भारत का जल-प्रबंधन मॉडल: विकासशील देशों के लिए सबक

भारत का जल-प्रबंधन मॉडल: विकासशील देशों के लिए सबक

भारत का जल-प्रबंधन मॉडल: विकासशील देशों के लिए सबक

जल प्रबंधन मॉडल का विकासऐतिहासिक प्रणालियाँतालाब, बावड़ियाँस्वतंत्रता पश्चातबड़े बांध, सिंचाईवर्तमान चुनौतियाँजलवायु परिवर्तनराष्ट्रीय कार्यक्रमहर खेत को पानीगुजरात मॉडलवर्षा जल संचयनविकासशील देशों के लिए व्यावहारिक खाका
जल प्रबंधन मॉडल का विकास

✎ भारत का जल-प्रबंधन मॉडल बुनियादी ढांचे, अच्छी योजना, मजबूत स्थानीय व्यवस्थाओं और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जल सुरक्षा प्राप्त करने पर केंद्रित है, जो विकासशील देशों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, पारदर्शिता एवं जवाबदेही के महत्वपूर्ण पक्ष  |  GS Paper II — विकास प्रक्रियाएँ तथा विकास उद्योग – गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों एवं संघों, दानकर्ताओं, लोकोपकारी संस्थाओं, संस्थागत एवं अन्य हितधारकों की भूमिका  |  GS Paper III — आपदा एवं आपदा प्रबंधन
  • Prelims: जल सुरक्षा, जल प्रबंधन मॉडल, सामुदायिक भागीदारी, विकसित देश (ग्लोबल साउथ), राष्ट्रीय जल मिशन, जल जीवन मिशन
  • Essay: जल सुरक्षा: विकास और स्थिरता की कुंजी, सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से सतत विकास

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत का जल-प्रबंधन मॉडल बुनियादी ढांचे, अच्छी योजना, मजबूत स्थानीय व्यवस्थाओं और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जल सुरक्षा प्राप्त करने पर केंद्रित है, जो विकासशील देशों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

प्रधानमंत्री ने हाल ही में एक लेख साझा किया है, जिसमें बताया गया है कि भारत का जल-प्रबंधन मॉडल किस प्रकार विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) के लिए उपयोगी सबक प्रदान कर सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जल सुरक्षा केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अच्छी योजना, मजबूत स्थानीय व्यवस्था और जल प्रबंधन में समुदायों की सक्रिय भागीदारी भी शामिल है।

पृष्ठभूमि

  • भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है, जहाँ जल संसाधनों का असमान वितरण और बढ़ती जनसंख्या के कारण जल सुरक्षा एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है।
  • ऐतिहासिक रूप से, भारत में जल प्रबंधन की पारंपरिक प्रणालियाँ रही हैं, जिनमें तालाब, बावड़ियाँ और नहरें शामिल हैं, जो स्थानीय समुदायों द्वारा संचालित होती थीं।
  • स्वतंत्रता के बाद, सरकार ने बड़े पैमाने पर सिंचाई परियोजनाओं और बांधों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई लेकिन स्थानीय जल निकायों की उपेक्षा हुई।
  • हाल के दशकों में, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण जल संकट और गहराया है, जिससे जल संरक्षण और कुशल प्रबंधन की आवश्यकता महसूस हुई है।
  • भारत ने जल प्रबंधन में सुधार के लिए विभिन्न राष्ट्रीय कार्यक्रमों और नीतियों को अपनाया है, जिसमें ‘हर खेत को पानी’ और ‘प्रति बूँद अधिक फसल’ जैसे लक्ष्य शामिल हैं।
  • गुजरात जैसे राज्यों ने जल संरक्षण और प्रबंधन में महत्वपूर्ण सुधार किए हैं, जिनमें वर्षा जल संचयन और सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया गया है, जो राष्ट्रीय स्तर पर मॉडल के रूप में देखे जाते हैं।

भारत का जल-प्रबंधन मॉडल क्या है?

  • भारत का जल-प्रबंधन मॉडल एक बहुआयामी दृष्टिकोण है जो जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बुनियादी ढांचे के विकास, नीतिगत सुधारों और सामुदायिक भागीदारी को एकीकृत करता है।
  • यह मॉडल केवल बड़े पैमाने पर परियोजनाओं पर निर्भर नहीं करता, बल्कि स्थानीय स्तर पर जल निकायों के पुनरुद्धार और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) जैसी छोटी पहल को भी महत्व देता है।
  • इसमें ‘जल जीवन मिशन’ जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम शामिल हैं, जिनका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक घर में नल से स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना है।
  • मॉडल में जल संरक्षण, जल उपयोग दक्षता में सुधार और अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण (Recycling) पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  • यह जल प्रबंधन में ग्राम पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों (Self-Help Groups) जैसे स्थानीय निकायों की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करता है, जिससे योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सके।
  • तकनीकी नवाचारों, जैसे कि सेंसर-आधारित निगरानी और डेटा विश्लेषण का उपयोग, जल संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और आवंटन में सहायक होता है।
  • यह मॉडल ‘ग्लोबल साउथ’ के अन्य विकासशील देशों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो अपनी बढ़ती जल आवश्यकताओं को पूरा करने और जल सुरक्षा में सुधार करने के इच्छुक हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
समग्र जल सुरक्षा दृष्टिकोण जल सुरक्षा को केवल बुनियादी ढाँचे के निर्माण तक सीमित न रखकर, इसमें अच्छी योजना, मजबूत स्थानीय व्यवस्था और सामुदायिक भागीदारी को शामिल करना। यह दृष्टिकोण दीर्घकालिक स्थिरता और दक्षता सुनिश्चित करता है।
सामुदायिक भागीदारी जल प्रबंधन में स्थानीय समुदायों को सक्रिय रूप से शामिल करना। यह स्वामित्व की भावना को बढ़ावा देता है, स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान सुनिश्चित करता है और योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन में मदद करता है।
स्थानीय व्यवस्थाओं का सुदृढ़ीकरण जल संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन के लिए मजबूत स्थानीय प्रणालियों और संस्थागत तंत्रों का विकास। यह विकेन्द्रीकृत निर्णय लेने और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही को बढ़ावा देता है।
योजनाबद्ध दृष्टिकोण जल संसाधनों के उपयोग और संरक्षण के लिए सुविचारित और व्यापक योजनाएँ बनाना। यह संसाधनों के इष्टतम उपयोग, बर्बादी को कम करने और भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक है।
गुजरात मॉडल से राष्ट्रीय कार्यक्रमों तक गुजरात में जल सुधारों के सफल अनुभवों को बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय कार्यक्रमों में लागू करना। यह एक सफल क्षेत्रीय मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर दोहराने की क्षमता को दर्शाता है और अन्य विकासशील देशों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

महत्व

शासन और नीति निर्माण

  • यह मॉडल जल प्रबंधन में एक समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देता है, जिसमें केवल इंजीनियरिंग समाधानों के बजाय सामाजिक और संस्थागत पहलुओं को भी शामिल किया जाता है।
  • यह विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) के लिए एक व्यावहारिक खाका प्रदान करता है, जो उन्हें अपनी विशिष्ट चुनौतियों के अनुरूप जल सुरक्षा रणनीतियाँ विकसित करने में मदद कर सकता है।
  • स्थानीय सरकारों और समुदायों की भूमिका को मजबूत करने पर जोर देता है, जो विकेन्द्रीकृत शासन और सहभागी विकास के सिद्धांतों के अनुरूप है।

सामाजिक-आर्थिक विकास

  • बेहतर जल प्रबंधन से कृषि उत्पादकता में वृद्धि होती है, जिससे ग्रामीण आय और खाद्य सुरक्षा में सुधार होता है।
  • स्वच्छ और पर्याप्त जल की उपलब्धता से सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार होता है और जल-जनित बीमारियों का बोझ कम होता है।
  • जल सुरक्षा महिलाओं और बच्चों पर जल लाने के बोझ को कम करती है, जिससे उन्हें शिक्षा और अन्य उत्पादक गतिविधियों में शामिल होने का अवसर मिलता है।

पर्यावरण और सतत विकास

  • यह मॉडल जल संसाधनों के सतत उपयोग और संरक्षण को बढ़ावा देता है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।
  • भूजल पुनर्भरण और वर्षा जल संचयन जैसी प्रथाओं को प्रोत्साहित करता है, जो जल स्तर को बनाए रखने और सूखे के प्रभावों को कम करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति लचीलापन बढ़ाने में सहायक है, क्योंकि यह जल उपलब्धता और प्रबंधन में अनिश्चितताओं को संबोधित करता है।

चुनौतियाँ

1. बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण

  • तेजी से बढ़ती जनसंख्या और शहरीकरण के कारण जल की मांग में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे मौजूदा जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।
  • शहरी क्षेत्रों में अपशिष्ट जल प्रबंधन और जल प्रदूषण एक बड़ी चुनौती है, जो उपलब्ध स्वच्छ जल को और कम कर देता है।

2. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

  • जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में बदलाव, सूखे और बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि हो रही है, जिससे जल उपलब्धता और प्रबंधन में अनिश्चितता बढ़ रही है।
  • ग्लेशियरों के पिघलने और समुद्र के स्तर में वृद्धि तटीय क्षेत्रों में ताजे जल संसाधनों को प्रभावित कर रही है।

3. बुनियादी ढाँचे की कमी और रखरखाव

  • कई क्षेत्रों में जल संचयन, वितरण और उपचार के लिए पर्याप्त बुनियादी ढाँचे की कमी है, जिससे जल की बर्बादी होती है और पहुँच सीमित होती है।
  • मौजूदा बुनियादी ढाँचे का अपर्याप्त रखरखाव भी जल प्रबंधन की दक्षता को प्रभावित करता है।

4. अंतर-राज्यीय जल विवाद

  • नदी जल के बँटवारे को लेकर विभिन्न राज्यों के बीच विवाद जल प्रबंधन और परियोजनाओं के कार्यान्वयन में बाधा डालते हैं।
  • ये विवाद अक्सर राजनीतिक और कानूनी जटिलताओं को जन्म देते हैं, जिससे एकीकृत जल प्रबंधन दृष्टिकोण को अपनाना मुश्किल हो जाता है।

5. जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन की कमी

  • जल संरक्षण के महत्व के बारे में सार्वजनिक जागरूकता की कमी और जल के अपव्ययी उपयोग की आदतें प्रभावी जल प्रबंधन में बाधा डालती हैं।
  • सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए व्यवहार परिवर्तन और शिक्षा की आवश्यकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
भूजल का अत्यधिक दोहन कृषि और औद्योगिक उपयोग के लिए भूजल का अनियंत्रित दोहन, जिससे भूजल स्तर में गिरावट और जल गुणवत्ता में कमी।
जल प्रदूषण औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि रसायन और घरेलू सीवेज द्वारा नदियों, झीलों और भूजल का प्रदूषण, जिससे स्वच्छ जल की उपलब्धता कम होती है।
वितरण में असमानता शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समूहों के बीच स्वच्छ पेयजल की पहुँच में असमानता।
पुराने जल कानून और नीतियाँ कई मौजूदा जल कानून और नीतियाँ वर्तमान चुनौतियों और आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं हैं, जिससे प्रभावी प्रबंधन में बाधा आती है।
अंतर-क्षेत्रीय समन्वय का अभाव जल से संबंधित विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय की कमी, जिससे नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा आती है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • जल जीवन मिशन (Jal Jeevan Mission)
  • अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana)
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana)
  • नमामि गंगे कार्यक्रम (Namami Gange Programme)

आगे की राह

  • जल प्रबंधन में एक एकीकृत और बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाना, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय हो।
  • जल संरक्षण और कुशल उपयोग के लिए जन जागरूकता अभियान और शिक्षा कार्यक्रमों को मजबूत करना।
  • जल-गहन फसलों से कम जल-गहन फसलों की ओर विविधीकरण को बढ़ावा देना और सूक्ष्म सिंचाई (micro-irrigation) तकनीकों को अपनाना।
  • जल पुनर्चक्रण (water recycling) और अपशिष्ट जल उपचार (wastewater treatment) संयंत्रों में निवेश बढ़ाना।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल जल प्रबंधन रणनीतियों को विकसित करना और सूखे व बाढ़ के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना।
  • जल डेटा संग्रह, विश्लेषण और साझाकरण के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय ढाँचा स्थापित करना।
  • जल प्रबंधन में स्थानीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं की भागीदारी को और बढ़ाना और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जल प्रबंधन मॉडल · जल सुरक्षा · सामुदायिक भागीदारी · स्थानीय जल व्यवस्थाएँ · विकासशील देश · ग्लोबल साउथ · जल संरक्षण · नीतिगत सुधार · बुनियादी ढाँचा · सतत विकास

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule)’, ‘note’: “राज्य सूची में ‘जल’ विषय”}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 262 (Article 262)’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G (Article 243G)’, ‘note’: ‘पंचायतों को जल प्रबंधन शक्तियाँ’}

अवधारणा प्रवाह

जल संसाधनों पर बढ़ती मांग और दबाव  →  जल सुरक्षा के लिए समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता  →  अच्छी योजना, स्थानीय व्यवस्था, सामुदायिक भागीदारी पर जोर  →  गुजरात मॉडल से राष्ट्रीय कार्यक्रमों तक का अनुभव  →  विकासशील देशों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण  →  वैश्विक जल सुरक्षा और सतत विकास में योगदान

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जल सुरक्षा केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण तक ही सीमित है।
2. भारत का जल-प्रबंधन मॉडल विकासशील देशों के लिए उपयोगी सबक प्रदान कर सकता है।
3. जल प्रबंधन में समुदायों की भागीदारी एक महत्वपूर्ण घटक है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि जल सुरक्षा में बुनियादी ढांचे के साथ-साथ अच्छी योजना, मजबूत स्थानीय व्यवस्था और सामुदायिक भागीदारी भी शामिल है। कथन 2 सही है क्योंकि प्रधानमंत्री ने स्वयं इस बात पर जोर दिया है कि भारत का मॉडल ग्लोबल साउथ के लिए उपयोगी है। कथन 3 सही है क्योंकि जल प्रबंधन में समुदायों की भागीदारी को एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में रेखांकित किया गया है।

Q2. भारत के जल-प्रबंधन मॉडल के संदर्भ में, ‘ग्लोबल साउथ’ शब्द का क्या अर्थ है?

  1. उत्तरी गोलार्ध के विकसित देश
  2. दक्षिणी गोलार्ध के विकसित देश
  3. विकासशील और अल्पविकसित देशों का समूह
  4. केवल अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश

उत्तर: विकासशील और अल्पविकसित देशों का समूह — ‘ग्लोबल साउथ’ शब्द आमतौर पर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील और अल्पविकसित देशों के समूह को संदर्भित करता है, जो अक्सर साझा ऐतिहासिक अनुभवों और विकास चुनौतियों का सामना करते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत का जल-प्रबंधन मॉडल किस प्रकार विकासशील देशों के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करता है? जल सुरक्षा सुनिश्चित करने में सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय व्यवस्थाओं की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** भारत के जल-प्रबंधन मॉडल का संक्षिप्त परिचय, जिसमें बताया जाए कि यह ग्लोबल साउथ के लिए कैसे प्रासंगिक है।
2. **भारत के मॉडल की मुख्य विशेषताएँ:**
* बुनियादी ढाँचा विकास (जैसे नहरें, बाँध, जल संचयन संरचनाएँ)।
* अच्छी योजना और नीतिगत ढाँचा (जैसे राष्ट्रीय जल नीतियाँ, मिशन)।
* मजबूत स्थानीय व्यवस्थाएँ (जैसे पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका)।
* सामुदायिक भागीदारी पर जोर।
3. **विकासशील देशों के लिए प्रासंगिकता:**
* समान भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ।
* लागत प्रभावी और टिकाऊ समाधानों की आवश्यकता।
* ज्ञान और अनुभव साझा करने का अवसर।
4. **सामुदायिक भागीदारी की भूमिका:**
* योजना और कार्यान्वयन में स्थानीय ज्ञान का उपयोग।
* संसाधनों का कुशल उपयोग और रखरखाव।
* जवाबदेही और स्वामित्व की भावना का विकास।
* जल विवादों का स्थानीय स्तर पर समाधान।
* उदाहरण: जल ग्राम समितियाँ, स्वयं सहायता समूह।
5. **स्थानीय व्यवस्थाओं की भूमिका:**
* विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन।
* नीतियों को जमीनी स्तर पर लागू करना।
* निगरानी और मूल्यांकन।
* स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलन।
* उदाहरण: ग्राम पंचायतें, जल उपयोगकर्ता संघ।
6. **निष्कर्ष:** भारत के मॉडल की सफलता और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए, सतत जल सुरक्षा के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)

Uttar Pradesh PCS (UPPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: उत्तर प्रदेश में जल-प्रबंधन के संदर्भ में, ‘प्रधानमंत्री द्वारा साझा किए गए भारत के जल-प्रबंधन मॉडल’ के प्रमुख तत्वों में से कौन-सा उत्तर प्रदेश की जल-संकट समस्याओं के समाधान में सर्वाधिक प्रभावी सिद्ध हो सकता है?

  1. A. वर्षा जल संचयन प्रणाली का व्यापक उपयोग
  2. B. नदियों के अंतर-राज्यीय जल विवादों का न्यायिक समाधान
  3. C. जल शक्ति अभियान के माध्यम से जल संरक्षण जन-आंदोलन
  4. D. जल निकासी व्यवस्था में आधुनिक तकनीक का एकीकरण

उत्तर: C. जल शक्ति अभियान के माध्यम से जल संरक्षण जन-आंदोलन — उत्तर प्रदेश में जल संकट के समाधान हेतु ‘जल शक्ति अभियान’ जैसे जन-आंदोलनात्मक दृष्टिकोण से जन-भागीदारी बढ़ाकर जल संरक्षण को स्थायी बनाया जा सकता है।

Mains: उत्तर प्रदेश में ‘जल-प्रबंधन मॉडल’ को प्रभावी बनाने हेतु राज्य सरकार द्वारा अपनाए जाने वाले किन्हीं चार प्रमुख रणनीतियों का वर्णन कीजिए। साथ ही, इन रणनीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों एवं उनके निराकरण के उपायों पर प्रकाश डालिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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