18 Sep वैश्विक चुनौतियों में विज्ञान नीति एवं संचार: सीएसआईआर की पहल और भविष्य की रणनीति
✎ विज्ञान नीति और संचार सतत विकास के पूरक स्तंभ हैं, जो वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने और वैज्ञानिक प्रगति को सार्थक सामाजिक परिणामों में बदलने के लिए अनुसंधान, नीति और समाज के बीच समन्वय को मजबूत करते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास
- Prelims: विज्ञान शिखर सम्मेलन संयुक्त राष्ट्र महासभा (SSUNGA), वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR), CSIR-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR), प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (TRL), TRL कम्पास, खुली पहुंच पत्रिकाएँ (Open Access Journals)
- Essay: सतत विकास के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार की भूमिका, वैश्विक चुनौतियों का समाधान: विज्ञान नीति और संचार का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: विज्ञान नीति और संचार सतत विकास के पूरक स्तंभ हैं, जो वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने और वैज्ञानिक प्रगति को सार्थक सामाजिक परिणामों में बदलने के लिए अनुसंधान, नीति और समाज के बीच समन्वय को मजबूत करते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में आयोजित विज्ञान शिखर सम्मेलन (SSUNGA 81) के दौरान वार्षिक सत्रों का आयोजन कर रहा है। इसी क्रम में, CSIR-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR) ने “वैश्विक चुनौतियों के युग में विज्ञान नीति और संचार: सीमाओं से सफलताओं की ओर” विषय पर एक ऑनलाइन सत्र का आयोजन किया, जिसमें विशेषज्ञों ने जटिल वैश्विक चुनौतियों से निपटने में विज्ञान, नीति और समाज के बीच समन्वय को मजबूत करने पर विचार-विमर्श किया।
पृष्ठभूमि
- SSUNGA 81 का केंद्रीय विषय “सीमाओं से सफलताओं की ओर: एक पुनर्जीवित और न्यायसंगत भविष्य के लिए विज्ञान” है, जो वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में विज्ञान की भूमिका पर केंद्रित है।
- CSIR-NIScPR ने वैज्ञानिक ज्ञान को अनुसंधान से वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोग तक ले जाने और अनुसंधान, नीति तथा तैनाती को जोड़ने के लिए मजबूत संस्थागत तंत्र की आवश्यकता पर बल दिया।
- सत्र में वैश्विक “विज्ञान विभाजन” का उल्लेख किया गया, जो अवसंरचना, कौशल और भागीदारी में मौजूद है, तथा विज्ञान नीति और विज्ञान संचार को सतत एवं समावेशी विकास के पूरक स्तंभों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
- उभरती प्रौद्योगिकियों, विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तीव्र विकास को देखते हुए, प्रौद्योगिकी तत्परता, वैज्ञानिक उद्यमिता और दूरदर्शिता के महत्व पर प्रकाश डाला गया।
- भारत के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय ने प्रौद्योगिकी तत्परता आकलन (Technology Readiness Assessment) हेतु भारत के साक्ष्य-आधारित राष्ट्रीय ढांचे, TRL कम्पास को प्रस्तुत किया, जो गहन प्रौद्योगिकी निवेश के जोखिम को कम करने में सहायक है।
विज्ञान नीति और संचार का महत्व
- विज्ञान नीति (Science Policy) एक देश में वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने और विनियमित करने के लिए सरकार द्वारा अपनाए गए सिद्धांतों और उपायों का एक समूह है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक प्रगति को सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों के साथ संरेखित करना है।
- विज्ञान संचार (Science Communication) वैज्ञानिक जानकारी को गैर-विशेषज्ञ दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने की प्रक्रिया है। इसका लक्ष्य वैज्ञानिक साक्षरता बढ़ाना, सार्वजनिक सहभागिता को बढ़ावा देना और साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में सहायता करना है।
- CSIR-NIScPR, CSIR के तहत एक प्रमुख संस्थान है जो विज्ञान संचार, विज्ञान नीति अध्ययन और नवाचार नीति अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य करता है। यह वैज्ञानिक ज्ञान को समाज तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- प्रौद्योगिकी तत्परता स्तर (Technology Readiness Level – TRL) एक पैमाना है जिसका उपयोग किसी प्रौद्योगिकी की परिपक्वता का आकलन करने के लिए किया जाता है, जो बुनियादी अनुसंधान से लेकर वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोग तक के चरणों को दर्शाता है।
- TRL कम्पास भारत का एक साक्ष्य-आधारित राष्ट्रीय ढाँचा है जो प्रौद्योगिकी तत्परता आकलन के लिए एक संरचित, क्षेत्र-विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान करता है। यह उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए गहन प्रौद्योगिकी निवेश के जोखिम को कम करने में सहायक है।
- खुली पहुंच (Open Access) का अर्थ है कि वैज्ञानिक शोध साहित्य और डेटा इंटरनेट पर निःशुल्क उपलब्ध हैं, जिससे ज्ञान का व्यापक प्रसार होता है और अनुसंधान की दृश्यता बढ़ती है।
- प्रौद्योगिकी दूरदर्शिता (Technology Foresight) भविष्य की तकनीकी प्रवृत्तियों और उनके संभावित सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का पूर्वानुमान लगाने की एक प्रक्रिया है, जो नीति निर्माताओं को सूचित निर्णय लेने में मदद करती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| विज्ञान नीति और संचार | जटिल वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने के लिए विज्ञान, नीति और समाज के बीच समन्वय को मजबूत करना। |
| वैश्विक ‘विज्ञान विभाजन’ | अवसंरचना, कौशल और भागीदारी में मौजूद असमानताओं को दूर करना ताकि सभी राष्ट्र वैज्ञानिक प्रगति से लाभान्वित हो सकें। |
| प्रौद्योगिकी तत्परता और वैज्ञानिक उद्यमिता | उभरती प्रौद्योगिकियों, विशेष रूप से AI, का लाभ उठाकर सामाजिक समस्याओं का समाधान करना और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देना। |
| साक्ष्य-आधारित नीतिगत दृष्टिकोण | वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति को सार्थक सामाजिक परिणामों में बदलने के लिए डेटा और अनुसंधान पर आधारित नीतियां बनाना। |
| खुले ज्ञान प्रणालियाँ | शोधकर्ताओं और व्यापक समाज के लिए वैज्ञानिक ज्ञान तक पहुंच को सुगम बनाना, जिससे नवाचार और सहयोग को बढ़ावा मिले। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- विज्ञान नीति और संचार के माध्यम से वैश्विक चुनौतियों जैसे जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट और गरीबी का समाधान करने में मदद मिलती है।
- समावेशी विज्ञान संचार यह सुनिश्चित करता है कि वैज्ञानिक ज्ञान भाषा, साक्षरता और डिजिटल पहुंच जैसी बाधाओं के बावजूद समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे।
- वैज्ञानिक उद्यमिता और स्टार्टअप को बढ़ावा देने से सामाजिक समस्याओं के लिए नवीन समाधान विकसित होते हैं, जिससे जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है।
आर्थिक महत्व
- उभरती प्रौद्योगिकियों (Emerging Technologies) में निवेश और उनके अनुप्रयोग से आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलता है।
- प्रौद्योगिकी तत्परता आकलन (Technology Readiness Assessment) जैसे ‘TRL कम्पास’ गहन प्रौद्योगिकी निवेश से जुड़े जोखिमों को कम करता है, जिससे संसाधनों का कुशल उपयोग होता है।
- वैज्ञानिक अनुसंधान को वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों से जोड़ने से नवाचार और उत्पादकता बढ़ती है, जिससे प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होता है।
वैज्ञानिक और तकनीकी महत्व
- विज्ञान नीति अनुसंधान और विकास (R&D) के लिए एक रणनीतिक ढांचा प्रदान करती है, जिससे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में प्रगति सुनिश्चित होती है।
- प्रौद्योगिकी दूरदर्शिता (Technology Foresight) उभरते रुझानों और नीतिगत प्राथमिकताओं का पूर्वानुमान लगाने में मदद करती है, जिससे देश तकनीकी रूप से तैयार रहते हैं।
- खुले पहुंच वाले जर्नल और ज्ञान प्रणालियाँ वैज्ञानिक सहयोग और ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देती हैं, जिससे अनुसंधान की गुणवत्ता और प्रभाव में सुधार होता है।
शासनिक महत्व
- साक्ष्य-आधारित नीतिगत दृष्टिकोणों को मजबूत करने से सरकारें अधिक प्रभावी और सूचित निर्णय ले पाती हैं।
- सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर (CSIR-NIScPR) और प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय (Office of Principal Scientific Adviser) के बीच सहयोग नीति निर्माण और कार्यान्वयन में समन्वय को दर्शाता है।
- वैश्विक दक्षिण (Global South) के लिए प्रासंगिक प्रौद्योगिकी तत्परता ढांचे का विकास विकासशील देशों के लिए एक खाका प्रदान करता है, जिससे वे अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार प्रगति कर सकें।
चुनौतियाँ
1. वैश्विक ‘विज्ञान विभाजन’
- अवसंरचना, कौशल और भागीदारी में वैश्विक असमानताएं कई देशों को वैज्ञानिक प्रगति से वंचित करती हैं।
- विकासशील देशों में अनुसंधान और विकास के लिए अपर्याप्त वित्तपोषण और संसाधनों की कमी एक बड़ी बाधा है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास
2. वैज्ञानिक ज्ञान का अनुप्रयोग
- वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रयोगशाला से वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों तक ले जाने में चुनौतियाँ आती हैं।
- अनुसंधान, नीति और तैनाती के बीच मजबूत संस्थागत तंत्रों की कमी अक्सर नवाचार को बाधित करती है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ
3. समावेशी विज्ञान संचार की बाधाएँ
- भाषा, साक्षरता, सांस्कृतिक संदर्भ और डिजिटल पहुंच जैसी बाधाएं वैज्ञानिक जानकारी को व्यापक समाज तक पहुंचने से रोकती हैं।
- गलत सूचना (Misinformation) और दुष्प्रचार (Disinformation) वैज्ञानिक तथ्यों की सार्वजनिक समझ को प्रभावित करते हैं।
यूपीएससी लिंक: संचार प्रौद्योगिकी
4. उभरती प्रौद्योगिकियों का प्रबंधन
- AI जैसी तेजी से विकसित हो रही प्रौद्योगिकियों के लिए प्रभावी नीतिगत और नियामक ढांचे विकसित करना एक चुनौती है।
- प्रौद्योगिकी के नैतिक निहितार्थों और सामाजिक प्रभावों को संबोधित करना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: सूचना प्रौद्योगिकी
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| विज्ञान और प्रौद्योगिकी में असमान पहुंच | विकासशील देशों में अनुसंधान अवसंरचना, कुशल मानव संसाधन और वित्तपोषण की कमी। |
| अनुसंधान से अनुप्रयोग तक का अंतर | वैज्ञानिक खोजों को मूर्त सामाजिक और आर्थिक लाभों में बदलने में संस्थागत और प्रक्रियात्मक बाधाएँ। |
| प्रौद्योगिकी तत्परता का आकलन | उभरती प्रौद्योगिकियों में निवेश के जोखिम को कम करने और उनके सामाजिक प्रभाव को अधिकतम करने के लिए मानकीकृत ढांचे की कमी। |
| वैज्ञानिक संचार की प्रभावशीलता | जटिल वैज्ञानिक अवधारणाओं को आम जनता तक सरल, सुलभ और विश्वसनीय तरीके से पहुंचाने में चुनौतियाँ। |
| नीति निर्माण में साक्ष्य का उपयोग | वैज्ञानिक साक्ष्य को नीतिगत निर्णयों में प्रभावी ढंग से एकीकृत करने के लिए मजबूत तंत्रों की आवश्यकता। |
आगे की राह
- वैश्विक ‘विज्ञान विभाजन’ को पाटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।
- अनुसंधान, नीति निर्माण और प्रौद्योगिकी तैनाती के बीच एक मजबूत संस्थागत और प्रक्रियात्मक सेतु का निर्माण करना।
- भारत के ‘TRL कम्पास’ जैसे साक्ष्य-आधारित प्रौद्योगिकी तत्परता आकलन ढांचों को अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए अनुकूलित करना।
- भाषा, साक्षरता और डिजिटल पहुंच की बाधाओं को दूर करते हुए समावेशी विज्ञान संचार रणनीतियों को विकसित करना।
- उभरती प्रौद्योगिकियों, विशेष रूप से AI, के लिए दूरदर्शिता अध्ययन और नैतिक दिशानिर्देशों के साथ-साथ मजबूत नीतिगत ढांचे तैयार करना।
- वैज्ञानिक उद्यमिता और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना ताकि सामाजिक समस्याओं के लिए नवीन समाधान विकसित हो सकें।
- खुले पहुंच वाले ज्ञान प्रणालियों को बढ़ावा देना और वैज्ञानिक प्रकाशनों तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
विज्ञान नीति · विज्ञान संचार · सतत विकास · प्रौद्योगिकी तत्परता · वैज्ञानिक उद्यमिता · साक्ष्य-आधारित नीति · वैश्विक विज्ञान विभाजन · ओपन एक्सेस · कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) · सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर
अवधारणा प्रवाह
वैश्विक चुनौतियाँ → विज्ञान नीति और संचार की आवश्यकता → अनुसंधान एवं विकास में निवेश → प्रौद्योगिकी तत्परता और उद्यमिता → साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण → सामाजिक अनुप्रयोग और सतत विकास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में विज्ञान शिखर सम्मेलन के दौरान वार्षिक सत्रों का आयोजन करती है।
2. CSIR-NIScPR, विज्ञान नीति और संचार के क्षेत्र में भारत का एक प्रमुख संस्थान है।
3. TRL कम्पास प्रौद्योगिकी तत्परता आकलन के लिए भारत का एक साक्ष्य-आधारित राष्ट्रीय ढाँचा है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि CSIR UNGA में विज्ञान शिखर सम्मेलन के दौरान वार्षिक सत्र आयोजित करता है। कथन 2 सही है क्योंकि CSIR-NIScPR (राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान) विज्ञान संचार और नीति अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कथन 3 सही है क्योंकि TRL कम्पास (Technology Readiness Level Compass) प्रौद्योगिकी तत्परता आकलन के लिए भारत का एक साक्ष्य-आधारित राष्ट्रीय ढाँचा है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा संस्थान भारत में विज्ञान नीति और संचार के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास में शामिल है?
- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)
- वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR)
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO)
उत्तर: वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NIScPR) — CSIR-NIScPR (राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान) विशेष रूप से विज्ञान नीति और संचार के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास के लिए समर्पित है, जैसा कि लेख में उल्लेख किया गया है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ वैश्विक चुनौतियों के समाधान में विज्ञान नीति और विज्ञान संचार की भूमिका का परीक्षण कीजिए। भारत में वैज्ञानिक प्रगति को सामाजिक परिणामों में बदलने के लिए किन संस्थागत तंत्रों की आवश्यकता है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** विज्ञान नीति और विज्ञान संचार को परिभाषित करें और वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता बताएं।
2. **विज्ञान नीति की भूमिका:**
* साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में महत्व।
* अनुसंधान और विकास (R&D) को दिशा देना।
* प्रौद्योगिकी तत्परता और उद्यमिता को बढ़ावा देना (जैसे TRL कम्पास का उल्लेख)।
* उभरती प्रौद्योगिकियों (जैसे AI) के लिए नियामक ढांचा तैयार करना।
3. **विज्ञान संचार की भूमिका:**
* वैज्ञानिक ज्ञान को आम जनता तक पहुंचाना।
* विज्ञान विभाजन (Science Divide) को कम करना।
* समावेशी विज्ञान संचार की आवश्यकता (भाषा, साक्षरता, डिजिटल पहुंच)।
* नीति निर्माताओं और समाज के बीच समन्वय स्थापित करना।
4. **भारत में संस्थागत तंत्रों की आवश्यकता:**
* **अनुसंधान, नीति और तैनाती को जोड़ने वाले मजबूत तंत्र:** CSIR-NIScPR और प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय (PSA) जैसे संस्थानों की भूमिका।
* **प्रौद्योगिकी तत्परता आकलन और दूरदर्शिता:** TRL कम्पास जैसे राष्ट्रीय ढांचे का विकास।
* **वैज्ञानिक उद्यमिता और स्टार्टअप को बढ़ावा:** सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए।
* **ओपन एक्सेस ज्ञान प्रणालियों को मजबूत करना:** सरकारों, वित्तपोषकों, शोधकर्ताओं की भागीदारी।
* **क्षमता निर्माण और कौशल विकास।**
* **अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक दक्षिण के लिए प्रासंगिक मॉडल।**
5. **निष्कर्ष:** विज्ञान नीति और संचार के समन्वित प्रयासों के माध्यम से एक पुनर्जीवित और न्यायसंगत भविष्य के लिए विज्ञान की क्षमता को रेखांकित करें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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