बॉम्बे हाईकोर्ट ने गणेशोत्सव में ध्वनि एवं वायु प्रदूषण पर उठाई चिंता

‘Innocent persons can’t suffer’: Bombay HC flags noise, air pollution during Ganeshotsav — diagram

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गणेशोत्सव में ध्वनि एवं वायु प्रदूषण पर उठाई चिंता

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Ganeshotsav pollution sources

✎ बॉम्बे उच्च न्यायालय ने गणेशोत्सव के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दायर की है, जिसमें मौजूदा नियमों के अप्रभावी कार्यान्वयन और नागरिकों के अधिकारों पर इसके प्रतिकूल प्रभाव पर चिंता व्यक्त की…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी (संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन)  |  GS Paper II — शासन (सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके डिजाइन तथा कार्यान्वयन से उत्पन्न मुद्दे)  |  GS Paper II — भारतीय संविधान (न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली)
  • Prelims: ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000, वायु प्रदूषण (निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, जनहित याचिका (PIL), स्वतः संज्ञान (Suo Motu), डेसिबल स्तर, पटाखों पर प्रतिबंध
  • Essay: पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के अधिकार: संतुलन की आवश्यकता, विकास बनाम पर्यावरण: एक सतत बहस

त्वरित पुनरावृत्ति: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने गणेशोत्सव के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दायर की है, जिसमें मौजूदा नियमों के अप्रभावी कार्यान्वयन और नागरिकों के अधिकारों पर इसके प्रतिकूल प्रभाव पर चिंता व्यक्त की गई है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) ने गणेशोत्सव के दौरान अत्यधिक ध्वनि और वायु प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करते हुए स्वतः संज्ञान (suo motu) जनहित याचिका (PIL) दायर की है। न्यायालय ने कहा कि मौजूदा नियमों का ठीक से पालन नहीं किया जा रहा है, जिससे नागरिकों को गंभीर परेशानी हो रही है। न्यायालय ने पटाखों पर प्रतिबंध लगाने और डीजे साउंड सिस्टम की अनुमति पर भी सवाल उठाए हैं, यह देखते हुए कि उत्सवों को नागरिकों के अधिकारों के अनुरूप आयोजित किया जाना चाहिए।

पृष्ठभूमि

  • बॉम्बे उच्च न्यायालय ने गणेशोत्सव के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण के उच्च स्तर पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एक जनहित याचिका शुरू की है।
  • न्यायालय ने पाया कि निर्धारित समय-सीमा और अनुमेय घंटों का उल्लंघन किया जा रहा है, जिससे सामूहिक डेसिबल स्तर बढ़ रहा है।
  • अदालत ने पटाखों से होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण के कारण हवा की विषाक्तता को कम करने के लिए उन पर प्रतिबंध लगाने का ‘उच्च समय’ बताया।
  • न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि उत्सवों और जुलूसों को इस तरह से आयोजित किया जाना चाहिए जो नागरिकों के अधिकारों के प्रति जागरूक और अनुकूल हो।
  • यह मामला मुंबई में वायु प्रदूषण पर 2023 की स्वतः संज्ञान जनहित याचिका से भी संबंधित है, जिसमें अधिकारियों को सितंबर-अक्टूबर के दौरान उच्च वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने में कठिनाई हो रही है।
  • न्यायालय ने कहा कि ‘निर्दोष व्यक्तियों को कुछ लोगों के कारण कष्ट नहीं उठाना चाहिए जो आपत्तिजनक ध्वनि प्रदूषण पैदा करते हैं’।
  • अदालत ने सार्वजनिक सड़कों पर पटाखे फोड़ने से कारों और पैदल चलने वालों को होने वाले ‘दुर्घटनाओं के आसन्न खतरे’ पर भी प्रकाश डाला।

ध्वनि और वायु प्रदूषण से संबंधित प्रमुख कानूनी प्रावधान

  • **पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment (Protection) Act, 1986):** यह अधिनियम केंद्र सरकार को पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा और सुधार तथा पर्यावरण प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने और कम करने के लिए उपाय करने की शक्ति प्रदान करता है। ध्वनि और वायु प्रदूषण दोनों ही इस अधिनियम के दायरे में आते हैं।
  • **वायु प्रदूषण (निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981):** यह अधिनियम वायु प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने और कम करने के लिए बनाया गया है। यह केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को वायु गुणवत्ता मानकों को निर्धारित करने और प्रदूषणकारी गतिविधियों को विनियमित करने का अधिकार देता है।
  • **ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 (Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000):** इन नियमों को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किया गया है। ये नियम विभिन्न क्षेत्रों (जैसे आवासीय, वाणिज्यिक, औद्योगिक) के लिए दिन और रात के समय ध्वनि के अनुमेय स्तर निर्धारित करते हैं और लाउडस्पीकर, सार्वजनिक संबोधन प्रणाली और ध्वनि उत्पन्न करने वाले उपकरणों के उपयोग को विनियमित करते हैं।
  • **आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 133:** यह धारा सार्वजनिक उपद्रव (public nuisance) को हटाने के लिए कार्यकारी मजिस्ट्रेटों को शक्ति प्रदान करती है, जिसमें ध्वनि प्रदूषण भी शामिल हो सकता है।
  • **भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 268:** यह सार्वजनिक उपद्रव को परिभाषित करती है, जिसके तहत अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण को भी शामिल किया जा सकता है, यदि यह जनता को चोट, खतरा या झुंझलाहट का कारण बनता है।
  • **न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism):** न्यायालयों द्वारा स्वतः संज्ञान या जनहित याचिकाओं के माध्यम से ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करना जहाँ कार्यपालिका अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहती है, न्यायिक सक्रियता का एक उदाहरण है। बॉम्बे उच्च न्यायालय का यह कदम इसी श्रेणी में आता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
जनहित याचिका (PIL) उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए पर्यावरण प्रदूषण और नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघन पर चिंता व्यक्त करना।
ध्वनि प्रदूषण त्योहारों के दौरान लाउडस्पीकर और डीजे सिस्टम के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होने वाला गंभीर मुद्दा, जो निर्धारित सीमा और समय का उल्लंघन करता है।
वायु प्रदूषण पटाखों के कारण होने वाला वायु प्रदूषण, जिससे हवा की गुणवत्ता खराब होती है और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
मौजूदा नियमों का कार्यान्वयन न्यायालय ने पाया कि ध्वनि और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने वाले मौजूदा नियमों का उचित कार्यान्वयन नहीं हो रहा है।
नागरिकों के अधिकार न्यायालय ने निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया, जो प्रदूषण के कारण चुपचाप पीड़ित होते हैं।
पर्यावरण संरक्षण न्यायालय ने स्वस्थ पर्यावरण सुनिश्चित करने के लिए पटाखों पर प्रतिबंध लगाने और प्रदूषण कम करने की आवश्यकता पर बल दिया।

महत्व

पर्यावरण और पारिस्थितिकी

  • यह मामला त्योहारों के दौरान होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण के गंभीर पर्यावरणीय प्रभावों को उजागर करता है।
  • यह पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के लिए प्रभावी उपायों की आवश्यकता पर बल देता है।
  • यह स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र बनाए रखने और नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के महत्व को रेखांकित करता है।

शासन और प्रशासन

  • न्यायालय का स्वतः संज्ञान लेना दर्शाता है कि मौजूदा नियमों के कार्यान्वयन में खामियां हैं।
  • यह स्थानीय प्रशासन और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जवाबदेही पर सवाल उठाता है।
  • यह सार्वजनिक व्यवस्था और पर्यावरण नियमों के प्रभावी प्रवर्तन की आवश्यकता को दर्शाता है।

सामाजिक और नैतिक

  • यह मामला त्योहारों के उत्सव और नागरिकों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
  • यह सामाजिक जिम्मेदारी और पर्यावरण के प्रति नागरिकों की जागरूकता बढ़ाने का आह्वान करता है।
  • यह दर्शाता है कि कुछ व्यक्तियों के उत्सव से बड़े पैमाने पर समाज को नुकसान नहीं होना चाहिए।

न्यायिक सक्रियता

  • उच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान लेना न्यायिक सक्रियता का एक उदाहरण है, जहां न्यायालय सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए स्वयं हस्तक्षेप करता है।
  • यह न्यायपालिका की भूमिका को मजबूत करता है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है।
  • यह दर्शाता है कि जब कार्यकारी शाखा अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहती है, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है।

चुनौतियाँ

1. नियमों का अप्रभावी कार्यान्वयन

  • ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 जैसे मौजूदा नियमों का उचित प्रवर्तन नहीं हो रहा है।
  • स्थानीय अधिकारियों द्वारा अनुमति देने में ढिलाई और उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की कमी।

2. जन जागरूकता की कमी

  • त्योहारों के दौरान अत्यधिक शोर और प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों के बारे में जनता में जागरूकता का अभाव।
  • पर्यावरण-अनुकूल उत्सव मनाने की संस्कृति का अभाव।

3. हितों का टकराव

  • धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं तथा पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
  • त्योहार आयोजकों और स्थानीय निवासियों के बीच अक्सर हितों का टकराव होता है।

4. प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग

  • डीजे और लाउडस्पीकर जैसी ध्वनि प्रणालियों का अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग।
  • कम लागत वाले पटाखों की उपलब्धता और उनका व्यापक उपयोग।

5. स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव

  • उच्च ध्वनि स्तर से श्रवण हानि, तनाव और हृदय संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।
  • वायु प्रदूषण से श्वसन संबंधी बीमारियां और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ती हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
ध्वनि प्रदूषण निर्धारित डेसिबल सीमा और समय का उल्लंघन, जिससे नागरिकों को गंभीर असुविधा होती है।
वायु प्रदूषण पटाखों के कारण हवा में विषाक्तता बढ़ना, जिससे स्वास्थ्य जोखिम पैदा होते हैं।
नियमों का कार्यान्वयन मौजूदा नियमों और दिशानिर्देशों का प्रभावी ढंग से पालन न होना।
सार्वजनिक सुरक्षा सार्वजनिक सड़कों पर पटाखों से दुर्घटनाओं का खतरा।
नागरिकों के अधिकार उत्सवों के कारण हजारों निर्दोष नागरिकों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार का हनन।
प्रशासनिक जवाबदेही अधिकारियों द्वारा डीजे सिस्टम और देर रात तक संगीत बजाने की अनुमति देने पर सवाल।

आगे की राह

  • ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 और वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 का कड़ाई से कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
  • स्थानीय प्रशासन और पुलिस को प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए सशक्त किया जाए।
  • त्योहार आयोजकों और नागरिकों के बीच पर्यावरण-अनुकूल उत्सव मनाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
  • पटाखों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने और ध्वनि-सीमित पटाखों को बढ़ावा देने पर विचार किया जाए।
  • सार्वजनिक स्थानों पर ध्वनि स्तर की निगरानी के लिए आधुनिक उपकरण स्थापित किए जाएं और डेटा सार्वजनिक किया जाए।
  • न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए एक निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए।
  • नागरिकों को प्रदूषण संबंधी शिकायतों के लिए एक सुलभ और प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र प्रदान किया जाए।
  • पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए ताकि युवा पीढ़ी में जागरूकता बढ़े।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

ध्वनि प्रदूषण · वायु प्रदूषण · जनहित याचिका (PIL) · पर्यावरण संरक्षण अधिनियम · नागरिकों के अधिकार · न्यायिक सक्रियता · मौलिक अधिकार · राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत · सतत विकास · प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48क’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 51क (छ)’, ‘note’: ‘पर्यावरण की रक्षा और सुधार का कर्तव्य’}

अवधारणा प्रवाह

त्योहारों के दौरान लाउड संगीत और पटाखों का अत्यधिक उपयोग  →  निर्धारित ध्वनि और वायु प्रदूषण मानकों का उल्लंघन  →  नागरिकों के स्वास्थ्य और शांतिपूर्ण जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव  →  मौजूदा नियमों और कानूनों का अप्रभावी कार्यान्वयन  →  उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान (suo motu) जनहित याचिका  →  पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का आह्वान  →  प्रदूषण नियंत्रण के लिए सख्त उपायों की आवश्यकता पर बल

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को मान्यता देता है।
2. ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000, त्योहारों के दौरान रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर के उपयोग की अनुमति देता है यदि विशेष अनुमति प्राप्त हो।
3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) पर्यावरण से संबंधित मामलों में जनहित याचिका (PIL) पर स्वतः संज्ञान ले सकता है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के एक भाग के रूप में स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को मान्यता दी है। कथन 2 गलत है क्योंकि ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000, सामान्यतः रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है, हालांकि कुछ विशेष अवसरों पर छूट दी जा सकती है, लेकिन यह सामान्य नियम नहीं है। कथन 3 गलत है क्योंकि NGT स्वयं जनहित याचिका पर स्वतः संज्ञान नहीं लेता, बल्कि यह अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले पर्यावरण संबंधी मामलों पर स्वतः संज्ञान ले सकता है, लेकिन इसे PIL के रूप में नहीं जाना जाता।

Q2. अभिकथन (A): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने गणेशोत्सव के दौरान अत्यधिक ध्वनि और वायु प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका (PIL) शुरू की।
कारण (R): न्यायालय ने पाया कि मौजूदा नियमों का उचित कार्यान्वयन नहीं हो रहा है, जिससे नागरिकों को गंभीर पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ रहा है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सत्य है क्योंकि बॉम्बे उच्च न्यायालय ने गणेशोत्सव के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लिया। कारण (R) भी सत्य है क्योंकि न्यायालय ने नियमों के अनुचित कार्यान्वयन को नागरिकों के लिए गंभीर पूर्वाग्रह का कारण बताया। कारण (R) सीधे तौर पर अभिकथन (A) की व्याख्या करता है कि न्यायालय ने स्वतः संज्ञान क्यों लिया।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में त्योहारों के दौरान ध्वनि और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए मौजूदा कानूनी और नियामक ढाँचे का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संबंध में न्यायिक सक्रियता की भूमिका पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत में त्योहारों के दौरान बढ़ते ध्वनि और वायु प्रदूषण की समस्या का संक्षिप्त उल्लेख।
2. मौजूदा कानूनी और नियामक ढाँचा:
• पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986: व्यापक प्रावधान।
• ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000: डेसिबल सीमाएँ, समय प्रतिबंध (रात 10 बजे से सुबह 6 बजे)।
• वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981: वायु गुणवत्ता मानकों का निर्धारण।
• मोटर वाहन अधिनियम, 1988: हॉर्न के उपयोग से संबंधित प्रावधान।
• भारतीय दंड संहिता (IPC): सार्वजनिक उपद्रव से संबंधित धाराएँ (जैसे धारा 268)।
• राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की भूमिका।
3. ढाँचे का समालोचनात्मक परीक्षण:
• कार्यान्वयन में चुनौतियाँ: प्रवर्तन एजेंसियों की कमी, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, जन जागरूकता की कमी।
• अपर्याप्त दंड: उल्लंघनकर्ताओं के लिए दंड का हल्का होना।
• त्योहारों के दौरान विशेष छूट का दुरुपयोग।
• तकनीकी निगरानी और डेटा संग्रह की कमी।
4. न्यायिक सक्रियता की भूमिका:
• स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले: न्यायालयों द्वारा स्वयं संज्ञान लेकर जनहित की रक्षा।
• जनहित याचिकाएँ (PILs): नागरिकों या संगठनों द्वारा दायर याचिकाएँ, न्यायालयों द्वारा व्यापक व्याख्या।
• महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय: जैसे ‘लाउडस्पीकर बनाम जीवन का अधिकार’ (अनुच्छेद 21), पटाखों पर प्रतिबंध से संबंधित निर्णय (जैसे अर्जुन गोपाल बनाम भारत संघ)।
• दिशानिर्देश जारी करना और निगरानी करना: न्यायालयों द्वारा प्रशासन को विशिष्ट निर्देश देना।
• मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) और राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 48A) का प्रवर्तन।
5. निष्कर्ष: प्रभावी कार्यान्वयन, जन जागरूकता और न्यायिक हस्तक्षेप के संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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