पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भारत ने ऊर्जा सहयोग पर दिया बल, जानें प्रमुख बिंदु

पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भारत ने ऊर्जा सहयोग पर दिया बल, जानें प्रमुख बिंदु

पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भारत ने ऊर्जा सहयोग पर दिया बल, जानें प्रमुख बिंदु

✎ पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भारत का जोर क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने पर है, जो उसकी एक्ट ईस्ट नीति और सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना (ऊर्जा)
  • Prelims: पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS), आसियान (ASEAN), एक्ट ईस्ट नीति, ऊर्जा सुरक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), प्रधानमंत्री सूर्यघर परियोजना, राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDC)
  • Essay: ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास में क्षेत्रीय सहयोग की भूमिका, भारत की एक्ट ईस्ट नीति और उसके आर्थिक निहितार्थ

त्वरित पुनरावृत्ति: पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भारत का जोर क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने पर है, जो उसकी एक्ट ईस्ट नीति और सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत ने फिलीपींस के मनीला में आयोजित 20वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) में ऊर्जा मंत्रियों की बैठक में क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा पर बल दिया है। केंद्रीय विद्युत और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्री श्रीपद येसो नाइक ने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए एक सुरक्षित, सशक्त, किफायती और स्थायी ऊर्जा भविष्य के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने आसियान के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी और ऊर्जा सहयोग के लिए आसियान कार्य योजना 2026-2030 का स्वागत किया।

पृष्ठभूमि

  • पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) एशिया-प्रशांत क्षेत्र के नेताओं के लिए एक प्रमुख मंच है, जो क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और समृद्धि से संबंधित व्यापक रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा करता है।
  • भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ आसियान देशों के साथ आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देने और रणनीतिक संबंधों को विकसित करने पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य भारत को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करना है।
  • ऊर्जा सुरक्षा किसी देश की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक ऊर्जा संसाधनों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने को संदर्भित करती है।
  • भारत ने अपनी स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिसमें गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से 55 प्रतिशत क्षमता (308 गीगावाट) शामिल है, जो 30 सितंबर, 2026 तक कुल 558.8 गीगावाट है।
  • भारत ने जून 2025 तक अपने राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्य से पांच साल पहले ही गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से संचयी स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता का 50 प्रतिशत प्राप्त कर लिया था।
  • भारत और सिंगापुर के बीच प्रस्तावित 2,000 मेगावाट सीमा पार विद्युत अंतर्संबंध के विकल्प विचाराधीन हैं, जिसमें भारत के इम्फाल को म्यांमार, थाईलैंड और मलेशिया होते हुए सिंगापुर से जोड़ने वाला लगभग 3,000 किलोमीटर लंबा भूमि आधारित पारेषण गलियारा शामिल है।

पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) क्या है?

  • पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) एक क्षेत्रीय मंच है जिसमें 18 सदस्य देश शामिल हैं: आसियान के दस सदस्य देश (ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम) और आठ संवाद भागीदार (ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड, कोरिया गणराज्य, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका)।
  • यह मंच 2005 में स्थापित किया गया था और यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर नेताओं के नेतृत्व वाले संवाद और सहयोग के लिए एक प्रमुख मंच के रूप में कार्य करता है।
  • EAS का उद्देश्य क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देना है।
  • यह ऊर्जा, वित्त, शिक्षा, आपदा प्रबंधन, कनेक्टिविटी और समुद्री सहयोग जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग पर केंद्रित है।
  • भारत EAS का एक संस्थापक सदस्य है और यह मंच भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के लिए महत्वपूर्ण है, जो इसे पूर्वी एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है।
  • EAS बैठकें आमतौर पर आसियान शिखर सम्मेलन के साथ आयोजित की जाती हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) के सदस्य देशों के बीच ऊर्जा संसाधनों के साझाकरण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और नीति समन्वय को बढ़ावा देना।
ऊर्जा सुरक्षा क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता, विश्वसनीयता और सामर्थ्य सुनिश्चित करना, जिससे आर्थिक विकास और भू-राजनीतिक स्थिरता को समर्थन मिले।
आसियान पावर ग्रिड पहल आसियान देशों और भारत के बीच ग्रिड कनेक्टिविटी, क्षेत्रीय विद्युत पारेषण और बहुपक्षीय विद्युत व्यापार को बढ़ावा देना।
गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता में वृद्धि भारत की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता का 55% गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करना, जो जलवायु परिवर्तन शमन प्रयासों के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाता है।
भारत-सिंगापुर सीमा पार विद्युत अंतर्संबंध भारत के इम्फाल को म्यांमार, थाईलैंड और मलेशिया होते हुए सिंगापुर से जोड़ने वाला 3,000 किलोमीटर लंबा भूमि आधारित पारेषण गलियारा, जो क्षेत्रीय ऊर्जा एकीकरण को मजबूत करेगा।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग से ऊर्जा लागत कम हो सकती है और व्यापार के नए अवसर खुल सकते हैं।
  • स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के साझाकरण से आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा मिलेगा और नए उद्योग विकसित होंगे।
  • ग्रिड कनेक्टिविटी और बहुपक्षीय विद्युत व्यापार से ऊर्जा बाजारों का विस्तार होगा, जिससे दक्षता बढ़ेगी।

सामरिक महत्व

  • ऊर्जा सुरक्षा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे देशों के बीच निर्भरता और सहयोग बढ़ता है।
  • भारत की एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy) के तहत आसियान (ASEAN) देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना।
  • क्षेत्रीय अंतर्संबंधों से भू-राजनीतिक प्रभाव बढ़ता है और भारत की ऊर्जा कूटनीति को बल मिलता है।

पर्यावरणीय महत्व

  • गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों पर जोर देने से कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी।
  • हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) और अन्य स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों पर सहयोग से सतत विकास (Sustainable Development) लक्ष्यों की प्राप्ति होगी।
  • नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के व्यापक उपयोग से पर्यावरणीय प्रदूषण कम होगा।

तकनीकी महत्व

  • ऊर्जा भंडारण, ग्रिड एकीकरण और पारेषण नियोजन में भारत के अनुभव को साझा करने से क्षेत्रीय तकनीकी क्षमता बढ़ेगी।
  • संस्थागत संबंधों को मजबूत करने से अनुसंधान और विकास (R&D) में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।
  • उभरती ऊर्जा प्रौद्योगिकियों पर ज्ञान के आदान-प्रदान से नवाचार को प्रोत्साहन मिलेगा।

चुनौतियाँ

1. बुनियादी ढाँचे का विकास

  • क्षेत्रीय ग्रिड कनेक्टिविटी और सीमा पार पारेषण गलियारों के निर्माण के लिए भारी निवेश और तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता है।
  • विभिन्न देशों के बीच तकनीकी मानकों और नियामक ढाँचों का सामंजस्य स्थापित करना एक चुनौती है।

2. वित्तीय बाधाएँ

  • नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं और बड़े पैमाने पर ऊर्जा अंतर्संबंधों के लिए पर्याप्त वित्तपोषण जुटाना एक बड़ी चुनौती है।
  • परियोजनाओं की उच्च प्रारंभिक लागत और लंबी भुगतान अवधि निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकती है।

3. भू-राजनीतिक जोखिम

  • क्षेत्र में विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक अस्थिरता या तनाव ऊर्जा सहयोग परियोजनाओं को बाधित कर सकता है।
  • सीमा पार ऊर्जा व्यापार में सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और विवादों का समाधान करना महत्वपूर्ण है।

4. नियामक और नीतिगत चुनौतियाँ

  • विभिन्न देशों की ऊर्जा नीतियों, शुल्कों और सब्सिडी व्यवस्थाओं में भिन्नता क्षेत्रीय एकीकरण को जटिल बना सकती है।
  • ऊर्जा व्यापार समझौतों और कानूनी ढाँचों को विकसित करने में समय और प्रयास लगता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
अंतर-सरकारी समन्वय विभिन्न देशों की सरकारों के बीच नीतियों, विनियमों और निवेश प्राथमिकताओं का समन्वय करना जटिल है।
तकनीकी एकीकरण विभिन्न देशों के विद्युत ग्रिडों और ऊर्जा प्रणालियों को तकनीकी रूप से एकीकृत करने में चुनौतियाँ आती हैं, जैसे आवृत्ति और वोल्टेज का मानकीकरण।
वित्तपोषण की कमी बड़े पैमाने पर ऊर्जा परियोजनाओं, विशेषकर नवीकरणीय ऊर्जा और ग्रिड अंतर्संबंधों के लिए पर्याप्त और सतत वित्तपोषण सुनिश्चित करना।
साइबर सुरक्षा ऊर्जा बुनियादी ढाँचे और ग्रिड कनेक्टिविटी पर साइबर हमलों का खतरा, जिससे ऊर्जा आपूर्ति बाधित हो सकती है।
बाजार एकीकरण क्षेत्रीय ऊर्जा बाजारों को एकीकृत करने और बहुपक्षीय विद्युत व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उचित बाजार तंत्र और मूल्य निर्धारण व्यवस्था का अभाव।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रधानमंत्री सूर्यघर परियोजना

आगे की राह

  • क्षेत्रीय ऊर्जा ग्रिडों के विकास और अंतर्संबंधों को मजबूत करने के लिए बहुपक्षीय निवेश को प्रोत्साहित करना।
  • स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों, जैसे हरित हाइड्रोजन और बैटरी ऊर्जा भंडारण, में अनुसंधान और विकास के लिए संयुक्त पहल शुरू करना।
  • ऊर्जा व्यापार को सुगम बनाने के लिए एक मानकीकृत नियामक और कानूनी ढाँचा विकसित करना।
  • ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और आपातकालीन तैयारी पर सहयोग बढ़ाना।
  • मानव संसाधन विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों और क्षमता निर्माण पहलों को बढ़ावा देना, विशेषकर ग्रिड कनेक्टिविटी में।
  • कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों पर ज्ञान साझा करना।
  • ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) और संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय जागरूकता अभियान चलाना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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अवधारणा प्रवाह

क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग पर बल  →  आसियान कार्य योजना 2026-2030 का स्वागत  →  आसियान पावर ग्रिड और क्षेत्रीय विद्युत पारेषण पर सहयोग  →  भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता में वृद्धि  →  भारत-सिंगापुर सीमा पार विद्युत अंतर्संबंध की संभावना  →  नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में अनुभव साझा करना  →  क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा और सतत ऊर्जा भविष्य की दिशा में प्रगति

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) में केवल आसियान सदस्य देश ही शामिल होते हैं।
2. भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
3. प्रधानमंत्री सूर्यघर परियोजना का उद्देश्य रूफटॉप सौर पैनलों की स्थापना को बढ़ावा देना है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि EAS में आसियान के 10 सदस्य देशों के साथ-साथ 8 अन्य देश (ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड, कोरिया गणराज्य, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका) भी शामिल हैं। कथन 2 सही है क्योंकि भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ आसियान देशों के साथ ऊर्जा सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करने पर केंद्रित है। कथन 3 सही है क्योंकि प्रधानमंत्री सूर्यघर परियोजना का मुख्य लक्ष्य घरों में रूफटॉप सौर पैनलों की स्थापना को प्रोत्साहित करना है।

Q2. भारत ने हाल ही में अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। जून 2025 तक भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से संचयी स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता का 50 प्रतिशत प्राप्त कर लिया था, जो उसके 2030 के लक्ष्य से पाँच साल पहले है। इस संदर्भ में, भारत के ऊर्जा लक्ष्यों और रणनीतियों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. भारत का लक्ष्य 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करना है।
2. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन भारत के ऊर्जा संक्रमण का एक महत्वपूर्ण घटक है।
3. भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की सह-स्थापना की है।
सही विकल्प चुनें:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1 सही है। भारत ने COP26 में 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन (Net-Zero Emissions) का लक्ष्य घोषित किया है। कथन 2 सही है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) भारत के ऊर्जा संक्रमण और डीकार्बोनाइजेशन प्रयासों का एक प्रमुख स्तंभ है। कथन 3 सही है। भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance – ISA) की सह-स्थापना की है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) के संदर्भ में क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग और ऊर्जा सुरक्षा के महत्व पर चर्चा कीजिए। भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ इन उद्देश्यों को प्राप्त करने में किस प्रकार सहायक है? (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (EAS) और क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग के महत्व का संक्षिप्त परिचय।
मुख्य भाग:
1. क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग का महत्व: ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक संवृद्धि, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, ग्रिड कनेक्टिविटी, बहुपक्षीय विद्युत व्यापार जैसे बिंदुओं पर चर्चा।
2. ऊर्जा सुरक्षा का महत्व: आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता, मूल्य अस्थिरता से बचाव, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, आपातकालीन तैयारी।
3. भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ और इसकी भूमिका: आसियान के साथ व्यापक रणनीतिक साझेदारी, आसियान-भारत कार्य योजना (2026-2030), आसियान पावर ग्रिड पहल, 400 पेशेवरों के प्रशिक्षण की घोषणा।
4. भारत के योगदान और अनुभव: नवीकरणीय ऊर्जा में प्रगति (558.8 GW स्थापित क्षमता, 308 GW गैर-जीवाश्म), प्रधानमंत्री सूर्यघर परियोजना, हरित हाइड्रोजन, ऊर्जा भंडारण, CCUS और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग में सहयोग की इच्छा।
5. क्षेत्रीय अंतर्संबंधों के उदाहरण: भारत-सिंगापुर प्रस्तावित 2,000 मेगावाट सीमा पार विद्युत अंतर्संबंध (इम्फाल-म्यांमार-थाईलैंड-मलेशिया-सिंगापुर गलियारा)।
निष्कर्ष: क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग और सुरक्षा के लिए भारत की प्रतिबद्धता और भविष्य की संभावनाओं पर बल देते हुए निष्कर्ष। मानक संस्थानों (NTPC, PowerGrid, CEA, NIWE, NISE, NPTI) के माध्यम से संस्थागत संबंधों को मजबूत करने का उल्लेख।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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