लोकसभा में आएगा न्यायाधिकरण नियुक्तियों वाला राष्ट्रीय आयोग विधेयक, जानिए पूरी प्रक्रिया

Parliament: न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों के लिए बनेगा राष्ट्रीय आयोग, अगले सप्ताह लोकसभा में आएगा विधेयक — concept mind map

लोकसभा में आएगा न्यायाधिकरण नियुक्तियों वाला राष्ट्रीय आयोग विधेयक, जानिए पूरी प्रक्रिया

लोकसभा में आएगा न्यायाधिकरण नियुक्तियों वाला राष्ट्रीय आयोग विधेयक, जानिए पूरी प्रक्रिया — National Tribunals Commission Bill process
आरेख: National Tribunals Commission Bill process

✎ राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का गठन न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों को पारदर्शी, स्वतंत्र और कुशल बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप एक महत्वपूर्ण विधायी कदम है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण, विभिन्न विवाद निवारण तंत्र  |  GS Paper II — सरकार की नीतियां और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप
  • Prelims: राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग, न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021, शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक स्वतंत्रता, अनुच्छेद 323A और 323B, न्यायाधिकरण
  • Essay: भारत में न्यायिक सुधारों की आवश्यकता और चुनौतियाँ, संस्थागत स्वतंत्रता और जवाबदेही: भारतीय लोकतंत्र के लिए निहितार्थ

त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का गठन न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों को पारदर्शी, स्वतंत्र और कुशल बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप एक महत्वपूर्ण विधायी कदम है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार विभिन्न न्यायाधिकरणों (Tribunals) में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति की व्यवस्था को पुनर्गठित करने की तैयारी में है। इसके लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (National Tribunals Commission) के गठन का प्रावधान करने वाला विधेयक अगले सप्ताह लोकसभा में पेश किया जाएगा। यह कदम सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के निर्देशों के बाद उठाया जा रहा है, जिसमें न्यायाधिकरणों की नियुक्तियों में पारदर्शिता, दक्षता और न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया था।

पृष्ठभूमि

  • भारत में न्यायाधिकरणों की स्थापना प्रशासनिक बोझ को कम करने और विशिष्ट मामलों में विशेषज्ञतापूर्ण तथा त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए की गई है।
  • संविधान के अनुच्छेद 323A और 323B संसद को विभिन्न मामलों के लिए न्यायाधिकरण स्थापित करने का अधिकार देते हैं।
  • विभिन्न न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं, विशेषकर कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण न्यायिक स्वतंत्रता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने ‘न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021’ के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया था, क्योंकि उन्हें शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) और न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) के सिद्धांतों के विपरीत माना गया था।
  • प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति तथा उनकी योग्यता में दक्षता बढ़ाना, स्वतंत्रता सुनिश्चित करना, पारदर्शिता लाना और एकरूपता कायम करना है।

राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग क्या है?

  • राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग एक प्रस्तावित स्वतंत्र निकाय होगा, जिसका मुख्यालय राष्ट्रीय राजधानी में होगा।
  • इसका मुख्य कार्य विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन से संबंधित होगा।
  • आयोग में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होंगे, जिनमें दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य शामिल होंगे।
  • आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय (High Court) के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश पात्र होंगे।
  • यह आयोग नियुक्तियों में स्पष्ट मानक, पारदर्शी प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।
  • इसका लक्ष्य न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली में सुधार लाना और न्यायिक प्रणाली पर बोझ कम करते हुए त्वरित तथा विशेषज्ञ न्याय प्रदान करना है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का गठन विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन के लिए एक स्वतंत्र निकाय की स्थापना।
आयोग की संरचना एक अध्यक्ष (सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश) और चार सदस्य (दो न्यायिक, दो तकनीकी) शामिल होंगे।
उद्देश्य नियुक्तियों में दक्षता, स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित करना।
मुख्यालय राष्ट्रीय राजधानी में स्थित होगा।
न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 का प्रतिस्थापन यह विधेयक कानून बनने के बाद न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 को समाप्त कर देगा।

महत्व

न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही

  • यह विधेयक न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों को कार्यपालिका के सीधे हस्तक्षेप से मुक्त करके न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत करेगा।
  • एक स्वतंत्र आयोग द्वारा नियुक्तियां न्यायिक निर्णयों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को बढ़ाएंगी।

शासन और दक्षता

  • नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और एकरूपता से योग्य व्यक्तियों का चयन सुनिश्चित होगा, जिससे न्यायाधिकरणों की कार्यप्रणाली में सुधार होगा।
  • तकनीकी और न्यायिक विशेषज्ञों को शामिल करने से न्यायाधिकरणों के विशिष्ट कार्यों के लिए उपयुक्त उम्मीदवारों का चयन संभव होगा।

संविधानवाद और शक्तियों का पृथक्करण

  • यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करता है, जो शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत और न्यायिक स्वतंत्रता के महत्व पर जोर देते हैं।
  • यह कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद करेगा, जो भारतीय संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।

चुनौतियाँ

1. न्यायिक स्वतंत्रता बनाम कार्यपालिका का प्रभाव

  • आयोग की संरचना और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के प्रभाव की संभावना बनी रह सकती है।
  • यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि आयोग वास्तव में स्वतंत्र रूप से कार्य करे और राजनीतिक दबाव से मुक्त रहे।

2. नियुक्ति प्रक्रिया में देरी

  • एक नया आयोग स्थापित करने और उसकी प्रक्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने में समय लग सकता है, जिससे न्यायाधिकरणों में रिक्तियों को भरने में देरी हो सकती है।
  • विलंबित नियुक्तियां न्याय वितरण प्रणाली को प्रभावित कर सकती हैं।

3. तकनीकी और न्यायिक सदस्यों का संतुलन

  • आयोग में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के बीच सही संतुलन बनाए रखना आवश्यक है ताकि दोनों क्षेत्रों की विशेषज्ञता का उचित प्रतिनिधित्व हो।
  • किसी एक पक्ष का अत्यधिक प्रभाव आयोग के निर्णयों की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।

4. न्यायाधिकरणों की भूमिका का स्पष्टीकरण

  • न्यायाधिकरणों की भूमिका और क्षेत्राधिकार को लेकर अभी भी अस्पष्टता बनी हुई है, जिसे इस विधेयक के माध्यम से और स्पष्ट किया जाना चाहिए।
  • यह न्यायिक समीक्षा के दायरे को भी प्रभावित कर सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
आयोग की स्वतंत्रता कार्यकारी हस्तक्षेप की संभावना और राजनीतिक दबाव से मुक्ति सुनिश्चित करना।
नियुक्ति में विलंब नए आयोग की स्थापना और प्रक्रिया में लगने वाला समय न्याय वितरण को प्रभावित कर सकता है।
योग्यता और विशेषज्ञता अध्यक्ष और सदस्यों के चयन में उच्चतम मानकों को बनाए रखना।
शक्तियों का पृथक्करण न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन बनाए रखना।
न्यायाधिकरणों का मानकीकरण विभिन्न न्यायाधिकरणों के लिए एकरूपता और दक्षता सुनिश्चित करना।

आगे की राह

  • राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की संरचना और कार्यप्रणाली को इस प्रकार डिजाइन किया जाना चाहिए कि उसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
  • आयोग के सदस्यों के चयन में पारदर्शिता और योग्यता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिसमें न्यायिक और तकनीकी विशेषज्ञता का उचित संतुलन हो।
  • नियुक्ति प्रक्रिया को समयबद्ध और कुशल बनाया जाना चाहिए ताकि न्यायाधिकरणों में रिक्तियों को शीघ्रता से भरा जा सके।
  • न्यायाधिकरणों के लिए स्पष्ट योग्यता मानदंड और सेवा शर्तें निर्धारित की जानी चाहिए ताकि सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकर्षित किया जा सके।
  • न्यायाधिकरणों के क्षेत्राधिकार और शक्तियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि न्यायिक समीक्षा के साथ उनके संबंधों में कोई अस्पष्टता न रहे।
  • विधेयक के प्रावधानों को न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 323A: प्रशासनिक न्यायाधिकरणों से संबंधित प्रावधान।
  • अनुच्छेद 323B: अन्य मामलों के लिए न्यायाधिकरणों से संबंधित प्रावधान।
  • अनुच्छेद 50: कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण।
  • अनुच्छेद 124: उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति।
  • अनुच्छेद 217: उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति।

अवधारणा प्रवाह

न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों में कार्यपालिका का प्रभाव  →  सुप्रीम कोर्ट द्वारा न्यायिक स्वतंत्रता पर चिंता व्यक्त करना  →  राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का निर्देश  →  लोकसभा में नया विधेयक पेश किया जाना  →  न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों में पारदर्शिता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करना  →  न्याय वितरण प्रणाली में सुधार

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का मुख्यालय राष्ट्रीय राजधानी में होगा।
2. आयोग में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होंगे, जिनमें दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य शामिल होंगे।
3. आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश पात्र होंगे।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि प्रस्तावित आयोग का मुख्यालय राष्ट्रीय राजधानी में होगा। कथन 2 सही है क्योंकि आयोग में एक अध्यक्ष और चार सदस्य (दो न्यायिक, दो तकनीकी) होंगे। कथन 3 भी सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश ही अध्यक्ष पद के पात्र होंगे।

Q2. अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत माना था।
कारण (R): सर्वोच्च न्यायालय ने एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का निर्देश दिया था ताकि न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों में पारदर्शिता और विशेषज्ञता सुनिश्चित की जा सके।
उपर्युक्त कथनों के आलोक में, निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही है?

  1. A और R दोनों सही हैं, तथा R, A का सही स्पष्टीकरण है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
  3. A सही है, किंतु R गलत है।
  4. A गलत है, किंतु R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, तथा R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत पाया था। कारण (R) भी सही है क्योंकि न्यायालय ने एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का निर्देश दिया था ताकि नियुक्तियों में पारदर्शिता और विशेषज्ञता सुनिश्चित की जा सके। कारण (R) अभिकथन (A) का सही स्पष्टीकरण भी है, क्योंकि न्यायालय ने इन्हीं चिंताओं के कारण आयोग के गठन का निर्देश दिया था।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन के पीछे के औचित्य का परीक्षण कीजिए। यह आयोग न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों को कैसे सुदृढ़ कर सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** न्यायाधिकरणों की भूमिका और हालिया विधेयक का संदर्भ (राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का गठन)।
2. **गठन का औचित्य:**
* सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश: न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को रद्द करना।
* शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) और न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) के सिद्धांतों का उल्लंघन।
* नियुक्तियों में स्पष्ट मानक, पारदर्शी प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता की आवश्यकता।
* दक्षता और एकरूपता सुनिश्चित करना।
3. **न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण को सुदृढ़ करना:**
* **स्वतंत्र निकाय:** आयोग में न्यायिक और तकनीकी विशेषज्ञों का समावेश, कार्यपालिका के सीधे हस्तक्षेप को कम करना।
* **पारदर्शी चयन प्रक्रिया:** नियुक्तियों के लिए स्पष्ट मानदंड और निगरानी तंत्र।
* **कार्यकाल की सुरक्षा:** न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के कार्यकाल तथा कामकाज से जुड़े मानकों का स्पष्टीकरण।
* **न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का सम्मान:** सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों (जैसे मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ) का अनुपालन।
* **कार्यपालिका पर नियंत्रण:** नियुक्तियों में कार्यपालिका के विवेकाधिकार को सीमित करना।
4. **चुनौतियाँ/आलोचना (संक्षिप्त):** आयोग की संरचना, सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में संभावित चुनौतियाँ।
5. **निष्कर्ष:** न्यायिक प्रणाली में विश्वास बहाली और सुशासन (Good Governance) के लिए आयोग का महत्व।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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