बायोई3 नीति: जैव विनिर्माण से रोज़गार और नवाचार को बढ़ावा

बायोई3 नीति का योगदान — concept mind map

बायोई3 नीति: जैव विनिर्माण से रोज़गार और नवाचार को बढ़ावा

✎ बायोई3 नीति का उद्देश्य जैव-विनिर्माण केंद्रों और जैव फाउंड्री की स्थापना के माध्यम से भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना, नवाचार को बढ़ावा देना और रोज़गार सृजित करना है।

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BioE3 Policy Components

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण  |  GS Paper II — सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप
  • Prelims: बायोई3 नीति, जैव-विनिर्माण, जैव-फाउंड्री, जैव-अर्थव्यवस्था, जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT), मेक-इन-इंडिया
  • Essay: भारत में नवाचार-आधारित विकास और आत्मनिर्भरता, जैव प्रौद्योगिकी का आर्थिक संवृद्धि और रोज़गार सृजन में योगदान

त्वरित पुनरावृत्ति: बायोई3 नीति का उद्देश्य जैव-विनिर्माण केंद्रों और जैव फाउंड्री की स्थापना के माध्यम से भारत की जैव-अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना, नवाचार को बढ़ावा देना और रोज़गार सृजित करना है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में बताया कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) ने बायोई3 नीति के तहत जैव विनिर्माण केंद्रों और जैव फाउंड्री की स्थापना के लिए छह विषयगत क्षेत्रों की पहचान की है। इस नीति का उद्देश्य उच्च क्षमता वाले जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देना और वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करना है।

पृष्ठभूमि

  • भारत सरकार ने आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth), पर्यावरण संरक्षण और रोज़गार सृजन के लिए जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) को एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में मान्यता दी है।
  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) देश में जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने वाली प्रमुख नोडल एजेंसी है।
  • आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन-इंडिया जैसी पहलों के तहत स्वदेशी विनिर्माण क्षमताओं को सुदृढ़ करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
  • जैव-अर्थव्यवस्था (Bio-economy) में जैव-आधारित उत्पादों और प्रक्रियाओं का उपयोग शामिल है, जिसमें कृषि, स्वास्थ्य सेवा, ऊर्जा और पर्यावरण जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
  • स्टार्ट-अप (Start-up), सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) तथा निजी उद्योग की भागीदारी को बढ़ावा देना नवाचार और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
  • भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक अपनी जैव-अर्थव्यवस्था को 300 अरब डॉलर तक पहुंचाना है, जिसमें बायोई3 जैसी नीतियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

बायोई3 नीति क्या है?

  • बायोई3 नीति ‘उच्च क्षमता जैव विनिर्माण को बढ़ावा देने हेतु अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोज़गार के लिये जैव प्रौद्योगिकी’ का संक्षिप्त रूप है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य जैव-विनिर्माण केंद्रों (Biomanufacturing Hubs) और जैव फाउंड्री (Biofoundries) की स्थापना करके देश में उच्च क्षमता वाले जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देना है।
  • यह नीति जैव-आधारित प्रौद्योगिकियों के विस्तार और सत्यापन को सक्षम बनाने के लिए विभिन्न स्टार्टअप, नवाचारों और उद्योगों को सहायता प्रदान करती है।
  • नीति के तहत छह विषयगत क्षेत्रों की पहचान की गई है: जैव-आधारित रसायन, बायोप्लास्टिक्स, सक्रिय फार्मास्युटिकल तत्व और एंजाइम; कार्यात्मक खाद्य पदार्थ और स्मार्ट प्रोटीन; सटीक जैवचिकित्सा; जलवायु प्रतिरोधी कृषि; जैव ईंधन और कार्बन कैप्चर; तथा भविष्योन्मुखी समुद्री और अंतरिक्ष अनुसंधान।
  • बायो-एआई हब (Bio-AI Hub) की स्थापना के लिए पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई है: आयुर्वेद, कृषि नवाचार, जीनोम निदान, संश्लेषित जीव विज्ञान और बायोमोलेक्यूलर डिज़ाइन।
  • यह नीति परियोजना लागत की 70 प्रतिशत राशि तक वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जिसमें शेष 30 प्रतिशत निजी क्षेत्रों के योगदान से पूरा होने की उम्मीद है।
  • बायोई3 नीति का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में लगभग 1500 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार के अवसर सृजित करना है।
  • यह नीति नवाचार-आधारित विकास को बढ़ावा देते हुए स्वदेशी जैव-विनिर्माण क्षमताओं को सुदृढ़ करने और जैव प्रौद्योगिकी पारितंत्र (Ecosystem) का विस्तार करने में सहायक होगी।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
छह विषयगत क्षेत्र जैव-आधारित रसायन, बायोप्लास्टिक्स, सक्रिय फार्मास्युटिकल तत्व, कार्यात्मक खाद्य पदार्थ, स्मार्ट प्रोटीन, सटीक जैवचिकित्सा, जलवायु प्रतिरोधी कृषि, जैव ईंधन, कार्बन कैप्चर, समुद्री और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में उच्च क्षमता जैव विनिर्माण को बढ़ावा देना।
पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्र (बायो-एआई हब) आयुर्वेद, कृषि नवाचार, जीनोम निदान, संश्लेषित जीव विज्ञान और बायोमोलेक्यूलर डिज़ाइन में बायो-एआई हब की स्थापना के माध्यम से अनुसंधान और विकास को गति देना।
वित्तीय सहायता परियोजना लागत का 70% तक वित्तीय सहायता प्रदान करना, जिससे स्टार्टअप, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) और निजी उद्योगों की भागीदारी बढ़े।
रोजगार सृजन अगले पांच वर्षों में द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में लगभग 1500 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होने की संभावना।
जैव-अर्थव्यवस्था लक्ष्य वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान।
निजी क्षेत्र का निवेश अभी तक निजी क्षेत्र से 602.09 करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिबद्धता प्राप्त होना, जो नीति की सफलता का सूचक है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • स्वदेशी जैव-विनिर्माण (Bio-manufacturing) को बढ़ावा देकर आयात पर निर्भरता कम करना और ‘मेक इन इंडिया’ पहल को सुदृढ़ करना।
  • जैव-अर्थव्यवस्था (Bio-economy) के आकार को वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य, जिससे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि होगी।
  • स्टार्टअप, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) तथा निजी उद्योगों को वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन प्रदान कर आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा देना।

सामाजिक महत्व

  • द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में लगभग 1500 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित करना, जिससे क्षेत्रीय असमानता कम होगी।
  • सटीक जैवचिकित्सा (Precision Biomedicine) और कार्यात्मक खाद्य पदार्थों जैसे क्षेत्रों में प्रगति से सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार की संभावना।
  • जलवायु प्रतिरोधी कृषि (Climate Resilient Agriculture) को बढ़ावा देकर खाद्य सुरक्षा (Food Security) और ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करना।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी महत्व

  • जैव विनिर्माण केंद्रों, जैव फाउंड्री (Biofoundries) और बायो-एआई हब (Bio-AI Hubs) की स्थापना से अत्याधुनिक अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहन।
  • जैव-आधारित रसायन, बायोप्लास्टिक्स, जीन चिकित्सा (Gene Therapy) और कार्बन कैप्चर (Carbon Capture) जैसी भविष्योन्मुखी प्रौद्योगिकियों में नवाचार को बढ़ावा देना।
  • आयुर्वेद, कृषि नवाचार और जीनोम निदान जैसे क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) के अनुप्रयोगों का विस्तार करना।

पर्यावरणीय महत्व

  • जैव ईंधन (Biofuels) और कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देकर जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के प्रभावों को कम करने में योगदान।
  • बायोप्लास्टिक्स जैसे जैव-आधारित उत्पादों के विकास से प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution) को कम करने में सहायता।
  • जलवायु प्रतिरोधी कृषि को बढ़ावा देकर पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability) सुनिश्चित करना।

चुनौतियाँ

1. बुनियादी ढाँचा और निवेश

  • जैव विनिर्माण केंद्रों और जैव फाउंड्री की स्थापना के लिए पर्याप्त अत्याधुनिक बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) और उपकरणों की आवश्यकता।
  • निजी क्षेत्र से अपेक्षित 30% सह-वित्तपोषण (Co-financing) को आकर्षित करने में संभावित चुनौतियाँ, विशेषकर प्रारंभिक चरण के स्टार्टअप्स के लिए।

2. मानव संसाधन और कौशल

  • जैव प्रौद्योगिकी और जैव विनिर्माण क्षेत्रों में कुशल वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों की कमी।
  • बायो-एआई जैसे उभरते क्षेत्रों में विशेषज्ञता विकसित करने के लिए विशेष प्रशिक्षण और शिक्षा कार्यक्रमों की आवश्यकता।

3. नियामक और नैतिक मुद्दे

  • जैव-आधारित उत्पादों और प्रौद्योगिकियों, विशेषकर आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (Genetically Modified Organisms) से संबंधित कठोर नियामक ढाँचे (Regulatory Framework) और अनुमोदन प्रक्रियाएँ।
  • सटीक जैवचिकित्सा और संश्लेषित जीव विज्ञान (Synthetic Biology) जैसे क्षेत्रों में नैतिक चिंताओं (Ethical Concerns) का समाधान।

4. अनुसंधान एवं विकास का व्यावसायीकरण

  • प्रयोगशाला से बाजार तक नवाचारों को ले जाने में आने वाली चुनौतियाँ, जिसमें प्रोटोटाइप से बड़े पैमाने पर उत्पादन तक का संक्रमण शामिल है।
  • बौद्धिक संपदा अधिकारों (Intellectual Property Rights) का प्रभावी ढंग से प्रबंधन और उनका संरक्षण सुनिश्चित करना।

5. अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा

  • वैश्विक स्तर पर जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तीव्र प्रतिस्पर्धा का सामना करना, विशेषकर विकसित देशों से।
  • अंतर्राष्ट्रीय मानकों और गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) के अनुरूप उत्पादों का विकास सुनिश्चित करना।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
उच्च पूंजी निवेश जैव विनिर्माण सुविधाओं की स्थापना के लिए बड़ी मात्रा में पूंजी की आवश्यकता होती है, जो निजी निवेशकों के लिए एक बाधा हो सकती है।
दीर्घकालिक अनुसंधान चक्र जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और विकास में सफल उत्पादों को बाजार तक लाने में लंबा समय लगता है, जिससे निवेशकों का धैर्य प्रभावित हो सकता है।
तकनीकी जोखिम जैव-आधारित प्रौद्योगिकियों में उच्च तकनीकी जोखिम शामिल होते हैं, क्योंकि सफलता की दर अनिश्चित हो सकती है।
बाजार स्वीकृति नए जैव-आधारित उत्पादों को उपभोक्ता स्वीकृति प्राप्त करने में चुनौतियाँ आ सकती हैं, विशेषकर यदि वे पारंपरिक विकल्पों से भिन्न हों।
अपशिष्ट प्रबंधन जैव विनिर्माण प्रक्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट के प्रभावी और पर्यावरण-अनुकूल प्रबंधन की आवश्यकता।
डेटा सुरक्षा और गोपनीयता बायो-एआई हब और जीनोम निदान जैसे क्षेत्रों में संवेदनशील जैव-डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करना।

आगे की राह

  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और अन्य मंत्रालयों के बीच समन्वय को सुदृढ़ किया जाए ताकि नीति के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित किया जा सके।
  • जैव विनिर्माण और बायो-एआई जैसे क्षेत्रों में कुशल कार्यबल तैयार करने के लिए विशेष कौशल विकास कार्यक्रम और शैक्षणिक पाठ्यक्रम शुरू किए जाएँ।
  • निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करने के लिए कर प्रोत्साहन, सब्सिडी और आसान ऋण सुविधाओं जैसे वित्तीय प्रोत्साहनों को और बढ़ाया जाए।
  • जैव-आधारित उत्पादों और प्रौद्योगिकियों के लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध नियामक ढाँचा (Regulatory Framework) विकसित किया जाए।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और साझेदारी को बढ़ावा दिया जाए ताकि नवीनतम प्रौद्योगिकियों और सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान हो सके।
  • छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी नवाचार को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय जैव-इनक्यूबेटर (Bio-incubators) और अनुसंधान केंद्रों की स्थापना की जाए।
  • जैव-अर्थव्यवस्था के महत्व और लाभों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाई जाए ताकि समाज में इसकी स्वीकार्यता बढ़े।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

बायोई3 नीति · जैव-विनिर्माण · जैव-अर्थव्यवस्था · जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) · स्टार्ट-अप · सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) · रोजगार सृजन · आत्मनिर्भर भारत · अनुसंधान एवं विकास (R&D) · उच्च क्षमता जैव विनिर्माण

अवधारणा प्रवाह

बायोई3 नीति का अनावरण  →  जैव विनिर्माण केंद्रों और जैव फाउंड्री की स्थापना  →  अनुसंधान, विकास और नवाचार को प्रोत्साहन  →  स्वदेशी जैव-विनिर्माण और स्टार्टअप को बढ़ावा  →  रोजगार सृजन और आर्थिक संवृद्धि  →  300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था का लक्ष्य

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. बायोई3 नीति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. बायोई3 नीति का उद्देश्य वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करना है।
2. यह नीति जैव-विनिर्माण केंद्रों और जैव फाउंड्री की स्थापना के लिए परियोजना लागत का 70 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
3. बायोई3 नीति के तहत स्थापित होने वाले बायो-एआई हब के लिए पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई है, जिनमें आयुर्वेद और कृषि नवाचार शामिल हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि नीति का लक्ष्य 2030 तक 300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था प्राप्त करना है। कथन 2 सही है क्योंकि नीति परियोजना लागत का 70 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता प्रदान करती है। कथन 3 भी सही है क्योंकि आयुर्वेद और कृषि नवाचार बायो-एआई हब के लिए पहचाने गए पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में से हैं।

Q2. बायोई3 नीति के तहत जैव विनिर्माण केंद्रों और जैव फाउंड्री की स्थापना के लिए पहचाने गए छह विषयगत क्षेत्रों में निम्नलिखित में से कौन-सा शामिल नहीं है?

  1. जैव-आधारित रसायन और बायोप्लास्टिक्स
  2. सक्रिय फार्मास्युटिकल तत्व और एंजाइम
  3. पारंपरिक हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग
  4. जलवायु प्रतिरोधी कृषि (कृषि-जैविक)

उत्तर: पारंपरिक हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग — बायोई3 नीति के छह विषयगत क्षेत्रों में जैव-आधारित रसायन, बायोप्लास्टिक्स, सक्रिय फार्मास्युटिकल तत्व और एंजाइम, कार्यात्मक खाद्य पदार्थ और स्मार्ट प्रोटीन, सटीक जैवचिकित्सा, जलवायु प्रतिरोधी कृषि (कृषि-जैविक), जैव ईंधन और कार्बन कैप्चर, भविष्योन्मुखी समुद्री और अंतरिक्ष अनुसंधान शामिल हैं। पारंपरिक हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग इसमें शामिल नहीं हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ बायोई3 नीति भारत में जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और ‘मेक-इन-इंडिया’ पहल को सुदृढ़ करने में किस प्रकार महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है? इस नीति के प्रमुख उद्देश्यों और कार्यान्वयन तंत्रों की चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** बायोई3 नीति का संक्षिप्त परिचय और इसका मुख्य उद्देश्य (उच्च क्षमता जैव विनिर्माण को बढ़ावा देना, जैव-अर्थव्यवस्था को 300 अरब डॉलर तक ले जाना)।
2. **महत्वपूर्ण योगदान:**
* **स्वदेशी जैव-विनिर्माण को बढ़ावा:** स्टार्ट-अप, MSMEs और निजी उद्योग की भागीदारी से आत्मनिर्भरता।
* **रोजगार सृजन:** द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में 1500 प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर।
* **नवाचार-आधारित विकास:** अनुसंधान एवं विकास (R&D) और प्रौद्योगिकी विस्तार को प्रोत्साहन।
* **’मेक-इन-इंडिया’ पहल:** विभिन्न जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा।
* **निजी क्षेत्र का निवेश:** 602.09 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश।
3. **प्रमुख उद्देश्य:**
* जैव विनिर्माण केंद्रों और जैव फाउंड्री की स्थापना।
* उच्च क्षमता-युक्त जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देना।
* जैव-आधारित प्रौद्योगिकियों के विस्तार और सत्यापन को सक्षम बनाना।
* जैव-अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करना।
4. **कार्यान्वयन तंत्र:**
* **वित्तीय सहायता:** परियोजना लागत का 70 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता, शेष 30 प्रतिशत निजी क्षेत्र से।
* **विषयगत क्षेत्र:** छह विषयगत क्षेत्रों की पहचान (जैसे जैव-आधारित रसायन, बायोप्लास्टिक्स, सटीक जैवचिकित्सा, जलवायु प्रतिरोधी कृषि)।
* **बायो-एआई हब:** पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्रों (आयुर्वेद, कृषि नवाचार, जीनोम निदान आदि) में स्थापना।
* **चयन मानदंड:** राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्ताव आमंत्रण, तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन, विशेषज्ञों की टिप्पणियाँ और शीर्ष समिति की सिफारिशें।
* **लाभार्थी:** 600 से अधिक लाभार्थी सुविधाओं से लाभान्वित।
5. **निष्कर्ष:** नीति के दीर्घकालिक प्रभावों और भारत को वैश्विक जैव-विनिर्माण केंद्र बनाने की क्षमता पर प्रकाश।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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