सिम्बेक्स-2026: भारत-सिंगापुर द्विपक्षीय समुद्री अभ्यास का 33वां संस्करण संपन्न

सिम्बेक्स-2026: भारत-सिंगापुर द्विपक्षीय समुद्री अभ्यास का 33वां संस्करण संपन्न

सिम्बेक्स-2026: भारत-सिंगापुर द्विपक्षीय समुद्री अभ्यास का 33वां संस्करण संपन्न

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सिम्बेक्स-2026 प्रक्रिया

✎ सिम्बेक्स भारत-सिंगापुर का 1994 से चल रहा द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास है, जिसका 33वाँ संस्करण 2026 में विशाखापत्तनम में संपन्न हुआ और जो हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा व परिचालन समन्वय को सुदृढ़ करता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत और उसके पड़ोस तथा प्रमुख शक्तियों के साथ द्विपक्षीय सहयोग; हिंद-प्रशांत क्षेत्र)  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (समुद्री सुरक्षा की चुनौतियाँ और सुरक्षा बलों की भूमिका)
  • Prelims: सिम्बेक्स (SIMBEX), आईएनएस नीलगिरि और आईएनएस कमोर्ता जैसे स्वदेशी युद्धपोत, पी-8आई (P-8I) समुद्री गश्ती विमान, एमएच-60आर (MH-60R) बहुउद्देशीय हेलीकॉप्टर, पूर्वी नौसेना कमान (Eastern Naval Command), विशाखापत्तनम, सागर (SAGAR) दृष्टिकोण, यूएनसीएलओएस (UNCLOS), 1982 और अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ), मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca)
  • Essay: बहुपक्षीय ढाँचों के बिना भी द्विपक्षीय सैन्य सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता में कैसे योगदान देता है?, हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा: साझा चुनौतियाँ और सहकारी समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: सिम्बेक्स भारत-सिंगापुर का 1994 से चल रहा द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास है, जिसका 33वाँ संस्करण 2026 में विशाखापत्तनम में संपन्न हुआ और जो हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा व परिचालन समन्वय को सुदृढ़ करता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय नौसेना द्वारा विशाखापत्तनम में आयोजित सिंगापुर-भारत समुद्री द्विपक्षीय अभ्यास ‘सिम्बेक्स-2026’ का 33वाँ संस्करण 26 अक्टूबर, 2026 को संपन्न हुआ। यह अभ्यास दो चरणों में हुआ: बंदरगाह चरण में विषय विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श (एसएमईई), जहाजों के दौरे और खेल स्पर्धाएँ हुईं, जबकि बंगाल की खाड़ी में आयोजित समुद्री चरण में पनडुब्बी-रोधी युद्ध, समुद्री अवरोध अभियान और हवाई व सतह आधारित खतरों से निपटने के अभ्यास किए गए। सिंगापुर की ओर से स्टील्थ फ्रिगेट ‘आरएसएस सुप्रीम’ और भारत की ओर से स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट ‘आईएनएस नीलगिरि’ तथा कॉर्वेट ‘आईएनएस कमोर्ता’ ने भाग लिया। समापन के दौरान सिंगापुर नौसेना के फ्लीट कमांडर और भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग के बीच समुद्री सहयोग पर चर्चा भी हुई।

पृष्ठभूमि

  • भारत और सिंगापुर के बीच नौसैनिक सहयोग का सिलसिला 1994 में आरंभ हुए सिम्बेक्स से जुड़ा है, जो दोनों देशों के बीच सबसे पुराने और नियमित द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यासों में गिना जाता है।
  • वर्ष 2015 में भारत और सिंगापुर ने अपनी संबंधों को ‘व्यापक सामरिक भागीदारी’ (Comprehensive Strategic Partnership) के स्तर तक उन्नत किया, जिसमें रक्षा और सुरक्षा सहयोग एक प्रमुख स्तंभ है।
  • भारत ने 2015 में ‘सागर’ (SAGAR: Security and Growth for All in the Region) का दृष्टिकोण रखा, जिसमें हिंद महासागर क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास पर बल दिया गया है।
  • सिंगापुर दक्षिण-पूर्व एशिया में ASEAN का सदस्य है और मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित होने के कारण वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा में उसकी विशेष रुचि है।
  • भारत में हिंद महासागर क्षेत्र की समुद्री जागरूकता बढ़ाने के लिए सूचना समेकन केंद्र (IFC-IOR) कार्यरत है, जिसमें सिंगापुर सहित कई मित्र देशों के संपर्क अधिकारी सहयोग करते हैं।

सिम्बेक्स (SIMBEX) क्या है?

  • सिम्बेक्स भारतीय नौसेना और सिंगापुर गणराज्य की नौसेना के बीच आयोजित होने वाला द्विपक्षीय समुद्री अभ्यास है, जिसका उद्देश्य परिचालन समन्वय और आपसी विश्वास को बढ़ाना है।
  • इसका आयोजन बारी-बारी से दोनों देशों में होता है; 33वाँ संस्करण विशाखापत्तनम में हुआ, जहाँ भारतीय नौसेना की पूर्वी नौसेना कमान स्थित है।
  • अभ्यास के दो चरण होते हैं: बंदरगाह चरण, जिसमें पेशेवर संवाद और खेल-कूद होते हैं, और समुद्री चरण, जिसमें वास्तविक परिचालन अभ्यास किए जाते हैं।
  • पनडुब्बी-रोधी युद्ध (ASW) समुद्री चरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि पनडुब्बियों का पता लगाना और उन्हें निष्प्रभावी करना आधुनिक नौसैनिक क्षमता का केंद्रीय तत्व है।
  • पी-8आई और डोर्नियर जैसे समुद्री गश्ती विमान तथा एमएच-60आर हेलीकॉप्टर समुद्री निगरानी और खोज-बचाव में सहायक होते हैं।
  • यूएनसीएलओएस, 1982 (UNCLOS) के अंतर्गत तटीय राज्यों को अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में संसाधनों पर अधिकार प्राप्त हैं, जिनकी सुरक्षा के लिए ऐसे अभ्यास उपयोगी माने जाते हैं।
  • सिम्बेक्स जैसे अभ्यास किसी तीसरे देश के विरुद्ध नहीं होते, बल्कि साझा समुद्री सुरक्षा और मुक्त नौवहन के सिद्धांत को व्यवहार में लाने का माध्यम होते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
अभ्यास का स्वरूप सिंगापुर-भारत समुद्री द्विपक्षीय अभ्यास (Singapore-India Maritime Bilateral Exercise) सिम्बेक्स-2026 का यह 33वां संस्करण है। यह दोनों नौसेनाओं के बीच नियमित द्विपक्षीय प्रशिक्षण का प्रमुख मंच है।
आयोजन स्थल और अवधि यह विशाखापत्तनम में आयोजित हुआ और 26 अक्टूबर 2026 को संपन्न हुआ। आयोजन दो चरणों में हुआ: बंदरगाह चरण और बंगाल की खाड़ी में समुद्री चरण।
बंदरगाह चरण की गतिविधियां विषय विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श (SMEE), एक-दूसरे के जहाजों का दौरा, पेशेवर वार्ता, खेल स्पर्धाएं और योजना-निर्माण संबंधी कार्यक्रम हुए। इनसे परिचालन-जानकारी साझा करने और आपसी समझ बढ़ाने में मदद मिली।
समुद्री चरण के अभ्यास समुद्री अवरोध अभियान, पनडुब्बी-रोधी युद्ध (Anti-Submarine Warfare – ASW), हवाई और सतही खतरों से निपटने के अभ्यास, समुद्री कौशल गतिविधियां और एक-दूसरे के जहाजों से विमान संचालन शामिल रहे। इनसे संयुक्त परिचालन क्षमता को बल मिला।
भागीदार नौसैनिक परिसंपत्तियां सिंगापुर की ओर से ‘फॉर्मिडेबल’ श्रेणी का स्टील्थ फ्रिगेट ‘आरएसएस सुप्रीम’ और एसएच-70बी हेलीकॉप्टर शामिल हुए। भारत की ओर से स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट ‘आईएनएस नीलगिरि’, ASW कार्वेट ‘आईएनएस कमोर्ता’, पी-8आई और डोर्नियर गश्ती विमान, हॉक उन्नत जेट प्रशिक्षक तथा एमएच-60आर हेलीकॉप्टर भाग लेने वाले थे।
संस्थागत संवाद दोनों पक्षों के बीच फ्लीट कमांडर और पूर्वी बेड़े के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग के स्तर पर बैठक हुई, जिसमें समुद्री सहयोग और आपसी हित के मुद्दों पर विचार हुआ।

महत्व

सामरिक महत्व

  • भारत-सिंगापुर सामरिक साझेदारी (Comprehensive Strategic Partnership) की व्यावहारिक अभिव्यक्ति के रूप में यह अभ्यास रक्षा सहयोग को ठोस रूप देता है।
  • हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रति दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता इससे दृढ़ होती है।
  • पनडुब्बी-रोधी युद्ध और समुद्री अवरोध जैसे अभ्यास बहुपक्षीय समुद्री संचालन में अंतरसंचालनीयता (Interoperability) की तैयारी को मजबूत करते हैं।

भौगोलिक और समुद्री संचार मार्ग से जुड़ा महत्व

  • मलक्का जलडमरूमध्य भारत और पूर्वी एशिया के बीच व्यापार का अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है, और सिंगापुर इसके समीप स्थित है।
  • समुद्री संचार मार्ग (Sea Lines of Communication – SLOC) की सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता, जो संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि संधि (UNCLOS), 1982 के ढांचे में आती है, इस सहयोग का मूल आधार है।
  • बंगाल की खाड़ी में समुद्री चरण का आयोजन भारत की अपनी समुद्री सीमा और उसके निकटवर्ती जल क्षेत्र में परिचालन क्षमता के प्रदर्शन को दर्शाता है।

आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता से संबंध

  • ‘आईएनएस नीलगिरि’ जैसे स्वदेशी जहाजों की भागीदारी भारत के रक्षा उत्पादन और स्वदेशीकरण के लक्ष्य को परिचालन स्तर पर प्रदर्शित करती है।
  • स्वदेशी प्लेटफॉर्म का विदेशी नौसेना के साथ संयुक्त अभ्यास में उतरना क्षमता-निर्माण और विश्वसनीयता के संकेत के रूप में देखा जा सकता है।

क्षेत्रीय कूटनीति से संबंध

  • ‘सागर’ (SAGAR – Security and Growth for All in the Region) की नीति के अंतर्गत क्षेत्रीय सुरक्षा और आपसी विश्वास को बढ़ाने वाली गतिविधियों को यह अभ्यास सहारा देता है।
  • आसियान (ASEAN) देशों के साथ भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के समुद्री आयाम को यह अभ्यास व्यावहारिक आधार प्रदान करता है।

चुनौतियाँ

1. अंतरसंचालनीयता और मानकीकरण की सीमाएं

  • विभिन्न नौसेनाओं के संचार प्रोटोकॉल, डेटा-लिंक और प्रणालियां अलग-अलग मानकों पर होती हैं, जिससे वास्तविक समय में समन्वय कठिन हो सकता है।
  • अभ्यास के बाद भी साझा परिचालन प्रक्रियाओं को स्थायी रूप से अपनाने के लिए निरंतर तकनीकी और प्रशिक्षण समन्वय आवश्यक है।

2. हिंद महासागर में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा

  • हिंद महासागर क्षेत्र में विभिन्न शक्तियों की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति से शक्ति-संतुलन की जटिलता बढ़ी है।
  • ऐसी परिस्थितियों में विश्वास-निर्माण के उपाय और पारदर्शी संवाद का महत्व बढ़ जाता है।

3. गैर-राज्य तत्वों और समुद्री अपराधों का खतरा

  • समुद्री डकैती, तस्करी, अवैध मछली पकड़ना और मानव तस्करी जैसी गैर-पारंपरिक चुनौतियां पारंपरिक सैन्य अभ्यास से आगे की तैयारी मांगती हैं।
  • सूचना साझेदारी और समुद्री डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness) इन खतरों से निपटने में निर्णायक हैं।

4. संवेदनशील सूचना और विश्वास की सीमा

  • परिचालन जानकारी साझा करने में गोपनीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित संतुलित करने होते हैं, जिससे सहयोग की गहराई सीमित हो सकती है।
  • बंदरगाह और समुद्री चरणों की गतिविधियां प्रायः प्रतीकात्मक और प्रशिक्षण-आधारित होती हैं, वास्तविक संकट में समन्वय का परीक्षण अलग परिस्थिति में होता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
तकनीकी अंतरसंचालनीयता अलग-अलग मानक और प्रणालियां वास्तविक परिचालन में समन्वय को धीमा कर सकती हैं।
समुद्री संचार मार्गों की सुरक्षा मलक्का जैसे संकरे मार्गों पर किसी भी व्यवधान का वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
गैर-पारंपरिक समुद्री खतरे समुद्री डकैती, तस्करी और अवैध गतिविधियां पारंपरिक नौसैनिक क्षमता से परे नीतिगत और खुफिया समन्वय मांगती हैं।
क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों से तनाव प्रबंधन और संवाद तंत्र की आवश्यकता बढ़ती है।
सूचना साझेदारी की सीमाएं संवेदनशील डेटा साझा करने में राष्ट्रीय सुरक्षा और गोपनीयता के बीच संतुलन बनाना कठिन है।

आगे की राह

  • अभ्यास के बाद सीखे गए परिचालन सबक को संस्थागत रूप से दस्तावेज़ीकृत कर भविष्य के प्रशिक्षण चक्रों में शामिल किया जाए।
  • सूचना साझेदारी के लिए सुरक्षित और मानकीकृत डेटा-लिंक को विकसित कर अंतरसंचालनीयता को व्यवस्थित रूप दिया जाए।
  • समुद्री डोमेन जागरूकता बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय सूचना संलयन केंद्रों के साथ नियमित समन्वय सुदृढ़ किया जाए।
  • गैर-पारंपरिक समुद्री खतरों, जैसे समुद्री डकैती और तस्करी, पर संयुक्त प्रशिक्षण और संयुक्त अभ्यास को अभ्यास-सूची में स्थान दिया जाए।
  • आसियान और हिंद महासागर रिम संगठन जैसे बहुपक्षीय मंचों के साथ द्विपक्षीय अभ्यासों का समन्वय बढ़ाया जाए, ताकि क्षेत्रीय सहयोग का ढांचा व्यापक हो।
  • स्वदेशी जहाजों और विमानों की भागीदारी को बढ़ाकर रक्षा उत्पादन और परिचालन विश्वसनीयता के बीच संबंध को और स्पष्ट किया जाए।
  • बंदरगाह चरण के पेशेवर संवाद और विषय विशेषज्ञ विचार-विमर्श को निरंतर बनाकर नीतिगत समझ को गहरा किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

समुद्री सुरक्षा · द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास · समुद्री कूटनीति · नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) · संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन (UNCLOS), 1982 · हिंद महासागर क्षेत्र · सागर (SAGAR) दृष्टिकोण · भारत-आसियान समुद्री सहयोग · पनडुब्बी-रोधी युद्ध (ASW) · सामुद्रिक डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness) · सूचना संलयन केंद्र-हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) · क्षेत्रीय स्थिरता

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 53: सशस्त्र बलों का सर्वोच्च कमान राष्ट्रपति के पास
  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची की प्रविष्टि 1: भारत की रक्षा (संघ का विषय)

अवधारणा प्रवाह

भारत और सिंगापुर के बीच सामरिक साझेदारी और क्षेत्रीय सुरक्षा के साझा हित  →  दोनों नौसेनाओं द्वारा विशाखापत्तनम में बंदरगाह चरण का आयोजन (विशेषज्ञ विचार-विमर्श, जहाज-दौरे और खेल)  →  बंगाल की खाड़ी में समुद्री चरण: समुद्री अवरोध, ASW और हवाई-सतही खतरों के अभ्यास  →  स्वदेशी और विदेशी प्लेटफॉर्म (फ्रिगेट, कार्वेट, पी-8आई, एमएच-60आर) के बीच परिचालन समन्वय का सत्यापन  →  परिचालन क्षमता और अंतरसंचालनीयता में वृद्धि, जिससे पारस्परिक विश्वास और सूचना-साझेदारी मजबूत होती है  →  हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए दीर्घकालिक द्विपक्षीय संबंधों का सुदृढ़ीकरण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन, 1982 के अनुसार, प्रादेशिक सागर आधार रेखा से अधिकतम 12 समुद्री मील तक विस्तृत होता है।
2. सन्निहित क्षेत्र (Contiguous Zone) आधार रेखा से अधिकतम 24 समुद्री मील तक विस्तृत होता है।
3. अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में तटवर्ती राज्य को प्रादेशिक सागर के समान पूर्ण संप्रभुता प्राप्त होती है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: प्रादेशिक सागर की अधिकतम चौड़ाई 12 समुद्री मील है। कथन 2 सही है: सन्निहित क्षेत्र 24 समुद्री मील तक होता है। कथन 3 गलत है: EEZ में तटवर्ती राज्य को केवल संसाधनों के अन्वेषण, दोहन और संरक्षण से जुड़े संप्रभु अधिकार प्राप्त होते हैं, पूर्ण संप्रभुता नहीं; वहां अन्य राज्यों को नौवहन और उड़ान की स्वतंत्रता रहती है। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।

Q2. निम्नलिखित में से प्रत्येक में एक कथन (A) और एक तर्क (R) दिया गया है।

कथन (A): मलक्का जलडमरूमध्य विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है।
तर्क (R): यह मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है।

नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए।

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, किंतु R गलत है।
  4. A गलत है, किंतु R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर और प्रशांत महासागर (दक्षिण चीन सागर के माध्यम से) को जोड़ने वाला प्रमुख चोकपॉइंट है। इसके व्यस्त होने का मुख्य कारण यही भौगोलिक संयोजन है, इसलिए R, A की सही व्याख्या है। सिंगापुर इसके दक्षिणी छोर के समीप स्थित है, जिससे इसकी सामरिक प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलन (Match) कीजिए:

सूची-I (मंच / अभ्यास)
1. हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी (IONS)
2. सागर (SAGAR) दृष्टिकोण
3. मिलन (MILAN) अभ्यास
4. मालाबार अभ्यास

सूची-II (विवरण)
A. भारत की पहल से 2008 में आरंभ हुआ, हिंद महासागर के तटवर्ती देशों की नौसेनाओं का मंच
B. 2015 में घोषित, क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास की नीति
C. विशाखापत्तनम में आयोजित होने वाला द्विवार्षिक बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास
D. अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की नौसेनाओं की भागीदारी वाला अभ्यास

सही सुमेलन चुनिए:

  1. 1-A, 2-B, 3-C, 4-D
  2. 1-B, 2-A, 3-D, 4-C
  3. 1-C, 2-D, 3-A, 4-B
  4. 1-A, 2-C, 3-B, 4-D

उत्तर: 1-A, 2-B, 3-C, 4-D — IONS की पहल भारत ने 2008 में की थी, अतः 1-A। SAGAR का विचार 2015 में प्रस्तुत हुआ, अतः 2-B। MILAN विशाखापत्तनम में आयोजित होने वाला बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास है और यह द्विवार्षिक रूप से होता है, अतः 3-C। मालाबार में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया सहित अन्य सहभागी होते हैं, अतः 4-D।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ हिंद महासागर क्षेत्र में द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यासों को समुद्री कूटनीति के प्रभावी साधन के रूप में देखा जाने लगा है। इस कथन की समीक्षा कीजिए। साथ ही यह भी स्पष्ट कीजिए कि ऐसे अभ्यास संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन (UNCLOS), 1982 में निहित नौवहन की स्वतंत्रता के सिद्धांत के साथ किस प्रकार संगत हैं और इनकी सीमाएं क्या हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा:
1. भूमिका: सिम्बेक्स-2026 (33वां संस्करण, विशाखापत्तनम, 2026) का उल्लेख करें। इसमें बंदरगाह चरण (एसएमईई, जहाज-दौरा, खेल, योजना) और बंगाल की खाड़ी में समुद्री चरण (समुद्री अवरोध, पनडुब्बी-रोधी युद्ध (ASW), हवाई व सतह खतरों से निपटने के अभ्यास, जहाजों से विमान संचालन) का संक्षिप्त विवरण दें। भागीदारी में आईएनएस नीलगिरि (स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट), आईएनएस कमोर्ता (ASW कार्वेट), पी-8आई, डोर्नियर, एमएच-60आर और सिंगापुर का आरएसएस सुप्रीम (फॉर्मिडेबल श्रेणी) का उल्लेख करें।
2. विधिक ढांचा: UNCLOS, 1982 के अनुच्छेद 17 (प्रादेशिक सागर में निर्दोष मार्ग), अनुच्छेद 58 (EEZ में अन्य राज्यों के अधिकार) और अनुच्छेद 87 (खुले समुद्र की स्वतंत्रता) स्पष्ट करें। भारत का घरेलू विधान समुद्री क्षेत्र अधिनियम, 1976 (Territorial Waters, Continental Shelf, Exclusive Economic Zone and other Maritime Zones Act, 1976) भी उल्लेखनीय है।
3. समर्थन के तर्क: (क) अंतरसंचालनीयता (Interoperability) और परिचालन समन्वय में वृद्धि; (ख) विश्वास-निर्माण के उपाय (CBMs); (ग) समुद्री डकैती, अवैध मत्स्यन और तस्करी से निपटने में सूचना साझाकरण; (घ) सिंगापुर जैसे आसियान सदस्य के साथ सामरिक साझेदारी (2015 की व्यापक सामरिक भागीदारी) को गहराई देना; (ङ) सागर दृष्टिकोण और सामुद्रिक डोमेन जागरूकता (MDA) का व्यावहारिक क्रियान्वयन; सूचना संलयन केंद्र-हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR, गुरुग्राम) की भूमिका।
4. विमर्श के विभिन्न पक्ष: (क) कुछ विश्लेषक ऐसे अभ्यासों को शक्ति-संतुलन और निवारण (Deterrence) की दृष्टि से देखते हैं; (ख) दूसरी ओर इन्हें पारदर्शिता, समुद्री विश्वास और बहुपक्षीय सहयोग का साधन माना जाता है; (ग) तटवर्ती राज्यों की संप्रभुता और EEZ की विधिक सीमाओं का सम्मान आवश्यक है।
5. सीमाएं: द्विपक्षीय अभ्यासों का सीमित दायरा; आलोचना का विषय बनने वाली ‘सैन्यीकरण’ की धारणा; विधिक दृष्टि से EEZ में सैन्य गतिविधियों पर भिन्न व्याख्याएं (भारत और कुछ अन्य राज्यों के दृष्टिकोण में अंतर); तटवर्ती राज्यों की सहमति का महत्व।
6. निष्कर्ष: समुद्री कूटनीति के रूप में ये अभ्यास तभी प्रभावी हैं जब वे UNCLOS की विधिक मर्यादा, पारदर्शिता और बहुपक्षीय मंचों (IONS, MILAN, सागर दृष्टिकोण) के साथ सुसंगत हों। संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण से ही ‘सभी के लिए सुरक्षा और विकास’ का उद्देश्य पूरा होता है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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