12 Aug विजय का लोकसभा सीट स्थिरता प्रस्ताव: महिला आरक्षण और परिसीमन पर केंद्र का ध्यान आकर्षित
✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण कर जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है, जबकि महिला आरक्षण विधेयक महिलाओं के लिए विधायी निकायों में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व का मार्ग प्रशस्त करता है, दोनों ही…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
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- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 81, अनुच्छेद 82, महिला आरक्षण विधेयक, जनसंख्या नियंत्रण, संघवाद, संसदीय प्रतिनिधित्व, लोकसभा की सीटें, राज्य पुनर्गठन अधिनियम
- Essay: भारत में जनसंख्या नियंत्रण और संसदीय प्रतिनिधित्व का संतुलन, लोकतंत्र में महिला प्रतिनिधित्व: आवश्यकता और चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण कर जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है, जबकि महिला आरक्षण विधेयक महिलाओं के लिए विधायी निकायों में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व का मार्ग प्रशस्त करता है, दोनों ही भारत के संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, एक राज्य के मुख्यमंत्री ने लोकसभा सीटों की संख्या को 543 पर बनाए रखने और मौजूदा 543 सीटों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को तत्काल लागू करने के लिए एक प्रस्ताव पेश करने की घोषणा की है। इस प्रस्ताव में यह तर्क दिया गया है कि 1971 के बाद की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने से दक्षिणी राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व प्रतिकूल रूप से प्रभावित होगा, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 81 लोकसभा की संरचना से संबंधित है, जिसमें राज्यों को सीटों का आवंटन उनकी जनसंख्या के आधार पर होता है।
- अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है, जिसके तहत परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है।
- परिसीमन का अर्थ है किसी देश या विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों (लोकसभा या विधानसभा सीटों) की सीमाओं का निर्धारण।
- भारत में, परिसीमन आयोग का गठन अब तक चार बार (1952, 1963, 1973 और 2002) किया जा चुका है।
- 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के आवंटन को 1971 की जनगणना के आधार पर वर्ष 2000 तक के लिए स्थिर कर दिया गया था।
- 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने इस स्थगन को 2026 तक बढ़ा दिया, जिसका उद्देश्य उन राज्यों को दंडित होने से बचाना था जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की थी।
- महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023) लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है, लेकिन इसका कार्यान्वयन अगले परिसीमन के बाद ही होगा।
परिसीमन क्या है?
- परिसीमन का शाब्दिक अर्थ है किसी देश या विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण।
- भारत में, परिसीमन का कार्य एक उच्चाधिकार प्राप्त निकाय, ‘परिसीमन आयोग’ द्वारा किया जाता है।
- इस आयोग के आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- परिसीमन का मुख्य उद्देश्य सभी निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या को यथासंभव समान बनाना है, ताकि प्रत्येक नागरिक के वोट का मूल्य समान हो।
- यह अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए सीटों के आरक्षण का भी प्रावधान करता है, जो उनकी जनसंख्या के अनुपात में होता है।
- परिसीमन आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्य के निर्वाचन आयुक्त पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| लोकसभा सीटों की संख्या 543 पर बनाए रखना | यह प्रस्ताव दक्षिणी राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु की चिंता को दर्शाता है, कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण परिसीमन के बाद संसदीय प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। |
| महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का तत्काल कार्यान्वयन | यह लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ाने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी। |
| परिसीमन का आधार 1971 की जनगणना | यह सुनिश्चित करेगा कि जनसंख्या नियंत्रण उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने वाले राज्यों को उनके प्रयासों के लिए दंडित न किया जाए, बल्कि उनके संसदीय प्रतिनिधित्व को बनाए रखा जाए। |
| लोकसभा-राज्यसभा अनुपात 2.2:1 बनाए रखना | यह संघवाद के सिद्धांतों और संसद के दोनों सदनों के बीच संतुलन को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। |
| NEET परीक्षा का विरोध | यह सामाजिक न्याय और राज्य के अधिकारों के मुद्दे को उठाता है, यह तर्क देते हुए कि यह परीक्षा छात्रों के लिए समान अवसर प्रदान नहीं करती है। |
महत्व
संघवाद और राज्य के अधिकार
- यह प्रस्ताव संघवाद (Federalism) के सिद्धांत और राज्यों, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के अधिकारों पर प्रकाश डालता है, जो जनसंख्या नियंत्रण में अपनी सफलता के लिए संसदीय प्रतिनिधित्व खोने की आशंका रखते हैं।
- यह केंद्र-राज्य संबंधों (Centre-State Relations) में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देता है, जहां राज्यों को लगता है कि उनकी नीतियों के सकारात्मक परिणाम उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
संसदीय प्रतिनिधित्व और परिसीमन
- परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है, लेकिन यह उन राज्यों के लिए चिंता का विषय बन गया है जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है।
- यह मुद्दा भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में प्रतिनिधित्व की प्रकृति और विभिन्न क्षेत्रों की चिंताओं को संतुलित करने की आवश्यकता पर सवाल उठाता है।
महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता
- महिलाओं के लिए 33% आरक्षण (Reservation) के तत्काल कार्यान्वयन की मांग महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) और लैंगिक समानता (Gender Equality) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- यह विधायी निकायों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और नीति निर्माण में उनकी आवाज को मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
शिक्षा और सामाजिक न्याय
- NEET परीक्षा के विरोध का मुद्दा शिक्षा प्रणाली में सामाजिक न्याय (Social Justice) और समानता (Equality) के सिद्धांतों से संबंधित है।
- यह राज्य सरकारों के अधिकारों और शिक्षा के क्षेत्र में उनकी स्वायत्तता पर भी बहस छेड़ता है।
चुनौतियाँ
1. परिसीमन और जनसंख्या नियंत्रण
- जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को परिसीमन के बाद संसदीय सीटों के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में कम प्रतिनिधित्व मिलेगा।
- यह राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण उपायों को अपनाने से हतोत्साहित कर सकता है, जो राष्ट्रीय हित में नहीं होगा।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान-संघवाद
2. महिला आरक्षण का कार्यान्वयन
- महिला आरक्षण विधेयक (Women’s Reservation Bill) को लागू करने में देरी और इसके कार्यान्वयन की प्रक्रिया पर अभी भी स्पष्टता का अभाव है।
- आरक्षण के भीतर उप-आरक्षण (Sub-reservation) जैसे मुद्दों पर आम सहमति बनाना एक चुनौती हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था-महिला सशक्तिकरण
3. केंद्र-राज्य संबंध
- परिसीमन और NEET जैसे मुद्दों पर केंद्र और राज्यों के बीच मतभेद संघवाद के सिद्धांतों पर तनाव पैदा कर सकते हैं।
- राज्यों की स्वायत्तता और केंद्र के अधिकार के बीच संतुलन बनाना एक निरंतर चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान-केंद्र-राज्य संबंध
4. संसदीय सीटों का पुनर्गठन
- यदि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो संसद भवन के बुनियादी ढांचे और कामकाज पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह एक विचारणीय विषय है।
- सीटों की संख्या में वृद्धि से निर्वाचन क्षेत्रों का आकार और प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था-संसद
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| परिसीमन का आधार | यदि 1971 के बाद की जनगणना को आधार बनाया जाता है, तो जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। |
| महिला आरक्षण का कार्यान्वयन | मौजूदा 543 सीटों पर तत्काल 33% महिला आरक्षण लागू करने में कानूनी और राजनीतिक चुनौतियाँ। |
| लोकसभा-राज्यसभा अनुपात | लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि से लोकसभा और राज्यसभा के बीच मौजूदा अनुपात (2.2:1) में बदलाव आ सकता है, जिससे संतुलन बिगड़ सकता है। |
| NEET परीक्षा का उन्मूलन | राष्ट्रीय स्तर पर एक समान प्रवेश परीक्षा को समाप्त करने से विभिन्न राज्यों में शिक्षा की गुणवत्ता और मानकों में भिन्नता आ सकती है। |
| संघीय संतुलन | जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्गठन राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है, जिससे क्षेत्रीय असंतोष बढ़ सकता है। |
आगे की राह
- परिसीमन प्रक्रिया को इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए जिससे जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित न किया जाए, बल्कि उनके प्रयासों को मान्यता दी जाए।
- महिला आरक्षण विधेयक के तत्काल और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राजनीतिक सहमति और एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया जाना चाहिए।
- केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि परिसीमन और शिक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बन सके।
- एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है जो परिसीमन के विभिन्न मॉडलों और उनके संभावित प्रभावों का अध्ययन करे।
- शिक्षा प्रणाली में समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रवेश परीक्षाओं की समीक्षा की जानी चाहिए, जिसमें राज्यों की चिंताओं को भी ध्यान में रखा जाए।
- लोकसभा और राज्यसभा के बीच संवैधानिक संतुलन को बनाए रखने के लिए सीटों के पुनर्गठन पर सावधानीपूर्वक विचार किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटों का निर्धारण · महिला आरक्षण · जनसंख्या नियंत्रण · संघवाद · संवैधानिक संशोधन · समान प्रतिनिधित्व · राज्यों का प्रतिनिधित्व · सामाजिक न्याय · संसदीय लोकतंत्र
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 81’, ‘note’: ‘लोकसभा की संरचना’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘राज्यों की विधानसभाओं की संरचना’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 330’, ‘note’: ‘लोकसभा में SC/ST के लिए आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 332’, ‘note’: ‘विधानसभाओं में SC/ST के लिए आरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
जनसंख्या नियंत्रण में राज्यों की सफलता → परिसीमन के बाद संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी की आशंका → लोकसभा सीटों को 543 पर बनाए रखने का प्रस्ताव → महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का तत्काल कार्यान्वयन → संघवाद, राज्य के अधिकार और प्रतिनिधित्व पर बहस
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है।
2. 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के समायोजन पर 2026 तक के लिए रोक लगा दी थी।
3. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है, जिसके तहत परिसीमन आयोग का गठन होता है। कथन 2 सही है क्योंकि 84वें संशोधन ने 2026 तक सीटों के समायोजन पर रोक लगाई थी। कथन 3 भी सही है क्योंकि परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून द्वारा अंतिम माना जाता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती ताकि परिसीमन प्रक्रिया में देरी से बचा जा सके।
Q2. अभिकथन (A): दक्षिणी राज्यों को डर है कि जनसंख्या नियंत्रण उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन के कारण भविष्य के परिसीमन में उनका संसदीय प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
कारण (R): परिसीमन आमतौर पर नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जाता है, और दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि दक्षिणी राज्य, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा प्रदर्शन किया है, उन्हें चिंता है कि जनसंख्या-आधारित परिसीमन से लोकसभा में उनकी सीटें कम हो सकती हैं। कारण (R) भी सही है और A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि परिसीमन का आधार जनसंख्या होता है और कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को कम सीटें मिल सकती हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ परिसीमन प्रक्रिया के संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या कीजिए। दक्षिणी राज्यों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के बावजूद संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी की आशंकाओं के संदर्भ में, परिसीमन के भावी प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: परिसीमन की अवधारणा और इसके महत्व का संक्षिप्त परिचय।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 82 (संसद द्वारा कानून), अनुच्छेद 170 (राज्यों के लिए), परिसीमन आयोग का गठन, इसकी शक्तियाँ और आदेशों की अंतिम प्रकृति। 84वें, 87वें संविधान संशोधनों का उल्लेख।
3. दक्षिणी राज्यों की आशंकाएँ: जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण दक्षिणी राज्यों (जैसे तमिलनाडु) को 1971 की जनगणना के बाद के परिसीमन में सीटों के नुकसान का डर। संघवाद और समान प्रतिनिधित्व पर इसका संभावित प्रभाव।
4. भावी प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण:
क. सकारात्मक पहलू: जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण लोकतंत्र में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को मजबूत करता है।
ख. नकारात्मक पहलू: जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित करने जैसा प्रतीत होना, जिससे संघवाद पर तनाव। क्षेत्रीय असंतुलन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असमानता की संभावना।
ग. संभावित समाधान: महिला आरक्षण विधेयक के साथ परिसीमन का संबंध। सीटों की संख्या में वृद्धि, 1971 की जनगणना को आधार बनाए रखने या वैकल्पिक मानदंडों पर विचार करने जैसे सुझावों पर चर्चा।
5. निष्कर्ष: संघवाद के सिद्धांतों और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: Hindustan Times
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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