16 Oct भारत-मंगोलिया रक्षा सहयोग: 14वीं संयुक्त कार्य समूह बैठक से प्रमुख निष्कर्ष
✎ भारत-मंगोलिया संयुक्त कार्य समूह की 14वीं बैठक (उलानबातार, 16 अक्टूबर 2026) में रक्षा सहयोग की समीक्षा हुई, नोमैडिक एलीफेंट अभ्यास और भारत-सहयोगित साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र प्रमुख उपलब्धियाँ रहीं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत और उसके पड़ोसी/अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय समूह और समझौते) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (साइबर सुरक्षा और रक्षा क्षमता निर्माण)
- Prelims: संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group), नोमैडिक एलीफेंट (Nomadic Elephant) सैन्य अभ्यास, उलानबातार (Ulaanbaatar) — मंगोलिया की राजधानी, मंगोलिया: स्थलरुद्ध (Landlocked) देश, रूस और चीन के बीच स्थित, गोबी मरुस्थल (Gobi Desert) — मंगोलिया का प्रमुख भू-भाग, भारत-मंगोलिया रणनीतिक साझेदारी (2015), ‘तीसरा पड़ोसी’ (Third Neighbour) नीति — मंगोलिया की विदेश नीति अवधारणा, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र और रक्षा क्षमता निर्माण
- Essay: छोटे देश, बड़ी साझेदारी: रक्षा कूटनीति और विश्वास-निर्माण के उपाय, साइबर सुरक्षा और क्षमता निर्माण: आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों में सहयोग की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत-मंगोलिया संयुक्त कार्य समूह की 14वीं बैठक (उलानबातार, 16 अक्टूबर 2026) में रक्षा सहयोग की समीक्षा हुई, नोमैडिक एलीफेंट अभ्यास और भारत-सहयोगित साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र प्रमुख उपलब्धियाँ रहीं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारत और मंगोलिया के रक्षा मंत्रालयों के संयुक्त कार्य समूह की 14वीं बैठक उलानबातार में आयोजित हुई, जिसमें द्विपक्षीय रक्षा सहयोग गतिविधियों की व्यापक समीक्षा की गई और मौजूदा पहलों में हुई प्रगति का आकलन किया गया। दोनों पक्षों ने दीर्घकालिक रक्षा साझेदारी को निरंतर संवाद के माध्यम से सुदृढ़ बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई। बैठक में नोमैडिक एलीफेंट सैन्य अभ्यास के सफल आयोजन की सराहना की गई, मंगोलियाई सशस्त्र बलों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण में भारत के सहयोग को स्वीकार किया गया, और भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने मंगोलिया के राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में भारत के सहयोग से स्थापित साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र के कामकाज की समीक्षा की। बैठक की सह-अध्यक्षता भारत की ओर से रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव डॉ. इशिता गांगुली त्रिपाठी और मंगोलिया की ओर से रक्षा उप सचिव ब्रिगेडियर जनरल गंसुख ई. ने की।
पृष्ठभूमि
- भारत और मंगोलिया के बीच राजनयिक संबंध वर्ष 1955 में स्थापित हुए थे, और दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत संबंधों की गहरी परंपरा है, जिसमें बौद्ध धर्म की साझा विरासत एक प्रमुख आधार है।
- वर्ष 2015 में दोनों देशों के बीच संबंधों को ‘रणनीतिक साझेदारी’ (Strategic Partnership) के स्तर तक उन्नत किया गया, जिसके बाद रक्षा, सुरक्षा और क्षमता निर्माण सहयोग का दायरा बढ़ा।
- नोमैडिक एलीफेंट अभ्यास भारत और मंगोलिया के बीच होने वाला एक नियमित संयुक्त सैन्य अभ्यास है, जो भारत और मंगोलिया में बारी-बारी से आयोजित होता है।
- मंगोलिया की विदेश नीति में ‘तीसरा पड़ोसी’ की अवधारणा का महत्व है, जिसके अंतर्गत वह रूस और चीन जैसे निकट पड़ोसियों के अतिरिक्त अन्य देशों के साथ संबंधों को विविध बनाने का प्रयास करता है।
- साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में बढ़ते खतरों के बीच सैन्य एवं रक्षा संस्थानों में प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण आवश्यक हो गया है, और इसी संदर्भ में भारत का सहयोग अहम माना जा रहा है।
संयुक्त कार्य समूह और रक्षा सहयोग की व्यवस्था क्या है?
- संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group) दो देशों के रक्षा मंत्रालयों के बीच स्थापित एक द्विपक्षीय तंत्र है, जो रक्षा सहयोग की गतिविधियों की समीक्षा, नई पहलों के सुझाव और सहयोग के क्षेत्रों की पहचान का कार्य करता है।
- ऐसी बैठकें आमतौर पर नियमित अंतराल पर होती हैं, जिनमें पिछली बैठक के निर्णयों के क्रियान्वयन का मूल्यांकन किया जाता है।
- रक्षा सहयोग में सैन्य अभ्यास, सैन्य कर्मियों का प्रशिक्षण, रक्षा विश्वविद्यालयों और प्रशिक्षण संस्थानों के बीच सहयोग, तथा ज्ञान और अनुभव का आदान-प्रदान प्रमुख घटक होते हैं।
- संयुक्त सैन्य अभ्यास देशों के बीच परिचालन समन्वय, पारस्परिक विश्वास और सैन्य अंतरसंचालनीयता (Interoperability) बढ़ाने का माध्यम माने जाते हैं।
- साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र जैसी संस्थाएँ रक्षा बलों को डिजिटल खतरों से निपटने के लिए तैयार करती हैं और क्षमता निर्माण का एक व्यावहारिक रूप हैं।
- रक्षा कूटनीति (Defence Diplomacy) में ऐसे सहयोग का उपयोग राजनीतिक संबंधों को सुदृढ़ करने और क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान देने के लिए किया जाता है।
- भारत की ओर से ऐसे सहयोग का मूल उद्देश्य मित्र देशों की रक्षा क्षमता बढ़ाना और साझा सुरक्षा हितों को आगे बढ़ाना है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| बैठक का स्वरूप | भारत और मंगोलिया के रक्षा मंत्रालयों के संयुक्त कार्य समूह की 14वीं बैठक उलानबातार में हुई। यह द्विपक्षीय रक्षा सहयोग की संस्थागत व्यवस्था का नियमित तंत्र है। |
| सह-अध्यक्षता | भारत की ओर से रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव और मंगोलिया की ओर से रक्षा उप सचिव ने बैठक की सह-अध्यक्षता की। इससे दोनों पक्षों के नीति-स्तरीय अधिकारियों की भागीदारी स्पष्ट होती है। |
| समीक्षा और भविष्य की कार्ययोजना | चालू पहलों की प्रगति का आकलन हुआ और भारत-मंगोलिया रणनीतिक साझेदारी के लिए भविष्यपरक कार्ययोजना बनाने पर चर्चा हुई। |
| नोमैडिक एलीफेंट (Nomadic Elephant) अभ्यास | भारत और मंगोलिया के बीच होने वाला द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास, जिसकी सफलता की दोनों पक्षों ने सराहना की। यह सैन्य अंतर-संचालनीयता और आपसी विश्वास का व्यावहारिक माध्यम है। |
| साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र | मंगोलिया के राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (National Defence University) में भारत के सहयोग से स्थापित केंद्र की कार्यप्रणाली की समीक्षा हुई। यह क्षमता निर्माण का ठोस उदाहरण है। |
| प्रशिक्षण और भाषा सहयोग | मंगोलियाई सशस्त्र बलों के कर्मियों के प्रशिक्षण, क्षमता विकास और भाषा प्रशिक्षण में भारत के सहयोग की मंगोलिया ने सराहना की। |
महत्व
सामरिक महत्व
- मंगोलिया भूभौगोलिक दृष्टि से चीन और रूस के बीच स्थित स्थलरुद्ध (Landlocked) देश है। ऐसे में उसके साथ रक्षा सहयोग भारत की बहु-आयामी विदेश नीति का एक हिस्सा है।
- रक्षा सहयोग से भारत की मध्य एशिया और पूर्वोत्तर एशिया में संवाद-क्षमता बढ़ती है, जो एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy) के व्यापक दायरे से जुड़ती है।
- संयुक्त अभ्यास और प्रशिक्षण से दोनों सेनाओं के बीच परिचालन-स्तर का तालमेल विकसित होता है।
क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकीय सहयोग
- साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र जैसे संस्थान रक्षा क्षेत्र में डिजिटल खतरों से निपटने की साझा क्षमता बनाते हैं।
- सैन्य शिक्षा और भाषा प्रशिक्षण से मंगोलियाई कर्मियों की व्यावसायिक दक्षता बढ़ती है और ज्ञान का आदान-प्रदान गहरा होता है।
कूटनीतिक और सांस्कृतिक आयाम
- दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंध (जैसे बौद्ध परंपरा के माध्यम से जुड़ाव) इस साझेदारी का सामाजिक आधार हैं।
- नियमित संवाद और संस्थागत बैठकें विश्वास-निर्माण के उपाय (Confidence Building Measures) के रूप में कार्य करती हैं।
चुनौतियाँ
1. स्थलरुद्ध भू-राजनीति और दूरी की सीमा
- मंगोलिया के चारों ओर केवल भू-मार्ग हैं और भारत से उसकी भौगोलिक दूरी बड़ी है। इससे सैन्य उपकरणों और प्रशिक्षण दलों की नियमित आवाजाही कठिन होती है।
- सहयोग की गति अक्सर वायु-मार्ग और परिवहन-व्यवस्था पर निर्भर रहती है, जो लागत बढ़ाती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत के विदेश संबंध; GS-1: भूगोल (स्थलरुद्ध देश)
2. साइबर खतरों की बढ़ती जटिलता
- रक्षा प्रतिष्ठानों पर साइबर हमलों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, इसलिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम को लगातार अद्यतन करना पड़ता है।
- प्रशिक्षित जनशक्ति को बनाए रखना और उसका उपयोग सुनिश्चित करना दीर्घकालिक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: आंतरिक सुरक्षा और साइबर सुरक्षा की चुनौतियाँ
3. सहयोग का संस्थागतकरण और निरंतरता
- द्विपक्षीय पहलें अक्सर बैठकों और घोषणाओं तक सीमित रह जाती हैं; उनके परिणामों की वार्षिक समीक्षा और मापन आवश्यक है।
- सरकारों के बदलने या नीतिगत प्राथमिकताओं के बदलने से दीर्घकालिक कार्ययोजनाओं की निरंतरता प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: द्विपक्षीय समझौते और शासन में निरंतरता
4. क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन का प्रभाव
- मंगोलिया के पड़ोसी बड़े देशों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना उसकी विदेश और रक्षा नीति की स्थायी चुनौती है।
- भारत को अपनी साझेदारी को किसी तीसरे देश के विरुद्ध नहीं, बल्कि स्वतंत्र और बहुपक्षीय ढाँचे में प्रस्तुत करना होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत के पड़ोस और क्षेत्रीय संबंध
5. संसाधन और क्षमता की असमानता
- मंगोलिया के सशस्त्र बलों का आकार और बजट सीमित है, इसलिए प्रशिक्षण का प्रभाव सीमित संस्थानों तक ही पहुँच पाता है।
- सैन्य प्रशिक्षण को नागरिक और तकनीकी शिक्षा से जोड़ना एक व्यावहारिक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: विकासशील देशों के साथ क्षमता निर्माण सहयोग
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| भौगोलिक दूरी और परिवहन | सैन्य प्रशिक्षण और उपकरण सहयोग की लागत तथा समय बढ़ता है। |
| साइबर खतरे | तेजी से बदलते खतरों के लिए पाठ्यक्रम और तकनीक का निरंतर उन्नयन आवश्यक है। |
| प्रशिक्षित जनशक्ति का टिकाव | प्रशिक्षित कर्मियों का अन्य क्षेत्रों में चला जाना क्षमता निर्माण के प्रभाव को कम करता है। |
| पहलों के परिणामों का मापन | बैठकों के बावजूद ठोस परिणामों और प्रगति-सूचकों की कमी से सहयोग की प्रभावशीलता का आकलन कठिन होता है। |
| क्षेत्रीय संतुलन | बड़े पड़ोसी देशों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना नीतिगत जटिलता पैदा करता है। |
आगे की राह
- संयुक्त कार्य समूह की बैठकों में प्रगति के लिए स्पष्ट मापन-सूचक (Metrics) तय किए जाएँ और अगली बैठक में उनकी समीक्षा हो।
- साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र के पाठ्यक्रम को नवीनतम खतरों के अनुरूप नियमित रूप से अद्यतन किया जाए।
- नोमैडिक एलीफेंट जैसे अभ्यासों का दायरा क्रमिक रूप से बढ़ाया जाए, ताकि परिचालन-स्तर का तालमेल और गहरा हो।
- भाषा प्रशिक्षण और सैन्य शिक्षा को अकादमिक आदान-प्रदान से जोड़कर दीर्घकालिक मानव-संसाधन क्षमता बनाई जाए।
- साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में सूचना साझाकरण और संयुक्त क्षमता-विकास के लिए स्थायी तंत्र बनाया जाए।
- रक्षा सहयोग को आर्थिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक सहयोग के साथ समन्वित करके व्यापक रणनीतिक साझेदारी का आधार मजबूत किया जाए।
- सहयोग की निरंतरता के लिए द्विपक्षीय समझौतों और कार्ययोजनाओं का नियमित संस्थागत पुनरावलोकन किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
रक्षा कूटनीति (Defence Diplomacy) · भारत-मंगोलिया संयुक्त कार्य समूह · नोमैडिक एलीफेंट (Nomadic Elephant) सैन्य अभ्यास · तीसरा पड़ोसी नीति (Third Neighbour Policy) · क्षमता निर्माण (Capacity Building) · साइबर सुरक्षा (Cyber Security) · भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम (ITEC) · एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy) · स्थलरुद्ध देश (Landlocked Country) · सॉफ्ट पावर (Soft Power) · संघ सूची की प्रविष्टि 1 (Union List, Entry 1) · अनुच्छेद 51 (Article 51) · सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000)
अवधारणा प्रवाह
भारत और मंगोलिया के रक्षा मंत्रालयों के बीच संयुक्त कार्य समूह की स्थापना, जो सहयोग का संस्थागत मंच है। → संयुक्त कार्य समूह की 14वीं बैठक में द्विपक्षीय रक्षा गतिविधियों की व्यापक समीक्षा और भविष्य की कार्ययोजना पर चर्चा। → नोमैडिक एलीफेंट जैसे सैन्य अभ्यास और भारत के सहयोग से स्थापित राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र के माध्यम से व्यावहारिक क्षमता निर्माण। → मंगोलियाई सशस्त्र बलों के प्रशिक्षण, भाषा शिक्षा और साइबर सुरक्षा में सहयोग से पारस्परिक विश्वास और परिचालन-तालमेल में वृद्धि। → विश्वास और परिचालन-तालमेल बढ़ने से दीर्घकालिक रक्षा साझेदारी और भारत-मंगोलिया रणनीतिक साझेदारी का सुदृढ़ीकरण।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 51 के अंतर्गत राज्य से अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने की अपेक्षा की गई है।
2. संघ सूची की प्रविष्टि 1 में ‘भारत की रक्षा’ का उल्लेख है और इस विषय पर विधि बनाने की शक्ति संसद के पास है।
3. मंगोलिया की सीमा भारत से लगती है और वह समुद्र तट वाला देश है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 51 राज्य के नीति-निदेशक तत्वों (भाग IV) में आता है और अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा के संवर्धन की बात करता है। कथन 2 भी सही है, क्योंकि ‘भारत की रक्षा’ संघ सूची की प्रविष्टि 1 है।
कथन 3 गलत है: मंगोलिया भारत से नहीं, बल्कि रूस और चीन से घिरा स्थलरुद्ध देश है और उसकी कोई समुद्र तट सीमा नहीं है।
Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक कथन अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है:
अभिकथन (A): स्थलरुद्ध देश होने के कारण मंगोलिया के लिए समुद्री मार्गों की तुलना में भूमि-आधारित और बहुपक्षीय संबंध विशेष महत्व रखते हैं।
कारण (R): मंगोलिया ने ‘तीसरा पड़ोसी’ की नीति अपनाई है, जिसके अंतर्गत वह रूस और चीन के अतिरिक्त अन्य देशों के साथ संबंध बढ़ाना चाहता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — मंगोलिया स्थलरुद्ध देश है, इसलिए उसके लिए बहुपक्षीय और भूमि-आधारित संबंध महत्वपूर्ण हैं। उसकी ‘तीसरा पड़ोसी’ नीति इसी आवश्यकता से जुड़ी है, जिससे रूस और चीन पर निर्भरता संतुलित होती है।
अतः (R) स्पष्ट रूप से (A) की व्याख्या करता है।
Q3. भारत में साइबर घटनाओं के प्रति प्रतिक्रिया और समन्वय के लिए भारतीय कंप्यूटर आपात प्रतिक्रिया दल (CERT-In) की स्थापना सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की किस धारा के अंतर्गत की गई है?
- धारा 43
- धारा 66A
- धारा 70
- धारा 70B
उत्तर: धारा 70B — CERT-In की वैधानिक स्थिति सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 70B से जुड़ी है, जिसे 2008 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।
धारा 66A को सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल वाद (2015) में असंवैधानिक घोषित किया था, इसलिए वह विकल्प गलत है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत के रक्षा सहयोग का स्वरूप अब केवल हथियारों की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहा है; प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्र इसके केंद्र में आ गए हैं। भारत-मंगोलिया संयुक्त कार्य समूह की हाल की बैठक के संदर्भ में इस प्रवृत्ति का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि छोटे और स्थलरुद्ध साझेदार देशों के साथ क्षमता निर्माण पर आधारित रक्षा सहयोग भारत की विदेश नीति के उद्देश्यों को किस प्रकार आगे बढ़ा सकता है? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर-संरचना:
(क) परिचय: रक्षा कूटनीति (Defence Diplomacy) को सॉफ्ट पावर (Soft Power) के एक उपकरण के रूप में रखें; 14वीं संयुक्त कार्य समूह बैठक (उलानबातार, 16 अक्टूबर 2026) में व्यापक समीक्षा, नोमैडिक एलीफेंट अभ्यास, सह-अध्यक्षता (संयुक्त सचिव और मंगोलियाई रक्षा उप सचिव) और ‘भविष्यपरक कार्ययोजना’ का उल्लेख करें।
(ख) संवैधानिक व संस्थागत आधार: अनुच्छेद 51 (अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा का संवर्धन); संघ सूची की प्रविष्टि 1 (भारत की रक्षा) जिसके अंतर्गत रक्षा नीति का अधिकार संघ के पास है; अनुच्छेद 73 के अंतर्गत संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार; विदेश मंत्रालय का भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग कार्यक्रम (ITEC) जो तृतीय देशों को प्रशिक्षण देता है।
(ग) प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के ठोस उदाहरण: मंगोलिया के सशस्त्र बलों के कर्मियों का प्रशिक्षण; राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (National Defence University, Mongolia) में भारत-सहयोग से स्थापित साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण केंद्र; भाषा प्रशिक्षण। साइबर सुरक्षा के संदर्भ में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (धारा 70B, CERT-In) और राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति, 2013 का उल्लेख करें।
(घ) विश्लेषण—पक्ष: ‘तीसरा पड़ोसी’ नीति के अंतर्गत मंगोलिया का रूस-चीन संतुलन; एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy) के साथ निरंतरता; प्रशिक्षण से भरोसे और परिचालन-समन्वय (interoperability) में वृद्धि; सॉफ्ट पावर का विस्तार।
(ङ) विश्लेषण—सीमाएँ/आलोचनात्मक दृष्टि: परियोजनाओं की दीर्घकालिक स्थिरता और स्थानीय स्वामित्व का प्रश्न; समीक्षा-आधारित प्रगति बनाम ठोस परिणाम (outcome) का अंतर; वित्तीय सीमाएँ; संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांत के साथ संतुलन; ‘घोषणा’ और ‘क्रियान्वयन’ के बीच अंतर। इसके लिए सुशासन-आधारित मूल्यांकन और नियमित समीक्षा तंत्र की आवश्यकता पर बल दें।
(च) निष्कर्ष: क्षमता निर्माण आधारित रक्षा सहयोग को अधिक विश्वसनीय बनाने हेतु स्पष्ट मापदंड, संस्थागत निरंतरता और नागरिक-सैन्य समन्वय का सुझाव दें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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