13 Aug संसदीय समिति: 73% बच्चे छोड़ देते हैं 12वीं से पहले पढ़ाई, जानें कारण और समाधान

✎ संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 73 प्रतिशत छात्र हायर सेकेंडरी शिक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं, जो शिक्षा तक पहुँच और निरंतरता में गंभीर चुनौतियों को उजागर करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — सामाजिक न्याय: शिक्षा, मानव संसाधन | GS Paper II — शासन: सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप
- Prelims: स्कूली ड्रॉपआउट दर, हायर सेकेंडरी शिक्षा, संसदीय प्राक्कलन समिति, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, समावेशी शिक्षा, बालिकाओं की शिक्षा
- Essay: भारत में शिक्षा: चुनौतियाँ और समाधान, मानव पूंजी निर्माण में शिक्षा की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 73 प्रतिशत छात्र हायर सेकेंडरी शिक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं, जो शिक्षा तक पहुँच और निरंतरता में गंभीर चुनौतियों को उजागर करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली में छात्रों के ड्रॉपआउट (पढ़ाई छोड़ने) की चिंताजनक दर पर प्रकाश डाला गया है। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 73 प्रतिशत छात्र हायर सेकेंडरी (कक्षा 12) की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। समिति ने प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्तर के स्कूलों की तुलना में सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्तर पर स्कूलों और छात्रों की संख्या में भारी गिरावट पर चिंता व्यक्त की है, जो शिक्षा तक पहुँच और निरंतरता में महत्वपूर्ण चुनौतियों को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि
- भारत में शिक्षा का अधिकार (Right to Education – RTE) अधिनियम, 2009 के तहत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy – NEP) 2020 का लक्ष्य स्कूली शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ratio – GER) को बढ़ाना और ड्रॉपआउट दर को कम करना है।
- शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education) विभिन्न योजनाओं जैसे समग्र शिक्षा अभियान (Samagra Shiksha Abhiyan) के माध्यम से स्कूली शिक्षा को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहा है।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में शिक्षा तक पहुँच, विशेषकर उच्च कक्षाओं में, एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, जहाँ स्कूलों की उपलब्धता और गुणवत्ता में अंतर देखा जाता है।
- सामाजिक-आर्थिक कारक, जैसे गरीबी, लैंगिक असमानताएँ और बुनियादी ढाँचे की कमी, छात्रों के स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारणों में से हैं।
- विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (Children with Special Needs – CwSN) के लिए अनुकूल बुनियादी ढाँचे और सुविधाओं की कमी भी एक महत्वपूर्ण समस्या है, जो उनके ड्रॉपआउट में योगदान करती है।
- संसदीय प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) संसद की एक स्थायी समिति है जो सरकारी व्यय में दक्षता और अर्थव्यवस्था की जाँच करती है।
भारत में स्कूली शिक्षा और ड्रॉपआउट दर
- स्कूली ड्रॉपआउट दर उन छात्रों का प्रतिशत है जो किसी विशेष शैक्षिक स्तर को पूरा करने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं।
- संसदीय समिति की रिपोर्ट में प्राइमरी स्तर पर 6.18 करोड़ से अधिक छात्रों की तुलना में हायर सेकेंडरी तक यह संख्या घटकर 1.64 करोड़ रह जाने का उल्लेख किया गया है।
- रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 73% छात्र 12वीं कक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं, जो शिक्षा प्रणाली में एक गंभीर कमी को दर्शाता है।
- समिति ने प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों की तुलना में सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या में भारी कमी को इस उच्च ड्रॉपआउट दर का एक प्रमुख कारण बताया है।
- विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के लिए अनुकूल बुनियादी ढाँचे की कमी भी ड्रॉपआउट दर को बढ़ाने में योगदान करती है।
- समिति ने मौजूदा प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूलों को हायर सेकेंडरी स्कूलों में अपग्रेड करने की सिफारिश की है ताकि छात्रों की उच्च शिक्षा तक पहुँच आसान हो सके और ड्रॉपआउट दर कम हो सके।
- उच्च ड्रॉपआउट दर देश के मानव संसाधन विकास और आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।
- यह शिक्षा के सार्वभौमिकरण (Universalization of Education) और सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals – SDGs) को प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ी बाधा है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| उच्च माध्यमिक स्तर से पहले छात्रों का स्कूल छोड़ना | संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 73% छात्र उच्च माध्यमिक (Higher Secondary) स्तर की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। यह शिक्षा प्रणाली में एक गंभीर कमी को दर्शाता है। |
| प्राथमिक बनाम उच्च शिक्षा स्तर पर स्कूलों की संख्या | समिति ने पाया कि प्राथमिक (Primary) और उच्च प्राथमिक (Upper Primary) स्तर के स्कूलों की तुलना में माध्यमिक (Secondary) और उच्च माध्यमिक स्तर के स्कूलों की संख्या बहुत कम है, जिससे उच्च शिक्षा तक पहुंच सीमित हो जाती है। |
| छात्रों की संख्या में गिरावट | जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ता है, छात्रों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिलती है। प्राथमिक स्तर पर 6.18 करोड़ से अधिक छात्र हैं, जो उच्च माध्यमिक तक 1.64 करोड़ रह जाते हैं। |
| विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के लिए सुविधाओं की कमी | रिपोर्ट में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के अनुकूल बुनियादी ढांचे की उपलब्धता में भारी कमी को भी उजागर किया गया है, जो समावेशी शिक्षा के लक्ष्य में बाधा डालता है। |
| स्कूलों को अपग्रेड करने की सिफारिश | समिति ने मंत्रालय से मौजूदा प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को उच्च माध्यमिक स्कूलों में अपग्रेड करने को प्राथमिकता देने की अपील की है, ताकि छात्रों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच आसान हो और ड्रॉपआउट दर कम हो। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- उच्च ड्रॉपआउट दर (Dropout Rate) समाज के एक बड़े वर्ग को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित करती है, जिससे सामाजिक असमानताएँ बढ़ती हैं।
- शिक्षा के अभाव में व्यक्तियों के कौशल विकास और रोजगार के अवसरों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे गरीबी और सामाजिक बहिष्कार का चक्र बना रहता है।
- विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए अपर्याप्त सुविधाएँ समावेशी समाज के निर्माण में बाधा डालती हैं और उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन करती हैं।
आर्थिक महत्व
- शिक्षा में उच्च ड्रॉपआउट दर देश की मानव पूंजी (Human Capital) के विकास को बाधित करती है, जिससे अर्थव्यवस्था की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होती है।
- कम शिक्षित कार्यबल नवाचार और तकनीकी प्रगति में योगदान करने में असमर्थ होता है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) धीमी पड़ जाती है।
- शिक्षा पर किए गए सार्वजनिक निवेश का पूरा लाभ नहीं मिल पाता जब छात्र उच्च स्तर पर पढ़ाई छोड़ देते हैं, जिससे संसाधनों का अपव्यय होता है।
शासन और नीतिगत महत्व
- यह रिपोर्ट शिक्षा के अधिकार (Right to Education) के प्रभावी कार्यान्वयन में मौजूदा चुनौतियों को उजागर करती है और नीति निर्माताओं को इन मुद्दों पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।
- संसदीय समिति की सिफारिशें शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता को दर्शाती हैं, विशेष रूप से स्कूलों के उन्नयन और बुनियादी ढांचे के विकास के संबंध में।
- यह रिपोर्ट शिक्षा क्षेत्र में बजट आवंटन और उसके प्रभावी उपयोग की समीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है, ताकि ‘सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा’ के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।
चुनौतियाँ
1. उच्च ड्रॉपआउट दर
- उच्च माध्यमिक स्तर से पहले लगभग 73% छात्रों का स्कूल छोड़ना शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी चुनौती है।
- इसके पीछे सामाजिक-आर्थिक कारण, स्कूलों तक पहुंच की कमी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव और पारिवारिक जिम्मेदारियां हो सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: शिक्षा, मानव संसाधन
2. स्कूलों की अपर्याप्त संख्या
- माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर स्कूलों की संख्या प्राथमिक स्तर की तुलना में बहुत कम है, जिससे छात्रों को आगे की पढ़ाई जारी रखने में कठिनाई होती है।
- ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में उच्च शिक्षा तक पहुंच और भी सीमित है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: शिक्षा अवसंरचना
3. बुनियादी ढांचे की कमी
- विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के लिए अनुकूल बुनियादी ढांचे की भारी कमी समावेशी शिक्षा के लक्ष्य को कमजोर करती है।
- सामान्य स्कूलों में भी पर्याप्त कक्षाओं, शौचालयों, पुस्तकालयों और प्रयोगशालाओं का अभाव हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: कमजोर वर्ग, शिक्षा
4. शिक्षा की गुणवत्ता
- केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी आवश्यक है ताकि छात्र स्कूल में बने रहें और सीख सकें।
- शिक्षक-छात्र अनुपात, प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों का अभाव गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: शिक्षा मानक
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| उच्च माध्यमिक स्तर से पहले ड्रॉपआउट | लगभग 73% छात्रों का पढ़ाई छोड़ना मानव पूंजी के नुकसान और सामाजिक-आर्थिक असमानता को बढ़ाता है। |
| उच्च शिक्षा स्तर पर स्कूलों की कमी | प्राथमिक स्कूलों की तुलना में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों की संख्या कम होने से छात्रों के लिए आगे की पढ़ाई तक पहुंच बाधित होती है। |
| विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए सुविधाओं का अभाव | CwSN के अनुकूल बुनियादी ढांचे की कमी समावेशी शिक्षा के लक्ष्य को कमजोर करती है और इन बच्चों को शिक्षा से वंचित करती है। |
| शिक्षा के स्तर बढ़ने पर छात्रों की संख्या में गिरावट | यह दर्शाता है कि शिक्षा प्रणाली छात्रों को उच्च कक्षाओं तक बनाए रखने में विफल है, जिससे राष्ट्रीय विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। |
| बजट और नीतिगत पहलू | शिक्षा क्षेत्र में बजट का प्रभावी उपयोग और नीतियों का उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित करना एक चुनौती है ताकि ड्रॉपआउट दर को कम किया जा सके और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की जा सके। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- समग्र शिक्षा अभियान (Samagra Shiksha Abhiyan)
आगे की राह
- मौजूदा प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों को चरणबद्ध तरीके से उच्च माध्यमिक विद्यालयों में अपग्रेड किया जाए, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ उच्च शिक्षा तक पहुंच सीमित है।
- विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CwSN) के लिए स्कूलों में रैंप, सुलभ शौचालय और विशेष शिक्षण सामग्री सहित अनुकूल बुनियादी ढांचे का विकास सुनिश्चित किया जाए।
- ड्रॉपआउट के मूल कारणों की पहचान करने और उन्हें दूर करने के लिए लक्षित हस्तक्षेप किए जाएं, जिसमें छात्रवृत्ति, परामर्श और सामुदायिक जुड़ाव कार्यक्रम शामिल हों।
- शिक्षक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाए ताकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सुनिश्चित हो सके और छात्रों को स्कूल में बनाए रखने के लिए आकर्षक शिक्षण वातावरण बनाया जा सके।
- शिक्षा में प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए, जैसे कि ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल सामग्री, ताकि दूरदराज के क्षेत्रों में भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच बढ़ाई जा सके।
- माता-पिता और समुदायों को शिक्षा के महत्व के बारे में जागरूक किया जाए और उन्हें अपने बच्चों को स्कूल भेजने और बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
- शिक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय में वृद्धि की जाए और आवंटित धन का प्रभावी ढंग से उपयोग सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
स्कूली शिक्षा में ड्रॉपआउट दर · शिक्षा का अधिकार · संसदीय समिति की रिपोर्ट · हायर सेकेंडरी शिक्षा · शिक्षा में असमानता · समावेशी शिक्षा · राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 · बुनियादी ढाँचा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार
- अनुच्छेद 45: प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा
- अनुच्छेद 46: अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षिक हितों को बढ़ावा
अवधारणा प्रवाह
संसदीय समिति की रिपोर्ट → उच्च ड्रॉपआउट दर का खुलासा (73% छात्र) → माध्यमिक/उच्च माध्यमिक स्कूलों की कमी → उच्च शिक्षा तक पहुंच में बाधा → मानव पूंजी का नुकसान और असमानता → आर्थिक संवृद्धि और सामाजिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. संसदीय समिति की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में स्कूली शिक्षा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. लगभग 73% छात्र हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं।
2. प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्तर के स्कूलों की तुलना में सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्तर के स्कूलों की संख्या बहुत कम है।
3. विशेष जरूरतों वाले बच्चों (CwSN) के अनुकूल बुनियादी ढांचे की उपलब्धता में भारी कमी है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1: रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि लगभग 73% छात्र हायर सेकेंडरी की पढ़ाई पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं। यह कथन सही है।
कथन 2: समिति ने गौर किया कि प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्तर के स्कूलों की तुलना में सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्तर के स्कूलों की संख्या बहुत कम है। यह कथन सही है।
कथन 3: समिति ने CwSN के अनुकूल बुनियादी ढांचे की उपलब्धता में भारी कमी को भी उजागर किया है। यह कथन सही है।
Q2. भारत में स्कूली शिक्षा में ड्रॉपआउट दर को कम करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों में निम्नलिखित में से कौन-सा/से शामिल है/हैं?
1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy) 2020
2. सर्व शिक्षा अभियान (Sarva Shiksha Abhiyan)
3. मिड-डे मील योजना (Mid-Day Meal Scheme)
सही विकल्प चुनें:
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य शिक्षा तक पहुंच बढ़ाना और ड्रॉपआउट दर को कम करना है। सर्व शिक्षा अभियान का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण करना था, जिसमें ड्रॉपआउट दर को कम करना भी शामिल था। मिड-डे मील योजना बच्चों को स्कूल में बनाए रखने और उनके पोषण स्तर में सुधार करने में मदद करती है, जिससे ड्रॉपआउट दर कम होती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ हाल ही में एक संसदीय समिति की रिपोर्ट ने स्कूली शिक्षा में उच्च ड्रॉपआउट दर और बुनियादी ढांचे की कमी पर चिंता व्यक्त की है। भारत में स्कूली शिक्षा में उच्च ड्रॉपआउट दर के प्रमुख कारणों का विश्लेषण करें और इस समस्या के समाधान हेतु राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रावधानों तथा अन्य सरकारी पहलों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करें। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: संसदीय समिति की रिपोर्ट का संक्षिप्त उल्लेख और भारत में स्कूली शिक्षा में ड्रॉपआउट दर की गंभीरता (73% छात्र हायर सेकेंडरी से पहले पढ़ाई छोड़ देते हैं) का उल्लेख।
2. उच्च ड्रॉपआउट दर के प्रमुख कारण:
क. आर्थिक कारण: गरीबी, बाल श्रम, शिक्षा का खर्च।
ख. सामाजिक कारण: लैंगिक असमानता, सामाजिक मानदंड, जागरूकता की कमी, विशेषकर लड़कियों और वंचित समुदायों में।
ग. शैक्षिक प्रणाली संबंधी कारण: स्कूलों की कमी (विशेषकर सेकेंडरी और हायर सेकेंडरी स्तर पर), शिक्षकों की कमी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव, CwSN के लिए अनुकूल बुनियादी ढांचे की कमी, पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता।
घ. भौगोलिक कारण: दूरदराज के क्षेत्रों में स्कूलों तक पहुंच का अभाव।
3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के प्रावधान और उनकी प्रभावशीलता:
क. पहुंच और नामांकन बढ़ाना: स्कूल छोड़ने वाले बच्चों को वापस मुख्यधारा में लाना, वैकल्पिक शिक्षा मॉडल।
ख. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा: प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE), पाठ्यक्रम सुधार, अनुभवात्मक शिक्षा।
ग. समावेशिता: CwSN के लिए प्रावधान, लैंगिक समावेशी कोष।
घ. बुनियादी ढाँचा: स्कूलों का उन्नयन, डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा।
ङ. शिक्षक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण।
4. अन्य सरकारी पहलें और उनकी प्रभावशीलता:
क. शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009।
ख. समग्र शिक्षा अभियान।
ग. मिड-डे मील योजना।
घ. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएं।
5. चुनौतियाँ और आगे की राह: NEP 2020 के प्रभावी कार्यान्वयन में चुनौतियाँ, वित्तीय संसाधन, सामुदायिक भागीदारी, निगरानी और मूल्यांकन।
6. निष्कर्ष: समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के महत्व पर जोर देते हुए एक संतुलित निष्कर्ष।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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