यूपीएससी/पीसीएस: 25 सितंबर 2026 को सरकारी प्रतिभूतियों की बोली प्रक्रिया, ₹34,000 करोड़ का पुनर्प्रस्ताव

Underwriting Auction for sale of Government Security for ₹34,000 crore on September 25, 2026 — diagram

यूपीएससी/पीसीएस: 25 सितंबर 2026 को सरकारी प्रतिभूतियों की बोली प्रक्रिया, ₹34,000 करोड़ का पुनर्प्रस्ताव

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✎ सरकारी प्रतिभूतियाँ सरकार के उधार कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और प्राथमिक डीलर अंडरराइटिंग के माध्यम से इन प्रतिभूतियों के सफल निर्गम को सुनिश्चित करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं, जिससे सरकार को अपने राजकोषीय…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाना, संवृद्धि, विकास और रोज़गार से संबंधित विषय।
  • Prelims: सरकारी प्रतिभूतियाँ (Government Securities – G-Secs), अंडरराइटिंग (Underwriting), प्राथमिक डीलर (Primary Dealers – PDs), भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI), राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit), खुला बाज़ार परिचालन (Open Market Operations – OMO), ई-कुबेर प्रणाली (e-Kuber system), न्यूनतम अंडरराइटिंग प्रतिबद्धता (Minimum Underwriting Commitment – MUC), अतिरिक्त प्रतिस्पर्धी अंडरराइटिंग (Additional Competitive Underwriting – ACU)
  • Essay: भारत में राजकोषीय प्रबंधन में सरकारी प्रतिभूतियों की भूमिका, मौद्रिक नीति के उपकरण के रूप में RBI की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: सरकारी प्रतिभूतियाँ सरकार के उधार कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और प्राथमिक डीलर अंडरराइटिंग के माध्यम से इन प्रतिभूतियों के सफल निर्गम को सुनिश्चित करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं, जिससे सरकार को अपने राजकोषीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलती है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 25 सितंबर, 2026 को ₹34,000 करोड़ की सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities – G-Secs) की बिक्री (पुनः-जारी) के लिए अंडरराइटिंग नीलामी की घोषणा की है। यह नीलामी भारत सरकार के उधार कार्यक्रम का एक हिस्सा है, जिसके माध्यम से सरकार अपने राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को वित्तपोषित करती है। इस प्रक्रिया में प्राथमिक डीलर (Primary Dealers – PDs) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो सरकारी प्रतिभूतियों के सफल निर्गम को सुनिश्चित करते हैं।

पृष्ठभूमि

  • भारत सरकार अपनी व्यय आवश्यकताओं को पूरा करने और राजकोषीय घाटे को प्रबंधित करने के लिए बाज़ार से उधार लेती है। यह उधार मुख्य रूप से सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) को जारी करके किया जाता है।
  • सरकारी प्रतिभूतियाँ केंद्र सरकार या राज्य सरकारों द्वारा जारी की गई ऋण लिखत (Debt Instruments) होती हैं। ये अल्पकालिक (ट्रेजरी बिल) या दीर्घकालिक (दिनांकित प्रतिभूतियाँ) हो सकती हैं।
  • RBI भारत सरकार के लिए ऋण प्रबंधक (Debt Manager) के रूप में कार्य करता है और सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी का संचालन करता है।
  • अंडरराइटिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जहाँ अंडरराइटर (इस मामले में प्राथमिक डीलर) यह सुनिश्चित करते हैं कि जारी की गई सभी प्रतिभूतियाँ बिक जाएँगी। यदि कोई प्रतिभूति नहीं बिकती है, तो अंडरराइटर उसे खरीदने के लिए बाध्य होते हैं।
  • प्राथमिक डीलर (PDs) वित्तीय संस्थान होते हैं जो सरकारी प्रतिभूतियों के बाज़ार में तरलता (Liquidity) और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए RBI द्वारा अधिकृत होते हैं। वे सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं।
  • अंडरराइटिंग नीलामी में, प्राथमिक डीलर अंडरराइटिंग कमीशन के बदले में सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की गारंटी देते हैं। यह कमीशन उन्हें प्रतिभूतियों को बेचने के जोखिम को उठाने के लिए दिया जाता है।

सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Secs) और अंडरराइटिंग

  • सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Secs): ये भारत सरकार द्वारा जारी किए गए ऋण लिखत हैं जो सरकार की उधार आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इन्हें ‘जोखिम-मुक्त’ (Risk-Free) निवेश माना जाता है क्योंकि सरकार द्वारा जारी किए गए ऋण पर चूक का जोखिम बहुत कम होता है।
  • नीलामी प्रक्रिया: RBI ‘मूल्य-आधारित’ या ‘उपज-आधारित’ नीलामी पद्धति का उपयोग करके सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री करता है। इस नीलामी में, निवेशक (बैंक, वित्तीय संस्थान, प्राथमिक डीलर आदि) प्रतिभूतियों के लिए बोली लगाते हैं।
  • अंडरराइटिंग (Underwriting): यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत अंडरराइटर (प्राथमिक डीलर) सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं कि जारी की गई सभी प्रतिभूतियाँ बिक जाएँ। यदि नीलामी में कुछ प्रतिभूतियाँ नहीं बिक पाती हैं, तो अंडरराइटर उन्हें खरीदने के लिए बाध्य होते हैं।
  • प्राथमिक डीलर (Primary Dealers – PDs): ये RBI द्वारा लाइसेंस प्राप्त वित्तीय मध्यस्थ हैं जो सरकारी प्रतिभूतियों के बाज़ार में बाज़ार निर्माता (Market Makers) के रूप में कार्य करते हैं। वे सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में भाग लेते हैं और द्वितीयक बाज़ार में भी उनका व्यापार करते हैं।
  • न्यूनतम अंडरराइटिंग प्रतिबद्धता (MUC): यह प्रत्येक प्राथमिक डीलर के लिए निर्धारित न्यूनतम राशि है जिसके लिए उन्हें सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में अंडरराइटिंग प्रतिबद्धता देनी होती है। यह सुनिश्चित करता है कि नीलामी में पर्याप्त भागीदारी हो।
  • अतिरिक्त प्रतिस्पर्धी अंडरराइटिंग (ACU): यह MUC के अतिरिक्त एक विकल्प है जहाँ प्राथमिक डीलर अतिरिक्त प्रतिभूतियों के लिए अंडरराइटिंग बोली लगा सकते हैं। यह उन्हें अधिक कमीशन अर्जित करने का अवसर प्रदान करता है।
  • अंडरराइटिंग कमीशन: यह वह शुल्क है जो प्राथमिक डीलरों को उनकी अंडरराइटिंग सेवाओं के लिए RBI द्वारा भुगतान किया जाता है। यह उन्हें प्रतिभूतियों की बिक्री से जुड़े जोखिम के लिए क्षतिपूर्ति करता है।
  • ई-कुबेर प्रणाली (e-Kuber system): यह RBI की कोर बैंकिंग समाधान प्रणाली है जिसका उपयोग प्राथमिक डीलर अंडरराइटिंग नीलामी के लिए अपनी बोलियाँ इलेक्ट्रॉनिक रूप से जमा करने के लिए करते हैं। यह प्रक्रिया को कुशल और पारदर्शी बनाता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री भारत सरकार के लिए ऋण जुटाने का एक प्राथमिक तरीका, जिससे राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) का प्रबंधन किया जा सके।
अंडरराइटिंग नीलामी यह सुनिश्चित करना कि सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री सफल हो, भले ही बाजार में मांग कम हो। इससे सरकार को आवश्यक धन प्राप्त करने में मदद मिलती है।
प्राथमिक डीलर (Primary Dealer – PD) सरकारी प्रतिभूतियों के बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, अंडरराइटिंग प्रतिबद्धता के माध्यम से बाजार को तरलता प्रदान करते हैं।
न्यूनतम अंडरराइटिंग प्रतिबद्धता (Minimum Underwriting Commitment – MUC) प्रत्येक प्राथमिक डीलर के लिए एक निश्चित राशि की प्रतिभूतियों को अंडरराइट करने की बाध्यता, जिससे नीलामी की सफलता सुनिश्चित होती है।
अतिरिक्त प्रतिस्पर्धी अंडरराइटिंग (Additional Competitive Underwriting – ACU) प्राथमिक डीलरों को MUC से अधिक प्रतिभूतियों के लिए बोली लगाने का अवसर, जिससे अंडरराइटिंग प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।
मल्टीपल प्राइस-आधारित विधि अंडरराइटिंग नीलामी में प्रत्येक सफल बोलीदाता को उनकी बोली के अनुसार मूल्य पर प्रतिभूतियां आवंटित की जाती हैं, जो बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण को बढ़ावा देती है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • यह नीलामी सरकार को अपने व्यय को वित्तपोषित करने और राजकोषीय घाटे को प्रबंधित करने के लिए आवश्यक धन जुटाने में मदद करती है।
  • सरकारी प्रतिभूतियों की सफल बिक्री से बाजार में सरकार की साख बनी रहती है और निवेशकों का विश्वास बढ़ता है।
  • अंडरराइटिंग तंत्र बाजार को तरलता प्रदान करता है और सरकारी प्रतिभूतियों के लिए एक स्थिर मांग सुनिश्चित करता है, जिससे ब्याज दरों में अस्थिरता कम होती है।

मौद्रिक नीति पर प्रभाव

  • भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI) सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी के माध्यम से बाजार में तरलता (Liquidity) को प्रभावित करता है, जो उसकी मौद्रिक नीति (Monetary Policy) का एक महत्वपूर्ण उपकरण है।
  • अंडरराइटिंग प्रक्रिया RBI को सरकारी ऋण प्रबंधन में सहायता करती है और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में योगदान देती है।

वित्तीय बाजार पर प्रभाव

  • प्राथमिक डीलर सरकारी प्रतिभूतियों के बाजार में महत्वपूर्ण बिचौलिए के रूप में कार्य करते हैं, जिससे खुदरा और संस्थागत निवेशकों के लिए इन प्रतिभूतियों तक पहुंच आसान होती है।
  • अंडरराइटिंग कमीशन प्राथमिक डीलरों के लिए एक आय का स्रोत है, जो उन्हें सरकारी प्रतिभूति बाजार में सक्रिय रहने के लिए प्रोत्साहित करता है।

चुनौतियाँ

1. बाजार जोखिम

  • यदि बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों की मांग कम रहती है, तो प्राथमिक डीलरों को अंडरराइट की गई प्रतिभूतियों को नुकसान पर बेचना पड़ सकता है।
  • ब्याज दरों में अप्रत्याशित वृद्धि से प्रतिभूतियों के मूल्य में गिरावट आ सकती है, जिससे प्राथमिक डीलरों को नुकसान हो सकता है।

2. तरलता जोखिम

  • प्राथमिक डीलरों को अंडरराइटिंग प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए पर्याप्त तरलता बनाए रखने की आवश्यकता होती है, जो कभी-कभी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  • बाजार में अचानक तरलता की कमी से प्राथमिक डीलरों के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।

3. ब्याज दर जोखिम

  • सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में ब्याज दरों का निर्धारण बाजार की स्थितियों पर निर्भर करता है, जो सरकार के लिए ऋण लागत को प्रभावित करता है।
  • उच्च ब्याज दरें सरकार के लिए ऋण चुकाने की लागत को बढ़ा सकती हैं, जिससे राजकोषीय दबाव बढ़ सकता है।

4. प्राथमिक डीलरों पर दबाव

  • MUC और ACU के तहत बड़ी प्रतिबद्धताएँ प्राथमिक डीलरों पर वित्तीय दबाव डाल सकती हैं, खासकर अस्थिर बाजार स्थितियों में।
  • अंडरराइटिंग कमीशन का पर्याप्त न होना प्राथमिक डीलरों के लिए इस गतिविधि को कम आकर्षक बना सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
बाजार की अस्थिरता सरकारी प्रतिभूतियों की मांग और मूल्य में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव से प्राथमिक डीलरों और सरकार दोनों के लिए जोखिम बढ़ जाता है।
उच्च ऋण लागत यदि नीलामी में उच्च ब्याज दरें निर्धारित होती हैं, तो सरकार के लिए ऋण चुकाने की लागत बढ़ जाती है, जिससे राजकोषीय प्रबंधन पर दबाव पड़ता है।
प्राथमिक डीलरों का जोखिम अंडरराइटिंग प्रतिबद्धताओं के कारण प्राथमिक डीलरों को बाजार जोखिम और तरलता जोखिम का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी लाभप्रदता प्रभावित हो सकती है।
वित्तीय बाजार पर प्रभाव सरकारी प्रतिभूतियों की बड़ी बिक्री से बाजार में तरलता पर दबाव पड़ सकता है और अन्य निवेशों के लिए धन की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

आगे की राह

  • सरकारी प्रतिभूतियों के बाजार में खुदरा भागीदारी बढ़ाने के लिए जागरूकता कार्यक्रम और सरल निवेश विकल्प पेश करना।
  • प्राथमिक डीलरों के लिए अंडरराइटिंग कमीशन की समीक्षा करना ताकि उन्हें पर्याप्त प्रोत्साहन मिल सके और जोखिमों को कवर किया जा सके।
  • बाजार की स्थितियों के आधार पर अंडरराइटिंग प्रतिबद्धताओं को लचीला बनाना ताकि प्राथमिक डीलरों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
  • सरकारी प्रतिभूतियों के लिए एक मजबूत द्वितीयक बाजार (Secondary Market) विकसित करना ताकि प्राथमिक डीलरों को अंडरराइट की गई प्रतिभूतियों को आसानी से बेचने में मदद मिल सके।
  • सरकारी ऋण प्रबंधन रणनीति में पारदर्शिता और पूर्वानुमान क्षमता बढ़ाना ताकि निवेशकों और प्राथमिक डीलरों को बेहतर योजना बनाने में मदद मिल सके।
  • RBI को बाजार की तरलता और ब्याज दरों पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए ताकि सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी सुचारू रूप से संपन्न हो सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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अवधारणा प्रवाह

भारत सरकार को धन की आवश्यकता होती है।  →  सरकार RBI के माध्यम से सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की घोषणा करती है।  →  RBI अंडरराइटिंग नीलामी आयोजित करता है।  →  प्राथमिक डीलर MUC और ACU के तहत बोली लगाते हैं।  →  सफल प्राथमिक डीलरों को अंडरराइटिंग कमीशन मिलता है।  →  सरकार को आवश्यक धन प्राप्त होता है और राजकोषीय घाटा प्रबंधित होता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सरकारी प्रतिभूतियाँ (Government Securities – G-Secs) भारत सरकार या राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए व्यापार योग्य लिखत (tradable instruments) हैं।
2. प्राथमिक डीलर (Primary Dealers – PDs) सरकारी प्रतिभूतियों के बाजार में तरलता (liquidity) प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
3. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में केवल प्राथमिक डीलरों को ही भाग लेने की अनुमति देता है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। सरकारी प्रतिभूतियाँ वास्तव में सरकार द्वारा जारी किए गए व्यापार योग्य लिखत हैं। कथन 2 भी सही है। प्राथमिक डीलर सरकारी प्रतिभूतियों के बाजार को तरलता प्रदान करते हैं, जिससे निवेशकों के लिए इन प्रतिभूतियों को खरीदना और बेचना आसान हो जाता है। कथन 3 गलत है। RBI सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में बैंकों, वित्तीय संस्थानों, बीमा कंपनियों और सामान्य निवेशकों को भी भाग लेने की अनुमति देता है, हालांकि प्राथमिक डीलरों की भूमिका विशेष होती है।

Q2. सरकारी प्रतिभूतियों के संबंध में ‘अंडरराइटिंग’ (Underwriting) का मुख्य उद्देश्य क्या है?

  1. सरकार के लिए ऋण की लागत को कम करना।
  2. नीलामी में बेची न गई प्रतिभूतियों के लिए खरीददार सुनिश्चित करना।
  3. प्राथमिक डीलरों को अतिरिक्त लाभ प्रदान करना।
  4. मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए बाजार से तरलता को अवशोषित करना।

उत्तर: नीलामी में बेची न गई प्रतिभूतियों के लिए खरीददार सुनिश्चित करना। — अंडरराइटिंग का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकार द्वारा जारी की गई सभी प्रतिभूतियाँ नीलामी में बिक जाएँ, भले ही बाजार में पर्याप्त मांग न हो। अंडरराइटर (प्राथमिक डीलर) शेष प्रतिभूतियों को खरीदने की प्रतिबद्धता जताते हैं, जिससे सरकार को अपने ऋण कार्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा करने में मदद मिलती है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी प्रक्रिया में अंडरराइटिंग की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। भारत के राजकोषीय प्रबंधन में यह किस प्रकार सहायक है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs) और उनके महत्व का संक्षिप्त परिचय। अंडरराइटिंग की परिभाषा और इसका उद्देश्य।
2. **अंडरराइटिंग की भूमिका:**
* **नीलामी की सफलता सुनिश्चित करना:** यह कैसे सुनिश्चित करता है कि सरकार द्वारा जारी सभी प्रतिभूतियाँ बिक जाएँ, भले ही बाजार में मांग कम हो।
* **बाजार में विश्वास:** निवेशकों और बाजार सहभागियों के बीच विश्वास पैदा करना कि सरकारी प्रतिभूतियों का बाजार तरल और स्थिर है।
* **मूल्य स्थिरता:** नीलामी के दौरान अत्यधिक मूल्य अस्थिरता को कम करने में मदद करना।
* **प्राथमिक डीलरों की भूमिका:** प्राथमिक डीलरों (Primary Dealers – PDs) द्वारा निभाई जाने वाली प्रतिबद्धता (जैसे न्यूनतम अंडरराइटिंग प्रतिबद्धता – MUC और अतिरिक्त प्रतिस्पर्धी अंडरराइटिंग – ACU) का उल्लेख।
3. **आलोचनात्मक परीक्षण (चुनौतियाँ/सीमाएँ):**
* **लागत:** अंडरराइटिंग कमीशन के रूप में सरकार के लिए अतिरिक्त लागत।
* **बाजार विकृति:** कुछ हद तक बाजार की वास्तविक मांग और आपूर्ति को विकृत कर सकता है।
* **प्राथमिक डीलरों पर निर्भरता:** अत्यधिक निर्भरता से एकाधिकार जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
* **बाजार जोखिम:** यदि प्राथमिक डीलरों को बड़ी मात्रा में प्रतिभूतियाँ खरीदनी पड़ती हैं और बाद में बाजार में उनके मूल्य गिर जाते हैं तो उन्हें जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।
4. **राजकोषीय प्रबंधन में सहायता:**
* **ऋण जुटाना:** सरकार के लिए आवश्यक धन जुटाने का एक विश्वसनीय साधन।
* **राजकोषीय घाटा वित्तपोषण:** राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को वित्तपोषित करने में मदद करना।
* **सरकारी व्यय:** विकास परियोजनाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए धन उपलब्ध कराना।
* **दीर्घकालिक योजना:** सरकार को अपने व्यय और निवेश के लिए दीर्घकालिक योजना बनाने में सक्षम बनाना।
* **RBI की भूमिका:** भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा सरकार के ऋण प्रबंधक के रूप में निभाई जाने वाली भूमिका का उल्लेख।
5. **निष्कर्ष:** अंडरराइटिंग के महत्व को रेखांकित करते हुए, इसकी चुनौतियों का समाधान करने और बाजार को और अधिक कुशल बनाने के उपायों पर संक्षिप्त टिप्पणी।

स्रोत: RBI


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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