संसद में गतिरोध: किरेण रिजिजू ने राहुल गांधी से की बैठक, एफसीआरए विधेयक पर शाह बोलेंगे

Parliament deadlock: Rijiju meets Rahul to break logjam; Shah may speak on FCRA bill — concept mind map

संसद में गतिरोध: किरेण रिजिजू ने राहुल गांधी से की बैठक, एफसीआरए विधेयक पर शाह बोलेंगे

✎ संसदीय गतिरोध भारतीय लोकतंत्र में एक गंभीर चुनौती है, जो विधायी कार्यों, सार्वजनिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवाद को बाधित करता है, जिसके समाधान के लिए सरकार और विपक्ष के बीच रचनात्मक बातचीत आवश्यक है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान – संसद और राज्य विधायिका – संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय  |  GS Paper II — सरकार की नीतियां और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके डिजाइन तथा कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे
  • Prelims: संसदीय सत्र, प्रश्नकाल, शून्यकाल, विधेयक पारित करने की प्रक्रिया, संसदीय विशेषाधिकार, विपक्ष की भूमिका, FCRA विधेयक, परिसीमन विधेयक
  • Essay: भारतीय लोकतंत्र में संसद की भूमिका और चुनौतियाँ, संसदीय कार्यप्रणाली में गतिरोध: कारण, प्रभाव और समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: संसदीय गतिरोध भारतीय लोकतंत्र में एक गंभीर चुनौती है, जो विधायी कार्यों, सार्वजनिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक संवाद को बाधित करता है, जिसके समाधान के लिए सरकार और विपक्ष के बीच रचनात्मक बातचीत आवश्यक है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

संसद के मानसून सत्र में लगातार गतिरोध बना हुआ है, जिसके कारण लोकसभा में प्रश्नकाल और अन्य महत्वपूर्ण विधायी कार्य बाधित हुए हैं। इस गतिरोध को समाप्त करने के प्रयास में, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। इस बैठक में संसद में जारी गतिरोध और प्रस्तावित परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पर चर्चा हुई।

पृष्ठभूमि

  • संसद के मानसून सत्र की शुरुआत 20 जुलाई को हुई थी, लेकिन तब से लगातार व्यवधानों के कारण लोकसभा में एक भी प्रश्नकाल पूरा नहीं हो पाया है।
  • विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार से संसद में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के बयान की मांग कर रहा है, जिनमें जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई भी शामिल है।
  • सदन के अध्यक्ष ओम बिरला ने सदस्यों से सदन की गरिमा बनाए रखने और कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने का आग्रह किया है, क्योंकि व्यवधानों के कारण महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं उठाए जा पा रहे हैं।
  • अब तक, बार-बार व्यवधानों के बीच बिना किसी चर्चा के पाँच विधेयक पारित किए जा चुके हैं, जो विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
  • सरकार ने स्पष्ट किया है कि स्वतंत्रता दिवस के बाद विशेष संसदीय सत्र में परिसीमन विधेयक या महिला आरक्षण संशोधन विधेयक (Women’s Reservation Amendment Bill) पेश करने की कोई योजना नहीं है।
  • संसदीय गतिरोध भारतीय लोकतंत्र में एक आवर्ती समस्या बन गया है, जो विधायी कार्यों और सार्वजनिक जवाबदेही को प्रभावित करता है।

भारतीय संसद में विधायी प्रक्रिया और गतिरोध

  • भारतीय संसद में विधायी प्रक्रिया संविधान (Constitution) द्वारा निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार चलती है, जिसमें विधेयक पेश करना, चर्चा करना और पारित करना शामिल है।
  • प्रश्नकाल (Question Hour) और शून्यकाल (Zero Hour) संसदीय कार्यवाही के महत्वपूर्ण भाग हैं, जो सदस्यों को सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को उठाने और सरकार से जवाबदेही मांगने का अवसर प्रदान करते हैं।
  • संसदीय गतिरोध (Parliamentary Deadlock) तब उत्पन्न होता है जब विपक्षी दल विभिन्न मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन या व्यवधान के माध्यम से सदन की कार्यवाही को बाधित करते हैं, जिससे विधायी कार्य रुक जाते हैं।
  • गतिरोध के कारणों में सरकार की नीतियों पर असहमति, घोटालों के आरोप, या किसी विशेष मुद्दे पर सरकार से बयान की मांग शामिल हो सकती है।
  • विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) भारत में विदेशी दान के विनियमन से संबंधित है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे दान राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल गतिविधियों के लिए उपयोग न किए जाएं।
  • परिसीमन (Delimitation) निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है, ताकि जनसंख्या में परिवर्तन को दर्शाया जा सके और सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगभग समान रहे।
  • संसदीय गतिरोध के परिणामस्वरूप महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा के बिना पारित किया जा सकता है, जिससे कानून की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक जवाबदेही प्रभावित होती है।
  • गतिरोध को तोड़ने के लिए, संसदीय कार्य मंत्री और विपक्ष के नेताओं के बीच बातचीत एक महत्वपूर्ण तंत्र है, जिसका उद्देश्य आम सहमति बनाना और सदन की कार्यवाही को सामान्य करना है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
संसदीय गतिरोध संसद के मानसून सत्र में लगातार व्यवधान, प्रश्नकाल का न हो पाना और बिना चर्चा के विधेयकों का पारित होना।
विपक्ष की मांगें विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से सदन में बयान की मांग, विशेषकर छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर।
संसदीय कार्य मंत्री की पहल गतिरोध समाप्त करने के लिए संसदीय कार्य मंत्री द्वारा विपक्ष के नेता से मुलाकात, संवाद स्थापित करने का प्रयास।
सीमांकन विधेयक (Delimitation Bill) बैठक में सीमांकन विधेयक पर विपक्ष का रुख जानने का प्रयास, जो भविष्य में सीटों के पुनर्गठन से संबंधित है।
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026) गृह मंत्री द्वारा इस विधेयक पर बोलने की संभावना, जो गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के विदेशी धन पर नियंत्रण से संबंधित है।
लोकसभा अध्यक्ष की अपील अध्यक्ष द्वारा सदस्यों से सदन की गरिमा बनाए रखने और प्रश्नकाल चलने देने का आग्रह।

महत्व

लोकतांत्रिक महत्व

  • संसदीय गतिरोध लोकतंत्र के सुचारु कामकाज के लिए एक गंभीर चुनौती है, क्योंकि यह कानून बनाने की प्रक्रिया और जनता के मुद्दों पर चर्चा को बाधित करता है।
  • प्रश्नकाल (Question Hour) का न हो पाना सरकार की जवाबदेही (Accountability) सुनिश्चित करने में बाधा डालता है, जो संसदीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
  • विपक्ष की मांगों और सरकार के संवाद के प्रयासों से संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने का महत्व उजागर होता है।

शासन और नीति निर्माण

  • बिना पर्याप्त चर्चा के विधेयकों का पारित होना कानून की गुणवत्ता और उसके संभावित प्रभावों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
  • सीमांकन विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा का प्रयास भविष्य की चुनावी राजनीति और प्रतिनिधित्व पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
  • FCRA विधेयक जैसे कानून गैर-सरकारी संगठनों के कामकाज और नागरिक समाज पर सरकार के नियंत्रण को प्रभावित करते हैं, जिसका शासन पर सीधा असर होता है।

सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ

  • छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई जैसे मुद्दों पर विपक्ष का विरोध सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों के प्रति चिंता को दर्शाता है।
  • संसद में गतिरोध से जनता में राजनीतिक प्रक्रिया के प्रति निराशा बढ़ सकती है, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास कम हो सकता है।
  • विपक्षी नेताओं के बीच समन्वय और सरकार के साथ उनके संवाद के प्रयास राजनीतिक ध्रुवीकरण (Political Polarization) को कम करने में सहायक हो सकते हैं।

चुनौतियाँ

1. संसदीय कार्यप्रणाली में बाधा

  • लगातार व्यवधानों के कारण संसद का बहुमूल्य समय बर्बाद होता है, जिससे महत्वपूर्ण विधायी कार्य और सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर चर्चा नहीं हो पाती।
  • प्रश्नकाल और शून्यकाल (Zero Hour) जैसे महत्वपूर्ण संसदीय उपकरणों का उपयोग न हो पाना सरकार की जवाबदेही को कमजोर करता है।

2. कानून निर्माण की गुणवत्ता

  • बिना पर्याप्त चर्चा और जांच के विधेयकों का पारित होना खराब कानून निर्माण को जन्म दे सकता है, जिससे भविष्य में कानूनी चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं।
  • यह विधायी प्रक्रिया में सभी हितधारकों की भागीदारी को सीमित करता है।

3. सरकार की जवाबदेही का अभाव

  • विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के बयान की मांग को पूरा न करना सरकार की जवाबदेही के सिद्धांत को कमजोर करता है।
  • यह सरकार को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने से रोकता है।

4. राजनीतिक ध्रुवीकरण

  • संसद में गतिरोध और संवाद की कमी राजनीतिक दलों के बीच अविश्वास और ध्रुवीकरण को बढ़ाती है।
  • यह राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर आम सहमति बनाने में बाधा डालता है।

5. जनता का विश्वास

  • संसद में लगातार व्यवधान और हंगामे से जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास कम हो सकता है।
  • यह संसद की छवि को धूमिल करता है और उसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
संसदीय गतिरोध विधायी कार्य बाधित, जनता के मुद्दों पर चर्चा का अभाव।
प्रश्नकाल का निलंबन सरकार की जवाबदेही में कमी, महत्वपूर्ण प्रश्नों पर जानकारी का अभाव।
बिना चर्चा के विधेयक पारित खराब कानून निर्माण की संभावना, लोकतांत्रिक प्रक्रिया का कमजोर होना।
विपक्ष की मांगों की अनदेखी सरकार और विपक्ष के बीच संवादहीनता, राजनीतिक ध्रुवीकरण में वृद्धि।
सदन की गरिमा में कमी नारेबाजी और तख्तियां दिखाने से संसद की प्रतिष्ठा को नुकसान।
नागरिक समाज पर नियंत्रण FCRA जैसे विधेयकों के माध्यम से गैर-सरकारी संगठनों की स्वायत्तता पर संभावित प्रभाव।

आगे की राह

  • सरकार और विपक्ष के बीच नियमित और सार्थक संवाद स्थापित करने के लिए एक तंत्र विकसित करना।
  • लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति की भूमिका को मजबूत करना ताकि वे सदन में व्यवस्था बनाए रखने में अधिक प्रभावी हो सकें।
  • संसदीय समितियों (Parliamentary Committees) को सशक्त बनाना ताकि विधेयकों पर विस्तृत चर्चा और जांच सुनिश्चित की जा सके।
  • विपक्ष को महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करना और सरकार को उनके सवालों का जवाब देने के लिए प्रोत्साहित करना।
  • संसदीय कार्यवाही के नियमों और प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना, ताकि व्यवधानों को कम किया जा सके।
  • संसद सदस्यों के लिए आचार संहिता (Code of Conduct) को प्रभावी ढंग से लागू करना ताकि सदन की गरिमा बनी रहे।
  • जनता के बीच संसदीय प्रक्रियाओं और उनके महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 75’, ‘note’: ‘मंत्रिपरिषद की सामूहिक जवाबदेही’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 85’, ‘note’: ‘संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 105’, ‘note’: ‘संसद सदस्यों के विशेषाधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 118’, ‘note’: ‘संसद की प्रक्रिया के नियम’}

अवधारणा प्रवाह

संसदीय गतिरोध और व्यवधान  →  प्रश्नकाल और चर्चा का अभाव  →  बिना चर्चा के विधेयकों का पारित होना  →  सरकार की जवाबदेही पर प्रश्न  →  लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण  →  जनता के विश्वास में कमी

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. लोकसभा में प्रश्नकाल (Question Hour) संसदीय कार्यवाही का पहला घंटा होता है।
2. प्रश्नकाल के दौरान, सदस्य मंत्रियों से प्रश्न पूछते हैं और उन्हें मौखिक उत्तर देने होते हैं।
3. प्रश्नकाल के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्नों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है: तारांकित, अतारांकित और अल्प-सूचना प्रश्न।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 और 3 सही हैं। प्रश्नकाल संसदीय कार्यवाही का पहला घंटा होता है, और प्रश्नों को तारांकित, अतारांकित और अल्प-सूचना प्रश्न में वर्गीकृत किया जाता है। कथन 2 गलत है क्योंकि तारांकित प्रश्नों के मौखिक उत्तर दिए जाते हैं, जबकि अतारांकित प्रश्नों के लिखित उत्तर दिए जाते हैं।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ‘सीमांकन’ (Delimitation) को सबसे अच्छी तरह परिभाषित करता है?

  1. यह किसी राज्य के भीतर प्रशासनिक इकाइयों की सीमाओं को फिर से परिभाषित करने की प्रक्रिया है।
  2. यह एक देश के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को निर्धारित करने या फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है।
  3. यह किसी विशेष क्षेत्र में जनसंख्या के घनत्व का आकलन करने की प्रक्रिया है।
  4. यह किसी देश की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को चिह्नित करने की प्रक्रिया है।

उत्तर: यह एक देश के भीतर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को निर्धारित करने या फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है। — सीमांकन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को निर्धारित करने या फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है ताकि जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व में समानता सुनिश्चित की जा सके।

Q3. अभिकथन (A): संसदीय गतिरोध भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।
कारण (R): गतिरोध के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा नहीं हो पाती और विधायी कार्य बाधित होता है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — संसदीय गतिरोध वास्तव में लोकतंत्र के लिए हानिकारक है क्योंकि यह विधायी प्रक्रिया को बाधित करता है और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा को रोकता है, जिससे जवाबदेही प्रभावित होती है। कारण, अभिकथन की सही व्याख्या करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ संसदीय गतिरोध भारतीय लोकतंत्र के समक्ष एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है, जिससे विधायी प्रक्रिया और जवाबदेही प्रभावित होती है। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और संसदीय कार्यवाही को सुचारु बनाने के लिए संभावित उपायों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** संसदीय गतिरोध की संक्षिप्त परिभाषा और भारतीय लोकतंत्र पर इसके निहितार्थों का उल्लेख। (जैसे, विधायी कार्य में बाधा, सार्वजनिक धन की बर्बादी, जवाबदेही में कमी)।
2. **संसदीय गतिरोध के कारण:**
* सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास की कमी।
* विपक्ष द्वारा विरोध प्रदर्शनों को रणनीति के रूप में उपयोग करना।
* महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा का अभाव।
* अध्यक्ष/सभापति की भूमिका और नियमों का पालन न होना।
* राजनीतिक ध्रुवीकरण और आम सहमति की कमी।
3. **लोकतंत्र पर प्रभाव:**
* **विधायी कार्य में बाधा:** विधेयकों का बिना चर्चा के पारित होना (जैसा कि खबर में उल्लेख है)।
* **जवाबदेही में कमी:** प्रश्नकाल और शून्यकाल का बाधित होना।
* **सार्वजनिक धन की बर्बादी:** सत्रों का बाधित होना।
* **लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण:** बहस और विचार-विमर्श की संस्कृति का अभाव।
* **जनता का विश्वास कम होना।**
4. **सुधार के संभावित उपाय:**
* **सर्वदलीय बैठकें:** गतिरोध को तोड़ने के लिए नियमित और प्रभावी संवाद (जैसा कि खबर में किरेन रिजिजू और राहुल गांधी की बैठक का उल्लेख है)।
* **नियमों का प्रभावी प्रवर्तन:** अध्यक्ष/सभापति द्वारा नियमों का निष्पक्ष और दृढ़ता से पालन करवाना।
* **विपक्ष की रचनात्मक भूमिका:** विरोध के साथ-साथ सार्थक बहस में भागीदारी।
* **सरकार की जवाबदेही:** विपक्ष की चिंताओं को सुनना और उन पर प्रतिक्रिया देना।
* **संसदीय समितियों की भूमिका:** विधेयकों को समितियों के पास भेजना ताकि विस्तृत चर्चा हो सके।
* **आचार संहिता:** सांसदों के लिए आचार संहिता का कड़ाई से पालन।
* **नागरिक समाज की भूमिका:** संसदीय कार्यवाही पर नज़र रखना और दबाव बनाना।
5. **निष्कर्ष:** संसदीय गतिरोध को दूर करने के लिए सरकार और विपक्ष दोनों की ओर से सामूहिक इच्छाशक्ति और सहयोग की आवश्यकता पर बल, ताकि भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत किया जा सके।

स्रोत: Times of India


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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