14 Aug सुप्रीम कोर्ट ने ‘डायन’ के नाम पर महिला उत्पीड़न को अस्वीकार किया, दोषी को आजीवन कारावास
✎ उच्चतम न्यायालय ने डायन-प्रथा के नाम पर महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को 'गहराई से निहित सामाजिक पूर्वाग्रह' बताया है, जो तर्क और कानून के शासन पर अंधविश्वास को हावी नहीं होने देगा।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय समाज, महिलाओं की भूमिका, सामाजिक सशक्तिकरण | GS Paper II — भारतीय संविधान, न्यायपालिका, सामाजिक न्याय
- Prelims: डायन-प्रथा, उच्चतम न्यायालय, अनुच्छेद 21, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, सामाजिक कुरीतियाँ, न्यायिक समीक्षा
- Essay: आधुनिक भारत में अंधविश्वास और सामाजिक प्रगति की चुनौतियाँ, महिलाओं के सशक्तिकरण में न्यायपालिका की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: उच्चतम न्यायालय ने डायन-प्रथा के नाम पर महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को ‘गहराई से निहित सामाजिक पूर्वाग्रह’ बताया है, जो तर्क और कानून के शासन पर अंधविश्वास को हावी नहीं होने देगा।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने एक व्यक्ति की आजीवन कारावास की सज़ा को बरकरार रखा, जिसने 1998 में एक महिला की डायन-प्रथा (witchcraft) के आरोप में हत्या कर दी थी। न्यायालय ने इस दौरान समाज में व्याप्त अंधविश्वास और महिलाओं को बलि का बकरा बनाने की प्रवृत्ति की कड़ी निंदा की, यह रेखांकित करते हुए कि तर्कहीन भय और अंधविश्वास कानून के शासन को कमजोर नहीं कर सकते।
पृष्ठभूमि
- भारत में डायन-प्रथा के नाम पर महिलाओं के विरुद्ध हिंसा एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई है, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में।
- अक्सर, आर्थिक, सामाजिक या व्यक्तिगत समस्याओं के लिए महिलाओं को ‘डायन’ या ‘चुड़ैल’ करार देकर उन्हें प्रताड़ित किया जाता है, शारीरिक हिंसा का शिकार बनाया जाता है और कई बार उनकी हत्या भी कर दी जाती है।
- यह प्रथा महिलाओं के मानवाधिकारों, गरिमा और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का गंभीर उल्लंघन है।
- कई राज्यों ने डायन-प्रथा निषेध कानून बनाए हैं, जैसे झारखंड डायन-प्रथा (निषेध) अधिनियम, 2001, लेकिन इन कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन एक चुनौती बना हुआ है।
- उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर इस तरह की प्रथाओं की निंदा की है और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए महत्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं।
डायन-प्रथा (Witchcraft) और संबंधित मुद्दे
- डायन-प्रथा एक ऐसी सामाजिक कुरीति है जहाँ किसी महिला को कथित रूप से ‘बुरी आत्माओं’ या ‘जादुई शक्तियों’ का उपयोग करने का आरोप लगाकर उसे समाज से बहिष्कृत किया जाता है या उसके साथ हिंसा की जाती है।
- इस प्रथा के पीछे अक्सर अज्ञानता, अंधविश्वास, व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति विवाद या सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा जैसे कारण होते हैं।
- पीड़ित महिलाएं आमतौर पर समाज के कमजोर वर्गों से आती हैं, जिनमें विधवाएं, अकेली महिलाएं, या वे महिलाएं शामिल होती हैं जिनकी कोई सामाजिक या आर्थिक सुरक्षा नहीं होती।
- यह प्रथा लैंगिक असमानता (gender inequality) को दर्शाती है, क्योंकि इसका शिकार मुख्य रूप से महिलाएं ही होती हैं।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, जिसमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी शामिल है, जिसका डायन-प्रथा उल्लंघन करती है।
- न्यायपालिका की भूमिका इस तरह के मामलों में महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यह न केवल अपराधियों को दंडित करती है बल्कि समाज को एक मजबूत संदेश भी देती है कि कानून का शासन सर्वोपरि है।
- इस कुप्रथा से निपटने के लिए कानूनी प्रावधानों के साथ-साथ शिक्षा, जागरूकता अभियान और सामाजिक सुधारों की भी आवश्यकता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं का उत्पीड़न | यह समाज में व्याप्त गहरे पूर्वाग्रह और तर्कहीन भय को दर्शाता है, जो कमजोर महिलाओं को निशाना बनाता है। |
| सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय | न्यायालय ने हत्या के दोषी की आजीवन कारावास की सज़ा को बरकरार रखा, जो ऐसे अपराधों के प्रति न्यायिक गंभीरता को दर्शाता है। |
| न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का सिद्धांत | उच्च न्यायालय के निर्णय की समीक्षा कर सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय सुनिश्चित किया और कानून के शासन को बनाए रखा। |
| महिलाओं के विरुद्ध अपराध | यह घटना महिलाओं के प्रति हिंसा और भेदभाव के एक गंभीर सामाजिक मुद्दे को उजागर करती है, जिसे ‘डायन’ बताकर अंजाम दिया जाता है। |
| संवैधानिक लोकतंत्र में अंधविश्वास की निरंतरता | न्यायालय ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में भी ऐसी प्रथाएँ अभी भी मौजूद हैं। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह निर्णय समाज में व्याप्त अंधविश्वास और महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह को चुनौती देता है, खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में जहाँ ‘डायन’ बताकर उत्पीड़न की घटनाएँ अधिक होती हैं।
- यह समाज को तर्कहीन भय और अंधविश्वास के बजाय तर्क और कानून के शासन को अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
कानूनी और न्यायिक महत्व
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अंधविश्वास के नाम पर किसी भी व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं को बलि का बकरा नहीं बनाया जा सकता।
- यह निर्णय महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में न्याय सुनिश्चित करने और दोषियों को दंडित करने के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है।
मानवाधिकार महत्व
- यह महिलाओं के जीवन के अधिकार, गरिमा और समानता के अधिकार की रक्षा करता है, जो भारतीय संविधान के तहत मौलिक अधिकार हैं।
- यह निर्णय उन कमजोर वर्गों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक मजबूत संदेश देता है, जिन्हें अक्सर सामाजिक कुरीतियों का शिकार बनाया जाता है।
चुनौतियाँ
1. अंधविश्वास और कुप्रथाएँ
- भारत के कई हिस्सों में अभी भी अंधविश्वास, जादू-टोना और ‘डायन’ होने के आरोप में महिलाओं को प्रताड़ित करने की प्रथाएँ मौजूद हैं।
- ये प्रथाएँ अक्सर सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को निशाना बनाती हैं, जिससे उनके जीवन और गरिमा को खतरा होता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय समाज / सामाजिक मुद्दे
2. कानून का अपर्याप्त प्रवर्तन
- अंधविश्वास से संबंधित अपराधों को रोकने और दोषियों को दंडित करने के लिए मौजूदा कानूनों का प्रभावी ढंग से प्रवर्तन एक चुनौती है।
- पुलिस और न्यायिक प्रणाली को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: शासन / कानून और व्यवस्था
3. लैंगिक असमानता और भेदभाव
- अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं का उत्पीड़न गहरे जड़ें जमा चुकी लैंगिक असमानता और पितृसत्तात्मक सोच का परिणाम है।
- महिलाओं को अक्सर समाज में कमजोर और आसानी से निशाना बनाने योग्य माना जाता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय / महिला सशक्तिकरण
4. जागरूकता और शिक्षा की कमी
- शिक्षा और वैज्ञानिक सोच की कमी अंधविश्वासों को बढ़ावा देती है।
- समुदायों में जागरूकता बढ़ाना और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा देना एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन / शिक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अंधविश्वास आधारित हिंसा | महिलाओं के विरुद्ध गंभीर अपराधों को जन्म देता है, जिसमें हत्या और शारीरिक उत्पीड़न शामिल हैं। |
| सामाजिक पूर्वाग्रह | महिलाओं को बलि का बकरा बनाने की प्रवृत्ति, खासकर संकट या अज्ञात घटनाओं के समय। |
| कानून का शासन | तर्कहीन भय और अंधविश्वास का कानून के शासन और तर्क पर हावी होना। |
| संवैधानिक मूल्य | संवैधानिक लोकतंत्र में भी ऐसी अमानवीय प्रथाओं का जारी रहना, जो संविधान के मूल्यों के विपरीत हैं। |
| न्याय तक पहुँच | पीड़ितों के लिए न्याय प्राप्त करना कठिन हो सकता है, विशेषकर दूरदराज के क्षेत्रों में। |
आगे की राह
- अंधविश्वास और जादू-टोना विरोधी कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना और दोषियों को त्वरित दंड सुनिश्चित करना।
- वैज्ञानिक सोच (Scientific Temper) और तर्कवाद को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों का विस्तार करना।
- महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता के बारे में समुदायों को संवेदनशील बनाना, विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में।
- पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को ऐसे मामलों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण प्रदान करना, ताकि वे संवेदनशीलता और दक्षता से कार्य कर सकें।
- पीड़ित महिलाओं को कानूनी सहायता, पुनर्वास और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करने के लिए तंत्र स्थापित करना।
- नागरिक समाज संगठनों और स्थानीय समुदायों को अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई में शामिल करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जादू-टोना · अंधविश्वास · महिलाओं के विरुद्ध अपराध · न्यायिक सक्रियता · सामाजिक न्याय · संवैधानिक नैतिकता · मानवाधिकार · दंडात्मक न्याय · सर्वोच्च न्यायालय · अपराध और समाज
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 15’, ‘note’: ‘धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A(h)’, ‘note’: ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास’}
अवधारणा प्रवाह
समाज में व्याप्त अंधविश्वास और तर्कहीन भय → महिलाओं पर ‘डायन’ होने का आरोप → आरोपों के आधार पर महिलाओं का उत्पीड़न और हिंसा → अपराधियों द्वारा कानून का उल्लंघन → न्यायिक प्रणाली द्वारा न्याय सुनिश्चित करना → सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दोषी को दंडित करना और अंधविश्वास की निंदा
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार की रक्षा करता है।
2. जादू-टोना विरोधी कानून केवल कुछ ही भारतीय राज्यों में लागू हैं।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं के उत्पीड़न की निंदा की है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी शामिल है। कथन 2 सही है क्योंकि भारत में जादू-टोना विरोधी कानून कुछ राज्यों जैसे झारखंड, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और असम में लागू हैं, लेकिन यह पूरे देश में एक समान केंद्रीय कानून नहीं है। कथन 3 भी सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अंधविश्वास और जादू-टोना के नाम पर होने वाले अपराधों पर चिंता व्यक्त की है और ऐसे कृत्यों की निंदा की है, जैसा कि इस मामले में भी देखा गया।
Q2. अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने जादू-टोना के नाम पर महिलाओं के उत्पीड़न को ‘गहराई से जड़ जमाए हुए सामाजिक पूर्वाग्रह’ बताया है।
कारण (R): समाज अक्सर भय या दुख के समय में वास्तविक कारणों का सामना करने के बजाय महिलाओं को बलि का बकरा बनाना आसान पाता है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया फैसले में स्पष्ट रूप से कहा है कि जादू-टोना के नाम पर महिलाओं का उत्पीड़न एक गहरा सामाजिक पूर्वाग्रह दर्शाता है। कारण (R) भी सही है और यह अभिकथन की सही व्याख्या करता है, क्योंकि न्यायालय ने स्वयं कहा है कि ‘भय, दुख या किसी अस्पष्टीकृत घटना का सामना करने पर, समाज वास्तविक कारण का सामना करने के बजाय एक महिला को दोषी ठहराना आसान पाता है।’
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में अंधविश्वास और जादू-टोना के नाम पर महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने में न्यायपालिका की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संबंध में सामाजिक-कानूनी चुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का संदर्भ देते हुए जादू-टोना संबंधी अपराधों और महिलाओं के उत्पीड़न की समस्या का संक्षिप्त परिचय।
2. न्यायपालिका की भूमिका (सकारात्मक पक्ष):
क. न्यायिक सक्रियता और संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण (अनुच्छेद 21, 14, 15)।
ख. कठोर दंड और निवारक प्रभाव (वर्तमान मामले में आजीवन कारावास)।
ग. सामाजिक पूर्वाग्रहों की पहचान और निंदा (सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘गहराई से जड़ जमाए हुए सामाजिक पूर्वाग्रह’ का उल्लेख)।
घ. मानवाधिकारों और गरिमा की रक्षा पर जोर।
ङ. विभिन्न न्यायिक निर्णयों का उल्लेख (यदि कोई विशिष्ट मामला याद हो, अन्यथा सामान्य संदर्भ)।
3. सामाजिक-कानूनी चुनौतियाँ:
क. कानूनों का अपर्याप्त कार्यान्वयन और जागरूकता की कमी।
ख. सामाजिक जड़ता और गहरे बैठे अंधविश्वास।
ग. पुलिस और न्यायपालिका के स्तर पर संवेदनशीलता की कमी।
घ. पीड़ितों के लिए सहायता और पुनर्वास तंत्र का अभाव।
ङ. साक्ष्य जुटाने में कठिनाई और गवाहों पर दबाव।
च. विशिष्ट केंद्रीय कानून का अभाव और राज्य-वार कानूनों में भिन्नता।
4. निष्कर्ष: न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए, सामाजिक जागरूकता, शिक्षा और प्रभावी कानून प्रवर्तन के माध्यम से एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: Hindustan Times
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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