भारत की इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राज्य की शक्ति और डिजिटल पारदर्शिता की चुनौती

भारत की इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राज्य की शक्ति और डिजिटल पारदर्शिता की चुनौती

Syllabus Mapping

प्रारंभिक परीक्षा हेतु: अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(2), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, धारा 69A, धारा 79, Shreya Singhal मामला, Anuradha Bhasin मामला, IT Rules 2021, Telecommunications Act, 2023, इंटरनेट शटडाउन
मुख्य परीक्षा हेतु:
GS–2: संविधान, मौलिक अधिकार, शासन, जवाबदेही, न्यायिक समीक्षा, मीडिया एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
GS–3: साइबर सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा, डिजिटल शासन, प्रौद्योगिकी का विनियमन
GS–4: राज्य शक्ति, वैधता, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नागरिक स्वतंत्रता के बीच नैतिक संतुलन

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत की इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था पर फिर से बहस तेज हुई है, क्योंकि अलग-अलग इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (ISPs) द्वारा वेबसाइटों की ब्लॉकिंग एकसमान नहीं पाई गई। इससे यह प्रश्न उभरता है कि भारत में इंटरनेट पर नियंत्रण का कानूनी ढाँचा तो मौजूद है, पर उसका क्रियान्वयन कितना पारदर्शी, समान और न्यायसंगत है। यह विषय केवल तकनीकी नहीं, बल्कि संवैधानिक स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल लोकतंत्र—तीनों के संगम पर स्थित है. भारत में ऑनलाइन अभिव्यक्ति अनुच्छेद 19(1)(a) के संरक्षण में आती है, पर उस पर अनुच्छेद 19(2) के तहत युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया है कि इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति और व्यापार संवैधानिक रूप से संरक्षित हैं, और किसी भी प्रतिबंध को वैधता तथा proportionality की कसौटी पर खरा उतरना होगा.

इंटरनेट सेंसरशिप का अर्थ

ऑनलाइन सामग्री, वेबसाइट, मंच, संदेश या ऐप तक पहुँच को नियंत्रित, सीमित या अवरुद्ध करना। भारत में यह कई रूपों में दिखती है:
– वेबसाइट/URL ब्लॉकिंग
– सोशल मीडिया कंटेंट हटाना
– ऐप प्रतिबंध
– इंटरनेट/टेलीकॉम सेवाओं का अस्थायी निलंबन
यहाँ एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है: वेबसाइट ब्लॉकिंग और इंटरनेट शटडाउन एक ही चीज़ नहीं हैं। वेबसाइट ब्लॉकिंग सामान्यतः IT Act के तहत की जाती है, जबकि इंटरनेट/टेलीकॉम सेवाओं के निलंबन का ढाँचा अब Telecommunications Act, 2023 तथा उसके अंतर्गत बने 2024 Rules से जुड़ा है.

संवैधानिक आधार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने Anuradha Bhasin v. Union of India (2020) में कहा कि इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति और व्यवसाय करना संवैधानिक संरक्षण प्राप्त गतिविधियाँ हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि इंटरनेट संबंधी प्रतिबंध अनिश्चितकालीन नहीं हो सकते और उन्हें आवश्यकता, वैध उद्देश्य, न्यूनतम हस्तक्षेप और proportionality के मानकों पर परखा जाएगा.

भारत में कानूनी ढाँचा

1. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A :  धारा 69A केंद्र सरकार को यह शक्ति देती है कि वह संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था आदि कारणों से किसी सूचना या वेबसाइट तक सार्वजनिक पहुँच को ब्लॉक करने का निर्देश दे सके. इस धारा के तहत 2009 के Blocking Rules बनाए गए, जिनमें Designated Officer, nodal mechanism, committee scrutiny और emergency blocking जैसी प्रक्रिया निर्धारित है. आपात स्थिति में पहले अंतरिम ब्लॉकिंग की जा सकती है, लेकिन 48 घंटे के भीतर मामले को समिति के सामने लाना होता है.

2. Shreya Singhal v. Union of India (2015) : सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक निर्णय में IT Act की धारा 66A को असंवैधानिक ठहराया, क्योंकि वह अस्पष्ट और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असंगत आघात थी। साथ ही, न्यायालय ने धारा 69A को प्रक्रिया-सुरक्षाओं के कारण वैध माना. इसका अर्थ है कि भारत में ऑनलाइन सामग्री पर रोक का संवैधानिक आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसे प्रक्रियात्मक सीमाओं के भीतर स्वीकार किया गया.

3. धारा 79 और Safe Harbour :  मुख्यतः intermediaries को third-party content के लिए सीमित दायित्व-मुक्ति (safe harbour) देती है। यह स्वयं ब्लॉकिंग शक्ति नहीं देती; ब्लॉकिंग का प्रमुख आधार धारा 69A है. इसलिए धारा 79 को ब्लॉकिंग की सीधी शक्ति मानना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा.

4. IT (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 : ने intermediaries, विशेषकर significant social media intermediaries, पर अतिरिक्त due diligence डाली। इसमें grievance officer, compliance reporting और messaging services के मामले में “first originator” की पहचान सक्षम करने की व्यवस्था शामिल है, जिसे लेकर end-to-end encryption और privacy पर गंभीर बहस हुई.

5. Telecommunications Act, 2023 और 2024 Rules : Telecommunications Act, 2023 ने पुराने टेलीकॉम ढाँचे का व्यापक पुनर्गठन किया, और उसके अंतर्गत Telecommunications (Temporary Suspension of Services) Rules, 2024 अधिसूचित किए गए. अतः आज इंटरनेट/टेलीकॉम सेवाओं के अस्थायी निलंबन का नियमन नए अधिनियम-नियम ढाँचे से जुड़ चुका है. इसलिए “सेंसरशिप” पर चर्चा करते समय blocking और suspension के बीच कानूनी अंतर करना आवश्यक है.

सेंसरशिप के प्रमुख रूप

(क) वेबसाइट ब्लॉकिंग : सरकार या सक्षम न्यायालय के आदेश पर ISPs द्वारा URL, domain या platform तक पहुँच रोकी जाती है. 2009 Rules के तहत competent court orders पर भी Designated Officer कार्रवाई करता है. हाल के DoT आदेश दिखाते हैं कि अदालतों के निर्देशों के आधार पर लाइसेंसी ISPs को वेबसाइट/डोमेन ब्लॉक करने के लिए कहा जाता है. फरवरी 2026 और मार्च 2026 के DoT संचार में कई वेबसाइटों/डोमेनों की ब्लॉकिंग हेतु सभी लाइसेंसधारकों को निर्देश दिए गए.

(ख) इंटरनेट शटडाउन : यह किसी क्षेत्र में मोबाइल/ब्रॉडबैंड सेवाओं का अस्थायी निलंबन है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसा निलंबन अनिश्चितकालीन नहीं हो सकता और उसकी आवधिक समीक्षा आवश्यक है.

(ग) सोशल मीडिया टेकडाउन : सरकार प्लेटफॉर्मों को विशेष पोस्ट, लिंक या खातों के विरुद्ध कार्रवाई हेतु निर्देश दे सकती है। यह content moderation और censorship के बीच धुंधला क्षेत्र बनाता है, क्योंकि कई बार सार्वजनिक कारण स्पष्ट नहीं किए जाते.

(घ) ऐप बैन : राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे आधारों पर ऐप्स पर रोक भी भारत की डिजिटल नियंत्रण-व्यवस्था का हिस्सा रही है. इसका कानूनी-सैद्धांतिक आधार भी व्यापक रूप से धारा 69A के ढाँचे से जुड़ा माना जाता है.

ISPs वेबसाइट कैसे ब्लॉक करते हैं?

व्यवहार में अधिकांश ISPs वेबसाइट ब्लॉकिंग के लिए DNS-स्तरीय हस्तक्षेप का उपयोग करते हैं, क्योंकि यह अपेक्षाकृत सरल और कम लागत वाला तरीका है। DNS poisoning या गलत resolution के माध्यम से उपयोगकर्ता को वास्तविक वेबसाइट तक पहुँचने से रोका जाता है. हालाँकि अधिक उन्नत blocking methods भी संभव हैं, पर भारत में सस्ती और त्वरित प्रवर्तन-व्यवस्था के कारण DNS blocking अधिक प्रचलित मानी जाती है. इस तकनीकी सादगी के कारण क्रियान्वयन में एकरूपता की बजाय “जुगाड़-आधारित” विविधता भी पैदा होती है. इस दावे का आधार मुख्यतः समकालीन अध्ययन और मीडिया विश्लेषण हैं; आधिकारिक तकनीकी मानक सार्वजनिक रूप से बहुत स्पष्ट नहीं हैं.

मुख्य समस्या: अपारदर्शिता और असमान क्रियान्वयन

इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि ब्लॉकिंग आदेश अक्सर सार्वजनिक नहीं होते, जबकि उपयोगकर्ताओं को यह भी नहीं पता चलता कि कौन-सी वेबसाइट किस आदेश से ब्लॉक हुई है। परिणामस्वरूप अलग-अलग ISPs पर अलग-अलग blocklists दिखाई देती हैं. यही कारण है कि एक उपयोगकर्ता के लिए कोई वेबसाइट खुल सकती है, जबकि दूसरे ISP पर वही बंद हो. कानून एक है, पर उसका कार्यान्वयन असमान है.
यह स्थिति Rule of Law के सिद्धांत के विरुद्ध जाती है, क्योंकि समान कानूनी आदेश का प्रभाव समान नहीं है. साथ ही, गोपनीयता और गोपनीय आदेशों की संस्कृति से नागरिकों के पास न्यायिक चुनौती का अवसर भी सीमित हो जाता है. सर्वोच्च न्यायालय का proportionality और review-based approach इसी पृष्ठभूमि में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है.

प्रमुख चुनौतियाँ

1. पारदर्शिता का अभाव : ब्लॉकिंग आदेशों और ब्लॉकड डोमेनों की सार्वजनिक सूची सामान्यतः उपलब्ध नहीं होती. इससे नागरिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों प्रभावित होते हैं.

2. प्रक्रिया और व्यवहार में अंतर : कानून प्रक्रिया-सुरक्षा की बात करता है, पर व्यवहार में ISP-स्तर पर अनुपालन असमान दिखता है. इससे “due process” की गुणवत्ता पर प्रश्न उठते हैं.

3. राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम मौलिक अधिकार : आतंकवाद, उग्रवाद, दुष्प्रचार और हिंसा-प्रेरित सामग्री पर नियंत्रण की वास्तविक आवश्यकता है; किंतु यही आधार यदि अत्यधिक व्यापक हो जाए तो वैध आलोचना, पत्रकारिता और असहमति भी प्रभावित हो सकती है.

4. Eyncrption और Privacy पर दबाव : 2021 Rules के “first originator” प्रावधान ने privacy और traceability के बीच टकराव को तेज किया. यह डिजिटल अधिकारों की बहस का केंद्रीय प्रश्न बन चुका है.

5. न्यायिक समीक्षा की सीमित पहुँच : जब आदेश गोपनीय हों, तो प्रभावित पक्ष के लिए चुनौती देना कठिन हो जाता है. इसलिए प्रक्रिया की वैधता केवल कागज पर नहीं, व्यवहार में भी दिखनी चाहिए.

आगे की राह

भारत को ऐसी डिजिटल शासन-व्यवस्था की आवश्यकता है जो सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए। इसके लिए कुछ कदम महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं:
– ब्लॉकिंग आदेशों का सार्वजनिक disclosure, सिवाय वास्तविक संवेदनशील मामलों के
– ब्लॉक की गई वेबसाइटों/URLs की नियमित और सत्यापित सूची
– ISP अनुपालन हेतु एकरूप तकनीकी मानक
– blocking और shutdown पर स्वतंत्र review mechanism
– privacy, encryption और lawful access के बीच स्पष्ट विधिक संतुलन
– संसद और न्यायपालिका द्वारा अधिक संस्थागत निगरानी

निष्कर्ष

भारत की इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था एक जटिल द्वंद्व को सामने लाती है—एक ओर राज्य की वैध चिंता है: राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और अवैध सामग्री पर नियंत्रण; दूसरी ओर नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है: अभिव्यक्ति, सूचना तक पहुँच और डिजिटल भागीदारी। समस्या केवल सेंसरशिप की उपस्थिति नहीं, बल्कि उसकी अस्पष्टता, असमानता और सीमित जवाबदेही है। लोकतांत्रिक राज्य में डिजिटल नियंत्रण का औचित्य तभी स्वीकार्य होगा जब वह कानूनसम्मत, आवश्यक, अनुपातिक और पारदर्शी हो.

प्रारंभिक परीक्षा हेतु संभावित प्रश्न

प्रश्न: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A केंद्र सरकार को सार्वजनिक पहुँच हेतु ऑनलाइन सूचना को ब्लॉक करने की शक्ति देती है।
  2.  धारा 79 स्वयं सरकार को वेबसाइट ब्लॉक करने की सीधी शक्ति प्रदान करती है।
  3.  Anuradha Bhasin मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति अनुच्छेद 19(1)(a) के दायरे में आती है।
    उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
    (a) केवल 1 और 2
    (b) केवल 1 और 3
    (c) केवल 2 और 3
    (d) 1, 2 और 3
    उत्तर: (b)

मुख्य परीक्षा हेतु संभावित प्रश्न

“भारत की इंटरनेट सेंसरशिप व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है, किन्तु इसका क्रियान्वयन अपारदर्शी और असमान है।” टिप्पणी कीजिए.

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