लोकसभा अध्यक्ष ने गायत्री परिवार के आध्यात्मिक योगदान की सराहना की

लोकसभा अध्यक्ष ने गायत्री परिवार के आध्यात्मिक योगदान की सराहना की

लोकसभा अध्यक्ष ने गायत्री परिवार के आध्यात्मिक योगदान की सराहना की

✎ गायत्री परिवार का शताब्दी संदर्भ यह दिखाता है कि आध्यात्मिक चेतना, मूल्यपरक शिक्षा और महिला सशक्तीकरण का समन्वय सामाजिक सुधार की सतत प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकता है, जिसकी संवैधानिक आधारशिला अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 51क(ङ) में निहित…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भारतीय संस्कृति एवं भारतीय समाज (भक्ति एवं सामाजिक सुधार आंदोलन; धार्मिक संगठनों की सामाजिक भूमिका; महिला सशक्तीकरण)  |  GS Paper I — आधुनिक भारत का इतिहास (बीसवीं सदी के सुधार आंदोलन और जन-जागरण)  |  GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था (लोक सभा अध्यक्ष की भूमिका; मौलिक अधिकार एवं मौलिक कर्तव्य)
  • Prelims: गायत्री परिवार (Gayatri Parivar) और आचार्य श्रीराम शर्मा, अखंड ज्योति (Akhand Jyoti) पत्रिका, गायत्री मंत्र — ऋग्वेद का सावित्री मंत्र (मंडल 3, सूक्त 62, ऋचा 10), शांतिकुंज, हरिद्वार (Shantikunj, Haridwar) — गायत्री परिवार का मुख्यालय, अनुच्छेद 25 — अंतःकरण की स्वतंत्रता एवं धर्म के प्रचार की स्वतंत्रता, अनुच्छेद 51क(ङ) — स्त्रियों के गौरव के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग, अनुच्छेद 15(3) — महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबंध, लोक सभा अध्यक्ष — अनुच्छेद 93 के अधीन सदन का चयन
  • Essay: धार्मिक-आध्यात्मिक आंदोलन सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र निर्माण के वाहक कैसे बनते हैं — आध्यात्मिकता, नैतिकता और आधुनिक मूल्यों का संतुलन, आस्था से सशक्तीकरण तक: परिवार और समाज में महिला की भूमिका को बदलने में आध्यात्मिक आंदोलनों का योगदान

त्वरित पुनरावृत्ति: गायत्री परिवार का शताब्दी संदर्भ यह दिखाता है कि आध्यात्मिक चेतना, मूल्यपरक शिक्षा और महिला सशक्तीकरण का समन्वय सामाजिक सुधार की सतत प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकता है, जिसकी संवैधानिक आधारशिला अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 51क(ङ) में निहित है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

लोक सभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने 31 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में गायत्री परिवार द्वारा आयोजित शताब्दी समारोह 2026 को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा और माता भगवती देवी जी के योगदान का स्मरण किया। उन्होंने आध्यात्मिक चेतना के प्रसार, व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण के आदर्शों, मूल्यपरक शिक्षा तथा महिलाओं को शिक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित करने के प्रयासों की सराहना की। समारोह में अखंड ज्योति के माध्यम से फैले विचारों और “हम बदलेंगे, युग बदलेगा” के संकल्प को सामाजिक सुधार के मूल मंत्र के रूप में रेखांकित किया गया। यह समाचार सामाजिक सुधार, महिला सशक्तीकरण और नैतिक शिक्षा से संबंधित विषयों पर किसी धार्मिक या राजनीतिक मत के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक-सामाजिक आंदोलन के योगदान के रूप में देखा जाना चाहिए।

पृष्ठभूमि

  • भारत में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों (राजा राममोहन राय, आर्य समाज, ब्रह्म समाज, रामकृष्ण मिशन आदि) ने सती प्रथा, बाल विवाह, अस्पृश्यता और स्त्री-शिक्षा जैसे विषयों पर जनमत तैयार किया; गायत्री परिवार इसी परंपरा के बीसवीं सदी के उत्तरार्ध के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है।
  • स्वतंत्रता के बाद संविधान ने धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 से 28) की गारंटी दी, साथ ही मौलिक कर्तव्यों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और स्त्रियों के गौरव के विरुद्ध प्रथाओं के त्याग को शामिल किया (अनुच्छेद 51क)।
  • आचार्य श्रीराम शर्मा ने अखंड ज्योति पत्रिका और युग निर्माण योजना के माध्यम से व्यक्ति-निर्माण पर बल दिया; नैतिक शिक्षा, व्यसन-मुक्ति, कुरीति-उन्मूलन और सेवा-कार्य इस आंदोलन के प्रमुख कार्यक्षेत्र रहे।
  • हरिद्वार स्थित शांतिकुंज गायत्री परिवार का केंद्रीय मुख्यालय है, जहां से साधना, प्रशिक्षण और सेवा-कार्यक्रम संचालित होते हैं; आचार्य जी द्वारा स्थापित देव संस्कृति विश्वविद्यालय भी इसी परिसर-परंपरा से जुड़ा है।
  • भारत में आध्यात्मिक और सामाजिक संगठनों द्वारा महिला-शिक्षा, स्वास्थ्य-जागरूकता और सामुदायिक सेवा के कार्यों ने सरकारी नीतियों के पूरक के रूप में भूमिका निभाई है, जिसे नीति-विश्लेषण में नागरिक समाज (Civil Society) की भागीदारी के उदाहरण के रूप में पढ़ा जाता है।

गायत्री परिवार क्या है?

  • गायत्री परिवार एक आध्यात्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलन है, जिसकी स्थापना आचार्य श्रीराम शर्मा (Acharya Shriram Sharma) ने की थी; इसका केंद्र हरिद्वार का शांतिकुंज है।
  • इसका वैचारिक आधार गायत्री मंत्र और यज्ञ-परंपरा है; गायत्री मंत्र ऋग्वेद के सावित्री मंत्र से लिया गया है, जिसे साधना और आत्मिक जागरण का माध्यम माना जाता है।
  • अखंड ज्योति (Akhand Jyoti) पत्रिका इस आंदोलन के विचारों के प्रसार का प्रमुख माध्यम रही है, जिसके द्वारा नैतिकता, आत्म-सुधार और सामाजिक दायित्व के विषय जन-जन तक पहुँचाए गए।
  • युग निर्माण योजना के अंतर्गत व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण और राष्ट्र निर्माण को क्रमिक चरणों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  • माता भगवती देवी शर्मा आचार्य जी की सहधर्मिणी थीं और महिला-जागरण, परिवार में महिला की समान भागीदारी तथा स्त्री-शिक्षा के प्रचार में उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।
  • सामाजिक क्षेत्र में इस आंदोलन की गतिविधियाँ कुरीति-उन्मूलन, व्यसन-मुक्ति, पर्यावरण-संरक्षण, स्वास्थ्य-जागरूकता और सेवा-कार्यों से जुड़ी रही हैं।
  • संवैधानिक दृष्टि से ऐसे संगठन अनुच्छेद 25 के अंतर्गत धर्म के पालन की स्वतंत्रता का प्रयोग करते हैं, किंतु उनका सामाजिक कार्य अनुच्छेद 51क के मौलिक कर्तव्यों और समानता तथा गरिमा के संवैधानिक मूल्यों की दिशा में भी देखा जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता (Feature) महत्त्व (Significance)
आचार्य श्रीराम शर्मा और माता भगवती देवी का योगदान (Contribution of Acharya Shriram Sharma and Mata Bhagwati Devi) आध्यात्मिक पुनर्जागरण (Spiritual Renaissance) और व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र निर्माण के आदर्शों का प्रसार
अखंड ज्योति पत्रिका (Akhand Jyoti) आध्यात्मिक विचारों और जीवन-मूल्यों को गांवों और कस्बों तक पहुंचाने का सतत माध्यम
गायत्री मंत्र और यज्ञ परंपरा अंतर्मन की शुद्धता और आत्मिक जागरण का साधन, जो सामूहिक आचरण से जुड़ता है
महिला सशक्तीकरण (Women Empowerment) महिलाओं की शिक्षा, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता पर बल, जिसे परिवार और समाज की प्रगति का आधार माना गया
मूल्यपरक शिक्षा और चरित्र निर्माण (Value-based Education) शिक्षा के प्रारंभिक चरण से आध्यात्मिकता, सांस्कृतिक मूल्यों और उत्तरदायित्व की भावना का विकास
विदेशों में कार्य (Overseas Activities) भारतीय आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक ज्ञान का वैश्विक प्रसार

महत्व

सामाजिक सुधार (Social Reform)

  • अंधविश्वास, हानिकारक सामाजिक कुरीतियों और कठिन परिस्थितियों से उबरने में लोगों के मार्गदर्शन का उल्लेख किया गया, जो 19वीं-20वीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलनों की परंपरा से मेल खाता है।
  • सामाजिक सुधार का प्रभाव केवल शहरों तक सीमित नहीं माना गया; दूरदराज के गांवों और ढाणियों में परिवर्तन को विशेष रूप से रेखांकित किया गया।
  • व्यक्तिगत आचरण में सुधार को समाज-सुधार की नींव मानकर इसे व्यापक सामाजिक बदलाव से जोड़ा गया।

महिला सशक्तीकरण (Women Empowerment)

  • माता भगवती देवी के नेतृत्व में महिलाओं की शिक्षा, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता को सामाजिक प्रगति की कुंजी के रूप में प्रस्तुत किया गया।
  • परिवार में महिला के व्यक्तित्व विकास को पूरे परिवार और समाज की प्रगति से जोड़ना सामाजिक न्याय और समानता की दृष्टि से प्रासंगिक है।
  • भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्यों में स्त्रियों के गौरव को अपमानित करने वाली प्रथाओं के त्याग का उल्लेख है, जिससे ऐसे प्रयास संवैधानिक भावना के अनुरूप ठहरते हैं।

शैक्षिक और सांस्कृतिक योगदान (Educational and Cultural Contribution)

  • मूल्यपरक शिक्षा, चरित्र निर्माण और भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान को शिक्षा-व्यवस्था का हिस्सा बनाने पर बल दिया गया।
  • आध्यात्मिकता, संस्कृति और भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा को पाठ्यक्रम के पूरक के रूप में देखा गया।
  • भारतीय विरासत के वैश्विक प्रसार को सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) के व्यापक संदर्भ में भी समझा जा सकता है।

नागरिक समाज की भूमिका (Role of Civil Society)

  • सरकारी कार्यक्रमों के साथ-साथ नागरिक समाज संगठन व्यक्ति और परिवार स्तर पर सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में पूरक भूमिका निभाते हैं।
  • राष्ट्र निर्माण में जन-भागीदारी का यह उदाहरण लोकतांत्रिक शासन में स्वैच्छिक संस्थाओं के महत्त्व को दर्शाता है।

चुनौतियाँ

1. प्रभाव का मापन (Impact Measurement)

  • आध्यात्मिक चेतना, चरित्र निर्माण और मूल्य-परिवर्तन जैसे परिणाम गुणात्मक होते हैं, इन्हें मात्रात्मक संकेतकों से पूरी तरह नापना कठिन है।
  • सामाजिक सुधार के दावों को प्रमाणित करने के लिए स्वतंत्र आंकड़े और मूल्यांकन तंत्र का अभाव रहता है।

2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण और धार्मिक आस्था का संतुलन

  • आस्था-आधारित आंदोलनों में तर्कशील दृष्टिकोण और धार्मिक भावना के बीच संतुलन बनाए रखना एक संवेदनशील प्रश्न है।
  • अंधविश्वास-विरोध को सुधार का लक्ष्य मानते हुए भी आस्था की स्वतंत्रता का सम्मान आवश्यक है।

3. विदेशी वित्तपोषण और पारदर्शिता

  • विदेशों में कार्य करने वाले संगठनों के लिए विदेशी अंशदान से जुड़े नियम और रिपोर्टिंग दायित्व लागू होते हैं।
  • धन के स्रोत, व्यय और उत्तरदायित्व में पारदर्शिता बनाए रखना नागरिक समाज संगठनों की वैधता के लिए आवश्यक है।

4. व्यक्ति-केंद्रित आंदोलनों में संस्थागत निरंतरता

  • संस्थापकों के आदर्शों पर आधारित आंदोलनों में नेतृत्व-परिवर्तन के बाद भी मूल उद्देश्यों को बनाए रखना चुनौती होता है।
  • संस्थागत ढांचे, प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं और पारदर्शी प्रशासन के बिना प्रभाव सीमित रह सकता है।

5. सरकारी नीतियों के साथ समन्वय का अभाव

  • समुदाय-आधारित पहलें और राज्य की विकास योजनाएं प्रायः अलग-अलग चलती हैं, जिससे संसाधनों का दोहराव या अंतराल होता है।
  • महिला सशक्तीकरण और मूल्यपरक शिक्षा जैसे लक्ष्यों पर सरकारी और सामाजिक प्रयासों के बीच स्पष्ट साझेदारी का अभाव रहता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा (Issue) चिंता (Concern)
प्रभाव का मूल्यांकन सामाजिक और आध्यात्मिक परिवर्तन के दावों को प्रमाणित करने के लिए स्वतंत्र मानदंडों का अभाव
आस्था और तर्कशीलता धार्मिक भावना का सम्मान करते हुए अंधविश्वास-विरोधी दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की संवेदनशीलता
विदेशी वित्तपोषण विदेशों में सक्रिय संगठनों के लिए अंशदान-नियमों और रिपोर्टिंग का पालन
संस्थागत निरंतरता संस्थापकों के बाद आदर्शों, नेतृत्व और कार्यप्रणाली को बनाए रखने की चुनौती
नीतिगत समन्वय राज्य की योजनाओं और समुदाय-आधारित पहलों के बीच साझेदारी और दोहराव से बचाव

आगे की राह

  • सामाजिक सुधार संबंधी कार्यक्रमों के प्रभाव का मूल्यांकन स्वतंत्र संकेतकों, जैसे साक्षरता, विद्यालय उपस्थिति और लैंगिक अनुपात, के आधार पर किया जाए।
  • धार्मिक और आध्यात्मिक संस्थाओं की वित्तीय पारदर्शिता के लिए वार्षिक लेखा-परीक्षा और सार्वजनिक प्रकटीकरण को सुदृढ़ किया जाए।
  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मौलिक कर्तव्यों के प्रचार के लिए विद्यालय पाठ्यक्रम में मूल्यपरक शिक्षा को तर्कशील चिंतन के साथ जोड़ा जाए।
  • महिला सशक्तीकरण से जुड़े स्वैच्छिक प्रयासों और सरकारी कार्यक्रमों के बीच समन्वय तंत्र बनाया जाए, ताकि संसाधनों का दोहराव न हो।
  • स्थानीय स्तर पर नागरिक समाज संगठनों को प्रशिक्षण, डेटा-साझाकरण और मूल्यांकन के लिए शासन की प्रक्रियाओं में शामिल किया जाए।
  • विदेशों में सक्रिय भारतीय सांस्कृतिक संगठनों के कार्यों को सांस्कृतिक कूटनीति की व्यापक नीति के साथ जोड़ा जाए।
  • संस्थागत निरंतरता के लिए आंदोलनों को व्यक्ति-केंद्रित के बजाय नियम-आधारित और पारदर्शी प्रशासनिक ढांचे पर विकसित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

सामाजिक सुधार (Social Reform) · आध्यात्मिक पुनर्जागरण (Spiritual Renaissance) · महिला सशक्तीकरण (Women Empowerment) · मूल्यपरक शिक्षा (Value-based Education) · धार्मिक स्वतंत्रता (Freedom of Religion) : अनुच्छेद 25 से 28 · मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties) : अनुच्छेद 51क(ज) · नागरिक समाज (Civil Society) की भूमिका · करिश्माई प्राधिकार (Charismatic Authority) · कुरीति उन्मूलन विधि (Anti-Social Practice Legislation) · अनुच्छेद 17 एवं अस्पृश्यता उन्मूलन · धार्मिक संस्थाओं का स्व-प्रबंधन (Self-management of Religious Affairs) : अनुच्छेद 26 · सांस्कृतिक विरासत एवं राष्ट्र निर्माण (Cultural Heritage and Nation-Building)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 51क(ह): वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुधार की भावना
  • अनुच्छेद 51क(ड़): स्त्रियों के गौरव विरोधी प्रथाओं का त्याग
  • अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका

अवधारणा प्रवाह

आध्यात्मिक चेतना और मूल्यपरक विचारों का प्रसार (अखंड ज्योति, गायत्री परिवार के कार्यक्रम)  →  व्यक्ति के चरित्र और आत्मिक जागरण में परिवर्तन  →  परिवार में महिला की शिक्षा, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता में वृद्धि  →  कुरीतियों और अंधविश्वासों में कमी से सामाजिक सुधार  →  सामूहिक उत्तरदायित्व और नागरिक भागीदारी का विकास  →  समाज और राष्ट्र निर्माण में सकारात्मक योगदान

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
1. संविधान का अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।
2. अनुच्छेद 26 के अंतर्गत प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय को धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार प्राप्त है।
3. मौलिक कर्तव्यों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद, जिज्ञासा और सुधार की भावना का विकास सम्मिलित है।
4. मौलिक कर्तव्यों का उल्लंघन होने पर उन्हें न्यायालय द्वारा सीधे लागू कराया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 25 में अंतःकरण और धर्म की स्वतंत्रता है, जो भाग III के अन्य प्रावधानों और लोक व्यवस्था के अधीन है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को धार्मिक कार्यों के प्रबंधन का अधिकार देता है। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 51क(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और सुधार की भावना को मौलिक कर्तव्य बताता है। कथन 4 गलत है: मौलिक कर्तव्य न्यायालय द्वारा प्रत्यक्ष रूप से लागू नहीं कराए जाते, इसलिए केवल तीन कथन सही हैं।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों को ध्यानपूर्वक पढ़िए :
कथन (A): 19वीं सदी के भारतीय सामाजिक सुधार आंदोलनों ने धार्मिक पुनर्व्याख्या और विधायी हस्तक्षेप, दोनों मार्गों का सहारा लिया।
कारण (R): बाल विवाह अवरोध अधिनियम, 1929 केंद्रीय विधान सभा में सुधारवादी दबाव के परिणामस्वरूप पारित हुआ था।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए :

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — राजा राम मोहन राय, दयानंद सरस्वती और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे सुधारकों ने धर्मग्रंथों की पुनर्व्याख्या की, जबकि सती प्रथा उन्मूलन (1829), विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856) और बाल विवाह अवरोध अधिनियम (1929) जैसे विधायी उपाय भी हुए। बाल विवाह अवरोध अधिनियम, 1929 को हरबिलास शारदा द्वारा प्रस्तुत विधेयक के रूप में जाना जाता है और इसे सुधारवादी दबाव के बीच पारित किया गया, इसलिए दोनों कथन सही हैं तथा (R) (A) की स्पष्ट व्याख्या करता है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का मिलान कीजिए :
सूची-I (संस्था/आंदोलन)
1. ब्रह्म समाज
2. आर्य समाज
3. सत्यशोधक समाज
4. रामकृष्ण मिशन

सूची-II (संस्थापक/प्रवर्तक)
a. राजा राम मोहन राय
b. दयानंद सरस्वती
c. ज्योतिबा फुले
d. स्वामी विवेकानंद

सही मिलान का चयन कीजिए :

  1. 1-a, 2-b, 3-c, 4-d
  2. 1-b, 2-a, 3-c, 4-d
  3. 1-a, 2-c, 3-b, 4-d
  4. 1-a, 2-b, 3-d, 4-c

उत्तर: 1-a, 2-b, 3-c, 4-d — ब्रह्म समाज की स्थापना राजा राम मोहन राय ने की, आर्य समाज दयानंद सरस्वती द्वारा (1875) स्थापित हुआ, सत्यशोधक समाज ज्योतिबा फुले द्वारा (1873) बनाया गया और रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने की। इसलिए केवल विकल्प (A) का मिलान पूर्णतः सही है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में आध्यात्मिक और धार्मिक संगठन सामाजिक सुधार और महिला सशक्तीकरण के प्रभावशाली वाहक रहे हैं, किंतु उनके प्रयासों की कुछ सीमाएँ भी रही हैं। सामाजिक सुधार में धार्मिक-आध्यात्मिक संस्थाओं की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि कुरीतियों के उन्मूलन में विधिक हस्तक्षेप और आध्यात्मिक जन-जागरण एक-दूसरे के पूरक किस प्रकार बन सकते हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर-संरचना : (1) भूमिका : 19वीं-20वीं सदी के सुधार आंदोलन, संविधान के भाग III और भाग IV-क का संदर्भ। (2) धार्मिक-आध्यात्मिक संस्थाओं का योगदान : ब्रह्म समाज (1828), आर्य समाज (1875), सत्यशोधक समाज (1873), रामकृष्ण मिशन (1897) के उदाहरण; महिला शिक्षा में सावित्रीबाई फुले और पंडिता रमाबाई (आर्य महिला समाज, 1882); नैतिक शिक्षा और चरित्र निर्माण पर बल। (3) विधिक हस्तक्षेप : सती प्रथा उन्मूलन (बंगाल सती विनियमन, 1829), हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856), बाल विवाह अवरोध अधिनियम (1929), दहेज निषेध अधिनियम (1961), सती निवारण अधिनियम (1987), बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (2006); अनुच्छेद 17 और अनुच्छेद 25(2)(ख) के अंतर्गत सामाजिक सुधार हेतु राज्य की विधायी शक्ति। (4) न्यायिक दृष्टिकोण : शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) में तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराया जाना; इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य (सबरीमला, 2018) में धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और समानता के बीच संतुलन का प्रश्न, तथा उस पर बाद की पुनर्विचार प्रक्रिया। (5) सैद्धांतिक दृष्टिकोण : मैक्स वेबर का करिश्माई प्राधिकार, जिसके नियमितीकरण (routinisation) से संस्थाएँ बनती हैं और सुधार स्थायी होता है; बी. आर. आंबेडकर की “एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट” (1936) में कुरीतियों के उन्मूलन हेतु धार्मिक ग्रंथों की सत्ता पर प्रश्न; गांधीजी का नैतिक-आत्मिक सुधार पर बल। (6) संतुलित मत : आध्यात्मिक जागरण व्यवहार-परिवर्तन और सामाजिक स्वीकृति देता है, पर वह असमान अधिकारों को स्वतः समाप्त नहीं करता; अंधविश्वास विरोधी विधि (जैसे महाराष्ट्र मानव बलि एवं अघोरी प्रथाओं का प्रतिषेध तथा काला जादू विरोधी अधिनियम, 2013) दोनों की पूरक भूमिका दर्शाती है। (7) सीमाएँ : संस्थागत आदर्शों का सीमित विस्तार, लैंगिक शक्ति-संरचना का अपरिवर्तित रहना, तथा धार्मिक प्रभाव का कभी-कभी रूढ़ियों को वैधता देना। (8) निष्कर्ष : नागरिक समाज, शिक्षा और संवैधानिक नैतिकता (मौलिक कर्तव्य, अनुच्छेद 51क(ज)) का समन्वित मॉडल।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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