेयक पर पुनर्विचार करना होता है और यदि वह इसे संशोधन के साथ या बिना संशोधन के फिर से पारित करता है, तो उसे पुनः राष्ट्रपति के समक्ष उनकी सहमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है।
  • संविधान की सातवीं अनुसूची संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण करती है, जिसमें संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची शामिल हैं।
  • समवर्ती सूची (Concurrent List) में ऐसे विषय शामिल हैं जिन पर संघ और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर संघ और राज्य के कानूनों में टकराव होता है, तो अनुच्छेद 254 के तहत कुछ शर्तों के अधीन, केंद्रीय कानून प्रभावी होता है।

राष्ट्रपति की सहमति और अनुच्छेद 254

  • अनुच्छेद 201: यह अनुच्छेद राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित विधेयकों से संबंधित है। राष्ट्रपति ऐसे विधेयकों पर सहमति दे सकते हैं, अपनी सहमति रोक सकते हैं, या राज्यपाल को निर्देश दे सकते हैं कि वे विधेयक को राज्य विधानमंडल को पुनर्विचार के लिए लौटा दें।
  • पुनर्विचार के बाद: यदि राज्य विधानमंडल विधेयक को संशोधन के साथ या बिना संशोधन के फिर से पारित करता है, तो उसे पुनः राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। संविधान यह स्पष्ट नहीं करता कि इस स्थिति में राष्ट्रपति को सहमति देनी होगी या नहीं।
  • विरोध (Repugnancy): अनुच्छेद 254 समवर्ती सूची के विषयों पर संघ और राज्य के कानूनों के बीच विरोध की स्थिति से संबंधित है। यदि राज्य का कानून केंद्रीय कानून के प्रावधानों के विपरीत है, तो केंद्रीय कानून प्रभावी होगा।
  • राष्ट्रपति की सहमति का महत्व: यदि राज्य का कानून समवर्ती सूची के किसी विषय पर केंद्रीय कानून के विपरीत है, लेकिन उसे राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त हो गई है, तो वह राज्य में प्रभावी होगा। हालांकि, संसद अभी भी उस विषय पर एक कानून बना सकती है जो राज्य के कानून को संशोधित या निरस्त कर सकता है।
  • निवारक निरोध: ‘निवारक निरोध’ समवर्ती सूची का एक विषय है, जिसका अर्थ है कि संघ और राज्य दोनों इस पर कानून बना सकते हैं।
  • वर्तमान मामला: पश्चिम बंगाल विधेयक में ‘गुंडा’ की परिभाषा में NDPS अधिनियम, 1985 के तहत अपराधों को शामिल किया गया था, जिससे PITNDPS अधिनियम, 1988 के तहत निवारक निरोध के मौजूदा केंद्रीय ढाँचे के साथ अतिव्यापीकरण का मुद्दा उठा।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौटाना केंद्र और राज्य के कानूनों के बीच संभावित विरोधाभास (repugnancy) के संवैधानिक सिद्धांत को दर्शाता है।
नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम, 1985 यह मादक पदार्थों से संबंधित अपराधों के लिए एक विशिष्ट केंद्रीय कानून है, जिसके साथ राज्य के विधेयक का टकराव हुआ।
नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस में अवैध व्यापार की रोकथाम (PITNDPS) अधिनियम, 1988 यह मादक पदार्थों की तस्करी में लगे व्यक्तियों की निवारक निरोध (preventive detention) के लिए केंद्रीय ढाँचा प्रदान करता है।
विधेयक में ‘गुंडा’ की परिभाषा इसमें NDPS अधिनियम के तहत अपराधों में शामिल व्यक्तियों को शामिल किया गया था, जिससे केंद्रीय कानून के साथ अतिव्यापीकरण की आशंका हुई।
निवारक निरोध का प्रावधान राज्य विधेयक में निवारक निरोध का प्रावधान केंद्रीय PITNDPS अधिनियम के समानांतर एक तंत्र बना रहा था।

महत्व

संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध

  • यह घटना संघवाद (federalism) के सिद्धांत को रेखांकित करती है, जहाँ केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी शक्तियों का स्पष्ट विभाजन होता है।
  • यह दर्शाता है कि कैसे केंद्रीय कानूनों के साथ राज्य के कानूनों के टकराव से बचने के लिए संवैधानिक जाँच और संतुलन (checks and balances) आवश्यक हैं।

विधायी प्रक्रिया और संवैधानिक नैतिकता

  • राष्ट्रपति की भूमिका, अनुच्छेद 200 और 201 के तहत, राज्य विधेयकों की संवैधानिक वैधता और केंद्रीय कानूनों के साथ उनके सामंजस्य की जाँच करने में महत्वपूर्ण है।
  • यह राज्य सरकारों के लिए विधायी मसौदा तैयार करते समय केंद्रीय कानूनों के साथ संभावित विरोधाभास से बचने के महत्व पर प्रकाश डालता है।

कानून और व्यवस्था

  • राज्य सरकार का उद्देश्य असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगाना था, लेकिन इस प्रक्रिया में संवैधानिक प्रावधानों का पालन करना सर्वोपरि है।
  • निवारक निरोध जैसे संवेदनशील प्रावधानों के लिए एक सुसंगत और गैर-अतिव्यापी कानूनी ढाँचा सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है ताकि मनमानी से बचा जा सके।

चुनौतियाँ

1. विधायी विरोधाभास

  • राज्य के कानून और केंद्रीय कानून के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, विशेषकर समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषयों पर।

2. राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियाँ

  • राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाना राज्य की विधायी स्वायत्तता (legislative autonomy) को प्रभावित कर सकता है, हालांकि यह संवैधानिक जाँच का हिस्सा है।

3. निवारक निरोध का दुरुपयोग

  • यदि राज्य और केंद्र दोनों के पास निवारक निरोध के समानांतर कानून हों, तो इसके दुरुपयोग की संभावना बढ़ सकती है, जिससे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।

4. कानूनी स्पष्टता और एकरूपता

  • अतिव्यापी कानूनों से कानूनी अस्पष्टता पैदा होती है, जिससे कानून प्रवर्तन और न्यायिक प्रक्रिया में जटिलताएँ आ सकती हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
राज्य विधेयक का NDPS अधिनियम, 1985 के साथ अतिव्यापीकरण यह अनुच्छेद 254 के तहत विरोधाभास का मुद्दा उठाता है, जहाँ केंद्रीय कानून प्रभावी होता है।
निवारक निरोध के समानांतर तंत्र PITNDPS अधिनियम, 1988 पहले से ही मादक पदार्थों की तस्करी में निवारक निरोध के लिए एक विशिष्ट केंद्रीय ढाँचा प्रदान करता है।
कानूनी अस्पष्टता दो अलग-अलग कानूनों के तहत समान अपराधों के लिए निवारक निरोध से भ्रम और कानूनी जटिलताएँ पैदा हो सकती हैं।
राष्ट्रपति की स्वीकृति राज्य के विधेयक को कानून बनने के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक है, जो केंद्रीय कानूनों के साथ सामंजस्य पर निर्भर करती है।

आगे की राह

  • राज्य सरकार को केंद्रीय सरकार द्वारा उठाई गई आपत्तियों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करना चाहिए।
  • विधेयक में आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए ताकि केंद्रीय कानूनों, विशेषकर NDPS अधिनियम और PITNDPS अधिनियम, के साथ अतिव्यापीकरण या विरोधाभास से बचा जा सके।
  • ‘गुंडा’ की परिभाषा से NDPS अधिनियम के तहत अपराधों से संबंधित प्रावधानों को हटाना एक संभावित समाधान हो सकता है।
  • विधायी मसौदा तैयार करते समय केंद्र-राज्य संबंधों और समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्रीय कानूनों की प्रधानता का ध्यान रखना चाहिए।
  • राज्य विधानसभा में संशोधित विधेयक को फिर से प्रस्तुत कर पारित कराना चाहिए।
  • संशोधित विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए पुनः भेजा जाना चाहिए।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी समन्वय और परामर्श को बढ़ावा देना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसे टकरावों से बचा जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राष्ट्रपति की सहमति · राज्य विधानमंडल · केंद्रीय कानून · समवर्ती सूची · अनुच्छेद 254 · नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 · निवारक निरोध · संघवाद · विधायी टकराव · राज्य सूची

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 254’, ‘note’: ‘केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच विरोधाभास’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 200’, ‘note’: ‘राज्य विधेयकों पर राज्यपाल की स्वीकृति’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 201’, ‘note’: ‘राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित विधेयक’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘विधायी शक्तियों का विभाजन (संघ, राज्य, समवर्ती सूची)’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 22’, ‘note’: ‘निवारक निरोध से संबंधित प्रावधान’}

अवधारणा प्रवाह

राज्य सरकार द्वारा ‘असामाजिक गतिविधियों’ पर अंकुश लगाने हेतु विधेयक प्रस्तुत  →  विधेयक में ‘गुंडा’ की परिभाषा में NDPS अधिनियम के तहत अपराध शामिल  →  राज्यपाल द्वारा विधेयक राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित  →  केंद्र सरकार द्वारा NDPS और PITNDPS अधिनियमों के साथ अतिव्यापीकरण पर आपत्ति  →  राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को पुनर्विचार हेतु राज्य विधानसभा को लौटाया जाना  →  राज्य सरकार द्वारा विधेयक में संशोधन की आवश्यकता

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत, राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक को राज्यपाल राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित कर सकता है।
2. राष्ट्रपति के पास राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेजने की शक्ति है, भले ही वह केंद्रीय कानून से टकराता न हो।
3. नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट, 1985, भारत की संसद द्वारा अधिनियमित एक केंद्रीय कानून है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 200 राज्यपाल को कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करने की अनुमति देता है, खासकर यदि वे उच्च न्यायालय की शक्तियों को कम करते हैं या संविधान के प्रावधानों के खिलाफ हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि राष्ट्रपति आमतौर पर विधेयक को पुनर्विचार के लिए तभी वापस भेजते हैं जब उसमें संवैधानिक विसंगति या केंद्रीय कानून के साथ टकराव हो। कथन 3 सही है क्योंकि NDPS एक्ट, 1985, मादक पदार्थों और मनःप्रभावी पदार्थों से संबंधित अपराधों को नियंत्रित करने वाला एक केंद्रीय कानून है।

Q2. अभिकथन (A): यदि राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कोई कानून समवर्ती सूची के विषय पर केंद्रीय कानून के साथ टकराव में आता है, तो केंद्रीय कानून प्रभावी होगा।
कारण (R): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 254 इस सिद्धांत को स्थापित करता है कि समवर्ती सूची के मामलों में केंद्रीय कानून राज्य कानून पर हावी होगा, बशर्ते राज्य कानून को राष्ट्रपति की सहमति न मिली हो।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. A और R दोनों सत्य हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है। अनुच्छेद 254 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करता है कि यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद द्वारा बनाए गए कानून और राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानून के बीच कोई असंगति या टकराव होता है, तो संसद द्वारा बनाया गया कानून प्रभावी होगा। हालांकि, यदि राज्य कानून को राष्ट्रपति की सहमति मिल जाती है, तो वह राज्य में प्रभावी हो सकता है, भले ही वह केंद्रीय कानून के प्रावधानों के विपरीत हो।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारतीय संविधान के तहत राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर राष्ट्रपति की सहमति के महत्व और प्रक्रिया का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही, उन संवैधानिक प्रावधानों पर भी चर्चा कीजिए जो केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच संभावित टकराव को संबोधित करते हैं। (15 अंक)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: राष्ट्रपति की सहमति की संवैधानिक आवश्यकता का संक्षिप्त परिचय, विशेष रूप से अनुच्छेद 200 और 201 के संदर्भ में।
2. राष्ट्रपति की सहमति का महत्व:
क. संवैधानिक वैधता सुनिश्चित करना।
ख. केंद्रीय कानूनों के साथ टकराव से बचना।
ग. संघवाद और केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बनाए रखना।
घ. राज्य के कानूनों की व्यापक स्वीकार्यता और प्रवर्तन क्षमता बढ़ाना।
3. सहमति की प्रक्रिया:
क. राज्यपाल द्वारा विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करना (अनुच्छेद 200)।
ख. राष्ट्रपति के विकल्प: सहमति देना, सहमति रोकना, या पुनर्विचार के लिए वापस भेजना (अनुच्छेद 201)।
ग. पुनर्विचार के बाद विधेयक पर राष्ट्रपति की शक्ति।
4. केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच टकराव को संबोधित करने वाले संवैधानिक प्रावधान:
क. अनुच्छेद 246: संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के तहत विधायी शक्तियों का वितरण।
ख. अनुच्छेद 254: समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्रीय और राज्य कानूनों के बीच टकराव की स्थिति।
i. सामान्य नियम: केंद्रीय कानून की प्रधानता।
ii. अपवाद: यदि राज्य कानून को राष्ट्रपति की सहमति मिल जाती है, तो वह राज्य में प्रभावी हो सकता है, भले ही वह केंद्रीय कानून के विपरीत हो।
ग. हालिया उदाहरणों या न्यायिक निर्णयों का उल्लेख (जैसे ‘एंटी-गुंडा’ विधेयक का मामला)।
5. आलोचनात्मक विश्लेषण:
क. राष्ट्रपति की सहमति की शक्ति का संभावित दुरुपयोग या देरी।
ख. केंद्र सरकार द्वारा राज्य के विधायी मामलों में हस्तक्षेप की आशंका।
ग. संघवाद पर प्रभाव।
6. निष्कर्ष: केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बनाए रखने और संवैधानिक सर्वोच्चता सुनिश्चित करने में राष्ट्रपति की सहमति की भूमिका का सारांश।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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