05 Aug वन अधिकार अधिनियम: 2023-26 में 2.34 लाख दावों को मिली मंजूरी, जानिए राज्यवार विवरण
✎ वन अधिकार अधिनियम, 2006, अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन भूमि पर पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों अधिकार शामिल हैं, और इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना | GS Paper II — केंद्र एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ | GS Paper II — कल्याणकारी योजनाओं के लिए सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप | GS Paper III — भूमि सुधार
- Prelims: वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA), अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी, व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR), सामुदायिक वन अधिकार (CFR), जनजातीय कार्य मंत्रालय, ग्राम सभा, दावों की अस्वीकृति के कारण, 13 दिसंबर 2005 की कट-ऑफ तिथि
- Essay: भारत में जनजातीय अधिकारों का संरक्षण और समावेशी विकास, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: वन अधिकार अधिनियम, 2006, अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन भूमि पर पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों अधिकार शामिल हैं, और इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
जनजातीय कार्य राज्यमंत्री दुर्गादास उइके ने हाल ही में राज्यसभा में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (संक्षेप में FRA) के कार्यान्वयन से संबंधित जानकारी प्रदान की। उन्होंने बताया कि इस अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों को लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों (UT) के प्रशासनों की है, जबकि जनजातीय कार्य मंत्रालय मासिक प्रगति रिपोर्ट (MPR) संकलित करता है। वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2025-26 की अवधि के दौरान दायर किए गए दावों, स्वीकृत दावों और अस्वीकृत दावों का विवरण भी प्रस्तुत किया गया, जिसमें दावों के खारिज होने के मुख्य कारण भी बताए गए।
पृष्ठभूमि
- भारत में वनवासी समुदाय सदियों से वनों पर निर्भर रहे हैं, लेकिन औपनिवेशिक काल और उसके बाद की वन नीतियों ने उनके पारंपरिक अधिकारों को सीमित कर दिया था।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 जैसे कानूनों ने वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए उपयोग करने पर प्रतिबंध लगा दिया, जिससे वनवासियों के अधिकारों पर और भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
- वनवासियों को अक्सर अतिक्रमणकारी माना जाता था, जिससे उन्हें बेदखली और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था।
- इन ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने और वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देने के लिए एक व्यापक कानून की आवश्यकता महसूस की गई।
- इस पृष्ठभूमि में, अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 को अधिनियमित किया गया, जिसे आमतौर पर वन अधिकार अधिनियम (FRA) के नाम से जाना जाता है।
- यह अधिनियम वनवासियों को उनके पारंपरिक वन भूमि पर अधिकार प्रदान करता है और उन्हें वन संसाधनों के प्रबंधन में सशक्त बनाता है।
वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 क्या है?
- यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन अधिकारों और वन भूमि पर उनके अधिभोग को मान्यता देता है, जो पीढ़ियों से ऐसी भूमि पर निवास कर रहे हैं लेकिन जिनके अधिकारों को दर्ज नहीं किया जा सका है।
- यह अधिनियम व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) और सामुदायिक वन अधिकार (CFR) दोनों को मान्यता देता है। व्यक्तिगत अधिकारों में कृषि के लिए भूमि का अधिकार और निवास का अधिकार शामिल है, जबकि सामुदायिक अधिकारों में लघु वन उत्पादों (MFP) को इकट्ठा करने, उपयोग करने और बेचने का अधिकार, चराई का अधिकार, मछली पकड़ने का अधिकार और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का अधिकार शामिल है।
- अधिनियम के तहत, 13 दिसंबर 2005 को कट-ऑफ तिथि के रूप में निर्धारित किया गया है, जिसका अर्थ है कि इस तिथि से पहले वन भूमि पर कब्जा करने वाले ही अधिकारों का दावा कर सकते हैं।
- दावों को प्रस्तुत करने और सत्यापित करने की प्रक्रिया में ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका होती है, जो दावों की प्रारंभिक जाँच करती है और सिफारिशें करती है।
- यह अधिनियम वन संरक्षण और प्रबंधन में वनवासियों को शामिल करके वन शासन में सुधार का भी प्रयास करता है, जिससे सतत वन प्रबंधन को बढ़ावा मिलता है।
- अधिनियम का क्रियान्वयन राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों के प्रशासनों की जिम्मेदारी है, जबकि जनजातीय कार्य मंत्रालय केंद्रीय स्तर पर प्रगति की निगरानी करता है।
- दावों के खारिज होने के सामान्य कारणों में 13 दिसंबर 2005 से पहले कब्जे का अभाव, एक ही भूमि पर कई दावे, गैर-वन भूमि पर दावे और साक्ष्य की कमी शामिल हैं।
- इस अधिनियम का उद्देश्य वनवासियों को भूमि सुरक्षा प्रदान करना, उनकी आजीविका में सुधार करना और उन्हें वन संसाधनों पर नियंत्रण देकर सशक्त बनाना है, जिससे वे अपनी पारंपरिक संस्कृति और जीवन शैली को बनाए रख सकें।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| वन अधिकारों की मान्यता | यह अधिनियम वन में रहने वाले समुदायों, विशेषकर अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वन भूमि पर उनके पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देता है। |
| व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार | अधिनियम व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) और सामुदायिक वन अधिकार (CFR) दोनों को मान्यता देता है, जिसमें आजीविका, निवास, वन उपज तक पहुंच और वन प्रबंधन के अधिकार शामिल हैं। |
| ग्राम सभा की भूमिका | दावों के सत्यापन और वन संसाधनों के प्रबंधन में ग्राम सभा (ग्राम सभा) को केंद्रीय भूमिका प्रदान की गई है, जिससे स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा मिलता है। |
| विस्थापन से सुरक्षा | यह अधिनियम वन निवासियों को विकास परियोजनाओं के कारण होने वाले जबरन विस्थापन से सुरक्षा प्रदान करता है और पुनर्वास के अधिकार सुनिश्चित करता है। |
| क्रियान्वयन की जिम्मेदारी | अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों और संघ राज्य क्षेत्रों (UT) प्रशासनों की है। |
| दावों का निपटारा | दावों के निपटारे के लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं है, जिससे प्रक्रिया में विलंब हो सकता है। |
महत्व
सामाजिक-आर्थिक महत्व
- वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA) वन में रहने वाले समुदायों, विशेषकर अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) के ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने का प्रयास करता है, जिन्हें औपनिवेशिक काल से ही उनके पारंपरिक अधिकारों से वंचित रखा गया था।
- यह अधिनियम इन समुदायों को वन संसाधनों पर नियंत्रण और प्रबंधन का अधिकार देकर उनकी आजीविका सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता से ग्राम सभाओं को वन संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन में सशक्तिकरण मिलता है, जिससे स्थानीय स्वशासन और सहभागी लोकतंत्र मजबूत होता है।
पर्यावरण और पारिस्थितिक महत्व
- वन निवासियों को वन प्रबंधन में शामिल करने से वनों का बेहतर संरक्षण होता है, क्योंकि ये समुदाय वनों के साथ सहजीवी संबंध रखते हैं और उनके पारंपरिक ज्ञान का उपयोग स्थायी वन प्रबंधन में सहायक होता है।
- यह अधिनियम जैव विविधता (Biodiversity) के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि वन निवासी अक्सर जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots) के करीब रहते हैं और उनके पारंपरिक प्रथाएं पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती हैं।
शासन और मानवाधिकार
- यह अधिनियम मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हाशिए पर पड़े समुदायों के भूमि अधिकारों और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करता है।
- यह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहयोगात्मक संघवाद (Cooperative Federalism) के सिद्धांत को भी दर्शाता है, जहां केंद्र सरकार नीति बनाती है और राज्य सरकारें उसका क्रियान्वयन करती हैं।
चुनौतियाँ
1. क्रियान्वयन में चुनौतियाँ
- राज्य सरकारों और संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने में धीमी गति और उदासीनता एक बड़ी चुनौती है।
- दावों के निपटारे के लिए कोई निश्चित समय-सीमा न होने के कारण प्रक्रिया में अत्यधिक विलंब होता है, जिससे लाभार्थियों को उनके अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: शासन, सामाजिक न्याय
2. दावों की अस्वीकृति के कारण
- दावा की गई भूमि पर 13 दिसंबर 2005 से पहले कब्जे का प्रमाण न होना एक प्रमुख कारण है, जिससे कई वास्तविक दावे खारिज हो जाते हैं।
- एक ही भूमि पर एक से अधिक दावे, गैर-वन भूमि पर दावे और साक्ष्यों की कमी भी दावों की अस्वीकृति के महत्वपूर्ण कारण हैं।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक मुद्दे, भूमि सुधार
3. जागरूकता और क्षमता निर्माण का अभाव
- वन समुदायों में अधिनियम के तहत उनके अधिकारों और दावा प्रक्रिया के बारे में जागरूकता की कमी है।
- ग्राम सभाओं और अन्य हितधारकों के पास दावों के सत्यापन और वन प्रबंधन के लिए आवश्यक क्षमता और संसाधन अक्सर अपर्याप्त होते हैं।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन, जनजातीय विकास
4. वन विभाग के साथ समन्वय
- वन विभाग और जनजातीय कार्य मंत्रालय के बीच अक्सर समन्वय की कमी देखी जाती है, जिससे अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा आती है।
- वन विभाग का पारंपरिक दृष्टिकोण अक्सर वन संरक्षण को वन निवासियों के अधिकारों पर प्राथमिकता देता है, जिससे टकराव उत्पन्न होता है।
यूपीएससी लिंक: प्रशासनिक सुधार, पर्यावरण शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| दावों का धीमा निपटारा | लाखों दावे अभी भी लंबित हैं, जिससे वन निवासियों को उनके अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है और उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है। |
| दावों की उच्च अस्वीकृति दर | दावों के खारिज होने के कारण अक्सर तकनीकी या दस्तावेजी होते हैं, जिससे वास्तविक हकदार भी अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। |
| साक्ष्य जुटाने में कठिनाई | वन निवासियों के पास अक्सर 13 दिसंबर 2005 से पहले के कब्जे के दस्तावेजी साक्ष्य नहीं होते, जिससे उनके दावे कमजोर पड़ जाते हैं। |
| गैर-वन भूमि पर दावे | कई बार दावेदार अनजाने में ऐसी भूमि पर दावा कर देते हैं जो वन भूमि की श्रेणी में नहीं आती, जिससे दावे खारिज हो जाते हैं। |
| ग्राम सभाओं का सशक्तिकरण | ग्राम सभाओं को दावों के सत्यापन और वन प्रबंधन के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन नहीं मिल पाते हैं। |
आगे की राह
- दावों के निपटारे के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित की जाए और राज्य सरकारों को इसके लिए जवाबदेह बनाया जाए।
- दावों की अस्वीकृति के कारणों का गहन विश्लेषण किया जाए और साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया को वन निवासियों के लिए अधिक सुलभ बनाया जाए।
- वन समुदायों, विशेषकर महिलाओं और कमजोर वर्गों के बीच वन अधिकार अधिनियम के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाएं।
- ग्राम सभाओं और अन्य स्थानीय निकायों की क्षमता निर्माण पर ध्यान दिया जाए, ताकि वे दावों का प्रभावी ढंग से सत्यापन कर सकें और वन संसाधनों का प्रबंधन कर सकें।
- जनजातीय कार्य मंत्रालय और वन विभाग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए, ताकि अधिनियम का क्रियान्वयन सुचारू रूप से हो सके।
- दावों के निपटारे की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और निगरानी तंत्र का उपयोग किया जाए।
- राज्यों को दावों के निपटारे में तेजी लाने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
वन अधिकार अधिनियम 2006 · अनुसूचित जनजाति · परंपरागत वन निवासी · वन भूमि पर अधिकार · सामुदायिक वन अधिकार · व्यक्तिगत वन अधिकार · जनजातीय कार्य मंत्रालय · राज्य सरकारों की भूमिका · दावों का निपटारा · दावों की अस्वीकृति के कारण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 46’, ‘note’: ‘अनुसूचित जातियों, जनजातियों के शैक्षिक, आर्थिक हितों को बढ़ावा’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 244’, ‘note’: ‘अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन’}
- {‘article’: ‘पांचवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन’}
- {‘article’: ‘छठी अनुसूची’, ‘note’: ‘असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन’}
अवधारणा प्रवाह
वन में रहने वाले समुदायों पर ऐतिहासिक अन्याय → वन अधिकार अधिनियम, 2006 का अधिनियमन → व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों के लिए दावे दायर करना → ग्राम सभा द्वारा दावों का सत्यापन → राज्य सरकारों द्वारा दावों को मंजूरी/अस्वीकृति और अधिकार पत्र वितरण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. वन अधिकार अधिनियम, 2006 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह अधिनियम केवल अनुसूचित जनजातियों के वन अधिकारों को मान्यता देता है।
2. इस अधिनियम के तहत दायर दावों के निपटारे के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
3. जनजातीय कार्य मंत्रालय इस अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों को सीधे निर्देश जारी करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 गलत है क्योंकि यह अधिनियम अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासियों दोनों के अधिकारों को मान्यता देता है। कथन 2 सही है, जैसा कि प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि दावों के निपटारे के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है। कथन 3 गलत है क्योंकि अधिनियम के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों की है, जबकि जनजातीय कार्य मंत्रालय केवल मासिक प्रगति रिपोर्ट संकलित करता है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत दावों के खारिज होने का/के संभावित कारण हो सकता/सकते है/हैं?
1. दावा की गई भूमि पर 13 दिसंबर 2005 से पहले कब्ज़ा न होना।
2. एक ही भूमि पर एक से अधिक दावे दायर करना।
3. गैर-वन भूमि पर दावे करना।
4. साक्ष्यों की कमी।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 3 और 4
- केवल 1, 2 और 3
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि दावा की गई ज़मीन पर 13 दिसंबर 2005 से पहले कब्ज़ा न होना, एक ही ज़मीन पर एक से ज़्यादा दावे करना, गैर-वन भूमि पर दावे और साक्ष्यों की कमी दावों के खारिज होने के मुख्य कारण हैं। अतः सभी चार कथन सही हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के प्रमुख प्रावधानों का विश्लेषण कीजिए। इसके कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों और दावों की अस्वीकृति के कारणों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. परिचय: वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) का संक्षिप्त परिचय, इसका उद्देश्य और लक्षित लाभार्थी (अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी)।
2. प्रमुख प्रावधान: व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) और सामुदायिक वन अधिकार (CFR) की व्याख्या। वन उपज, चराई, लघु वन उपज के स्वामित्व आदि से संबंधित अधिकारों का उल्लेख। 13 दिसंबर 2005 की कट-ऑफ तिथि का महत्व।
3. कार्यान्वयन की चुनौतियाँ: राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों की प्राथमिक जिम्मेदारी का उल्लेख। जनजातीय कार्य मंत्रालय की भूमिका (मासिक प्रगति रिपोर्ट संकलन)। दावों के निपटारे में समय-सीमा का अभाव।
4. दावों की अस्वीकृति के कारण: प्रेस विज्ञप्ति में उल्लिखित मुख्य कारणों का विस्तार से वर्णन करें – जैसे 13 दिसंबर 2005 से पहले कब्ज़ा न होना, एक ही ज़मीन पर एक से ज़्यादा दावे, गैर-वन भूमि पर दावे, साक्ष्यों की कमी।
5. आगे की राह/सुझाव: कार्यान्वयन में सुधार, जागरूकता बढ़ाना, साक्ष्य संग्रह में सहायता, प्रक्रिया का सरलीकरण और दावों के त्वरित निपटारे के लिए संभावित समाधान।
6. निष्कर्ष: अधिनियम के महत्व और जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण में इसकी भूमिका को रेखांकित करें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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