11 Aug पहली बार राज्य वन बोर्ड में शामिल हुए दो आदिवासी प्रतिनिधि: जानिए पूरा मामला
✎ राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों का समावेशन वन प्रबंधन में पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने और समावेशी संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन, संविधान और राजव्यवस्था, कमजोर वर्गों का कल्याण | GS Paper III — पर्यावरण, जैव विविधता और आपदा प्रबंधन
- Prelims: राज्य वन्यजीव बोर्ड, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, जनजातीय पारंपरिक ज्ञान, मानव-वन्यजीव संघर्ष, पारिस्थितिकी पर्यटन (Ecotourism), वन अधिकार अधिनियम, 2006
- Essay: विकास और संरक्षण के बीच संतुलन: जनजातीय समुदायों की भूमिका, समावेशी शासन और सहभागी वन प्रबंधन
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों का समावेशन वन प्रबंधन में पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने और समावेशी संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, एक राज्य के वन्यजीव बोर्ड में पहली बार दो जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है। यह निर्णय जनजातीय भागीदारी सुनिश्चित करने और वन प्रबंधन में उनके पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने के उद्देश्य से लिया गया है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाले इस बोर्ड में मनन समुदाय के राजा रमन राजा मनन और चोलनाइकन समुदाय के शोधकर्ता विनोद को सदस्य बनाया गया है।
पृष्ठभूमि
- भारत में वन और वन्यजीव संरक्षण एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें स्थानीय समुदायों, विशेषकर जनजातीय लोगों की भूमिका को अक्सर नजरअंदाज किया जाता रहा है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) राज्य वन्यजीव बोर्डों के गठन का प्रावधान करता है, जो वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण से संबंधित मामलों पर राज्य सरकार को सलाह देते हैं।
- जनजातीय समुदाय सदियों से वनों के साथ सहजीवी संबंध साझा करते रहे हैं और उनके पास वन पारिस्थितिकी तंत्र तथा वन्यजीवों के बारे में गहन पारंपरिक ज्ञान होता है।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) भारत में एक बढ़ती हुई समस्या है, जिसके समाधान में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और उनके ज्ञान का उपयोग महत्वपूर्ण हो सकता है।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) ने जनजातीय समुदायों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन भूमि पर अधिकारों को मान्यता दी है, जिससे उन्हें वन प्रबंधन में अधिक भूमिका निभाने का अवसर मिला है।
- पारिस्थितिकी पर्यटन (Ecotourism) एक ऐसा मॉडल है जो संरक्षण और स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के अवसरों को जोड़ता है, जिससे जनजातीय समुदायों को आर्थिक लाभ मिल सकता है।
राज्य वन्यजीव बोर्ड और जनजातीय समावेशन
- राज्य वन्यजीव बोर्ड (State Wildlife Board) का गठन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की धारा 6 के तहत किया जाता है।
- इस बोर्ड की अध्यक्षता राज्य के मुख्यमंत्री करते हैं और इसमें वन मंत्री, विधानमंडल के सदस्य, सरकारी अधिकारी तथा वन्यजीव विशेषज्ञों सहित अन्य सदस्य शामिल होते हैं।
- बोर्ड का मुख्य कार्य वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण से संबंधित सभी मामलों पर राज्य सरकार को सलाह देना है, जिसमें वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना व प्रबंधन शामिल है।
- जनजातीय प्रतिनिधियों को बोर्ड में शामिल करने का उद्देश्य वन प्रबंधन और संरक्षण रणनीतियों में उनके पारंपरिक ज्ञान, प्रथाओं और अनुभवों को एकीकृत करना है।
- यह कदम जनजातीय समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करके समावेशी शासन (Inclusive Governance) और सहभागी वन प्रबंधन (Participatory Forest Management) को बढ़ावा देता है।
- जनजातीय ज्ञान का उपयोग मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने, वन संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देने और जैव विविधता के संरक्षण में सहायक हो सकता है।
- यह पहल जनजातीय समुदायों के अधिकारों और उनकी पहचान को मान्यता देने के साथ-साथ उन्हें मुख्यधारा के संरक्षण प्रयासों का अभिन्न अंग बनाती है।
- पारिस्थितिकी पर्यटन परियोजनाओं में जनजातीय भागीदारी से उन्हें आय के अवसर मिल सकते हैं और उनके पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण तथा संरक्षण भी सुनिश्चित हो सकता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्य वन्यजीव बोर्ड (State Wildlife Board) में जनजातीय प्रतिनिधियों का समावेश | वन प्रबंधन और संरक्षण में जनजातीय समुदायों की पारंपरिक बुद्धिमत्ता और भागीदारी सुनिश्चित करना। |
| दो जनजातीय प्रतिनिधियों की नियुक्ति | यह सुनिश्चित करना कि जनजातीय समुदायों की आवाज़ और अनुभव नीति निर्माण और कार्यान्वयन में शामिल हों। |
| मानव-पशु संघर्ष (Human-Animal Conflict) के समाधान में पारंपरिक ज्ञान का उपयोग | स्थानीय और प्रभावी समाधानों के लिए जनजातीय समुदायों के सदियों पुराने ज्ञान का लाभ उठाना। |
| जनजातीय समुदायों के लिए आय सृजन पर केंद्रित ₹50 करोड़ का इकोटूरिज्म प्रस्ताव | वन संरक्षण को स्थानीय समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ना। |
| जनजातीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर | जनजातीय बस्तियों में आजीविका के अवसर प्रदान कर उनके जीवन स्तर में सुधार करना। |
| जनजातीय बस्तियों में बुनियादी ढांचे का विकास (पेयजल, सड़क, स्ट्रीटलाइट) | जनजातीय क्षेत्रों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार और समावेशी विकास को बढ़ावा देना। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- जनजातीय समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करके उनके सशक्तिकरण को बढ़ावा देना।
- वन संरक्षण में जनजातीय समुदायों की पारंपरिक भूमिका को मान्यता देना और उसे संस्थागत बनाना।
- जनजातीय संस्कृति और ज्ञान के संरक्षण में मदद करना, जो लुप्त होने के कगार पर है।
पर्यावरण और वन प्रबंधन महत्व
- वन्यजीव संरक्षण और मानव-पशु संघर्ष न्यूनीकरण के लिए अधिक प्रभावी और टिकाऊ रणनीतियाँ विकसित करना।
- स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र की गहरी समझ के आधार पर वन प्रबंधन प्रथाओं में सुधार करना।
- वन्यजीव बोर्ड के निर्णयों में स्थानीय समुदायों की स्वीकार्यता और सहयोग बढ़ाना।
शासन और नीति निर्माण महत्व
- समावेशी शासन (Inclusive Governance) के सिद्धांतों को मजबूत करना, जहाँ हाशिए पर पड़े समुदायों की आवाज़ सुनी जाती है।
- नीति निर्माण में जमीनी स्तर की वास्तविकताओं और पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने के लिए एक मॉडल स्थापित करना।
- राज्य और केंद्र सरकार के बीच समन्वय को बढ़ावा देना, विशेषकर इकोटूरिज्म जैसे संयुक्त प्रस्तावों में।
चुनौतियाँ
1. पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण और एकीकरण
- जनजातीय समुदायों के मौखिक रूप से हस्तांतरित ज्ञान को प्रभावी ढंग से दस्तावेजीकृत करना और उसे आधुनिक वन प्रबंधन प्रथाओं में एकीकृत करना एक चुनौती है।
- यह सुनिश्चित करना कि दस्तावेजीकरण प्रक्रिया में जनजातीय समुदायों की सहमति और स्वामित्व हो।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण; जनजातीय कल्याण
2. मानव-पशु संघर्ष का प्रबंधन
- बढ़ते मानव-पशु संघर्षों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का संतुलन बनाना।
- संघर्षों को कम करने के लिए भूमि उपयोग नियोजन और सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों को लागू करना।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी; आपदा प्रबंधन
3. इकोटूरिज्म का सतत विकास
- इकोटूरिज्म परियोजनाओं को इस तरह से विकसित करना कि वे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव न डालें और वास्तव में स्थानीय जनजातीय समुदायों को लाभान्वित करें।
- पर्यटन से होने वाली आय का उचित वितरण सुनिश्चित करना और जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक अखंडता बनाए रखना।
यूपीएससी लिंक: आर्थिक विकास; पर्यावरण पर्यटन
4. बुनियादी ढांचे का विकास और सेवा वितरण
- दूरस्थ जनजातीय बस्तियों में पेयजल, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने में भौगोलिक और वित्तीय बाधाएं।
- यह सुनिश्चित करना कि विकास परियोजनाएं जनजातीय समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं और जीवन शैली के अनुकूल हों।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय; जनजातीय विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जनजातीय ज्ञान का क्षरण | आधुनिकीकरण और बाहरी प्रभावों के कारण पारंपरिक ज्ञान और प्रथाओं के लुप्त होने का जोखिम। |
| प्रतिनिधित्व की सीमाएं | केवल दो प्रतिनिधियों का समावेश सभी जनजातीय समुदायों की विविध आवाजों और चिंताओं को पूरी तरह से प्रतिबिंबित नहीं कर सकता है। |
| परियोजना कार्यान्वयन में देरी | बड़ी परियोजनाओं (जैसे इकोटूरिज्म) के लिए केंद्रीय अनुमोदन और धन प्राप्त करने में संभावित नौकरशाही बाधाएं। |
| स्थानीय समुदायों का सशक्तिकरण | यह सुनिश्चित करना कि बोर्ड में प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक न हो, बल्कि वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति और प्रभाव के साथ हो। |
| संसाधन आवंटन | जनजातीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास और रोजगार सृजन के लिए पर्याप्त वित्तीय और मानव संसाधनों का आवंटन। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- ऊरुनार्वु (Oorunarvu) – वन विभाग की पहल
आगे की राह
- जनजातीय प्रतिनिधियों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल करने के लिए तंत्र स्थापित करना और उनके सुझावों को गंभीरता से लेना।
- जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण करना और इसे वैज्ञानिक वन प्रबंधन योजनाओं में एकीकृत करना।
- इकोटूरिज्म परियोजनाओं को इस तरह से डिजाइन और कार्यान्वित करना कि वे स्थानीय जनजातीय समुदायों के लिए अधिकतम आर्थिक लाभ सुनिश्चित करें और उनकी सांस्कृतिक अखंडता का सम्मान करें।
- मानव-पशु संघर्षों को कम करने के लिए जनजातीय ज्ञान और आधुनिक तकनीकों का एक साथ उपयोग करते हुए व्यापक कार्य योजनाएं विकसित करना।
- जनजातीय बस्तियों में पेयजल, सड़क संपर्क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता के आधार पर विकसित करना।
- जनजातीय युवाओं के लिए कौशल विकास और रोजगार सृजन कार्यक्रमों को बढ़ावा देना, विशेष रूप से वन आधारित उद्योगों और इकोटूरिज्म में।
- राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधित्व की समीक्षा करना और आवश्यकतानुसार इसे बढ़ाने पर विचार करना ताकि विविधतापूर्ण जनजातीय समुदायों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राज्य वन्यजीव बोर्ड · जनजातीय प्रतिनिधित्व · वन प्रबंधन · पारंपरिक ज्ञान · मानव-वन्यजीव संघर्ष · पर्यावरण पर्यटन · वन अधिकार अधिनियम 2006 · पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम 1996 · जैव विविधता संरक्षण · समावेशी शासन · सतत विकास · जनजातीय कल्याण
अवधारणा प्रवाह
जनजातीय प्रतिनिधियों का राज्य वन्यजीव बोर्ड में समावेश → वन प्रबंधन में पारंपरिक ज्ञान का एकीकरण → मानव-पशु संघर्षों का प्रभावी समाधान → इकोटूरिज्म और रोजगार के माध्यम से जनजातीय आय में वृद्धि → जनजातीय समुदायों का सशक्तिकरण और समावेशी विकास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. राज्य वन्यजीव बोर्ड का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है।
2. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत राज्य वन्यजीव बोर्ड का गठन किया जाता है।
3. राज्य वन्यजीव बोर्ड में जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल करने का उद्देश्य वन प्रबंधन में उनके पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करना है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। राज्य वन्यजीव बोर्ड का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है। कथन 2 सही है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 6 के तहत राज्य वन्यजीव बोर्ड का गठन किया जाता है। कथन 3 सही है। जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल करने का मुख्य उद्देश्य वन प्रबंधन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना और उनके पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करना है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा अधिनियम जनजातीय समुदायों को वन संसाधनों पर उनके पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देता है और उन्हें वन प्रबंधन में भूमिका प्रदान करता है?
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
- अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006
- जैव विविधता अधिनियम, 2002
उत्तर: अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 — अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) जनजातीय समुदायों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वन भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें सामुदायिक वन अधिकार और वन प्रबंधन में उनकी भूमिका शामिल है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ वन्यजीव संरक्षण और प्रबंधन में जनजातीय समुदायों की भागीदारी के महत्व पर चर्चा करें। इस संदर्भ में, राज्य वन्यजीव बोर्डों में उनके प्रतिनिधित्व को शामिल करने के निहितार्थों का भी विश्लेषण करें। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: वन्यजीव संरक्षण में जनजातीय समुदायों की ऐतिहासिक भूमिका और उनके पारंपरिक ज्ञान का संक्षिप्त उल्लेख।
2. जनजातीय भागीदारी का महत्व:
– पारंपरिक ज्ञान का उपयोग: स्थानीय पारिस्थितिकी, प्रजातियों और वन संसाधनों के बारे में गहन समझ।
– मानव-वन्यजीव संघर्ष का समाधान: स्थानीय समाधान और सह-अस्तित्व की रणनीतियाँ।
– सतत वन प्रबंधन: संसाधनों का स्थायी उपयोग और संरक्षण।
– अधिकार-आधारित दृष्टिकोण: वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) और PESA अधिनियम, 1996 (PESA Act, 1996) के तहत अधिकारों की मान्यता।
– समावेशी विकास: जनजातीय समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना।
3. राज्य वन्यजीव बोर्डों में प्रतिनिधित्व के निहितार्थ:
– नीति निर्माण में प्रत्यक्ष भागीदारी: जनजातीय दृष्टिकोणों का समावेश।
– बेहतर निर्णय लेना: स्थानीय वास्तविकताओं और जरूरतों को ध्यान में रखना।
– विश्वास निर्माण: सरकार और जनजातीय समुदायों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना।
– संघर्षों में कमी: नीतियों को अधिक स्वीकार्य बनाना।
– जैव विविधता संरक्षण में वृद्धि: पारंपरिक प्रथाओं का लाभ उठाना।
4. चुनौतियाँ और आगे की राह: प्रतिनिधित्व के बावजूद आने वाली संभावित चुनौतियाँ (जैसे क्षमता निर्माण, प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना) और उन्हें दूर करने के उपाय।
5. निष्कर्ष: वन्यजीव संरक्षण के लिए जनजातीय भागीदारी के महत्व को दोहराना और समावेशी, सहभागी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देना।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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