विधायी विभाग ने विशेष अभियान 6 के तहत कार्यकुशलता बढ़ाने हेतु कार्यशाला आयोजित

विधायी विभाग ने विशेष अभियान 6 के तहत कार्यकुशलता बढ़ाने हेतु कार्यशाला आयोजित

विधायी विभाग ने विशेष अभियान 6 के तहत कार्यकुशलता बढ़ाने हेतु कार्यशाला आयोजित

विशेष अभियान 6 प्रक्रियाअभियान आरंभविधि एवं न्याय मंत्रालयकार्यशाला आयोजननई दिल्लीसर्वोत्तम तौर-तरीके अपप्रक्रिया सुधारलंबित मामलों का निपटानसमयबद्धपारदर्शिता बढ़ानाजवाबदेही सुनिश्चित
विशेष अभियान 6 प्रक्रिया

✎ सुशासन के लिए प्रक्रियागत सुधार (अभिलेख प्रबंधन, समयबद्ध निपटान, e-Office) को सार्वजनिक अभिलेख अधिनियम, 1993 और सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 जैसे वैधानिक ढाँचे से जोड़ना ही पारदर्शिता और जवाबदेही को संस्थागत बनाने का मार्ग है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन व्यवस्था (Polity and Governance): केंद्र सरकार के मंत्रालय एवं विभाग, प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही, सुशासन  |  सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II — शासन व्यवस्था: विधायी प्रक्रिया, विधेयकों का प्रारूपण और विधायी परामर्श की भूमिका
  • Prelims: विधायी विभाग (Legislative Department) और विधि एवं न्याय मंत्रालय (Ministry of Law and Justice) की भूमिका, सार्वजनिक अभिलेख अधिनियम, 1993 (Public Records Act, 1993), सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005), सेवोत्तम मॉडल (Sevottam Model) — सेवा वितरण की गुणवत्ता का ढाँचा, मिशन कर्मयोगी (Mission Karmayogi) — सिविल सेवकों की क्षमता-निर्माण योजना, इलेक्ट्रॉनिक कार्यालय (e-Office) और अभिलेखों का डिजिटलीकरण, नागरिक चार्टर (Citizen’s Charter), प्रशासनिक सुधार आयोग और प्रशासनिक सुधार विभाग (DARPG) की भूमिका
  • Essay: सुशासन की संस्कृति: प्रक्रियागत सुधार बनाम मानसिकता में परिवर्तन, लोक प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही: कानूनी ढाँचा और व्यावहारिक चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: सुशासन के लिए प्रक्रियागत सुधार (अभिलेख प्रबंधन, समयबद्ध निपटान, e-Office) को सार्वजनिक अभिलेख अधिनियम, 1993 और सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 जैसे वैधानिक ढाँचे से जोड़ना ही पारदर्शिता और जवाबदेही को संस्थागत बनाने का मार्ग है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग ने 28 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में ‘विशेष अभियान 6’ के तहत बेहतर कार्य प्रणाली अपनाने पर एक कार्यशाला आयोजित की। विभाग के सचिव डॉ. राजीव मणि के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यशाला में प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने, कार्य-प्रवाह प्रबंधन, अभिलेखों के रखरखाव, लंबित मामलों के समयबद्ध निपटान और अनुशासन पर चर्चा हुई। इसका उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और निरंतर सुधार की संस्कृति को संस्थागत रूप देना था। कार्यशाला का आयोजन इंडिया एड्स एनजीओ के सहयोग से हुआ, और एक बाहरी रिसोर्स पर्सन ने प्रशासन में सर्वोत्तम तौर-तरीकों पर व्याख्यान दिया। यह समाचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि सरकारी विभाग अपने आंतरिक कामकाज को सुधारने के लिए व्यवस्थित अभियानों का उपयोग कर रहे हैं, जो सुशासन के व्यापक लक्ष्य से जुड़ते हैं।

पृष्ठभूमि

  • विधि एवं न्याय मंत्रालय के अंतर्गत विधायी विभाग केंद्र सरकार के विधेयकों, अध्यादेशों और नियमों के प्रारूपण (drafting) तथा विधायी मामलों पर परामर्श का कार्य करता है। इसलिए इसके कामकाज में प्रक्रियागत सटीकता और अभिलेखों का व्यवस्थित रखरखाव अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • ‘विशेष अभियान’ सरकार द्वारा समय-समय पर चलाए जाने वाले केंद्रित अभियानों की शृंखला है, जिनमें स्वच्छता, अभिलेख प्रबंधन और लंबित मामलों के निपटान जैसे लक्ष्य प्रमुख होते हैं। ‘विशेष अभियान 6’ इसी शृंखला की एक कड़ी है।
  • सार्वजनिक अभिलेख अधिनियम, 1993 केंद्र सरकार के अभिलेखों के प्रबंधन, संरक्षण और विनष्टीकरण के लिए वैधानिक ढाँचा प्रदान करता है, जिससे अभिलेख प्रबंधन सुधार को विधिक आधार मिलता है।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों के कामकाज की जानकारी पाने का अधिकार देता है। अभिलेखों का व्यवस्थित होना इस अधिकार के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है।
  • सेवोत्तम मॉडल (2006) सेवा वितरण में गुणवत्ता, शिकायत निवारण और परिणाम-उन्मुखता पर केंद्रित प्रशासनिक ढाँचा है, जो सरकारी कार्यकुशलता के मूल्यांकन का एक संदर्भ बिंदु रहा है।

सर्वोत्तम प्रशासनिक तौर-तरीके (Best Administrative Practices) क्या हैं?

  • सर्वोत्तम प्रशासनिक तौर-तरीके वे व्यावहारिक विधियाँ हैं जिनसे सरकारी कार्यालय अपने कामकाज को अधिक कुशल, पारदर्शी और उत्तरदायी बना सकते हैं।
  • इनमें आधिकारिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण, कार्य-प्रवाह (work-flow) प्रबंधन, अभिलेखों का व्यवस्थित रखरखाव और उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग शामिल है।
  • प्रक्रियागत देरी को कम करना, समयबद्ध निपटान सुनिश्चित करना और दस्तावेजीकरण बनाए रखना परिणाम-उन्मुख प्रशासन के मूल तत्व हैं।
  • अधिकारियों के बीच समन्वय और सक्रिय समस्या-समाधान दृष्टिकोण से प्रशासनिक बाधाओं की पहचान और सुधार संभव होता है।
  • इलेक्ट्रॉनिक कार्यालय (e-Office) जैसे उपकरण फाइलों की गति, पारदर्शिता और अभिलेखों की खोज-योग्यता बढ़ाने में सहायक हैं।
  • मिशन कर्मयोगी (National Programme for Civil Services Capacity Building) के माध्यम से सिविल सेवकों की क्षमता-निर्माण पर बल दिया गया है, ताकि सुधार केवल नियमों तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी आएँ।
  • सुधार की स्थायी सफलता के लिए प्रक्रियागत बदलाव के साथ ‘निरंतर सुधार’ की संस्थागत संस्कृति और कर्मचारियों की जवाबदेही आवश्यक है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
आयोजक और सहभागी विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग ने 28 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में कार्यशाला आयोजित की। सचिव डॉ. राजीव मणि के मार्गदर्शन में संयुक्त सचिव एवं विधायी परामर्शदाता श्री जी. पानमेई नोडल अधिकारी रहे।
अभियान का संदर्भ यह कार्यशाला ‘विशेष अभियान 6’ (Special Campaign 6) के अंतर्गत आयोजित हुई, जिसका लक्ष्य स्वच्छता को संस्थागत बनाना, अभिलेख प्रबंधन में सुधार करना, लंबित मामलों को कम करना और कुशल शासन को बढ़ावा देना है।
विषय-वस्तु आधिकारिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण, कार्य-प्रवाह प्रबंधन, अभिलेखों का व्यवस्थित रखरखाव, संसाधनों का अधिकतम उपयोग, प्रक्रियागत विलंब में कमी और अधिकारियों के बीच समन्वय।
प्रशिक्षण पद्धति रिसोर्स पर्सन डॉ. देवेंद्र प्रसाद माझी के व्याख्यान के बाद प्रतिभागियों ने अपने कार्यालय की मौजूदा प्रक्रियाओं पर चर्चा की और सुधार योग्य क्षेत्रों की पहचान की। इससे व्यावहारिक और परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण पर बल मिला।
साझेदारी कार्यशाला का आयोजन इंडिया एड्स एनजीओ के सहयोग से हुआ। इससे सरकारी विभाग और गैर-सरकारी संस्थाओं के बीच क्षमता-निर्माण के सहयोग का एक उदाहरण सामने आता है।

महत्व

प्रशासनिक दक्षता

  • सर्वोत्तम तौर-तरीके (Best Practices) अपनाने से आधिकारिक प्रक्रियाएँ सुव्यवस्थित होती हैं और कार्य-प्रवाह में बाधाएँ कम होती हैं।
  • प्रक्रियागत देरी घटाने और समय पर निपटान से सरकारी संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होता है।
  • नियमित प्रशासनिक कार्यों में परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण से आर्थिक संवृद्धि के लिए आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता सुधरती है।

संस्थागत सुदृढ़ीकरण

  • अभिलेख प्रबंधन और दस्तावेजीकरण से संस्थागत स्मृति सुरक्षित रहती है और अधिकारियों के बदलने पर भी कामकाज में निरंतरता बनी रहती है।
  • अनुशासन और नियमित समीक्षा की संस्कृति व्यक्ति-आधारित कार्यप्रणाली के बजाय नियम-आधारित प्रशासन को मजबूत करती है।

पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन

  • निर्णयों और फाइलों के व्यवस्थित रिकॉर्ड से निर्णय-प्रक्रिया का परीक्षण आसान होता है, जो सुशासन का आधार है।
  • लंबित मामलों में कमी और समय-सीमा का पालन नागरिकों के प्रति सरकारी उत्तरदायित्व को दर्शाता है।
  • प्रशासनिक सुधार का यह प्रयास सार्वजनिक सेवा-वितरण में निरंतर सुधार की दिशा में एक संस्थागत कदम है।

चुनौतियाँ

1. अभिलेख प्रबंधन की समस्या

  • पुराने और डिजिटल दोनों प्रकार के अभिलेखों का व्यवस्थित वर्गीकरण, संरक्षण और पुनः प्राप्ति एक सतत चुनौती है।
  • दस्तावेजीकरण की मानक पद्धति का अभाव होने पर फाइलों का खो जाना या उनका दोहराव होने की संभावना बनी रहती है।

2. लंबित मामलों का बोझ

  • आधिकारिक कार्यों के समय पर निपटान के बिना प्रशासनिक विलंब बढ़ता है और नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता घटती है।
  • विभिन्न स्तरों पर समन्वय की कमी से एक ही मामला कई स्तरों पर अटक सकता है।

3. संस्कृति परिवर्तन की कठिनाई

  • स्वच्छता, अनुशासन और सक्रिय समाधान की भावना को केवल एक कार्यशाला से स्थायी आदत में बदलना कठिन है।
  • पुरानी कार्यप्रणाली पर निर्भरता और परिवर्तन के प्रति संकोच सुधारों की गति धीमी कर सकते हैं।

4. सतत निगरानी और मूल्यांकन

  • प्रशिक्षण के बाद प्रभाव का मापन और सुधारों की समीक्षा नियमित रूप से होनी चाहिए, अन्यथा अभियान औपचारिकता बनकर रह जाता है।
  • सुधारों के परिणामों को मापने के स्पष्ट संकेतक (indicators) का अभाव मूल्यांकन को कठिन बनाता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
अभिलेखों का रखरखाव अभिलेखों का अव्यवस्थित होना फाइलों की खोज, निर्णय-प्रक्रिया और जवाबदेही को प्रभावित करता है।
लंबित मामले समय पर निपटान न होने से प्रशासनिक विलंब बढ़ता है और नागरिकों का भरोसा घटता है।
समन्वय का अभाव अधिकारियों और विभागों के बीच स्पष्ट समन्वय न होने से कार्य-प्रवाह बाधित होता है।
प्रशिक्षण से व्यवहार तक कार्यशाला में प्राप्त ज्ञान का दैनिक कामकाज में स्थायी रूप से उपयोग सुनिश्चित करना कठिन है।
मूल्यांकन का अभाव सुधारों के प्रभाव को मापने के स्पष्ट मानदंड न होने से अभियान की सफलता का आकलन सीमित रहता है।

आगे की राह

  • सर्वोत्तम तौर-तरीकों को लिखित दिशानिर्देशों और मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOP) में बदला जाए, ताकि अधिकारियों के बदलने पर भी व्यवहार में निरंतरता बनी रहे।
  • अभिलेख प्रबंधन के लिए एक समान वर्गीकरण, नामकरण और अवधारण-अवधि (retention period) का ढाँचा तय किया जाए।
  • लंबित मामलों की नियमित समीक्षा के लिए स्पष्ट समय-सीमा और जिम्मेदारी तय की जाए।
  • डिजिटल अभिलेख प्रणाली अपनाकर खोज, साझाकरण और निगरानी को सरल बनाया जाए।
  • प्रशासनिक सुधारों के प्रभाव मापने के लिए परिणाम-संकेतक (outcome indicators) तय किए जाएँ और उनकी आवधिक समीक्षा हो।
  • अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए नियमित क्षमता-निर्माण कार्यक्रम चलाए जाएँ, ताकि प्रशिक्षण केवल एक बार का आयोजन न रहे।
  • विभागों के बीच अनुभव साझा करने के लिए सर्वोत्तम तौर-तरीकों का संग्रह और आदान-प्रदान तंत्र विकसित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

प्रशासनिक सुधार (Administrative Reforms) · सुशासन (Good Governance) · अभिलेख प्रबंधन (Record Management) · पारदर्शिता (Transparency) · जवाबदेही (Accountability) · लंबित मामले (Pendency) · सेवा वितरण (Service Delivery) · नागरिक चार्टर (Citizen’s Charter) · सूचना का अधिकार (Right to Information) · सर्वोत्तम तौर-तरीके (Best Practices) · संस्थागत क्षमता (Institutional Capacity) · दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग (Second Administrative Reforms Commission)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 77 — सरकारी कामकाज के संचालन और नियम-निर्माण का आधार

अवधारणा प्रवाह

विधायी विभाग ने विशेष अभियान 6 के तहत सर्वोत्तम तौर-तरीकों को अपनाने का लक्ष्य तय किया।  →  कार्यशाला में रिसोर्स पर्सन ने प्रक्रिया-सरलीकरण, अभिलेख प्रबंधन और समन्वय के व्यावहारिक उपाय बताए।  →  प्रतिभागियों ने अपने कार्यालयों की मौजूदा प्रक्रियाओं की समीक्षा कर सुधार योग्य क्षेत्रों की पहचान की।  →  इन उपायों से कार्य-प्रवाह सुधरता है, लंबित मामले घटते हैं और रिकॉर्ड व्यवस्थित होते हैं।  →  परिणामस्वरूप पारदर्शिता, जवाबदेही और कार्यकुशलता बढ़ती है तथा सार्वजनिक सेवा-वितरण में सुधार होता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लोक अभिलेख अधिनियम, 1993 (Public Records Act, 1993) केंद्र सरकार के अभिलेखों के प्रबंधन और रखरखाव से संबंधित है।
2. सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4 के अंतर्गत सार्वजनिक प्राधिकारियों पर कुछ जानकारियों को स्वतः प्रकाशित करने का दायित्व डाला गया है।
3. ‘सेवोत्तम’ (Sevottam) ढाँचे के चार घटक हैं: नागरिक चार्टर, लोक शिकायत निवारण प्रणाली, सेवा वितरण क्षमता और डिजिटल अभिलेख प्रणाली।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त में से कोई नहीं, क्योंकि सभी कथन गलत हैं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: लोक अभिलेख अधिनियम, 1993 केंद्र सरकार और केंद्र शासित प्रदेशों के अभिलेखों के प्रबंधन से संबंधित है। कथन 2 सही है: सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4 स्वतः प्रकटीकरण (proactive disclosure) का दायित्व देती है। कथन 3 गलत है: सेवोत्तम ढाँचे के तीन घटक हैं: नागरिक चार्टर, लोक शिकायत निवारण प्रणाली और सेवा वितरण क्षमता; ‘डिजिटल अभिलेख प्रणाली’ इसका घटक नहीं है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए, जिनमें एक कथन (A) और एक तर्क (R) दिया गया है:
कथन (A): सार्वजनिक कार्यालयों में अभिलेखों का व्यवस्थित रखरखाव सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की एक पूर्व-शर्त है।
तर्क (R): सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 4(1)(क) के अंतर्गत प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकारी से अपेक्षा की गई है कि वह अपने सभी अभिलेखों को उचित रूप से सूचीबद्ध (catalogued) और अनुक्रमित (indexed) रखे।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) सही है और (R) सही है तथा (R), (A) की सही व्याख्या है
  2. (A) सही है और (R) सही है, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है

उत्तर: (A) सही है और (R) सही है तथा (R), (A) की सही व्याख्या है — धारा 4(1)(क) में अभिलेखों को उचित रूप से सूचीबद्ध और अनुक्रमित रखने का स्पष्ट प्रावधान है, जो अभिलेख प्रबंधन और सूचना-उपलब्धता के बीच सीधा संबंध स्थापित करता है। इसलिए (R), (A) की सही व्याख्या है। अभिलेख व्यवस्थित न हों तो जानकारी देना व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ सरकारी कार्यालयों में सर्वोत्तम तौर-तरीकों को संस्थागत रूप देना प्रशासनिक सुधार की केंद्रीय कड़ी माना जाता है, किंतु इसकी सफलता केवल अभियान-आधारित प्रयासों से नहीं, बल्कि नियमित कार्य-संस्कृति, अभिलेख प्रबंधन और नागरिक-केंद्रित सेवा वितरण ढाँचे से सुनिश्चित होती है। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि लंबित मामलों में कमी और अभिलेखों की व्यवस्था को सुशासन के मापदंड के रूप में किस सीमा तक देखा जा सकता है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा (Model-Answer Skeleton):
1. भूमिका: विधायी विभाग (Legislative Department), विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा ‘विशेष अभियान 6’ के अंतर्गत सर्वोत्तम तौर-तरीकों पर कार्यशाला (28 अक्टूबर 2026) का संदर्भ, जिसमें प्रक्रियागत देरी कम करने, दस्तावेजीकरण, समन्वय और अभिलेख प्रबंधन पर बल दिया गया; इसे सरकार की स्वच्छता और लंबित मामलों में कमी की व्यापक शृंखला से जोड़ें।
2. संवैधानिक एवं वैधानिक आधार: अनुच्छेद 19(1)(क) से जुड़ा सूचना का अधिकार; राज्य उत्तर प्रदेश बनाम राज नारायण (1975) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जानने के अधिकार की मान्यता; सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4(1)(क) (अभिलेखों का सूचीकरण व अनुक्रमण) और धारा 4 का स्वतः प्रकटीकरण; लोक अभिलेख अधिनियम, 1993; राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3) (द्विभाषिक दस्तावेज़)।
3. प्रशासनिक सुधार का ढाँचा: दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग (2005 में गठित; अध्यक्ष एम. वीरप्पा मोइली) की ‘नागरिक-केंद्रित प्रशासन’ पर रिपोर्ट; सेवोत्तम ढाँचा (नागरिक चार्टर, लोक शिकायत निवारण, सेवा वितरण क्षमता); राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना जैसी डिजिटल पहलें।
4. सैद्धांतिक आधार: मैक्स वेबर का आदर्श-प्रारूप नौकरशाही (नियम-आधारित, दस्तावेज़-आधारित, पदानुक्रमित प्रशासन) और उसकी आलोचना कि नियम-पालन लक्ष्य-प्राप्ति से ऊपर हो सकता है; ‘रेड टेपिज़्म’ (लालफीताशाही) की समस्या।
5. पक्ष-विपक्ष का संतुलन:
(क) अभियान-आधारित प्रयास (campaign mode) त्वरित परिणाम और ध्यानाकर्षण देते हैं, पर उनका प्रभाव अल्पकालिक हो सकता है;
(ख) नियमित संस्थागत प्रणाली स्थायित्व देती है, पर प्रशिक्षण, संसाधन और प्रोत्साहन के बिना वह औपचारिक बनकर रह जाती है;
(ग) डिजिटल अभिलेख प्रणाली से पारदर्शिता बढ़ती है, परंतु डिजिटल विभाजन और क्षमता-अंतर बाधा बन सकते हैं।
6. लंबित मामलों और सुशासन का संबंध: लंबित मामलों की संख्या और निपटान-समय को प्रशासनिक दक्षता के संकेतक के रूप में देखना; पर केवल संख्या घटाने से गुणवत्ता और न्यायसंगतता सुनिश्चित नहीं होती, इसलिए निपटान की गुणवत्ता और नागरिक संतुष्टि भी मापदंड होने चाहिए।
7. निष्कर्ष: संस्थागत सुधार के लिए अभियान, नियमित प्रक्रिया, प्रशिक्षण, डिजिटल अभिलेख और जवाबदेही-तंत्र का समन्वित होना आवश्यक; सुधार को मानसिकता-परिवर्तन से जोड़ना।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


Related guides on our sites

No Comments

Post A Comment