05 Aug महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर विशेष संसदीय सत्र: सरकार का स्पष्टीकरण
✎ महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व और समानता के सिद्धांतों को सुदृढ़ करने के महत्त्वपूर्ण प्रयास हैं, जिनके लिए संवैधानिक संशोधनों और व्यापक राजनीतिक सहमति की आवश्यकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय
- Prelims: महिला आरक्षण विधेयक, परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 330, अनुच्छेद 332, संसद सत्र, विशेष सत्र
- Essay: भारत में लैंगिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व, लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का महत्त्व
त्वरित पुनरावृत्ति: महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व और समानता के सिद्धांतों को सुदृढ़ करने के महत्त्वपूर्ण प्रयास हैं, जिनके लिए संवैधानिक संशोधनों और व्यापक राजनीतिक सहमति की आवश्यकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, मीडिया में ऐसी खबरें थीं कि सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों पर विचार करने के लिए 16 से 18 अगस्त तक तीन दिवसीय विशेष संसद सत्र बुलाएगी। हालांकि, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इन खबरों का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि संसद सत्र की तिथियों का विस्तार करने या इन विधेयकों पर कोई विशेष सत्र बुलाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। यह घोषणा मानसून सत्र के दौरान हुई, जिसमें विपक्षी दल दिल्ली पुलिस द्वारा छात्रों पर कथित बल प्रयोग को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री से बयान की मांग कर रहे थे।
पृष्ठभूमि
- महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना है।
- यह विधेयक दशकों से लंबित है और इसे विभिन्न सरकारों द्वारा पेश करने का प्रयास किया गया है, लेकिन आम सहमति की कमी के कारण यह पारित नहीं हो सका है।
- परिसीमन विधेयक का संबंध निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण से है ताकि जनसंख्या में बदलाव को दर्शाया जा सके और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखा जा सके।
- परिसीमन प्रत्येक जनगणना के बाद किया जाता है और इसका उद्देश्य सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या को लगभग समान करना है।
- पिछला बड़ा परिसीमन 2002 में हुआ था, जिसके बाद 2026 तक सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया गया था।
- संसद का विशेष सत्र सामान्य सत्रों (जैसे बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र) के अतिरिक्त होता है और इसे किसी विशिष्ट, महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा के लिए बुलाया जाता है।
महिला आरक्षण और परिसीमन क्या हैं?
- महिला आरक्षण विधेयक एक विधायी प्रस्ताव है जिसका उद्देश्य भारत की संसद (लोकसभा) और सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए कुल सीटों का एक-तिहाई (33 प्रतिशत) आरक्षित करना है।
- इस आरक्षण में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की महिलाओं के लिए उप-आरक्षण का भी प्रावधान है।
- इस विधेयक को पारित करने के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में संशोधन करेगा जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण से संबंधित हैं।
- परिसीमन (Delimitation) का अर्थ है किसी देश या एक विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण या पुनर्निर्धारण करना।
- भारत में, परिसीमन का कार्य एक उच्च-शक्ति वाले निकाय, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के समान खंडों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना और भौगोलिक क्षेत्रों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत, प्रत्येक जनगणना के बाद संसद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है।
- परिसीमन आयोग की संरचना में सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं।
- वर्तमान में, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक स्थगित कर दिया गया है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| महिला आरक्षण विधेयक | महिलाओं को विधायी निकायों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्रदान करने का प्रयास। |
| परिसीमन विधेयक | विधायी निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन, जनसंख्या परिवर्तन को दर्शाता है। |
| विशेष सत्र की आवश्यकता | महत्वपूर्ण विधायी कार्यों को निपटाने के लिए सामान्य सत्र से परे अतिरिक्त समय। |
| संसदीय गतिरोध | विभिन्न मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच असहमति के कारण विधायी कार्यवाही में बाधा। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य राजनीतिक निर्णय लेने में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है, जिससे लैंगिक समानता और समावेशी शासन को बढ़ावा मिलेगा।
- परिसीमन विधेयक का कार्यान्वयन निर्वाचन क्षेत्रों की जनसांख्यिकी को अद्यतन करेगा, जिससे ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
- संसदीय सत्रों के दौरान सरकार और विपक्ष के बीच संवाद और सहयोग विधायी प्रक्रिया की सुचारु कार्यप्रणाली के लिए महत्वपूर्ण है।
सामाजिक महत्व
- विधायी निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ने से समाज में महिलाओं की स्थिति मजबूत होगी और उनके मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया जा सकेगा।
- परिसीमन से समाज के विभिन्न वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी, खासकर तेजी से बदलती शहरी और ग्रामीण आबादी के संदर्भ में।
प्रशासनिक महत्व
- विशेष सत्र बुलाने या न बुलाने का निर्णय सरकार की विधायी प्राथमिकताओं और संसदीय एजेंडे को दर्शाता है।
- संसदीय गतिरोध को हल करने के लिए सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत विधायी कार्यों को समय पर पूरा करने के लिए आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. महिला आरक्षण विधेयक का कार्यान्वयन
- विधेयक के पारित होने के बाद भी, इसके कार्यान्वयन के लिए परिसीमन की आवश्यकता हो सकती है, जिसमें समय लग सकता है।
- आरक्षण के भीतर उप-आरक्षण (जैसे अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए) पर आम सहमति बनाना एक चुनौती हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, महिला सशक्तिकरण
2. परिसीमन प्रक्रिया की जटिलता
- परिसीमन एक संवेदनशील प्रक्रिया है क्योंकि यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सीधे प्रभावित करती है और इसमें विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों के बीच सीटों के पुनर्वितरण पर विवाद हो सकता है।
- जनसंख्या डेटा के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन राजनीतिक दलों और हितधारकों के लिए स्वीकार्य होना चाहिए।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था, चुनाव आयोग
3. संसदीय गतिरोध और सहमति का अभाव
- विभिन्न मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने में बाधा डाल सकता है।
- महत्वपूर्ण विधायी सुधारों के लिए राजनीतिक सहमति बनाना एक बड़ी चुनौती है, खासकर जब प्रमुख दल अलग-अलग रुख अपनाते हैं।
यूपीएससी लिंक: संसद की कार्यप्रणाली, राजनीतिक दल
4. दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र
- दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण, दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करती है, जिससे राज्य बनाम केंद्र के अधिकार क्षेत्र के मुद्दे उठ सकते हैं।
- विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल के कथित उपयोग पर जवाबदेही तय करना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: केंद्र-राज्य संबंध, कानून और व्यवस्था
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| महिला आरक्षण का कार्यान्वयन | परिसीमन की आवश्यकता और उप-आरक्षण पर आम सहमति का अभाव। |
| परिसीमन की संवेदनशीलता | राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर प्रभाव और विभिन्न राज्यों के बीच सीटों के पुनर्वितरण पर विवाद। |
| संसदीय गतिरोध | महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने में देरी और विधायी प्रक्रिया में बाधा। |
| दिल्ली पुलिस का अधिकार क्षेत्र | केंद्र शासित प्रदेश में कानून और व्यवस्था पर केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण और जवाबदेही के मुद्दे। |
आगे की राह
- महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विधायी सुधारों पर राजनीतिक सहमति बनाने के लिए सरकार और विपक्ष के बीच निरंतर संवाद और परामर्श आवश्यक है।
- संसदीय कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने और गतिरोध को तोड़ने के लिए सभी राजनीतिक दलों को रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
- महिला आरक्षण विधेयक के कार्यान्वयन के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें परिसीमन प्रक्रिया और संभावित उप-आरक्षण पर विचार शामिल हों।
- परिसीमन प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से आयोजित किया जाना चाहिए, जिसमें सभी हितधारकों की चिंताओं को दूर किया जा सके।
- विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल के उपयोग जैसे मुद्दों पर सरकार को संसद में स्पष्टीकरण देना चाहिए और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।
- संसदीय समितियों का प्रभावी ढंग से उपयोग करके विधेयकों की गहन जांच की जानी चाहिए, जिससे बेहतर कानून निर्माण सुनिश्चित हो सके।
- विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण के साथ-साथ, जमीनी स्तर पर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए अन्य उपायों पर भी ध्यान देना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
महिला आरक्षण विधेयक · परिसीमन विधेयक · संसद का विशेष सत्र · संवैधानिक संशोधन · लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व · समानता का अधिकार · संघवाद · विधायी प्रक्रिया · अनुच्छेद 330A · अनुच्छेद 332A
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘विधानसभाओं के लिए परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 239AA’, ‘note’: ‘दिल्ली के संबंध में विशेष प्रावधान’}
अवधारणा प्रवाह
मीडिया रिपोर्टों में विशेष संसदीय सत्र की खबर → सरकार द्वारा विशेष सत्र की खबरों का खंडन → महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों पर चर्चा की संभावना → संसदीय गतिरोध और विपक्ष की मांगें → सरकार और विपक्ष के बीच संवाद का प्रयास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान में ‘विशेष सत्र’ शब्द स्पष्ट रूप से परिभाषित है।
2. महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करना है।
3. परिसीमन आयोग का गठन भारत में जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने के लिए किया जाता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि भारतीय संविधान में ‘विशेष सत्र’ शब्द स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है, हालांकि संसद को सत्र बुलाने का अधिकार है। कथन 2 सही है क्योंकि महिला आरक्षण विधेयक का मुख्य उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करना है। कथन 3 सही है क्योंकि परिसीमन आयोग का कार्य जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन करना है।
Q2. अभिकथन (A): महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक दोनों को पारित करने के लिए संसद में संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी।
कारण (R): ये विधेयक संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित करते हैं और इसलिए इन्हें विशेष बहुमत से पारित किया जाना चाहिए।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A सही है, लेकिन R गलत है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित विधेयकों को संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी, विशेषकर यदि वे सीटों के आरक्षण या निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन से संबंधित हैं। हालांकि, कारण (R) गलत है क्योंकि इन विधेयकों को पारित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी, लेकिन यह कहना गलत है कि वे सीधे संविधान के ‘मूल ढांचे’ को प्रभावित करते हैं, बल्कि वे संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव करते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं के प्रतिनिधित्व और चुनावी भूगोल को कैसे प्रभावित कर सकते हैं? इन विधेयकों से जुड़े संवैधानिक और राजनीतिक निहितार्थों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक का संक्षिप्त परिचय देते हुए भारतीय लोकतंत्र में उनके महत्व को रेखांकित करें।
2. महिला आरक्षण विधेयक का प्रभाव: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण से लैंगिक समानता, निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक-राजनीतिक सशक्तिकरण पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा करें।
3. परिसीमन विधेयक का प्रभाव: निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्गठन, जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व के समायोजन और इसके क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व तथा राजनीतिक शक्ति संतुलन पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करें।
4. संवैधानिक निहितार्थ: अनुच्छेद 330A और 332A (यदि प्रस्तावित हों) जैसे संभावित संवैधानिक संशोधनों, विशेष बहुमत की आवश्यकता और संघवाद पर इसके प्रभावों पर चर्चा करें।
5. राजनीतिक निहितार्थ: राजनीतिक दलों पर प्रभाव, चुनावी रणनीतियों में बदलाव, सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व और सत्ता के विकेंद्रीकरण पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करें।
6. चुनौतियाँ और आलोचनाएँ: इन विधेयकों से जुड़ी संभावित चुनौतियों जैसे कि आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग, रोटेशन नीति, और परिसीमन की राजनीतिक प्रकृति पर चर्चा करें।
7. निष्कर्ष: भारतीय लोकतंत्र में इन विधेयकों के दूरगामी प्रभावों का सारांश प्रस्तुत करें और एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें।
स्रोत: Times of India
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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