केरल में आबकारी विभाग में भ्रष्टाचार: मंत्री पर आरोप, यूपीएससी के लिए विश्लेषण

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केरल में आबकारी विभाग में भ्रष्टाचार: मंत्री पर आरोप, यूपीएससी के लिए विश्लेषण

केरलम आबकारी विभाग में भ्रष्टाचारआयुक्त रिपोर्टरिश्वत के आरोपसतर्कता जाँचसिफारिश की गईभविष्य की तैनातीरिपोर्ट आधार बने
केरलम आबकारी विभाग में भ्रष्टाचार

✎ प्रशासनिक भ्रष्टाचार में शिकायत से दंड तक की कड़ी में धारा 17A (पूर्व अनुमोदन), धारा 19 (अभियोजन स्वीकृति) और विभागीय सतर्कता जाँच के बीच संतुलन ही जवाबदेही और निष्पक्षता, दोनों सुनिश्चित करता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजनीति एवं शासन (प्रशासनिक जवाबदेही, भ्रष्टाचार-निरोधी संस्थाएँ, राज्य सरकार की भूमिका)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (राज्य राजस्व में आबकारी शुल्क की भूमिका, लाइसेंसिंग और राजस्व-रिसाव)  |  GS Paper IV — सत्यनिष्ठा एवं नैतिकता (लोक सेवकों में आचरण, हितों का टकराव, सार्वजनिक धन की शुचिता)
  • Prelims: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) और 2018 का संशोधन, धारा 17A: लोक सेवक के आधिकारिक निर्णयों की जाँच हेतु पूर्व अनुमोदन, धारा 19: अभियोजन की स्वीकृति (Sanction for Prosecution), लोकायुक्त और लोकपाल (Lokayukta / Lokpal) का अंतर, केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission) और राज्य सतर्कता आयोग, अनुच्छेद 311: सिविल सेवकों की सेवा-सुरक्षा और विभागीय जाँच, राज्य सूची की प्रविष्टि 8 (मादक मदिरा) और समवर्ती सूची नहीं, बल्कि राज्य सूची की प्रविष्टि 51 (आबकारी शुल्क), अनुच्छेद 47: मादक पेयों के सेवन पर प्रतिबंध का राज्य का कर्तव्य (राज्य नीति का निदेशक तत्व)
  • Essay: सार्वजनिक प्रशासन में भ्रष्टाचार: संस्थागत उपाय बनाम व्यक्तिगत नैतिकता, विवेकाधीन शक्तियाँ, लाइसेंसिंग और भ्रष्टाचार का जोखिम: पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित हो

त्वरित पुनरावृत्ति: प्रशासनिक भ्रष्टाचार में शिकायत से दंड तक की कड़ी में धारा 17A (पूर्व अनुमोदन), धारा 19 (अभियोजन स्वीकृति) और विभागीय सतर्कता जाँच के बीच संतुलन ही जवाबदेही और निष्पक्षता, दोनों सुनिश्चित करता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केरलम (Keralam) सरकार के आबकारी आयुक्त पद से हटाए जाने से पहले आयुक्त सीरम संबसिव राव ने राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें आबकारी विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारियों पर रिश्वत और अवैध मासिक भुगतान की शिकायतों का उल्लेख है। रिपोर्ट में बार-लाइसेंस के नवीनीकरण, कार्य-समय की स्वीकृति और निरीक्षण के दौरान धन माँगे जाने के आरोप दर्ज हैं। रिपोर्ट ने सतर्कता जाँच की सिफारिश की है और भविष्य में संवेदनशील पदों पर तैनाती तथा जेईसी, अपर आबकारी आयुक्त और उप-आयुक्त स्तर के तबादलों के लिए आबकारी आयुक्त की रिपोर्ट को आधार बनाने का सुझाव दिया है। रिपोर्ट में मंत्री से संबंधित कुछ उल्लेख भी हैं, जिन पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आई हैं; ये आरोप हैं और अभी तक जाँच के विषय हैं। यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार-निरोधी जाँच-प्रक्रिया की दृष्टि से अध्ययन योग्य है।

पृष्ठभूमि

  • आबकारी (Excise) राज्य सूची का विषय है; मादक मदिरा के उत्पादन, परिवहन और विक्रय का नियमन राज्य करते हैं और इससे राज्य राजस्व का महत्वपूर्ण भाग प्राप्त होता है। इसी कारण लाइसेंसिंग और निरीक्षण के पद भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील माने जाते हैं।
  • भारत में सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 प्रमुख विधिक ढाँचा है, जिसे 2018 में संशोधित कर रिश्वत देने वाले को भी अपराधी माना गया और रिश्वत देने की स्थिति के लिए कुछ अपवाद रखे गए।
  • 2018 के संशोधन से अनुमोदन की व्यवस्था (धारा 17A) आई, जिसके अंतर्गत आधिकारिक निर्णयों से जुड़ी जाँच के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। ऐसे मामलों में प्रारंभिक सतर्कता जाँच की प्रक्रिया और उसकी वैधानिक सीमाएँ प्रायः चर्चा में रहती हैं।
  • सिविल सेवकों की सेवा-शर्तें अनुच्छेद 311 और संबंधित सेवा नियमों से नियंत्रित होती हैं; सामान्यतः स्थानांतरण प्रशासनिक निर्णय होता है, पर अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए विभागीय जाँच की प्रक्रिया अपनानी होती है।
  • केंद्र स्तर पर केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC, 2003 के अधिनियम से वैधानिक दर्जा) और राज्य स्तर पर राज्य सतर्कता आयोग/सतर्कता विभाग भ्रष्टाचार की जाँच करते हैं; लोकायुक्त संस्थाएँ कई राज्यों में लोक सेवकों के विरुद्ध शिकायतें सुनती हैं।

प्रशासनिक भ्रष्टाचार-निरोधी तंत्र क्या है?

  • यह ऐसी संस्थागत और विधिक व्यवस्था है जिसके माध्यम से लोक सेवकों के भ्रष्ट आचरण की शिकायत, प्रारंभिक जाँच, सतर्कता जाँच, अभियोजन और दंड सुनिश्चित किए जाते हैं।
  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अंतर्गत लोक सेवक द्वारा अनुचित लाभ लेना, आपराधिक कदाचार और अवैध संपत्ति के मामले आते हैं; इन पर अभियोजन के लिए सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति (धारा 19) आवश्यक है।
  • धारा 17A के अंतर्गत आधिकारिक निर्णयों की जाँच पूर्व अनुमोदन पर निर्भर है, जिससे ईमानदार अधिकारियों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है।
  • सतर्कता जाँच प्रायः विभागीय स्तर पर शुरू होती है, जबकि आपराधिक जाँच और अभियोजन के लिए पुलिस और विशेष एजेंसियाँ सक्रिय होती हैं; दोनों के बीच समन्वय आवश्यक है।
  • सेवा-आचरण नियम, संपत्ति का वार्षिक विवरण और हितों के टकराव से बचाव जैसे निवारक उपाय भ्रष्टाचार के अवसर कम करते हैं।
  • संवेदनशील पदों पर तैनाती, स्थानांतरण और पदोन्नति में पारदर्शी मानदंड अपनाना प्रशासनिक सुधार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने शासन में नैतिकता पर इस संदर्भ में बल दिया था।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 और लोकायुक्त संस्थाएँ नागरिकों को रिकॉर्ड तक पहुँच तथा शिकायत का मंच देती हैं, जिससे जवाबदेही की संस्थागत निगरानी मजबूत होती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
घटना का स्वरूप केरलम के पूर्व आबकारी आयुक्त द्वारा राज्य सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट में कुछ अधिकारियों पर रिश्वत और अनुचित भुगतान के आरोप हैं। यह प्रशासनिक भ्रष्टाचार का मामला है, जिसकी जाँच आवश्यक है।
आबकारी क्षेत्र की संवेदनशीलता मदिरा अनुज्ञापत्र (लाइसेंस), बार के समय और लाइसेंस नवीनीकरण जैसे निर्णय सीधे राजस्व और नियामक अधिकार से जुड़े हैं। इसलिए इस क्षेत्र में विवेकाधिकार का दुरुपयोग जोखिमपूर्ण माना जाता है।
आरोपित आर्थिक लेन-देन रिपोर्ट में मासिक भुगतान (₹30,000), एकमुश्त रकम (₹50,000) और त्योहार के बाद की भेंट (₹20,000) का उल्लेख है। ये आरोप हैं, जिन्हें जाँच से ही प्रमाणित किया जा सकता है।
अधिकारियों की पद-स्थिति रिपोर्ट में संयुक्त आबकारी आयुक्त और उप आयुक्त स्तर के अधिकारियों को क्षेत्रीय पदों से हटाकर कार्यालय-आधारित पदों पर भेजने की सिफ़ारिश की गई है, ताकि प्रभाव का संभावित क्षेत्र सीमित हो।
प्रस्तावित सुधार भविष्य में संयुक्त आबकारी आयुक्त, अपर आबकारी आयुक्त और उप आयुक्त स्तर के स्थानांतरण और नियुक्ति आयुक्त की रिपोर्ट के आधार पर करने का सुझाव है। इससे नियुक्ति-प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ने की संभावना है।
संस्थागत प्रक्रिया भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act), 1988 के अंतर्गत सतर्कता जाँच की सिफ़ारिश की गई है। यह जाँच तथ्य-निर्धारण और दोष-निर्धारण का वैधानिक मार्ग है।

महत्व

प्रशासनिक और सुशासन

  • नियामक पदों पर बैठे अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने में सेवा के भीतर की रिपोर्टिंग (आंतरिक शिकायत तंत्र) की भूमिका स्पष्ट होती है।
  • वरिष्ठ अधिकारी द्वारा सेवा-रिकॉर्ड और जाँच-सिफ़ारिश का उपयोग प्रशासनिक निगरानी को मज़बूत बनाता है।
  • नियुक्ति और स्थानांतरण में वस्तुनिष्ठ मानदंड अपनाने से मनमाने निर्णयों की गुंजाइश घटती है।

राजस्व और विनियमन

  • आबकारी राजस्व राज्य की प्रमुख वित्तीय स्रोत है; लाइसेंस प्रक्रिया में अनियमितता से राजस्व-हानि और बाज़ार में असमान अवसर पैदा होते हैं।
  • अनुज्ञापत्र, समय-सीमा और नवीनीकरण के नियम पारदर्शी हों तो व्यवसाय-वातावरण और कर-अनुपालन दोनों सुधरते हैं।

संवैधानिक और विधिक

  • मंत्रिपरिषद और प्रशासन के बीच संबंध में विधायिका के प्रति उत्तरदायित्व का प्रश्न उठता है; यह संसदीय/विधायी जवाबदेही की प्रक्रिया से जुड़ा है।
  • भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच विधि के शासन (Rule of Law) के अनुसार, साक्ष्य और उचित प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए।

चुनौतियाँ

1. प्रभाव और पक्षपात का संदेह

  • रिपोर्ट में मंत्री की किसी बार-मालिक से परिचितता का उल्लेख है; ऐसे परिचय को प्रभाव का प्रमाण मानना उचित नहीं है, पर इससे निष्पक्ष जाँच की आवश्यकता बढ़ जाती है।
  • जब उच्च राजनीतिक पद और निचले स्तर के प्रशासनिक निर्णय जुड़ते हैं, तो जाँच की स्वतंत्रता पर प्रश्न उठते हैं।
  • जाँच-एजेंसी की स्वायत्तता और उसके निर्णय की सार्वजनिक विश्वसनीयता बनाए रखना कठिन होता है।

2. पद-स्थानांतरण की अपारदर्शिता

  • संवेदनशील पदों पर आरोपित अधिकारियों की नियुक्ति से नियामक तंत्र की विश्वसनीयता घटती है।
  • स्थानांतरण के कारण सार्वजनिक न होने पर अधिकारियों के मनोबल और निर्णय-स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है।
  • सेवा-हित और जनहित के बीच संतुलन के लिए स्पष्ट नीति आवश्यक है।

3. आबकारी क्षेत्र में विवेकाधिकार

  • लाइसेंस, समय-सीमा और अनुज्ञापत्र-विस्तार जैसे निर्णयों में विवेकाधिकार अधिक होता है, जिससे रिश्वत की संभावना बढ़ती है।
  • निरीक्षण-यात्राओं के दौरान अधिकारी और व्यवसायी के बीच प्रत्यक्ष संपर्क जोखिम बढ़ाता है।
  • नियमों का अस्पष्ट होना या उनका ऑनलाइन न होना भ्रष्टाचार के अवसर बढ़ाता है।

4. शिकायतकर्ता की सुरक्षा

  • सूचना देने वाले कर्मचारी या स्रोत के उत्पीड़न का भय बना रहता है, जिससे आंतरिक रिपोर्टिंग कमज़ोर होती है।
  • व्हिसलब्लोअर संरक्षण से संबंधित विधि का प्रभावी क्रियान्वयन अब भी चुनौती है।

5. अंतिम निष्कर्ष तक प्रक्रिया की गति

  • सतर्कता जाँच में समय लगने से आरोपित अधिकारियों और जनता, दोनों के लिए अनिश्चितता बनी रहती है।
  • आरोपों का प्रमाणित होना या न होना साक्ष्य पर निर्भर है; इस प्रक्रिया में निष्पक्षता और प्रक्रियागत न्याय आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
आरोपों का प्रमाणन रिपोर्ट के दावे अभी जाँच के विषय हैं; बिना साक्ष्य निष्कर्ष निकालना अनुचित होगा।
उच्च पद का प्रभाव मंत्री से परिचय के उल्लेख के कारण जाँच की निष्पक्षता पर सार्वजनिक संदेह पैदा हो सकता है।
स्थानांतरण नीति संवेदनशील पदों पर आरोपित अधिकारियों की तैनाती से नियामक विश्वसनीयता घटती है।
लाइसेंस प्रक्रिया की अपारदर्शिता विवेकाधिकार और प्रत्यक्ष संपर्क रिश्वत के अवसर बढ़ाते हैं।
सूचना देने वालों की सुरक्षा शिकायतकर्ता के उत्पीड़न का भय आंतरिक रिपोर्टिंग को कमज़ोर करता है।

आगे की राह

  • सतर्कता जाँच को समय-सीमा के भीतर पूरा कर उसके निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाएँ।
  • जाँच के दौरान आरोपित अधिकारियों को नियामक और क्षेत्रीय पदों से दूर रखने की रिपोर्ट की सिफ़ारिश पर नीति-स्तर पर स्पष्ट मानदंड बनाए जाएँ।
  • आबकारी अनुज्ञापत्र, नवीनीकरण और समय-सीमा से जुड़ी प्रक्रियाओं का ऑनलाइन और स्वचालित (automated) प्रणाली में रूपांतरण किया जाए।
  • अधिकारी और अनुज्ञापत्रधारी के बीच प्रत्यक्ष संपर्क सीमित करने के लिए निरीक्षण की पूर्व-सूचना और रिकॉर्ड-आधारित प्रणाली अपनाई जाए।
  • जवाबदेही के लिए आयुक्त-स्तरीय रिपोर्टिंग को औपचारिक किया जाए, ताकि नियुक्ति और स्थानांतरण के निर्णय तथ्य-आधारित हों।
  • सूचना देने वाले कर्मचारियों की पहचान और सुरक्षा के लिए व्हिसलब्लोअर संरक्षण के प्रावधानों को व्यवहार में लागू किया जाए।
  • नियामक पदों के स्थानांतरण और नियुक्ति के लिए स्पष्ट आचार-संहिता और हितों के टकराव (conflict of interest) से बचाव के नियम बनाए जाएँ।
  • सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने के लिए जाँच-प्रक्रिया, उसकी प्रगति और निष्कर्षों की संक्षिप्त सार्वजनिक जानकारी दी जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

उत्पाद शुल्क प्रशासन (Excise Administration) · भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) · सतर्कता जाँच (Vigilance Inquiry) · केंद्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission) · लोकायुक्त (Lokayukta) · हितों का टकराव (Conflict of Interest) · प्रशासनिक जवाबदेही (Administrative Accountability) · विवेकाधिकार और नियंत्रण (Discretion and Control) · राज्य सूची, प्रविष्टि 8 (State List, Entry 8) · स्थानांतरण और नियुक्ति नीति (Transfer and Posting Policy) · व्हिसलब्लोअर संरक्षण (Whistleblower Protection) · सूचना का अधिकार (Right to Information)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 163: मंत्रिपरिषद द्वारा राज्यपाल को सहायता एवं परामर्श
  • अनुच्छेद 164: मंत्रिपरिषद की विधानसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व
  • सातवीं अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 51: मदिरा पर उत्पाद शुल्क का राज्य-विषय

अवधारणा प्रवाह

आबकारी विभाग में लाइसेंस, नवीनीकरण और निरीक्षण जैसे विवेकाधिकार-युक्त कार्य होते हैं।  →  निरीक्षण और लाइसेंस-प्रक्रिया में अनुचित भुगतान के आरोप सामने आते हैं।  →  आबकारी आयुक्त अपनी रिपोर्ट में आरोप, सिफ़ारिशें और संबंधित अधिकारियों की स्थिति दर्ज करते हैं।  →  राज्य सरकार रिपोर्ट के आधार पर पद-स्थानांतरण और सतर्कता जाँच का निर्णय लेती है।  →  भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अंतर्गत जाँच से तथ्य स्थापित होते हैं और उसी के आधार पर विधिक या प्रशासनिक कार्रवाई तय होती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 में लोक सेवक द्वारा अनुचित लाभ लेने को दंडनीय अपराध बताया गया है।
2. इस अधिनियम की धारा 13 में आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) को अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है।
3. यह अधिनियम केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर लागू होता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: धारा 7 लोक सेवक द्वारा अनुचित लाभ लेने से संबंधित है। कथन 2 सही है: धारा 13 आपराधिक कदाचार और आय से अधिक संपत्ति से संबंधित है। कथन 3 गलत है: यह अधिनियम केंद्र और राज्य, दोनों के लोक सेवकों पर लागू होता है, इसलिए सही उत्तर ‘केवल दो’ है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत में मादक पेय पदार्थों (Intoxicating Liquors) के उत्पादन, विक्रय और अनुज्ञप्ति का विनियमन मुख्य रूप से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है।
कारण (R): संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 8 में मादक पेय पदार्थों से संबंधित विषय रखे गए हैं।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, किंतु R गलत है।
  4. A गलत है, किंतु R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — राज्य सूची की प्रविष्टि 8 में मादक पेय पदार्थों के उत्पादन, निर्माण, कब्ज़े, परिवहन, क्रय और विक्रय का विषय राज्यों को सौंपा गया है। इसी कारण राज्य अपने उत्पाद शुल्क कानून बनाते हैं। अतः A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलित कीजिए:
सूची I (संस्था)
A. केंद्रीय सतर्कता आयोग
B. लोकपाल
C. केरल लोकायुक्त

सूची II (आधारभूत विधि)
1. केरल लोकायुक्त अधिनियम, 1999
2. लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013
3. केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-3, B-2, C-1
  2. A-2, B-1, C-3
  3. A-1, B-3, C-2
  4. A-3, B-1, C-2

उत्तर: A-3, B-2, C-1 — केंद्रीय सतर्कता आयोग को केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, 2003 द्वारा वैधानिक दर्जा मिला। लोकपाल की स्थापना लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 से हुई। केरल लोकायुक्त केरल लोकायुक्त अधिनियम, 1999 से संचालित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ सार्वजनिक प्रशासन में अनुज्ञप्ति जारी करने और निरीक्षण जैसी विवेकाधीन शक्तियाँ भ्रष्टाचार का प्रमुख स्रोत बन जाती हैं। हाल ही में केरल के उत्पाद शुल्क विभाग से जुड़ी एक पूर्व आयुक्त की रिपोर्ट में अधिकारियों के विरुद्ध रिश्वत और अनुचित मासिक भुगतान के आरोप सामने आए हैं, जिनकी सतर्कता जाँच की सिफारिश की गई है। इस संदर्भ में नियामक शक्तियों पर नियंत्रण के उपायों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि विभागीय तबादलों और नियुक्तियों को किसी संवैधानिक या वैधानिक तंत्र के अधीन रखने से प्रशासनिक निष्पक्षता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। (15 Marks)

रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
(1) भूमिका: मादक पेय पदार्थों का विनियमन संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 8 के अंतर्गत राज्यों का विषय है। अनुच्छेद 47 राज्य को जन-स्वास्थ्य सुधार के लिए मादक पेय पदार्थों के नियंत्रण का दायित्व देता है। केरल में इस विषय का विनियमन राज्य के उत्पाद शुल्क कानूनों और अनुज्ञप्ति प्रक्रिया से होता है।
(2) तथ्यात्मक ढाँचा: रिपोर्ट में लगाए गए आरोप अभी प्रमाणित नहीं हैं। रिपोर्ट में सिफारिश है कि संबंधित अधिकारियों को क्षेत्रीय पदों से हटाकर गैर-क्षेत्रीय कार्यालयों में भेजा जाए, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अंतर्गत सतर्कता जाँच हो, और जेईसी, अपर आयुक्त तथा उप आयुक्त स्तर के तबादले आयुक्त की रिपोर्ट के आधार पर हों। किसी मंत्री की संलिप्तता के आरोप भी सार्वजनिक चर्चा में हैं, जिनका निर्णय केवल सक्षम जाँच के आधार पर ही होना चाहिए।
(3) वैधानिक और संस्थागत प्रावधान: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 (अनुचित लाभ), धारा 8 (रिश्वत देना, 2018 संशोधन), धारा 13 (आय से अधिक संपत्ति), धारा 19 (पूर्व स्वीकृति) का उल्लेख कीजिए। केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC Act, 2003), लोकायुक्त व्यवस्था (केरल लोकायुक्त अधिनियम, 1999) और लोकपाल (2013) की भूमिका स्पष्ट कीजिए। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की पारदर्शिता भूमिका और व्हिसलब्लोअर संरक्षण के सीमित ढाँचे पर भी टिप्पणी कीजिए।
(4) सुधार संबंधी दृष्टिकोण: वोहरा समिति (1993) ने अपराधीकरण और प्रशासन-राजनीति गठजोड़ पर चिंता जताई थी। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की चौथी रिपोर्ट ‘Ethics in Governance’ (2007) ने नैतिक शासन और आचार संहिता पर बल दिया। विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998) में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय सतर्कता आयोग को स्वतंत्रता और वैधानिक आधार देने पर जोर दिया।
(5) संतुलित दृष्टि: एक ओर प्राकृतिक न्याय और निर्दोष मानने का सिद्धांत है, दूसरी ओर जाँच-पूर्व स्थानांतरण को दंड न मानकर निष्पक्ष जाँच की व्यवस्था मानने का तर्क है। तबादला-नीति में पारदर्शी मानदंड, कार्यकाल की निश्चितता और रिपोर्ट-आधारित निर्णय से मनमानी घटती है, परंतु अत्यधिक केंद्रीकरण भी नई शक्ति-केंद्रीकरण की समस्या पैदा कर सकता है।
(6) निष्कर्ष: पारदर्शी अनुज्ञप्ति प्रणाली, डिजिटल रिकॉर्ड, स्वतंत्र सतर्कता तंत्र और तबादला-नीति के संस्थागत मानदंड मिलकर जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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