यूपीएससी/पीसीएस: उत्तराखंड में एसटी/एससी अत्याचार मामलों पर सीएम धामी के निर्देश, त्वरित न्याय पर जोर

देहरादून: पीड़ितों को न्याय में नहीं होगी देरी, ST/SC अत्याचार के लंबित मामलों पर मुख्यमंत्री धामी सख्त — diagram

यूपीएससी/पीसीएस: उत्तराखंड में एसटी/एससी अत्याचार मामलों पर सीएम धामी के निर्देश, त्वरित न्याय पर जोर

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SC/ST अत्याचार मामलों की सुनवाई प्रक्रिया

✎ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का मुख्य उद्देश्य SC/ST समुदायों के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना, पीड़ितों को न्याय दिलाना और उनके पुनर्वास को सुनिश्चित करना है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा
  • Prelims: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, राज्य स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति, विशेष न्यायालय, राहत राशि, डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम, मानवाधिकार
  • Essay: सामाजिक न्याय और समावेशी विकास, कानून का शासन और कमजोर वर्गों का संरक्षण

त्वरित पुनरावृत्ति: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का मुख्य उद्देश्य SC/ST समुदायों के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना, पीड़ितों को न्याय दिलाना और उनके पुनर्वास को सुनिश्चित करना है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए गठित राज्य स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति की बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने लंबित मामलों की त्वरित जांच, पीड़ितों को समय पर न्याय, सुरक्षा और राहत राशि के भुगतान में देरी न करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करने और पुलिस व अभियोजन विभाग के अधिकारियों के नियमित प्रशिक्षण पर भी जोर दिया।

पृष्ठभूमि

  • भारत में अनुसूचित जाति (Scheduled Castes) और अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) समुदायों के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकने और उन्हें न्याय दिलाने के लिए कई कानून और नीतियां बनाई गई हैं।
  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Prevention of Atrocities Act, 1989) इस दिशा में एक महत्वपूर्ण विधायी कदम है, जिसका उद्देश्य इन समुदायों के प्रति होने वाले अपराधों को रोकना और पीड़ितों को राहत व पुनर्वास प्रदान करना है।
  • इस अधिनियम के तहत, राज्य सरकारों को विशेष न्यायालयों (Special Courts) की स्थापना करने और विशेष लोक अभियोजकों (Special Public Prosecutors) की नियुक्ति करने का अधिकार है ताकि मामलों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित की जा सके।
  • अधिनियम में पीड़ितों को आर्थिक सहायता, चिकित्सा, शिक्षा और पुनर्वास सहित विभिन्न प्रकार की राहत प्रदान करने का प्रावधान है।
  • कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी के लिए राज्य और जिला स्तर पर सतर्कता एवं निगरानी समितियों (Vigilance and Monitoring Committees) का गठन किया जाता है।
  • अधिनियम में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं ताकि इसे और अधिक सशक्त बनाया जा सके, जैसे कि 2015 और 2018 के संशोधन, जिन्होंने अपराधों की सूची का विस्तार किया और पीड़ितों के अधिकारों को मजबूत किया।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 क्या है?

  • यह अधिनियम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकने, ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों का प्रावधान करने और पीड़ितों को राहत व पुनर्वास प्रदान करने के लिए बनाया गया है।
  • अधिनियम में विभिन्न प्रकार के अपराधों को परिभाषित किया गया है, जैसे कि शारीरिक हानि पहुंचाना, अपमानित करना, संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, आर्थिक या सामाजिक बहिष्कार करना आदि।
  • यह अधिनियम ‘अत्याचार’ शब्द को व्यापक रूप से परिभाषित करता है, जिसमें केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार भी शामिल है।
  • अधिनियम के तहत, ऐसे अपराधों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है, जिसमें कारावास और जुर्माना शामिल है।
  • राज्य सरकारों को अधिनियम के तहत मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए प्रत्येक जिले में विशेष न्यायालय स्थापित करने और विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति करने का निर्देश दिया गया है।
  • पीड़ितों को तत्काल राहत प्रदान करने के लिए अधिनियम में आर्थिक सहायता, चिकित्सा देखभाल, पुनर्वास और सुरक्षा उपायों का प्रावधान है।
  • अधिनियम के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए राज्य और जिला स्तर पर सतर्कता एवं निगरानी समितियों का गठन किया जाता है, जो मामलों की प्रगति और पीड़ितों को मिलने वाली सहायता की समीक्षा करती हैं।
  • अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि पुलिस अधिकारियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों को अधिनियम के तहत अपराधों की जांच और पीड़ितों को सहायता प्रदान करने के लिए संवेदनशील और प्रशिक्षित किया जाए।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राज्य स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति की बैठक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रभावी क्रियान्वयन की समीक्षा और दिशा-निर्देश।
लंबित विवेचनाओं की समीक्षा अत्याचार के मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित करने और देरी के कारणों का पता लगाने हेतु।
विशेष न्यायालयों में लंबित मामलों की नियमित समीक्षा न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने और विशेष लोक अभियोजकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए।
राहत राशि के भुगतान में तेजी पीड़ितों को समय पर आर्थिक सहायता प्रदान करने और उनकी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने हेतु।
डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम का विकास विवेचना, न्यायालय की स्थिति, राहत राशि और अन्य सहायता की प्रभावी निगरानी के लिए।
प्रशिक्षण का प्रावधान पुलिस, समाज कल्याण और अभियोजन विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों को अधिनियम और संवेदनशील मामलों की विवेचना के संबंध में प्रशिक्षित करना।

महत्व

सामाजिक न्याय

  • यह पहल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकने और पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने में सहायक होगी।
  • राहत राशि का समय पर भुगतान और पुनर्वास सहायता सुनिश्चित करके प्रभावित परिवारों को सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

शासन और प्रशासन

  • डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम के माध्यम से मामलों की प्रभावी निगरानी से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
  • विभिन्न विभागों (पुलिस, प्रशासन, अभियोजन) के बीच बेहतर समन्वय से मामलों के निपटान में दक्षता आएगी।

मानवाधिकार

  • यह सुनिश्चित करना कि अत्याचार से प्रभावित प्रत्येक व्यक्ति को समय पर न्याय, सुरक्षा और सम्मान मिले, मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।
  • पीड़ितों के बच्चों की शिक्षा और परिवार की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करना उनके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करता है।

चुनौतियाँ

1. लंबित मामलों का बोझ

  • बड़ी संख्या में लंबित विवेचनाएं और न्यायालयों में विचाराधीन मामले न्याय में देरी का कारण बनते हैं।
  • मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे की कमी से मामलों के त्वरित निपटान में बाधा आती है।

2. समन्वय की कमी

  • पुलिस, अभियोजन और समाज कल्याण विभागों के बीच प्रभावी समन्वय का अभाव मामलों की प्रगति को धीमा कर सकता है।
  • सूचनाओं के आदान-प्रदान और संयुक्त कार्यप्रणाली में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं।

3. जागरूकता और संवेदनशीलता

  • अधिनियम के प्रावधानों और संवेदनशील मामलों की विवेचना के संबंध में अधिकारियों और कर्मचारियों में पर्याप्त जागरूकता और संवेदनशीलता की कमी हो सकती है।
  • पीड़ितों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण का अभाव न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

4. पुनर्वास और सहायता का विस्तार

  • राहत राशि के भुगतान के अलावा, चिकित्सा, शिक्षा, सुरक्षा और पुनर्वास जैसी व्यापक सहायता का प्रभावी ढंग से विस्तार करना एक चुनौती है।
  • सरकारी योजनाओं से प्रभावित परिवारों को जोड़ने में नौकरशाही बाधाएं आ सकती हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
विवेचना में देरी न्याय प्रक्रिया में विलंब, पीड़ितों का मनोबल गिरना।
विशेष न्यायालयों में लंबित मामले न्यायिक प्रणाली पर बोझ, त्वरित न्याय की अवधारणा को कमजोर करना।
राहत राशि के भुगतान में विलंब पीड़ितों की तात्कालिक वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में विफलता, आगे के पुनर्वास में बाधा।
विभागों के बीच समन्वय का अभाव मामलों के प्रभावी निपटान में बाधा, सूचनाओं का असंतुलित प्रवाह।
प्रशिक्षण और संवेदनशीलता की कमी अधिनियम के प्रावधानों के अनुपालन में कमी, पीड़ितों के प्रति असंवेदनशील व्यवहार।
डिजिटल मॉनिटरिंग का प्रभावी क्रियान्वयन प्रौद्योगिकी के उपयोग में चुनौतियाँ, डेटा की सटीकता और अद्यतन सुनिश्चित करना।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989

आगे की राह

  • लंबित मामलों के त्वरित निपटान के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं और समय-सीमा निर्धारित की जाए।
  • पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका के बीच समन्वय को मजबूत करने के लिए नियमित अंतर्विभागीय बैठकें आयोजित की जाएं।
  • विशेष लोक अभियोजकों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और उनके प्रदर्शन की नियमित समीक्षा की जाए।
  • डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और डेटा की सटीकता व अद्यतन सुनिश्चित किया जाए।
  • अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए अधिनियम के प्रावधानों तथा संवेदनशील मामलों की विवेचना पर नियमित प्रशिक्षण और कार्यशालाएं आयोजित की जाएं।
  • राहत राशि के भुगतान की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया जाए, साथ ही चिकित्सा, शिक्षा और पुनर्वास जैसी व्यापक सहायता प्रदान की जाए।
  • पीड़ितों और उनके परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं और उन्हें मनोवैज्ञानिक परामर्श भी प्रदान किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 · राज्य स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति · न्याय तक पहुंच · राहत राशि का भुगतान · डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम · संवेदनशील मामलों की विवेचना · सामाजिक न्याय · मानवाधिकार

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 15’, ‘note’: ‘धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 17’, ‘note’: ‘अस्पृश्यता का उन्मूलन और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध।’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण, गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार।’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 46’, ‘note’: ‘राज्य का दायित्व कि वह दुर्बल वर्गों, विशेषकर SC/ST के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा दे।’}

अवधारणा प्रवाह

अत्याचार की घटना  →  FIR दर्ज करना  →  पुलिस विवेचना  →  विशेष न्यायालय में मुकदमा  →  न्याय और राहत का प्रावधान  →  पुनर्वास और सुरक्षा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उद्देश्य SC/ST समुदायों के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों को रोकना है।
2. इस अधिनियम के तहत पीड़ितों को आर्थिक सहायता और पुनर्वास का प्रावधान है।
3. राज्य सरकारें इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सतर्कता एवं निगरानी समितियों का गठन करती हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीनों
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीनों — कथन 1 सही है, अधिनियम का मुख्य उद्देश्य अत्याचारों को रोकना और पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करना है। कथन 2 भी सही है, अधिनियम में पीड़ितों को राहत और पुनर्वास के प्रावधान शामिल हैं। कथन 3 भी सही है, अधिनियम के तहत राज्य और जिला स्तर पर सतर्कता एवं निगरानी समितियों के गठन का प्रावधान है ताकि प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।

Q2. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा प्रावधान सही नहीं है?

  1. यह अधिनियम केवल अनुसूचित जाति के सदस्यों पर लागू होता है।
  2. यह अधिनियम विशेष न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान करता है।
  3. यह पीड़ितों को कानूनी सहायता प्रदान करने का प्रावधान करता है।
  4. यह अत्याचार के मामलों की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने पर जोर देता है।

उत्तर: यह अधिनियम केवल अनुसूचित जाति के सदस्यों पर लागू होता है। — विकल्प A सही नहीं है क्योंकि यह अधिनियम अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) दोनों समुदायों के सदस्यों पर लागू होता है। अन्य सभी प्रावधान अधिनियम के उद्देश्यों और विशेषताओं के अनुरूप हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रभावी क्रियान्वयन में आने वाली चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए राज्य स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) का संक्षिप्त परिचय और इसका उद्देश्य।
2. प्रभावी क्रियान्वयन में चुनौतियाँ: अधिनियम के क्रियान्वयन में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का विस्तृत वर्णन, जैसे:
क. मामलों की लंबितता और धीमी विवेचना प्रक्रिया।
ख. विशेष न्यायालयों में मामलों का विलंब।
ग. राहत राशि के भुगतान में देरी।
घ. पुलिस और अभियोजन विभागों के बीच समन्वय की कमी।
ङ. पीड़ितों को चिकित्सा, शिक्षा और पुनर्वास जैसी अन्य सहायता का अभाव।
च. जागरूकता की कमी और सामाजिक पूर्वाग्रह।
3. राज्य स्तरीय सतर्कता एवं निगरानी समिति की भूमिका का मूल्यांकन:
क. समिति की संरचना और उसके कार्य।
ख. लंबित मामलों की समीक्षा और उनके कारणों का पता लगाना।
ग. पुलिस, प्रशासन और अभियोजन विभाग के बीच समन्वय स्थापित करना।
घ. विशेष लोक अभियोजकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
ङ. राहत राशि के समय पर भुगतान की निगरानी।
च. पीड़ितों को व्यापक सहायता (चिकित्सा, शिक्षा, पुनर्वास) से जोड़ना।
छ. डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम का विकास और अधिकारियों के प्रशिक्षण पर जोर।
4. निष्कर्ष: अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समिति की भूमिका का महत्व और आगे के सुधारों के लिए सुझाव।

स्रोत: amarujala.com

Uttarakhand PCS (UKPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा हाल ही में घोषित ‘पीड़ितों को न्याय में नहीं होगी देरी’ अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है?

  1. A. ST/SC अत्याचार के लंबित मामलों की शीघ्र सुनवाई एवं न्याय सुनिश्चित करना
  2. B. उत्तराखंड में पर्यटन को बढ़ावा देना
  3. C. राज्य में औद्योगिक विकास को गति देना
  4. D. शिक्षा क्षेत्र में सुधार करना

उत्तर: A. ST/SC अत्याचार के लंबित मामलों की शीघ्र सुनवाई एवं न्याय सुनिश्चित करना — मुख्यमंत्री द्वारा ST/SC अत्याचार के लंबित मामलों पर त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह अभियान शुरू किया गया है।

Mains: उत्तराखंड में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निरोधक अधिनियम, 1989 के प्रभावी क्रियान्वयन में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए, राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का मूल्यांकन कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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