सीआरसी जम्मू के स्थायी परिसर से दिव्यांगजनों को मिलेगी नई शक्ति

सीआरसी जम्मू के स्थायी परिसर से दिव्यांगजनों को मिलेगी नई शक्ति

सीआरसी जम्मू के स्थायी परिसर से दिव्यांगजनों को मिलेगी नई शक्ति

सीआरसी निर्माण प्रक्रियानिर्माण शुरू24 करोड़ लागतसेवाओं का विस्तारफिजियोथेरेपी आदिसमय पर पूरामंत्री ने बल दिया
सीआरसी निर्माण प्रक्रिया

✎ दिव्यांगजनों के पुनर्वास को संवैधानिक (अनुच्छेद 41), अंतरराष्ट्रीय (UNCRPD, अनुच्छेद 26) और वैधानिक (दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016) आधार प्राप्त है, और समेकित क्षेत्रीय केंद्र इन दायित्वों को क्षेत्रीय स्तर पर सेवा-वितरण में…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, संविधान, सामाजिक न्याय (सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, दिव्यांगजनों के लिए योजनाएं, RPwD अधिनियम 2016)  |  GS Paper II — सामाजिक क्षेत्र (दिव्यांगजनों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास सेवाएं)  |  GS Paper II — सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप (सरकारी योजनाएं, उनके क्रियान्वयन में चुनौतियां)
  • Prelims: समेकित क्षेत्रीय केंद्र (Composite Regional Centre — CRC), दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016), भारतीय पुनर्वास परिषद (Rehabilitation Council of India — RCI), RCI अधिनियम, 1992, सहायता योजना: दिव्यांगजनों हेतु सहायक उपकरणों की खरीद एवं फिटिंग (ADIP), राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 (National Trust Act, 1999), अनुच्छेद 41 (राज्य नीति का निदेशक सिद्धांत), दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCRPD) और इसका अनुच्छेद 26 (habilitation and rehabilitation), दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग (Department of Empowerment of Persons with Disabilities — DEPwD)
  • Essay: समावेशी समाज का निर्माण: दिव्यांगजनों के लिए पुनर्वास से सशक्तीकरण तक का सफर, अवसंरचना की समयबद्ध पूर्णता और सेवा वितरण: सार्वजनिक संस्थाओं के सामने चुनौतियां

त्वरित पुनरावृत्ति: दिव्यांगजनों के पुनर्वास को संवैधानिक (अनुच्छेद 41), अंतरराष्ट्रीय (UNCRPD, अनुच्छेद 26) और वैधानिक (दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016) आधार प्राप्त है, और समेकित क्षेत्रीय केंद्र इन दायित्वों को क्षेत्रीय स्तर पर सेवा-वितरण में बदलने का संस्थागत माध्यम है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले के विजयपुर क्षेत्र स्थित चक ज्वाला गांव में समेकित क्षेत्रीय केंद्र (सीआरसी), जम्मू के स्थायी परिसर के निर्माण कार्य का दौरा किया और उसकी प्रगति की समीक्षा की। लगभग 24 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा यह परिसर अभी तक जम्मू शहर में सीमित स्तर पर चल रहे केंद्र की सेवाओं को विस्तार देगा। इसमें फिजियोथेरेपी, विशेष शिक्षा, शुरुआती हस्तक्षेप, कौशल विकास, अभिभावकों और देखभालकर्ताओं के प्रशिक्षण तथा कृत्रिम अंगों और सहायक उपकरणों के निर्माण व फिटिंग के लिए प्रयोगशालाओं की योजना है। मंत्री ने निर्माण कार्य को समय पर पूरा करने और शेष कार्यों में तेजी लाने पर बल दिया। समाचार का महत्व इस बात में है कि यह केंद्र सरकार की संस्थागत पुनर्वास व्यवस्था के क्षेत्रीय विस्तार का एक ठोस उदाहरण है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में दिव्यांगजनों से जुड़ी नीति का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 41 में है, जो राज्य को बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और निःशक्तता की स्थिति में लोक सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश देता है। यह अनुच्छेद न्यायोचित नहीं है, परंतु नीति-निर्माण के लिए मार्गदर्शक है।
  • भारत ने वर्ष 2007 में दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCRPD) की पुष्टि की। इसका अनुच्छेद 26 राज्यों से अपेक्षा करता है कि वे दिव्यांगजनों के लिए प्रभावी habilitation और rehabilitation सेवाएं उपलब्ध कराएं।
  • दिव्यांगजनों के अधिकार अधिनियम, 2016 ने पूर्ववर्ती निःशक्तजन अधिनियम, 1995 का स्थान लिया। इसमें दिव्यांगता की परिभाषा का विस्तार किया गया और सरकारों पर पुनर्वास सेवाओं, सुलभता और शिक्षा के संबंध में बाध्यताएं डाली गईं।
  • पुनर्वास और विशेषज्ञ प्रशिक्षण की गुणवत्ता नियंत्रित करने के लिए भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) की स्थापना RCI अधिनियम, 1992 के तहत हुई थी। इसी के तहत दिव्यांगता से संबंधित बीएड और एमएड जैसे पाठ्यक्रमों को मान्यता दी जाती है।
  • दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है। विभाग की योजनाओं के माध्यम से सहायक उपकरणों, पुनर्वास सेवाओं और क्षेत्रीय केंद्रों के जरिए सेवाएं पहुंचाई जाती हैं।

समेकित क्षेत्रीय केंद्र (CRC) क्या है?

  • समेकित क्षेत्रीय केंद्र (CRC) दिव्यांगजनों के लिए बहु-सेवा आधारित पुनर्वास संस्थान है, जो एक ही परिसर में चिकित्सीय, शैक्षिक और कौशल विकास संबंधी सेवाएं देने का प्रयास करता है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य भौगोलिक दृष्टि से क्षेत्र विशेष में पुनर्वास सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना और दिव्यांगजनों को उनके निवास के नजदीक सहायता देना है।
  • ऐसे केंद्रों पर सामान्यतः फिजियोथेरेपी, शुरुआती हस्तक्षेप (early intervention), विशेष शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और माता-पिता व देखभालकर्ताओं के प्रशिक्षण जैसी सेवाएं शामिल होती हैं।
  • सहायक उपकरणों के निर्माण, माप और फिटिंग के लिए प्रयोगशालाएं केंद्र की क्षमता को बढ़ाती हैं, जिससे कृत्रिम अंगों और उपकरणों की गुणवत्ता तथा उपलब्धता सुधरती है।
  • संस्थागत क्षमता का अर्थ है योग्य कर्मचारियों, स्थायी भवन, उपकरणों और सेवा-प्रक्रियाओं का सुदृढ़ होना, जिससे सेवाएं अस्थायी व्यवस्था पर निर्भर न रहें।
  • भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) द्वारा मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रमों के माध्यम से ऐसे केंद्र प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने में भी भूमिका निभा सकते हैं।
  • परियोजना की सफलता के लिए निर्माण की समयबद्धता, बुनियादी सुविधाओं और केंद्र के शीघ्र परिचालन को सुनिश्चित करना आवश्यक होता है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
समेकित क्षेत्रीय केंद्र (Composite Regional Centre) — सीआरसी जम्मू दिव्यांगजनों के पुनर्वास, कौशल विकास और सशक्तीकरण से जुड़ी सेवाओं का क्षेत्रीय स्तर पर एकीकृत केंद्र। वर्तमान में जम्मू शहर में सीमित स्तर पर कार्यरत है।
स्थान: चक ज्वाला गांव, विजयपुर, सांबा जिला, जम्मू संभाग जम्मू-कश्मीर के जम्मू संभाग में स्थायी परिसर बनने से क्षेत्र के दिव्यांगजनों को सेवाएं उनके नजदीक मिल सकेंगी।
लागत और स्वरूप: लगभग 24 करोड़ रुपये का स्थायी परिसर सीआरसी को अस्थायी व्यवस्था से निकालकर स्थायी भौतिक ढांचा देना संस्थागत क्षमता और सेवा की निरंतरता के लिए आवश्यक है।
प्रस्तावित सेवाएं: भौतिक चिकित्सा (Physiotherapy), विशेष प्रशिक्षण और शुरुआती हस्तक्षेप (Early Intervention) दिव्यांग बच्चों की शीघ्र पहचान और उपचार से उनकी आत्मनिर्भरता की संभावना बढ़ती है, और यह परिवार पर आश्रितता का बोझ भी घटाता है।
कृत्रिम अंग और सहायक उपकरणों की माप, निर्माण व फिटिंग की प्रयोगशालाएं स्थानीय स्तर पर सहायक उपकरण उपलब्ध होने से दिव्यांगजनों की रोजमर्रा की गतिशीलता और कार्यक्षमता बढ़ेगी।
बीएड और एमएड स्तर के दिव्यांगता संबंधी पाठ्यक्रम का प्रस्ताव प्रशिक्षित विशेष शिक्षकों और पुनर्वास पेशेवरों की उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे क्षेत्र में मानव संसाधन की कमी दूर करने में मदद मिलेगी।

महत्व

सामाजिक

  • दिव्यांगजनों को उनके निवास क्षेत्र के नजदीक पुनर्वास और सहायता सेवाएं मिलने से उनकी सम्मानजनक जीवन-शैली सुनिश्चित होती है।
  • दिव्यांग बच्चों के माता-पिता और देखभाल करने वालों के प्रशिक्षण से परिवार स्तर पर देखभाल की क्षमता बढ़ती है।
  • बच्चों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक सभी आयु-वर्गों को सेवाएं मिलने से जीवन-चक्र आधारित (Life-cycle) सहायता का ढांचा बनता है।

आर्थिक

  • कौशल विकास और सहायक उपकरणों की उपलब्धता से दिव्यांगजनों की श्रम-बाजार में भागीदारी की संभावना बढ़ती है।
  • पुनर्वास क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर बनते हैं, जिससे मानव पूंजी का विकास होता है।

प्रशासनिक और संस्थागत

  • स्थायी परिसर से सीआरसी जम्मू की संस्थागत क्षमता मजबूत होगी और सेवाओं का दायरा व्यापक होगा।
  • केंद्र सरकार के मंत्रालय द्वारा परियोजना की समीक्षा से निर्माण कार्य की निगरानी और समय-सीमा पर दबाव बनाने का तंत्र सक्रिय होता है।

समावेशी नीति

  • दिव्यांगजनों का सशक्तीकरण ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य से जुड़ा बताया गया है।
  • क्षेत्रीय असंतुलन घटाने की दृष्टि से जम्मू संभाग में पुनर्वास ढांचे का विस्तार समावेशी विकास की दिशा में कदम है।

चुनौतियाँ

1. निर्माण कार्य में विलंब का जोखिम

  • स्थायी परिसर को समय पर पूरा करना और चालू करना मंत्रालय की प्राथमिकता के रूप में रेखांकित किया गया है, पर शेष कार्यों की गति एक चुनौती है।
  • आवश्यक बुनियादी सुविधाओं (जैसे बिजली, जल, पहुंच मार्ग) का समय पर उपलब्ध होना परिसर के संचालन की शर्त है।
  • विलंब से लागत बढ़ने और सेवाओं के शुरू होने में देरी का खतरा रहता है।

2. विशेषज्ञ मानव संसाधन की कमी

  • कृत्रिम अंग, भौतिक चिकित्सा और विशेष शिक्षा के लिए प्रशिक्षित पेशेवरों की उपलब्धता सीमित है।
  • बीएड और एमएड स्तर के दिव्यांगता पाठ्यक्रमों की शुरुआत इस कमी को दूर करने का प्रयास है, पर पाठ्यक्रम की मान्यता और गुणवत्ता का प्रश्न रहेगा।
  • पाठ्यक्रम की मान्यता के लिए भारतीय पुनर्वास परिषद (Rehabilitation Council of India) जैसे वैधानिक निकाय के मानदंडों का पालन आवश्यक है।

3. सेवाओं की भौगोलिक पहुंच

  • फिलहाल केंद्र जम्मू शहर में सीमित स्तर पर कार्यरत है, जबकि क्षेत्र के ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों के दिव्यांगजनों तक पहुंच कठिन है।
  • परिवहन, आवागमन और सूचना के अभाव में दूर-दराज के परिवार सेवाओं का लाभ नहीं ले पाते।
  • सेवाओं के विस्तार के साथ सामुदायिक आधारित पहचान (Outreach) की व्यवस्था भी जरूरी है।

4. प्रयोगशालाओं का परिचालन और रखरखाव

  • कृत्रिम अंगों और सहायक उपकरणों की माप, निर्माण और फिटिंग के लिए उच्च-गुणवत्ता के उपकरण और तकनीकी कर्मी चाहिए।
  • लाभार्थी की व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार उपकरण बनाना तकनीकी रूप से जटिल है, और इसके लिए निरंतर परिचालन निधि आवश्यक है।
  • भवन निर्माण के साथ परिचालन-व्यय की योजना न बने तो ढांचा सक्रिय होने के बाद भी सेवाएं सीमित रह सकती हैं।

5. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम का व्यावहारिक क्रियान्वयन

  • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) पुनर्वास और सेवाओं को अधिकार के रूप में मान्यता देता है।
  • अधिनियम के प्रावधानों को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए राज्य और केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के बीच समन्वय आवश्यक है।
  • सेवाओं की गुणवत्ता, जागरूकता और लाभार्थियों की पहचान में अंतर अधिनियम की भावना के क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
निर्माण में देरी शेष कार्यों की गति और बुनियादी सुविधाओं की समय पर उपलब्धता से सेवाओं की शुरुआत टल सकती है।
प्रशिक्षित मानव संसाधन कृत्रिम अंग, भौतिक चिकित्सा और विशेष शिक्षा के विशेषज्ञों की कमी सेवा की गुणवत्ता को सीमित कर सकती है।
भौगोलिक पहुंच जम्मू शहर के बाहर के दिव्यांगजनों तक सेवाएं पहुंचना कठिन है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
परिचालन निधि भवन बनने के बाद प्रयोगशालाओं और प्रशिक्षण के संचालन के लिए निरंतर वित्तीय व्यवस्था आवश्यक है।
पाठ्यक्रम की मान्यता नए बीएड और एमएड पाठ्यक्रमों की गुणवत्ता और मान्यता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
अधिकार-आधारित क्रियान्वयन अधिनियम के प्रावधानों और लाभार्थियों की वास्तविक पहुंच के बीच अंतर बने रहने का खतरा है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रधानमंत्री दिव्याशा केंद्र (PM DIVYASHA Kendra)
  • दिव्यांगजनों को सहायक उपकरण उपलब्ध कराने की योजना (Assistance to Disabled Persons for Purchase/Fitting of Aids and Appliances — ADIP)

आगे की राह

  • निर्माण कार्य की समय-सीमा तय कर उसकी नियमित समीक्षा हो, और बुनियादी सुविधाओं (बिजली, जल, पहुंच मार्ग) के कार्य को समानांतर रूप से पूरा किया जाए।
  • परिसर चालू होने से पहले परिचालन-व्यय और मानव संसाधन की योजना बनाई जाए, ताकि भवन के साथ सेवाएं भी तुरंत शुरू हो सकें।
  • भारतीय पुनर्वास परिषद के मानदंडों के अनुरूप बीएड और एमएड पाठ्यक्रमों को समय पर मान्यता दिलाई जाए।
  • कृत्रिम अंग और सहायक उपकरणों की प्रयोगशालाओं में मानकीकृत प्रक्रिया और गुणवत्ता-जांच की व्यवस्था बनाई जाए।
  • जम्मू संभाग के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में शिविर आधारित पहचान और सामुदायिक आउटरीच के माध्यम से सेवाओं की पहुंच बढ़ाई जाए।
  • दिव्यांग बच्चों के माता-पिता और देखभाल करने वालों के प्रशिक्षण को नियमित कार्यक्रम का रूप दिया जाए।
  • सेवाओं के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए लाभार्थियों की संख्या, सेवा-गुणवत्ता और परिणाम-संकेतकों का नियमित डेटा संग्रह किया जाए।
  • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के अनुरूप राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर समन्वय तंत्र को सक्रिय रखा जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

समेकित क्षेत्रीय केंद्र (Composite Regional Centre) – CRC · दिव्यांगजन सशक्तीकरण · पुनर्वास (Rehabilitation) · RPwD अधिनियम, 2016 · अनुच्छेद 41 और राज्य के नीति निदेशक तत्व · सहायक उपकरण और कृत्रिम अंग · प्रारंभिक हस्तक्षेप (Early Intervention) · समावेशी शिक्षा · सुगम्यता (Accessibility) · सामुदायिक आधारित पुनर्वास (Community-Based Rehabilitation) · संघवाद और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 9 · UNCRPD और समावेशी विकास

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 41: दिव्यांगता में सार्वजनिक सहायता का दायित्व (DPSP)
  • अनुच्छेद 45: बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (DPSP)

अवधारणा प्रवाह

जम्मू क्षेत्र में दिव्यांगजनों के लिए व्यापक पुनर्वास केंद्र की लंबे समय से महसूस की जा रही आवश्यकता  →  समेकित क्षेत्रीय केंद्र (सीआरसी) जम्मू के लिए सांबा जिले में लगभग 24 करोड़ रुपये की लागत से स्थायी परिसर का निर्माण  →  केंद्रीय मंत्री द्वारा निर्माण कार्य की समीक्षा और समय पर पूरा करने तथा बुनियादी सुविधाओं पर बल  →  स्थायी परिसर में भौतिक चिकित्सा, विशेष प्रशिक्षण, शुरुआती हस्तक्षेप और कृत्रिम अंग व सहायक उपकरणों की प्रयोगशालाओं की स्थापना  →  परिवारों और देखभाल करने वालों का प्रशिक्षण, बीएड और एमएड पाठ्यक्रमों का प्रस्ताव तथा प्रशिक्षित मानव संसाधन का विकास  →  दिव्यांगजनों की आत्मनिर्भरता, कौशल विकास और सम्मानजनक जीवन, तथा समावेशी विकास के लक्ष्य की दिशा में प्रगति

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 का स्थान लिया।
2. RPwD अधिनियम, 2016 में विनिर्दिष्ट दिव्यांगताओं की संख्या 21 है।
3. स्वलीनता, प्रमस्तिष्क पक्षाघात, मानसिक मंदता और बहु-दिव्यांगता के लिए बनाया गया राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999, RPwD अधिनियम, 2016 के अंतर्गत समाहित कर दिया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: RPwD अधिनियम, 2016 ने 1995 के अधिनियम का स्थान लिया। कथन 2 सही है: इस अधिनियम में 21 विनिर्दिष्ट दिव्यांगताएं सूचीबद्ध हैं। कथन 3 गलत है: राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 एक पृथक विधि है और इसका न्यास आज भी अलग से कार्यरत है, इसे RPwD अधिनियम में समाहित नहीं किया गया।

Q2. निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत में दिव्यांगजनों के पुनर्वास और कल्याण से संबंधित विषय समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों इस पर विधि बना सकते हैं।
कारण (R): संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 9 ‘अक्षम और बेरोजगार व्यक्तियों की राहत’ से संबंधित है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — दिव्यांगजनों की राहत और कल्याण को संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 9 में रखा गया है, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों विधि बना सकते हैं। यह प्रविष्टि सीधे अभिकथन की व्याख्या करती है, अतः (R) सही व्याख्या है।

Q3. संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्य को बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और अंगहीनता जैसी स्थितियों में लोक सहायता देने का निर्देश दिया गया है?

  1. अनुच्छेद 41
  2. अनुच्छेद 39
  3. अनुच्छेद 45
  4. अनुच्छेद 46

उत्तर: अनुच्छेद 41 — अनुच्छेद 41 राज्य के नीति निदेशक तत्वों में आता है और कार्य, शिक्षा तथा बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी व अंगहीनता के मामलों में लोक सहायता का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 39 जीविका के साधनों और समान वेतन से, अनुच्छेद 45 बाल शिक्षा से तथा अनुच्छेद 46 दुर्बल वर्गों के शैक्षिक व आर्थिक हितों से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ दिव्यांगजनों के पुनर्वास के लिए समेकित क्षेत्रीय केंद्र (CRC) जैसे संस्थागत ढांचे के विस्तार की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या केवल भौतिक अवसंरचना के निर्माण से RPwD अधिनियम, 2016 के समावेशी और अधिकार-आधारित लक्ष्य प्राप्त हो सकते हैं? इस संदर्भ में प्रशिक्षित मानव संसाधन, सहायक उपकरणों की उपलब्धता और राज्यों की भूमिका पर भी विचार कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा (MODEL-ANSWER SKELETON):

1. भूमिका: जम्मू (सांबा जिले के विजयपुर, चक ज्वाला) में लगभग 24 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे CRC के स्थायी परिसर का उदाहरण दें। यह केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग की पुनर्वास सेवाओं के विस्तार की दिशा को दर्शाता है। जनगणना 2011 में देश में लगभग 2.68 करोड़ दिव्यांगजन दर्ज थे, जो माँग की व्यापकता का संकेत है।

2. संवैधानिक और विधिक ढांचा:
(क) अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता)।
(ख) अनुच्छेद 41 (नीति निदेशक तत्व) के अंतर्गत अंगहीनता में लोक सहायता।
(ग) संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 9 के कारण केंद्र और राज्यों की साझा भूमिका।
(घ) RPwD अधिनियम, 2016: 21 विनिर्दिष्ट दिव्यांगताएं, सुगम्यता और उचित समायोजन (reasonable accommodation) के प्रावधान।
(ङ) सर्वोच्च न्यायालय का राजीव रतूड़ी बनाम भारत संघ (2018) निर्णय, जिसमें विनिर्दिष्ट दिव्यांगताओं की सूची को संपूर्ण न मानकर उसके विस्तार का मार्ग स्वीकार किया गया।
(च) UNCRPD (2006, भारत द्वारा अनुसमर्थित): अनुच्छेद 9 (सुगम्यता), अनुच्छेद 25 (स्वास्थ्य) और अनुच्छेद 26 (हैबिलिटेशन एवं रिहैबिलिटेशन)।

3. नीतिगत साधन: राष्ट्रीय दिव्यांगजन नीति (2006), सुगम्य भारत अभियान (2015), सहायक उपकरणों के लिए ADIP योजना, DDRS योजना, और समावेशी शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम।

4. पक्ष में तर्क: संस्थागत क्षमता बढ़ने से प्रारंभिक हस्तक्षेप, फिजियोथेरेपी, विशेष शिक्षा और माता-पिता के प्रशिक्षण की पहुँच बढ़ती है; कृत्रिम अंग और सहायक उपकरणों की प्रयोगशालाएं स्थानीय स्तर पर सेवा देती हैं; दिव्यांगजनों की निकटता से सेवा (last-mile delivery) सुनिश्चित होती है; BEd और MEd (दिव्यांगता) पाठ्यक्रम विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी दूर करने में सहायक हो सकते हैं।

5. विपक्ष या सीमाएं: भौतिक निर्माण पूर्ण होने और संचालन के बीच विलंब; प्रशिक्षित विशेषज्ञों (फिजियोथेरेपिस्ट, विशेष शिक्षक, ऑर्थोटिस्ट) की कमी; केंद्र की सेवाएं सीमित क्षेत्र तक पहुँचती हैं; ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में अभिगम्यता (access) की समस्या; आवश्यकता-आधारित आकलन और निगरानी की कमी; सार्वजनिक भवनों व परिवहन में सुगम्यता का अभाव।

6. समाधान व संतुलित दृष्टिकोण: सामुदायिक आधारित पुनर्वास (CBR) को संस्थागत केंद्रों से जोड़ना; राज्य सरकारों के साथ समन्वय और राज्य-स्तरीय क्रियान्वयन; कौशल व रोजगार के साथ जोड़ना; डेटा-आधारित निगरानी और परिणाम-आधारित मूल्यांकन। निष्कर्ष में यह स्पष्ट करें कि अवसंरचना आवश्यक शर्त है, पर पर्याप्त नहीं; समावेशन के लिए मानव संसाधन, सुगम्यता और अधिकार-आधारित शासन का एकीकरण आवश्यक है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)

Jammu & Kashmir PCS (JKPSC (KAS)) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार द्वारा हाल ही में जम्मू में सीआरसी (कॉम्प्रिहेंसिव रिहैबिलिटेशन सेंटर) के स्थायी परिसर के निर्माण कार्य की समीक्षा के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

  1. सीआरसी जम्मू का स्थायी परिसर जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश के सामाजिक कल्याण विभाग द्वारा निर्मित किया जा रहा है।
  2. डॉ. वीरेंद्र कुमार ने सीआरसी जम्मू के स्थायी परिसर का निर्माण कार्य 2023 में शुरू करवाया था।
  3. सीआरसी जम्मू विकलांग व्यक्तियों के पुनर्वास एवं कौशल विकास के लिए स्थापित किया जा रहा है।
  4. सीआरसी जम्मू का स्थायी परिसर लद्दाख में स्थित है।

उत्तर: सीआरसी जम्मू विकलांग व्यक्तियों के पुनर्वास एवं कौशल विकास के लिए स्थापित किया जा रहा है। — सीआरसी (कॉम्प्रिहेंसिव रिहैबिलिटेशन सेंटर) विकलांग व्यक्तियों के पुनर्वास एवं कौशल विकास हेतु केंद्र सरकार द्वारा स्थापित किया जा रहा है।

Mains: विकलांग व्यक्तियों के पुनर्वास एवं कौशल विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा स्थापित ‘सीआरसी’ (कॉम्प्रिहेंसिव रिहैबिलिटेशन सेंटर) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए, जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में इसके संभावित प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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