07 Aug राज्यसभा अध्यक्ष ने केंद्र को दिया सुझाव, अमित शाह को सदन में आने के लिए कहा जाए
✎ संसद में मंत्रियों की उपस्थिति और जवाबदेही भारतीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों में से एक है, जो सरकार को जनता के प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी बनाती है, जबकि संसदीय नियम सदन की कार्यवाही को व्यवस्थित रखने में मदद करते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इससे उत्पन्न होने वाले विषय। | GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका का कार्यकरण। | GS Paper II — सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके डिजाइन तथा कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले विषय।
- Prelims: राज्यसभा अध्यक्ष (Rajya Sabha Chairman), संसदीय कार्य मंत्री (Parliamentary Affairs Minister), विपक्ष के नेता (Leader of Opposition), नियम 235 (Rule 235), नियम 240 (Rule 240), शून्यकाल (Zero Hour), संसदीय विशेषाधिकार (Parliamentary Privileges), संसदीय कार्यवाही (Parliamentary Proceedings)
- Essay: संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका और उसकी चुनौतियाँ।, भारतीय संसद में बहस और व्यवधान: संतुलन की तलाश।
त्वरित पुनरावृत्ति: संसद में मंत्रियों की उपस्थिति और जवाबदेही भारतीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों में से एक है, जो सरकार को जनता के प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी बनाती है, जबकि संसदीय नियम सदन की कार्यवाही को व्यवस्थित रखने में मदद करते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
विपक्ष द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री की राज्यसभा में उपस्थिति और सुरक्षा बलों की कथित ज्यादतियों पर जवाबदेही की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच, इस घटना ने संसदीय प्रक्रियाओं, मंत्रियों की जवाबदेही और विपक्ष की भूमिका पर बहस छेड़ दी है।
पृष्ठभूमि
- विपक्ष के सांसदों ने 20 जुलाई को पेपर लीक के विरोध में संसद की ओर मार्च कर रहे युवाओं पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कथित ज्यादतियों को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से राज्यसभा में आकर जवाब देने की मांग की है।
- विपक्षी सांसदों ने ‘अमित शाह जवाब दो, सदन में आओ’ के नारे लगाए, जिसके बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से गृह मंत्री की सदन में उपस्थिति के अनुरोध पर विचार करने को कहा।
- संसदीय कार्य मंत्री ने विपक्ष के व्यवधानों को समाप्त करने के लिए नियम 235 और अप्रासंगिकता या दोहराव पर नियम 240 का हवाला दिया, यह आरोप लगाते हुए कि विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे अपनी टिप्पणियों को दोहरा रहे थे।
- खड़गे ने अपने बोलने के अधिकार का बचाव किया और जोर देकर कहा कि यह उनका अधिकार है कि वे क्या, कब और कैसे कहें। उन्होंने गृह मंत्री और प्रधानमंत्री से सदन में आकर बयान देने की मांग की।
- इस घटना ने संसद में मंत्रियों की उपस्थिति की अनिवार्यता, विपक्ष की विरोध करने की स्वतंत्रता और संसदीय नियमों के अनुप्रयोग पर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किए हैं।
संसदीय प्रक्रियाएँ और मंत्रियों की जवाबदेही
- भारतीय संसदीय प्रणाली में, मंत्री सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं। हालांकि, राज्यसभा के सदस्य मंत्री भी सदन के प्रति जवाबदेह होते हैं, खासकर जब उनके मंत्रालय से संबंधित मुद्दों पर चर्चा हो रही हो।
- संसद में मंत्रियों की उपस्थिति यह सुनिश्चित करती है कि वे अपने मंत्रालयों से संबंधित नीतियों, निर्णयों और कार्यों पर सांसदों के प्रश्नों का उत्तर दें और स्पष्टीकरण दें। यह सरकार की जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- संसदीय नियम, जैसे कि नियम 235 (व्यवधानों को नियंत्रित करना) और नियम 240 (अप्रासंगिक या दोहराई गई टिप्पणियों को रोकना), सदन की कार्यवाही को सुचारू और व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
- शून्यकाल (Zero Hour) और प्रश्नकाल (Question Hour) जैसे तंत्र सांसदों को सार्वजनिक महत्व के मामलों को उठाने और मंत्रियों से जवाब मांगने का अवसर प्रदान करते हैं।
- विपक्ष की भूमिका सरकार को जवाबदेह ठहराना, सार्वजनिक मुद्दों को उठाना और नीतियों की आलोचना करना है। विरोध प्रदर्शन और नारे लगाना अक्सर इस भूमिका का एक हिस्सा होता है, हालांकि इसे संसदीय मर्यादा के भीतर होना चाहिए।
- सदन के अध्यक्ष (लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति) सदन की कार्यवाही के संरक्षक होते हैं। वे नियमों की व्याख्या करते हैं, व्यवस्था बनाए रखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि सभी सदस्यों को बोलने का उचित अवसर मिले।
- संसदीय लोकतंत्र में, सरकार और विपक्ष दोनों से अपेक्षा की जाती है कि वे सदन के नियमों और परंपराओं का सम्मान करें, ताकि सार्थक बहस और कानून निर्माण हो सके।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संसद में विपक्ष की भूमिका | लोकतंत्र में सरकार को जवाबदेह ठहराने और जनहित के मुद्दों को उठाने के लिए महत्वपूर्ण। |
| संसदीय विशेषाधिकार | सांसदों को सदन में अपनी बात रखने की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, ताकि वे बिना किसी भय के कार्य कर सकें। |
| सदन के नियमों का पालन | संसदीय कार्यवाही को सुचारु और व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए आवश्यक है। |
| अध्यक्ष/सभापति की भूमिका | सदन में व्यवस्था बनाए रखने, बहस को नियंत्रित करने और सभी सदस्यों को बोलने का अवसर प्रदान करने में निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। |
| मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी | मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका अर्थ है कि एक मंत्री का कार्य पूरे मंत्रिपरिषद का कार्य माना जाता है। |
महत्व
लोकतांत्रिक महत्व
- यह घटना संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका और सरकार की जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करती है।
- विपक्ष का यह आग्रह कि गृह मंत्री सदन में आकर सुरक्षा बलों द्वारा कथित ज्यादतियों पर जवाब दें, सरकार को जनता के प्रति उत्तरदायी ठहराने के उसके संवैधानिक कर्तव्य का हिस्सा है।
संसदीय प्रक्रिया और नियम
- राज्यसभा के सभापति द्वारा केंद्र से अनुरोध करना संसदीय प्रक्रियाओं और परंपराओं के सम्मान का प्रतीक है, जहाँ विपक्ष की मांगों पर विचार किया जाना चाहिए।
- नियम 235 (बाधाओं को समाप्त करना) और नियम 240 (अप्रासंगिकता या पुनरावृत्ति) का उल्लेख संसदीय बहस को नियंत्रित करने और सदन के समय का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के महत्व को दर्शाता है।
संघवाद और कानून-व्यवस्था
- सुरक्षा बलों की कथित ज्यादतियों का मुद्दा कानून-व्यवस्था से संबंधित है, जो भारत के संघीय ढांचे में राज्यों का विषय है, लेकिन राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर केंद्रीय मंत्री का बयान अपेक्षित होता है।
चुनौतियाँ
1. संसदीय गतिरोध
- विपक्ष की लगातार मांगें और सरकार का जवाब देने से बचना अक्सर संसदीय कार्यवाही में गतिरोध पैदा करता है, जिससे महत्वपूर्ण विधायी कार्य बाधित होते हैं।
- यह गतिरोध जनहित के मुद्दों पर सार्थक बहस को रोकता है और संसद की उत्पादकता को कम करता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संसद और इसकी कार्यप्रणाली
2. सरकार की जवाबदेही
- मंत्रियों का सदन में उपस्थित होकर सवालों का जवाब न देना सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाता है और पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है।
- यह स्थिति जनता के बीच यह धारणा बना सकती है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बच रही है।
यूपीएससी लिंक: कार्यपालिका की संसद के प्रति जवाबदेही
3. संसदीय नियमों का दुरुपयोग
- संसदीय नियमों, जैसे कि नियम 235 और 240, का उपयोग कभी-कभी विपक्ष की आवाज को दबाने या सार्थक बहस से बचने के लिए किया जा सकता है।
- यह सदन के भीतर स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद को बाधित करता है।
यूपीएससी लिंक: संसदीय नियम और प्रक्रियाएँ
4. अध्यक्ष/सभापति की भूमिका की चुनौती
- अध्यक्ष/सभापति को सरकार और विपक्ष के बीच संतुलन बनाना होता है, जिससे सदन की गरिमा बनी रहे और सभी पक्षों को सुना जा सके।
- दोनों पक्षों के बीच तनाव की स्थिति में निष्पक्षता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है।
यूपीएससी लिंक: संसद के पीठासीन अधिकारी
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| संसदीय कार्यवाही में बाधा | महत्वपूर्ण विधायी और नीतिगत चर्चाओं में देरी या उनका स्थगन। |
| मंत्रियों की अनुपस्थिति | सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल। |
| विपक्ष की मांगों को नजरअंदाज करना | लोकतांत्रिक मूल्यों और संसदीय परंपराओं का क्षरण। |
| संसदीय नियमों की व्याख्या | नियमों का दुरुपयोग या पक्षपातपूर्ण व्याख्या की संभावना। |
| जनता का विश्वास | संसद की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता के विश्वास में कमी। |
आगे की राह
- सरकार को विपक्ष की मांगों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए और महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदन में बयान देने के लिए मंत्रियों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
- विपक्ष को भी रचनात्मक विरोध प्रदर्शन करना चाहिए और संसदीय नियमों का सम्मान करते हुए सार्थक बहस में भाग लेना चाहिए।
- सभापति/अध्यक्ष को सदन के नियमों को निष्पक्षता से लागू करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिले।
- संसदीय समितियों का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए ताकि महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हो सके और गतिरोध कम हो सके।
- सदन के भीतर संवाद और सहयोग की भावना को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि सरकार और विपक्ष दोनों राष्ट्रीय हित में मिलकर काम कर सकें।
- संसद के सत्रों की अवधि और उत्पादकता बढ़ाने के लिए उपाय किए जाने चाहिए, ताकि सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर पर्याप्त समय दिया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
संसदीय विशेषाधिकार · संसदीय कार्यवाही · विपक्ष की भूमिका · सदन के अध्यक्ष की भूमिका · संसदीय नियम · मंत्रिपरिषद की जवाबदेही · लोकतंत्र में बहस · संसदीय गतिरोध · शून्य काल · प्रश्न काल
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 75 (3)’, ‘note’: ‘मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी।’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 85’, ‘note’: ‘संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन।’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 105’, ‘note’: ‘संसद के सदस्यों के विशेषाधिकार।’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 118’, ‘note’: ‘संसद की प्रक्रिया के नियम बनाने की शक्ति।’}
अवधारणा प्रवाह
सुरक्षा बलों की कथित ज्यादतियों पर विरोध प्रदर्शन। → विपक्ष द्वारा गृह मंत्री की राज्यसभा में उपस्थिति की मांग। → संसदीय कार्यवाही में गतिरोध और नारेबाजी। → राज्यसभा सभापति द्वारा केंद्र से अनुरोध। → संसदीय नियमों और परंपराओं की चर्चा। → सरकार की जवाबदेही और विपक्ष की भूमिका पर बहस।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. राज्यसभा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।
2. राज्यसभा के सभापति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
3. राज्यसभा के सभापति को हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित होना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। भारत का उपराष्ट्रपति (Vice-President) राज्यसभा (Rajya Sabha) का पदेन सभापति (ex-officio Chairman) होता है। कथन 2 गलत है। उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, लेकिन उसे लोकसभा (Lok Sabha) द्वारा भी अनुमोदित किया जाना चाहिए। कथन 3 सही है। उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित होना चाहिए।
Q2. अभिकथन (A): संसदीय कार्यवाही के दौरान विपक्ष का यह अधिकार है कि वह सरकार से महत्वपूर्ण मुद्दों पर जवाबदेही की मांग करे।
कारण (R): संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष सरकार पर नियंत्रण और संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं। संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार को जवाबदेह ठहराना और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर चर्चा को बढ़ावा देना है। कारण (R) अभिकथन (A) का सही स्पष्टीकरण है, क्योंकि विपक्ष की यह भूमिका ही उसे सरकार से जवाबदेही मांगने का अधिकार देती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारतीय संसद में विपक्ष की भूमिका और संसदीय कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने में पीठासीन अधिकारी की शक्तियों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या संसदीय गतिरोध लोकतंत्र के लिए एक स्वस्थ संकेत है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर की रूपरेखा:
1. **परिचय:** भारतीय संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष और पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) की भूमिका का संक्षिप्त परिचय।
2. **विपक्ष की भूमिका:**
* सरकार को जवाबदेह ठहराना (accountability)।
* वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करना।
* सार्वजनिक मुद्दों को उठाना।
* सरकार की आलोचना करना और उसकी कमियों को उजागर करना।
* संसदीय समितियों (Parliamentary Committees) में सक्रिय भागीदारी।
3. **पीठासीन अधिकारी (सभापति/अध्यक्ष) की शक्तियां:**
* सदन की कार्यवाही का संचालन (conduct of proceedings)।
* नियमों की व्याख्या और प्रवर्तन (interpretation and enforcement of rules)।
* सदन में व्यवस्था बनाए रखना (maintaining order)।
* सदस्यों को बोलने की अनुमति देना और समय आवंटित करना।
* संसदीय विशेषाधिकारों (Parliamentary Privileges) का संरक्षण।
* संसदीय गतिरोध को हल करने में भूमिका।
4. **आलोचनात्मक परीक्षण:**
* विपक्ष द्वारा व्यवधान (disruptions) और गतिरोध का बढ़ता चलन।
* पीठासीन अधिकारी की निष्पक्षता पर सवाल।
* संसदीय नियमों का दुरुपयोग।
* बहस और चर्चा की गुणवत्ता में गिरावट।
5. **संसदीय गतिरोध और लोकतंत्र:**
* **नकारात्मक पक्ष:** विधायी कार्य में बाधा, सार्वजनिक धन की बर्बादी, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा का अभाव, जनता का संसद में विश्वास कम होना।
* **सकारात्मक पक्ष (सीमित):** सरकार पर दबाव बनाने का एक तरीका, विपक्ष द्वारा अपनी बात रखने का अंतिम उपाय (हालांकि यह अंतिम उपाय नहीं होना चाहिए)।
6. **निष्कर्ष:** संसदीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों को नियमों का पालन करते हुए रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए। पीठासीन अधिकारी को निष्पक्षता और दृढ़ता से कार्य करना चाहिए ताकि सार्थक बहस और चर्चा को बढ़ावा मिल सके, न कि केवल गतिरोध को। लोकतंत्र में गतिरोध एक स्वस्थ संकेत नहीं है, बल्कि यह संसदीय प्रक्रिया की अक्षमता को दर्शाता है।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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