शीघ्र सुनवाई मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

शीघ्र सुनवाई मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

शीघ्र सुनवाई मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

संविधान बनाम विशेष कानूनसंविधानविशेष कानूनसर्वोच्चतासभी कानूनों से ऊपरसंविधान के अधीनत्वरित सुनवाईमौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21)कठोर जमानत शर्तेंटकराव की स्थितिप्रभावी होगाप्रभावी नहीं होगा
संविधान बनाम विशेष कानून

✎ त्वरित सुनवाई अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है; कोई भी विधि, विशेष कानून सहित, संविधान के मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती और टकराव की स्थिति में संविधान ही प्रभावी होगा।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 21, न्यायपालिका की भूमिका और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)  |  GS Paper II — शासन (Governance): न्याय वितरण प्रणाली, आपराधिक न्याय सुधार और विचाराधीन कैदियों की समस्या
  • Prelims: अनुच्छेद 21: विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित न करना, अनुच्छेद 13: मौलिक अधिकारों से असंगत विधियां उस सीमा तक शून्य, अनुच्छेद 145(3): संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर कम से कम पांच न्यायाधीशों की पीठ, हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979): त्वरित सुनवाई को अनुच्छेद 21 का अंग माना गया, मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978): अनुच्छेद 21 में ‘उचित, न्यायसंगत और ऋजु’ प्रक्रिया का सिद्धांत, एनडीपीएस अधिनियम, 1985 की धारा 37 और धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) की धारा 45 में जमानत की दोहरी शर्तें, विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) की धारा 43D(5) में जमानत पर कठोर प्रावधान, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 479: विचाराधीन कैदियों से संबंधित प्रावधान
  • Essay: न्याय में विलंब न्याय से इनकार है: त्वरित सुनवाई, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समाज का विश्वास, संविधान की सर्वोच्चता और विशेष कानून: विधायी संप्रभुता तथा न्यायिक व्याख्या के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: त्वरित सुनवाई अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है; कोई भी विधि, विशेष कानून सहित, संविधान के मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती और टकराव की स्थिति में संविधान ही प्रभावी होगा।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश उज्जवल भुयान और न्यायाधीश ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने गुरुवार को कहा कि संविधान सभी कानूनों और नियमों से ऊपर है। पीठ ने दोहराया कि त्वरित सुनवाई का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है, जिसका उल्लंघन किसी भी कानून के तहत नहीं किया जा सकता, और यह जमानत का आधार बन सकता है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि एनडीपीएस, यूएपीए और पीएमएलए जैसे विशेष कानूनों और संविधान के प्रावधानों में टकराव होने पर संविधान ही प्रभावी होगा। यह टिप्पणी उस विवाद के संदर्भ में आई है जिसमें विभिन्न पीठों ने विशेष कानूनों के अंतर्गत विचारण में देरी के आधार पर जमानत देने पर भिन्न मत अपनाए थे। इसी मतभेद के कारण मामला अब बड़ी पीठ के पास भेजा गया है।

पृष्ठभूमि

  • अनुच्छेद 21 का विस्तार: मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में प्रक्रिया को न्यायसंगत और ऋजु मानने के साथ अनुच्छेद 21 का दायरा व्यापक हुआ; इसके बाद हुसैनारा खातून मामले (1979) में त्वरित सुनवाई को इसका अभिन्न अंग माना गया।
  • विशेष कानूनों की कठोर जमानत-व्यवस्था: एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37, पीएमएलए की धारा 45 और यूएपीए की धारा 43D(5) में जमानत के लिए विशेष और सख्त शर्तें रखी गई हैं, जिससे विचारण में देरी और जमानत के अधिकार के बीच संबंध पर न्यायिक प्रश्न उठते रहे हैं।
  • संविधान की सर्वोपरिता: अनुच्छेद 13 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों का हनन करने वाली विधियां शून्य मानी जाती हैं, और न्यायपालिका अनुच्छेद 13 तथा अनुच्छेद 32 व 226 के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा का प्रयोग करती है। केशवानंद भारती मामले (1973) में मूल संरचना के सिद्धांत ने भी संविधान की सर्वोच्चता को पुष्ट किया।
  • बड़ी पीठ का संदर्भ: जब संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं, तो अनुच्छेद 145(3) के अंतर्गत संविधान पीठ (कम से कम पांच न्यायाधीश) उन पर विचार करती है। पीठों के बीच मतभेद होने पर मामले को बड़ी पीठ को सौंपना इसी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
  • नई आपराधिक संहिता: BNSS, 2023 की धारा 479 विचाराधीन कैदियों की लंबी हिरासत से संबंधित है और यह पूर्व दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A के अनुरूप प्रावधान है, जो विचारण में विलंब और स्वतंत्रता के प्रश्न से सीधे जुड़ा है।

त्वरित सुनवाई का मौलिक अधिकार क्या है?

  • अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा; न्यायपालिका ने इसमें त्वरित सुनवाई, निःशुल्क विधिक सहायता और मानवीय गरिमा को सम्मिलित किया है।
  • त्वरित सुनवाई का अर्थ है कि अभियुक्त का मुकदमा अनावश्यक विलंब के बिना चले; अनुचित विलंब स्वयं में अनुच्छेद 21 के उल्लंघन का आधार बन सकता है।
  • सामान्य आपराधिक विधि में ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद’ का सिद्धांत माना जाता है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने संजय चंद्रा बनाम सीबीआई (2012) में दोहराया।
  • विशेष कानूनों में जमानत की शर्तें अधिक कठोर होती हैं, क्योंकि इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, मादक पदार्थों के व्यापार या धन शोधन जैसे गंभीर अपराधों का नियंत्रण लक्ष्य होता है। इसलिए जमानत पर विधायी मंशा और मौलिक अधिकार के बीच संतुलन आवश्यक है।
  • संविधान की व्याख्या के सिद्धांत के अनुसार कानूनों की व्याख्या संविधान के प्रकाश में की जाती है, न कि संविधान की व्याख्या किसी विशेष कानून के आधार पर। यदि कोई विधि मौलिक अधिकार से टकराती है, तो अनुच्छेद 13 के अनुसार उस सीमा तक वह प्रभावहीन होती है।
  • मौलिक अधिकारों की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो उस अधिकार के उद्देश्य को आगे बढ़ाए, यही उदार और उद्देश्यपरक निर्वचन का मूल सिद्धांत है।
  • यदि एक ही प्रश्न पर विभिन्न पीठों के निर्णय भिन्न हों, तो विधिक एकरूपता के लिए मामला बड़ी पीठ को भेजा जाता है, ताकि न्यायिक निर्णयों में स्थिरता और पूर्वानुमेयता बनी रहे।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
मौलिक अधिकार का दर्जा सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है, जिसे किसी भी कानून के तहत छीना नहीं जा सकता
संविधान की सर्वोच्चता विशेष कानूनों (NDPS, UAPA, PMLA) और संविधान के प्रावधानों में टकराव होने पर संविधान ही प्रभावी होगा, यानी संविधान सभी कानूनों और नियमों से ऊपर है
व्याख्या का क्रम बेंच के अनुसार कानूनों की व्याख्या संविधान के आधार पर होनी चाहिए; कोई कानून संविधान की व्याख्या का मार्गदर्शक नहीं बन सकता
जमानत से संबंध विचाराधीन बंदी के मामले में ट्रायल में देरी को जमानत का आधार बनाया जा सकता है, भले ही विशेष कानून में कठोर शर्तें हों
धारा 37 पर पुनर्विचार पूर्व आदेश में कहा गया था कि सिर्फ देरी के आधार पर NDPS की धारा 37 को ओवरराइड नहीं किया जा सकता; इस पर सवाल उठाया गया
बड़ी पीठ को संदर्भ जमानत और देरी के प्रश्न पर पीठों के मतभेद के कारण मुद्दा बड़ी पीठ (Larger Bench) के पास भेजा गया है, जिससे न्यायिक एकरूपता की दिशा तय होगी

महत्व

संवैधानिक

  • अनुच्छेद 21 में ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ की व्याख्या को व्यापक करते हुए त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई को उसका अनिवार्य अंग माना गया है
  • सर्वोच्च न्यायालय का यह कथन कि विशेष कानून भी मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हैं, संविधानिक सर्वोच्चता के सिद्धांत की पुनः पुष्टि है
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति के माध्यम से विधायी प्रावधानों को संविधान की कसौटी पर परखा गया है

विधिक और न्यायिक

  • विचाराधीन कैदियों की लंबी अवधि तक हिरासत की समस्या पर न्यायालय का रुख स्पष्ट हुआ है
  • जमानत-संबंधी मतभेदों को बड़ी पीठ के पास भेजने से एक समान न्यायिक सिद्धांत बनने की संभावना है
  • आपराधिक न्याय प्रणाली में अभियोजन-हित और अभियुक्त के अधिकार के बीच संतुलन का नया विमर्श खड़ा हुआ है

मानवाधिकार और सामाजिक

  • देरी से होने वाला अन्याय, विशेषकर गरीब और कम साधन वाले अभियुक्तों के लिए, मौलिक अधिकार के उल्लंघन के रूप में देखा गया है
  • वर्षों तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रहने की स्थिति में व्यक्ति की गरिमा और परिवार पर पड़ने वाले प्रभाव को न्यायिक चिंता का विषय माना गया है

चुनौतियाँ

1. विशेष कानूनों की कठोर जमानत शर्तें

  • NDPS अधिनियम की धारा 37, UAPA की धारा 43D(5) और PMLA की धारा 45 में जमानत के लिए कठोर शर्तें (Twin Conditions) रखी गई हैं
  • इन शर्तों और अनुच्छेद 21 के बीच सामंजस्य बैठाना न्यायालय के लिए जटिल है
  • सामान्य आपराधिक कानून की तुलना में इन अधिनियमों में जमानत लगभग अपवाद के बजाय कठिन नियम बन जाती है

2. न्यायिक मतभेद और कानूनी अनिश्चितता

  • एक ही प्रश्न पर अलग-अलग पीठों के भिन्न निर्णयों से निचली अदालतों में असमंजस की स्थिति बनती है
  • समान मामलों में अलग परिणाम विधि के समक्ष समानता के सिद्धांत को प्रभावित कर सकते हैं
  • बड़ी पीठ के निर्णय तक इस प्रश्न पर अंतरिम अनिश्चितता बनी रहेगी

3. ट्रायल में देरी की संरचनात्मक समस्या

  • न्यायालयों में लंबित मामलों का बोझ, न्यायाधीशों की कमी और अभियोजन तथा फॉरेंसिक सुविधाओं की सीमाएँ देरी के मुख्य कारण हैं
  • जाँच एजेंसियों पर अत्यधिक निर्भरता और आरोपपत्र दाखिल होने में विलंब भी सुनवाई को धीमा करता है
  • देरी का दोष किसके सिर है, अभियोजन, न्यायालय या अभियुक्त, यह तय करना प्रत्येक मामले में कठिन होता है

4. राज्य की सुरक्षा और व्यक्तिगत अधिकार का संतुलन

  • UAPA और PMLA जैसे कानून राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक अपराधों से जुड़े हैं, इसलिए उनमें राज्य का हित भी महत्त्वपूर्ण है
  • जमानत के सख्त प्रावधानों को बनाए रखने के पीछे सार्वजनिक हित और साक्ष्य-संरक्षण का तर्क दिया जाता है
  • दोनों हितों के बीच संतुलन का कोई एकसमान सूत्र न होने से हर मामले में विवेक का प्रयोग आवश्यक है

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
विचाराधीन कैदियों की संख्या लंबी सुनवाई के कारण बड़ी संख्या में व्यक्ति दोष सिद्ध हुए बिना जेल में रहते हैं, जिससे मानवीय और सामाजिक लागत बढ़ती है
जमानत-संबंधी असमान निर्णय एक ही प्रकार के मामलों में अलग-अलग पीठों के निर्णय विधि की निश्चितता को कमज़ोर करते हैं
विशेष कानूनों की कठोरता धारा 37, धारा 43D(5) और धारा 45 जैसे प्रावधान जमानत को कठिन बनाते हैं, जिससे अनुच्छेद 21 के साथ टकराव की स्थिति बनती है
न्यायिक अवसंरचना न्यायाधीशों की कमी, लंबित मामले और सीमित संसाधन सुनवाई में देरी के प्रमुख कारण हैं
जाँच और अभियोजन की क्षमता जाँच में विलंब और अभियोजन की सीमित तैयारी से ट्रायल लंबा खिंचता है
राज्य हित और व्यक्तिगत अधिकार आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में दोनों हितों के बीच संतुलन कठिन है

आगे की राह

  • बड़ी पीठ द्वारा जमानत और त्वरित सुनवाई के प्रश्न पर स्पष्ट और एकसमान सिद्धांत तय किया जाना चाहिए
  • निचली अदालतों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाए जाएँ, ताकि समान परिस्थितियों में समान निर्णय हों
  • न्यायाधीशों के पद रिक्त न रहें और न्यायिक अवसंरचना, विशेषकर विशेष अदालतों, का विस्तार हो
  • जाँच एजेंसियों की क्षमता बढ़ाई जाए और आरोपपत्र समय पर दाखिल हो, ताकि सुनवाई की शुरुआत में ही विलंब न हो
  • फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं और डिजिटल साक्ष्य प्रबंधन की सुविधा सुदृढ़ की जाए
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 में दिए गए समय-सीमा संबंधी प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन की निगरानी हो
  • विचाराधीन कैदियों की नियमित समीक्षा की व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया जाए

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) · अनुच्छेद 21 (Article 21) · मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) · संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution) · विशेष कानून (Special Laws) · जमानत (Bail) · धारा 37, NDPS अधिनियम (Section 37, NDPS Act) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · अनुच्छेद 13 (Article 13) · सामंजस्यपूर्ण निर्वचन (Harmonious Construction) · संविधान पीठ (Constitution Bench) · मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21: जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार में त्वरित सुनवाई
  • अनुच्छेद 13: मौलिक अधिकारों से असंगत कानूनों की शून्यता
  • संविधान की सर्वोच्चता: विशेष कानूनों पर संविधान का प्रभावी होना

अवधारणा प्रवाह

विशेष कानूनों (NDPS, UAPA, PMLA) में जमानत के कठोर प्रावधान और ट्रायल में देरी की स्थिति उत्पन्न होती है  →  विचाराधीन अभियुक्त लंबी अवधि तक जेल में रहता है और अनुच्छेद 21 के अधिकार पर प्रश्न उठता है  →  पूर्व में कुछ पीठों ने देरी को जमानत का आधार न मानने का रुख अपनाया, जबकि अन्य ने इसके विपरीत निर्णय दिए  →  सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि त्वरित सुनवाई मौलिक अधिकार है और कानून संविधान की व्याख्या का आधार नहीं हो सकता  →  संविधान की सर्वोच्चता के आधार पर विशेष कानूनों की व्याख्या अनुच्छेद 21 के अनुरूप करने का सिद्धांत स्थापित होता है  →  मतभेद के समाधान हेतु मुद्दा बड़ी पीठ को भेजा गया, जिसके निर्णय से निचली अदालतों के लिए एकसमान दिशा तय होगी

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. सर्वोच्च न्यायालय ने हुसैनारा खातून मामले (1979) में त्वरित सुनवाई के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत पढ़ा। 2. अनुच्छेद 21 केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है, विदेशी नागरिकों को नहीं। 3. त्वरित सुनवाई का अधिकार किसी भी कानून के अंतर्गत जमानत का आधार नहीं बन सकता। उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है: हुसैनारा खातून मामले में न्यायालय ने त्वरित सुनवाई को अनुच्छेद 21 के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का अंग माना। कथन 2 गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 21 में ‘व्यक्ति’ शब्द है और यह नागरिकों व विदेशियों दोनों पर लागू होता है। कथन 3 गलत है, क्योंकि ताज़ा फैसले में न्यायालय ने कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार जमानत का आधार बन सकता है।

Q2. अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि किसी टकराव की स्थिति में संविधान के प्रावधान विशेष कानूनों पर प्रभावी होंगे। कारण (R): अनुच्छेद 13 के अनुसार मौलिक अधिकारों के भाग III से असंगत कोई भी विधि उस असंगति की सीमा तक शून्य होगी। नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है
  3. A सही है, R गलत है
  4. A गलत है, R सही है

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है — अनुच्छेद 13 के अनुसार भाग III से असंगत विधि शून्य है, जो मौलिक अधिकारों की सर्वोपरिता का आधार है। इसी आधार पर न्यायालय यह कहता है कि टकराव में संविधान विशेष कानून से ऊपर है। अतः R, A की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित वाद-सूची को उनके निर्णय-सार से सुमेलित कीजिए:

सूची I (वाद)
1. हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979)
2. अब्दुल रहमान अंतुले बनाम आर.एस. नायक (1992)
3. भारत संघ बनाम के.ए. नजीब (2021)
4. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)

सूची II (निर्णय-सार)
A. त्वरित सुनवाई अनुच्छेद 21 का अंग है
B. संविधान की मूल संरचना को संसद संशोधित नहीं कर सकती
C. विशेष विधि के कठोर प्रावधानों के बावजूद विचाराधीन विलंब होने पर जमानत दी जा सकती है
D. विलंब होने पर अभियोजन रद्द किया जा सकता है, इसके लिए दिशानिर्देश दिए गए

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-A, 2-D, 3-C, 4-B
  2. 1-B, 2-A, 3-D, 4-C
  3. 1-A, 2-B, 3-C, 4-D
  4. 1-D, 2-A, 3-B, 4-C

उत्तर: 1-A, 2-D, 3-C, 4-B — हुसैनारा खातून (1979) ने त्वरित सुनवाई को अनुच्छेद 21 से जोड़ा। अंतुले (1992) ने विलंब के आधार पर अभियोजन रद्द करने के दिशानिर्देश दिए। नजीब (2021) में UAPA की कठोर शर्तों के बावजूद विलंब की स्थिति में जमानत को मान्यता दी गई। केशवानंद भारती (1973) ने मूल संरचना सिद्धांत प्रतिपादित किया।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ संविधान का अनुच्छेद 21 त्वरित सुनवाई को मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित करता है, और हाल की सुनवाई में यह कहा गया है कि यह अधिकार विशेष कानूनों के अंतर्गत भी जमानत का आधार बन सकता है। PMLA, NDPS और UAPA जैसे विशेष कानूनों की कठोर जमानत-शर्तों और अनुच्छेद 21 के बीच उत्पन्न तनाव का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि विभिन्न न्यायिक दृष्टिकोणों के मतभेद में बड़ी पीठ की भूमिका क्या होनी चाहिए और सामंजस्यपूर्ण निर्वचन का सिद्धांत इस विवाद को सुलझाने में कैसे सहायक हो सकता है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर के मुख्य बिंदु: (1) अनुच्छेद 21 का पाठ और मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) द्वारा ‘प्रक्रिया’ को न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और युक्तिसंगत बनाना; (2) हुसैनारा खातून (1979) में त्वरित सुनवाई का अनुच्छेद 21 में समावेश, सुनील बत्रा (1978) में कैदियों के अधिकार; (3) अब्दुल रहमान अंतुले (1992) के दिशानिर्देश, जिनमें विलंब के आधार पर अभियोजन रद्द करने की संभावना स्वीकार की गई; (4) विशेष कानूनों के प्रावधान: NDPS अधिनियम की धारा 37 (दोहरी शर्तें), UAPA की धारा 43D(5), PMLA की धारा 45 (दोहरी शर्तें), और विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (2022) में PMLA के प्रावधानों की संवैधानिकता की पुष्टि; (5) भाग III से असंगत विधि की शून्यता (अनुच्छेद 13) और संविधान की सर्वोच्चता; केशवानंद भारती (1973) में मूल संरचना का सिद्धांत; (6) सामंजस्यपूर्ण निर्वचन: विशेष कानून की धारा 37 और अनुच्छेद 21 को इस तरह पढ़ना कि दोनों का उद्देश्य बना रहे; (7) संतुलन के पक्ष: राज्य की सुरक्षा और मादक पदार्थ/आर्थिक अपराध पर नियंत्रण का विधायी उद्देश्य बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता; विधायिका की नीति-निर्धारण भूमिका बनाम न्यायिक समीक्षा की सीमा; (8) अनुच्छेद 145(3) के अंतर्गत संवैधानिक व्याख्या के प्रश्न पर संविधान पीठ (कम से कम पाँच न्यायाधीश) की आवश्यकता और न्यायिक अनुशासन; (9) परिणाम: बड़ी पीठ का निर्णय तय करेगा कि त्वरित सुनवाई की भूमिका कितनी होगी; विधायी सुधार जैसे BNSS की धारा 479 (विचाराधीन कैदियों की रिहाई), फास्ट-ट्रैक न्यायालय और अभियोजन क्षमता के उपाय भी विलंब कम करने में सहायक हैं। निष्कर्ष में संतुलित और तर्कसंगत मत दिया जाए।

स्रोत: jagran.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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