08 Sep मॉनसून की कमी से खरीफ फसलों का रकबा घटकर 1,086.31 लाख हेक्टेयर

✎ मानसून की कमी और अल नीनो के प्रभाव से चालू खरीफ सीजन में कुल फसल रकबे में गिरावट आई है, विशेषकर धान के क्षेत्र में, जबकि दालों के रकबे में मामूली वृद्धि दर्ज की गई है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि, खाद्य प्रसंस्करण और संबंधित उद्योग)
- Prelims: खरीफ फसलें, मानसून, अल नीनो, कृषि मंत्रालय, फसल विविधीकरण, खाद्य सुरक्षा
- Essay: भारत में कृषि क्षेत्र की चुनौतियाँ और समाधान, जलवायु परिवर्तन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
त्वरित पुनरावृत्ति: मानसून की कमी और अल नीनो के प्रभाव से चालू खरीफ सीजन में कुल फसल रकबे में गिरावट आई है, विशेषकर धान के क्षेत्र में, जबकि दालों के रकबे में मामूली वृद्धि दर्ज की गई है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, चालू खरीफ सीजन में कुल खरीफ फसलों का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में घटकर 1,086.31 लाख हेक्टेयर हो गया है। यह गिरावट मुख्य रूप से अल नीनो (El Nino) मौसम पैटर्न के प्रतिकूल प्रभाव के कारण इस वर्ष मानसून की कमी को जिम्मेदार ठहराया गया है। विशेष रूप से धान के रकबे में कमी देखी गई है, जबकि दालों के रकबे में मामूली वृद्धि हुई है।
पृष्ठभूमि
- खरीफ फसलें वे फसलें हैं जिनकी बुवाई मानसून की शुरुआत के साथ जून-जुलाई में की जाती है और कटाई सितंबर-अक्टूबर में होती है। इनमें धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी, सोयाबीन, मूंगफली, कपास और जूट प्रमुख हैं।
- भारतीय कृषि मानसून पर अत्यधिक निर्भर है, और मानसून की कमी या अनियमितता का सीधा प्रभाव कृषि उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ता है।
- अल नीनो एक जटिल मौसम पैटर्न है जो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ा है, जिसका वैश्विक मौसम पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, जिसमें भारत में मानसून की वर्षा में कमी भी शामिल है।
- भारत सरकार विभिन्न योजनाओं और नीतियों के माध्यम से कृषि उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय स्थिर करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने का प्रयास करती है।
- फसल विविधीकरण (Crop Diversification) और कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों को बढ़ावा देना मानसून की अनिश्चितता से निपटने के लिए महत्वपूर्ण रणनीतियाँ हैं।
- खाद्य सुरक्षा (Food Security) सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन की स्थिरता अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर भारत जैसे बड़े जनसंख्या वाले देश में।
- कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (Ministry of Agriculture and Farmers Welfare) देश में कृषि नीतियों, कार्यक्रमों और आंकड़ों के लिए नोडल एजेंसी है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| खरीफ फसल कवरेज में गिरावट | चालू खरीफ सीजन में कुल बुवाई क्षेत्र में 1,086.31 लाख हेक्टेयर तक की कमी, जो पिछले वर्ष के 1,104 लाख हेक्टेयर से कम है। यह खाद्य सुरक्षा और कृषि आय पर संभावित नकारात्मक प्रभाव का संकेत है। |
| धान के क्षेत्र में कमी | धान के बुवाई क्षेत्र में उल्लेखनीय गिरावट (438.19 लाख हेक्टेयर से 421.82 लाख हेक्टेयर), मुख्य रूप से कर्नाटक, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में। यह भारत की मुख्य खाद्य फसल के उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। |
| दालों के क्षेत्र में वृद्धि | उड़द और मूंग जैसी दालों के बुवाई क्षेत्र में 1.83 लाख हेक्टेयर की वृद्धि, क्योंकि इन फसलों को कम पानी की आवश्यकता होती है। यह सूखे जैसी स्थिति में किसानों द्वारा फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को दर्शाता है। |
| मोटे अनाजों (Millets) के क्षेत्र में गिरावट | ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मोटे अनाजों के क्षेत्र में कमी (182.48 लाख हेक्टेयर से 181.39 लाख हेक्टेयर)। यह पोषक तत्वों से भरपूर फसलों के उत्पादन को प्रभावित कर सकता है, जो अक्सर शुष्क क्षेत्रों में उगाए जाते हैं। |
| अल नीनो का प्रभाव | मानसून की कमी और अल नीनो (El Nino) मौसम पैटर्न के प्रतिकूल प्रभाव को फसल कवरेज में गिरावट का मुख्य कारण बताया गया है। यह जलवायु परिवर्तन के कृषि पर सीधे प्रभाव को उजागर करता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्र में कमी से कृषि उत्पादन में गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों की आय प्रभावित होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
- धान जैसी प्रमुख खाद्य फसलों के उत्पादन में कमी से खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) बढ़ सकती है, जिससे उपभोक्ताओं पर बोझ पड़ेगा और सरकार पर मूल्य नियंत्रण के लिए दबाव बढ़ेगा।
- कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में महत्वपूर्ण योगदान है, और खरीफ उत्पादन में गिरावट से समग्र आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) धीमी हो सकती है।
सामाजिक महत्व
- फसल की पैदावार में कमी से ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य असुरक्षा बढ़ सकती है, विशेषकर सीमांत और छोटे किसानों के लिए जो अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं।
- किसानों की आय में गिरावट से ग्रामीण गरीबी बढ़ सकती है और कृषि संकट गहरा सकता है, जिससे सामाजिक अशांति की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- पानी की कमी के कारण फसल पैटर्न में बदलाव (जैसे दालों की ओर) किसानों के लिए नए जोखिम और अवसर पैदा कर सकता है, जिसके लिए अनुकूलन रणनीतियों की आवश्यकता होगी।
पर्यावरणीय महत्व
- मानसून की कमी और अल नीनो जैसे मौसमी पैटर्न जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को दर्शाते हैं, जो कृषि प्रणालियों की भेद्यता (Vulnerability) को उजागर करते हैं।
- पानी की कमी से भूजल (Groundwater) का अत्यधिक दोहन हो सकता है, जिससे दीर्घकालिक जल सुरक्षा चुनौतियां पैदा होंगी और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है।
- फसल विविधीकरण और कम पानी वाली फसलों को अपनाने से कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीला बनाने में मदद मिल सकती है।
चुनौतियाँ
1. जलवायु परिवर्तन और मानसून की अनिश्चितता
- अल नीनो जैसे मौसमी पैटर्न के कारण मानसून की वर्षा में कमी और अनिश्चितता, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई और वृद्धि प्रभावित होती है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक मौसम की घटनाओं (जैसे सूखा, बाढ़) की बढ़ती आवृत्ति, जो कृषि उत्पादन के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है।
यूपीएससी लिंक: भूगोल: जलवायु परिवर्तन; कृषि: फसल पैटर्न
2. जल संसाधन प्रबंधन
- सिंचाई के लिए पर्याप्त जल संसाधनों की कमी, विशेषकर वर्षा-आधारित कृषि (Rainfed Agriculture) वाले क्षेत्रों में, जिससे फसलें मानसून पर अत्यधिक निर्भर हो जाती हैं।
- भूजल के अत्यधिक दोहन और जल संरक्षण तकनीकों की कमी, जिससे दीर्घकालिक जल सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न होती हैं।
यूपीएससी लिंक: भूगोल: जल संसाधन; कृषि: सिंचाई
3. कृषि विविधीकरण और फसल पैटर्न
- किसानों द्वारा पारंपरिक रूप से अधिक पानी वाली फसलों (जैसे धान) पर निर्भरता, जिससे मानसून की कमी के प्रति भेद्यता बढ़ जाती है।
- कम पानी वाली और जलवायु-लचीली फसलों (जैसे दालें, मोटे अनाज) को अपनाने में चुनौतियां, जिनमें बाजार पहुंच और मूल्य समर्थन की कमी शामिल है।
यूपीएससी लिंक: कृषि: फसल पैटर्न; खाद्य सुरक्षा
4. किसानों की आय और ऋणग्रस्तता
- फसल उत्पादन में कमी से किसानों की आय में गिरावट आती है, जिससे ऋण चुकाने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है और ऋणग्रस्तता बढ़ती है।
- छोटे और सीमांत किसानों के लिए बीमा और ऋण सुविधाओं तक सीमित पहुंच, जिससे वे मौसमी झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: कृषि क्षेत्र; सामाजिक न्याय: गरीबी
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| खरीफ कवरेज में गिरावट | खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव। |
| धान के क्षेत्र में कमी | भारत की मुख्य खाद्य फसल के उत्पादन में संभावित गिरावट और खाद्य मुद्रास्फीति का जोखिम। |
| मानसून की कमी और अल नीनो | जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव और कृषि प्रणालियों की भेद्यता। |
| जल प्रबंधन की चुनौतियां | सिंचाई के लिए पानी की कमी और भूजल के अत्यधिक दोहन का जोखिम। |
| फसल विविधीकरण की आवश्यकता | जलवायु-लचीली फसलों को अपनाने और बाजार पहुंच सुनिश्चित करने की चुनौती। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)
- परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY)
- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY)
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM)
आगे की राह
- जलवायु-लचीली कृषि पद्धतियों (Climate-Resilient Agricultural Practices) को बढ़ावा देना, जिसमें सूखे प्रतिरोधी फसलों की किस्मों का विकास और प्रसार शामिल है।
- सिंचाई के बुनियादी ढांचे का विस्तार करना और जल-बचत तकनीकों (जैसे ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर) को लोकप्रिय बनाना, साथ ही वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को बढ़ावा देना।
- किसानों को फसल विविधीकरण के लिए प्रोत्साहित करना, विशेषकर कम पानी वाली फसलों जैसे दालों और मोटे अनाजों को अपनाने के लिए, और उनके लिए बाजार लिंकेज सुनिश्चित करना।
- कृषि ऋण और फसल बीमा योजनाओं तक किसानों की पहुंच में सुधार करना, ताकि उन्हें मौसमी झटकों से होने वाले नुकसान से बचाया जा सके।
- मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों (Weather Forecasting Systems) को मजबूत करना और किसानों को समय पर और सटीक जानकारी प्रदान करना ताकि वे बुवाई और फसल प्रबंधन के बारे में सूचित निर्णय ले सकें।
- कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना ताकि जलवायु परिवर्तन के अनुकूल नई प्रौद्योगिकियों और फसल किस्मों को विकसित किया जा सके।
- किसानों के लिए आय सहायता योजनाओं को सुदृढ़ करना ताकि फसल खराब होने की स्थिति में उनकी आजीविका सुनिश्चित की जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
खरीफ फसलें · मानसून की कमी · एल नीनो प्रभाव · कृषि क्षेत्र · खाद्य सुरक्षा · जलवायु परिवर्तन · फसल विविधीकरण · सिंचाई सुविधाएँ · किसानों की आय · कृषि नीतियाँ
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण (कृषि राज्य सूची का विषय)’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 38’, ‘note’: ‘राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 47’, ‘note’: ‘पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार’}
अवधारणा प्रवाह
अल नीनो प्रभाव और मानसून की कमी → खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्र में गिरावट → कृषि उत्पादन में कमी और किसानों की आय पर प्रभाव → खाद्य मुद्रास्फीति और खाद्य सुरक्षा चिंताएं → ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समग्र आर्थिक संवृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. खरीफ फसलों की बुवाई का क्षेत्र पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष कम हुआ है।
2. दालों के बुवाई क्षेत्र में वृद्धि हुई है क्योंकि उन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है।
3. एल नीनो (El Nino) मौसम पैटर्न को मानसून की कमी का एक प्रमुख कारण माना जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि खरीफ फसलों का कुल बुवाई क्षेत्र 1,086.31 लाख हेक्टेयर से घटकर 1,104 लाख हेक्टेयर हो गया है। कथन 2 सही है क्योंकि दालों का बुवाई क्षेत्र 115.30 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 117.13 लाख हेक्टेयर हो गया है, जिसका कारण उनकी कम पानी की आवश्यकता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि एल नीनो को मानसून की कमी के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।
Q2. खरीफ फसलों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
- चावल: प्रमुख खरीफ फसल
- दालें: कम पानी की आवश्यकता वाली फसलें
- मोटे अनाज: ज्वार, बाजरा, रागी
- गन्ना: केवल खरीफ मौसम में बोई जाने वाली फसल
उत्तर: गन्ना: केवल खरीफ मौसम में बोई जाने वाली फसल — गन्ना एक वार्षिक फसल है जिसे खरीफ मौसम से पहले बोया जाता है और यह केवल खरीफ मौसम तक सीमित नहीं है। अन्य सभी युग्म सही सुमेलित हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मानसून की कमी के कारण खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्र में आई गिरावट के प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए जा सकने वाले संभावित कदमों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: खरीफ फसलों के बुवाई क्षेत्र में गिरावट के हालिया आंकड़ों का उल्लेख करें और मानसून की कमी व एल नीनो प्रभाव को इसका कारण बताएं।
2. प्रभावों का विश्लेषण:
क. कृषि उत्पादन पर प्रभाव: चावल, मोटे अनाज, तिलहन और कपास जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन में संभावित कमी।
ख. खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव: खाद्यान्न की उपलब्धता और कीमतों पर असर, विशेषकर कमजोर वर्गों के लिए।
ग. किसानों की आय पर प्रभाव: फसल खराब होने या कम उत्पादन के कारण किसानों की आय में कमी और ग्रामीण संकट।
घ. अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव: कृषि क्षेत्र के GDP में योगदान पर असर, मुद्रास्फीति का दबाव, ग्रामीण मांग में कमी।
ङ. जल संसाधनों पर दबाव: भूजल के अत्यधिक दोहन की संभावना।
3. संभावित सरकारी कदम:
क. सिंचाई सुविधाओं का विस्तार: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) जैसी योजनाओं को मजबूत करना, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर) को बढ़ावा देना।
ख. फसल विविधीकरण: कम पानी वाली फसलों (जैसे दालें, मोटे अनाज) को बढ़ावा देना, किसानों को वैकल्पिक फसलों के लिए प्रोत्साहित करना।
ग. बीज और उर्वरक सहायता: किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज और उर्वरक उपलब्ध कराना, सब्सिडी प्रदान करना।
घ. फसल बीमा: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत कवरेज और दावों के निपटान में सुधार।
ङ. मौसम पूर्वानुमान और सलाह: किसानों को सटीक मौसम पूर्वानुमान और कृषि सलाह समय पर उपलब्ध कराना।
च. जल संचयन और प्रबंधन: वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) संरचनाओं का निर्माण और जल-कुशल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना।
छ. अनुसंधान और विकास: सूखा प्रतिरोधी और जलवायु-लचीली फसल किस्मों का विकास।
4. निष्कर्ष: इन चुनौतियों का सामना करने के लिए एक समग्र और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें, जिसमें दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन रणनीतियाँ शामिल हों।
स्रोत: orissapost.com
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