राज्यों द्वारा ₹16,750 करोड़ के सरकारी प्रतिभूतियों का नीलामी: जानिए तारीख, प्रक्रिया और लाभ

Auction of State Government Securities — diagram

राज्यों द्वारा ₹16,750 करोड़ के सरकारी प्रतिभूतियों का नीलामी: जानिए तारीख, प्रक्रिया और लाभ

राज्यों द्वारा ₹16,750 करोड़ के सरकारी प्रतिभूतियों का नीलामी: जानिए तारीख, प्रक्रिया और लाभ — राज्य सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी: राज्यवार प्रस्तावित राशि
आरेख: राज्य सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी: राज्यवार प्रस्तावित राशि

✎ राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे को पूरा करने और विकासात्मक व्ययों के वित्तपोषण के लिए RBI के माध्यम से बाज़ार से धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय। सरकारी बजट।  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ; स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ।
  • Prelims: राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), राजकोषीय घाटा, खुला बाज़ार परिचालन (OMO), ई-कुबेर प्रणाली, गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा, राजकोषीय संघवाद, सार्वजनिक ऋण
  • Essay: राजकोषीय संघवाद की चुनौतियाँ और भारत में राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता।, भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक ऋण प्रबंधन की भूमिका।

त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे को पूरा करने और विकासात्मक व्ययों के वित्तपोषण के लिए RBI के माध्यम से बाज़ार से धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा कुल ₹16,750 करोड़ की राज्य सरकारी प्रतिभूतियों (State Government Securities – SGS) की नीलामी की घोषणा की है। यह नीलामी राज्यों को अपने विकासात्मक और अन्य व्ययों के वित्तपोषण के लिए बाज़ार से धन जुटाने में सहायता करती है। यह घटनाक्रम राज्यों के राजकोषीय स्वास्थ्य, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों और समग्र भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

पृष्ठभूमि

  • राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं, जिनके माध्यम से वे बाज़ार से उधार लेती हैं। इन्हें ‘राज्य विकास ऋण’ (State Development Loans – SDLs) भी कहा जाता है।
  • यदि किसी राज्य ने भारत सरकार से कोई ऋण लिया है या केंद्र सरकार द्वारा दी गई गारंटी पर कोई ऋण बकाया है, तो उसे केंद्र की सहमति के बिना कोई नया ऋण नहीं उठाना चाहिए।
  • RBI राज्य सरकारों के लिए एक बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है, उनकी ओर से SGS की नीलामी आयोजित करता है।
  • इन प्रतिभूतियों की नीलामी RBI की कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (Core Banking Solution – CBS) प्रणाली ‘ई-कुबेर’ (E-Kuber) के माध्यम से की जाती है, जो एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म है।
  • निवेशकों के लिए ‘गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा’ (Non-competitive Bidding Facility) भी उपलब्ध है, जिसके तहत छोटे और खुदरा निवेशक बिना प्रतिस्पर्धी बोली लगाए सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीद सकते हैं।
  • इन प्रतिभूतियों पर ब्याज दरें नीलामी में RBI द्वारा निर्धारित की जाती हैं, जो बाज़ार की स्थितियों और राज्यों की साख पर निर्भर करती हैं।

राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) क्या हैं?

  • राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए दीर्घकालिक ऋण साधन हैं, जिनका उपयोग वे अपने राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को पूरा करने और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने हेतु करती हैं।
  • ये भारत सरकार की प्रतिभूतियों (Government Securities – G-Secs) की तरह ही संप्रभु गारंटी द्वारा समर्थित होती हैं, जिससे इनमें निवेश अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।
  • इन प्रतिभूतियों की परिपक्वता अवधि (Tenor) आमतौर पर 5 वर्ष से 20 वर्ष तक होती है, हालांकि यह भिन्न हो सकती है।
  • SGS पर ब्याज का भुगतान अर्ध-वार्षिक आधार पर किया जाता है, और मूलधन का भुगतान परिपक्वता पर किया जाता है।
  • RBI इन प्रतिभूतियों की नीलामी ‘मूल्य’ (Price) या ‘उपज’ (Yield) के आधार पर आयोजित करता है, जहाँ निवेशक अपनी अपेक्षित उपज या मूल्य के आधार पर बोली लगाते हैं।
  • SGS में विभिन्न संस्थागत निवेशक जैसे बैंक, बीमा कंपनियाँ, भविष्य निधि और खुदरा निवेशक भी निवेश कर सकते हैं।
  • इन प्रतिभूतियों का बाज़ार में द्वितीयक व्यापार (Secondary Trading) भी होता है, जिससे निवेशकों को तरलता (Liquidity) मिलती है।
  • राज्यों द्वारा SGS के माध्यम से उधार लेना उनके राजकोषीय प्रबंधन और वित्तीय स्वायत्तता का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो उन्हें केंद्र पर निर्भरता कम करने में मदद करता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) राज्य सरकारों द्वारा खुले बाजार से धन जुटाने का एक साधन।
नीलामी प्रक्रिया भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा ‘ई-कुबेर’ प्रणाली के माध्यम से आयोजित, पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित करती है।
गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा (Non-competitive Bidding Facility) छोटे और खुदरा निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने का अवसर प्रदान करती है, वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देती है।
पुनः जारी करना (Re-issue) पहले से जारी प्रतिभूतियों को फिर से बेचना, जिससे बाजार में तरलता बनी रहती है और राज्यों को निरंतर धन उपलब्ध होता है।
ब्याज दर/उपज का निर्धारण बाजार की शक्तियों और RBI द्वारा निर्धारित, जो राज्यों की उधार लेने की लागत को प्रभावित करता है।

महत्व

राजकोषीय प्रबंधन (Fiscal Management)

  • राज्य सरकार प्रतिभूतियों की नीलामी राज्यों को अपनी विकासात्मक परियोजनाओं और बजटीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक धन जुटाने में सक्षम बनाती है।
  • यह राज्यों के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के वित्तपोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिससे उन्हें वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है।

मौद्रिक नीति (Monetary Policy) और तरलता

  • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा नीलामी का संचालन बाजार में तरलता (Liquidity) के स्तर को प्रभावित करता है, जो समग्र मौद्रिक नीति का एक हिस्सा है।
  • सरकारी प्रतिभूतियों की मांग और आपूर्ति ब्याज दरों को प्रभावित करती है, जिसका अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।

निवेश और वित्तीय समावेशन

  • राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ निवेशकों, विशेषकर संस्थागत निवेशकों के लिए एक सुरक्षित निवेश विकल्प प्रदान करती हैं।
  • गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा और ‘रिटेल डायरेक्ट पोर्टल’ के माध्यम से खुदरा निवेशकों को भी सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने का अवसर मिलता है, जिससे वित्तीय समावेशन बढ़ता है।

संघीय वित्त (Federal Finance)

  • यह केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जहां RBI राज्यों के लिए एक बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है।
  • राज्यों की उधार लेने की क्षमता और लागत सीधे उनकी वित्तीय स्वायत्तता और विकासात्मक क्षमता को प्रभावित करती है।

चुनौतियाँ

1. राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline)

  • राज्यों द्वारा अत्यधिक उधार लेने से राजकोषीय घाटा बढ़ सकता है, जिससे भविष्य में ऋण चुकाने का बोझ बढ़ जाता है।
  • उच्च उधार लागत राज्यों के विकासात्मक व्यय के लिए उपलब्ध संसाधनों को कम कर सकती है।

2. बाजार जोखिम (Market Risk)

  • ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव SGS की मांग और मूल्य को प्रभावित कर सकता है, जिससे राज्यों की उधार लेने की लागत अप्रत्याशित हो सकती है।
  • कमजोर बाजार धारणा या तरलता की कमी से नीलामी में अपेक्षित धन जुटाना मुश्किल हो सकता है।

3. राज्यों के बीच असमानता

  • कुछ राज्यों की वित्तीय स्थिति दूसरों की तुलना में बेहतर होती है, जिससे उन्हें कम ब्याज दरों पर उधार लेने में आसानी होती है, जबकि कमजोर राज्यों को अधिक लागत चुकानी पड़ती है।
  • यह क्षेत्रीय असमानताओं को बढ़ा सकता है।

4. ऋण स्थिरता (Debt Sustainability)

  • राज्यों के बढ़ते ऋण स्तर उनकी दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के लिए चिंता का विषय बन सकते हैं, खासकर यदि ऋण का उपयोग अनुत्पादक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
  • उच्च ऋण-से-GDP अनुपात राज्यों की क्रेडिट रेटिंग को प्रभावित कर सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
राजकोषीय घाटे का प्रबंधन राज्यों द्वारा अत्यधिक उधार लेने से ऋण का बोझ बढ़ सकता है।
ब्याज दर में उतार-चढ़ाव उधार लेने की लागत पर अनिश्चितता पैदा करता है।
बाजार में तरलता कम तरलता से नीलामी में पर्याप्त मांग नहीं मिल पाती है।
राज्यों की वित्तीय स्थिति में अंतर कमजोर राज्यों के लिए उच्च उधार लागत।
ऋण स्थिरता दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता पर संभावित नकारात्मक प्रभाव।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा (Scheme for Non-competitive Bidding Facility)
  • रिटेल डायरेक्ट पोर्टल (Retail Direct portal)

आगे की राह

  • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना ताकि राज्यों के राजकोषीय घाटे को नियंत्रित किया जा सके।
  • राज्यों को अपनी राजस्व सृजन क्षमता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना, जैसे कि कर आधार का विस्तार और गैर-कर राजस्व में वृद्धि।
  • RBI को बाजार की स्थितियों की निगरानी जारी रखनी चाहिए और आवश्यकतानुसार तरलता प्रबंधन उपायों को अपनाना चाहिए ताकि SGS नीलामी सुचारू रूप से हो सके।
  • राज्यों को पूंजीगत व्यय पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करना, जो दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा देता है और ऋण चुकाने की क्षमता में सुधार करता है।
  • वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy) कार्यक्रमों को बढ़ावा देना ताकि अधिक खुदरा निवेशक SGS में निवेश कर सकें और राज्यों के लिए धन जुटाने के आधार को व्यापक बना सकें।
  • राज्यों के बीच सर्वोत्तम राजकोषीय प्रबंधन प्रथाओं को साझा करने के लिए एक मंच स्थापित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राज्य विकास ऋण · राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ · राजकोषीय संघवाद · राजकोषीय घाटा · भारतीय रिज़र्व बैंक · खुले बाज़ार परिचालन · गैर-प्रतिस्पर्धी बोली · ई-कुबेर प्रणाली · राज्यों का ऋण प्रबंधन · सरकारी प्रतिभूति बाज़ार

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • [‘अनुच्छेद 293’, ‘राज्यों द्वारा उधार लेने की शक्ति’]

अवधारणा प्रवाह

राज्य सरकारों को विकासात्मक व्यय के लिए धन की आवश्यकता होती है।  →  राज्य सरकारें भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के माध्यम से SGS जारी करती हैं।  →  RBI ‘ई-कुबेर’ प्रणाली पर SGS की नीलामी आयोजित करता है।  →  निवेशक (बैंक, वित्तीय संस्थान, खुदरा निवेशक) SGS खरीदते हैं।  →  राज्य सरकारों को धन प्राप्त होता है, जिसका उपयोग वे अपनी परियोजनाओं के लिए करती हैं।  →  निवेशकों को SGS पर ब्याज मिलता है और परिपक्वता पर मूलधन वापस मिलता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा राज्य सरकारों की ओर से जारी की जाती हैं।
2. SGS की नीलामी केवल प्रतिस्पर्धी बोली (Competitive Bidding) के माध्यम से की जाती है।
3. ‘गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा योजना’ के तहत, खुदरा निवेशक सीधे RBI के रिटेल डायरेक्ट पोर्टल के माध्यम से SGS में निवेश कर सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि RBI राज्यों के लिए ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है और उनकी ओर से SGS जारी करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि SGS की नीलामी प्रतिस्पर्धी और गैर-प्रतिस्पर्धी दोनों बोलियों के माध्यम से की जाती है। कथन 3 सही है क्योंकि गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा के तहत खुदरा निवेशक रिटेल डायरेक्ट पोर्टल का उपयोग कर सकते हैं।

Q2. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा राज्य सरकारों की ओर से जारी की जाने वाली राज्य सरकारी प्रतिभूतियों (SGS) के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सबसे सटीक रूप से SGS के उद्देश्य का वर्णन करता है?

  1. यह केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने का एक साधन है।
  2. यह राज्यों को अपने विकास और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए बाज़ार से धन जुटाने में सक्षम बनाता है।
  3. यह वाणिज्यिक बैंकों के लिए अपनी वैधानिक तरलता अनुपात (SLR) आवश्यकताओं को पूरा करने का प्राथमिक तरीका है।
  4. यह भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला एक मौद्रिक नीति उपकरण है।

उत्तर: यह राज्यों को अपने विकास और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए बाज़ार से धन जुटाने में सक्षम बनाता है। — SGS राज्य सरकारों के लिए बाज़ार से धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण साधन है ताकि वे अपने विकास व्यय और अन्य राजकोषीय आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। अन्य विकल्प SGS के प्राथमिक उद्देश्य का सही वर्णन नहीं करते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) क्या हैं और ये राज्य सरकारों के राजकोषीय प्रबंधन में कैसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं? भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) SGS की नीलामी प्रक्रिया में क्या भूमिका निभाता है, चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय में SGS को परिभाषित करें और बताएं कि यह राज्यों के लिए ऋण का एक साधन है।
मुख्य भाग में, SGS की विशेषताओं और राज्य सरकारों के राजकोषीय प्रबंधन में इसकी भूमिका (जैसे विकास परियोजनाओं का वित्तपोषण, राजकोषीय घाटे का प्रबंधन) पर चर्चा करें।
RBI की भूमिका को विस्तार से समझाएं, जिसमें ऋण प्रबंधक, नीलामीकर्ता (E-Kuber प्रणाली का उल्लेख), और बाज़ार निर्माता के रूप में इसकी भूमिका शामिल हो। प्रतिस्पर्धी और गैर-प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रियाओं का भी उल्लेख करें।
निष्कर्ष में, राजकोषीय संघवाद और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता में SGS के महत्व को रेखांकित करें।

स्रोत: RBI


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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