23 Sep सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की ऊंची कीमतों को ‘लूट’ बताया, सरकार से पूछा- क्या है कानून?
✎ सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं की अत्यधिक कीमतों को 'जबरन वसूली' बताया है और सरकार से सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने का आग्रह किया है ताकि स्वास्थ्य सेवा तक आम आदमी की पहुंच सुनिश्चित हो सके।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — सामाजिक न्याय (स्वास्थ्य) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (औषधि मूल्य नियंत्रण) | GS Paper II — शासन (नीति निर्माण और कार्यान्वयन)
- Prelims: औषधि मूल्य नियंत्रण, आवश्यक दवाएं, जन औषधि केंद्र, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA), आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955, सर्वोच्च न्यायालय का न्यायिक हस्तक्षेप
- Essay: स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच और सामर्थ्य: नैतिक और आर्थिक आयाम, सरकार की भूमिका: जन कल्याण और बाजार विनियमन
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं की अत्यधिक कीमतों को ‘जबरन वसूली’ बताया है और सरकार से सभी दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने का आग्रह किया है ताकि स्वास्थ्य सेवा तक आम आदमी की पहुंच सुनिश्चित हो सके।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं की अत्यधिक कीमतों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है, इसे ‘जबरन वसूली’ और ‘दिनदहाड़े डकैती’ करार दिया है। न्यायालय ने फार्मा कंपनियों और खुदरा विक्रेताओं द्वारा मरीजों से मनमानी कीमतें वसूलने पर आश्चर्य व्यक्त किया और सरकार से इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ने तथा सभी आवश्यक दवाओं को मूल्य नियंत्रण तंत्र के दायरे में लाने का सुझाव दिया। न्यायालय ने विशेष रूप से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं के अत्यधिक मूल्य निर्धारण का उल्लेख किया, जहां खुदरा मूल्य खरीद मूल्य से दस गुना तक अधिक था।
पृष्ठभूमि
- भारत में औषधि मूल्य नियंत्रण का उद्देश्य आवश्यक दवाओं को आम जनता के लिए वहनीय बनाना है।
- राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने वाली प्राथमिक नियामक संस्था है।
- NPPA आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act, 1955) के तहत स्थापित किया गया था और यह औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश (DPCO) के प्रावधानों को लागू करता है।
- DPCO समय-समय पर संशोधित होता रहता है और यह आवश्यक दवाओं की एक सूची (National List of Essential Medicines – NLEM) के आधार पर दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमतों को निर्धारित करता है।
- जन औषधि केंद्र (Jan Aushadhi Kendras) सरकार द्वारा प्रायोजित पहल हैं जिनका उद्देश्य सस्ती दरों पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराना है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के तहत, सर्वोच्च न्यायालय जनहित याचिकाओं (Public Interest Litigations – PILs) के माध्यम से ऐसे महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर हस्तक्षेप कर सकता है।
भारत में औषधि मूल्य नियंत्रण क्या है?
- औषधि मूल्य नियंत्रण एक सरकारी तंत्र है जिसका उद्देश्य आवश्यक दवाओं की कीमतों को विनियमित करना है ताकि वे आम जनता के लिए सुलभ और वहनीय हों।
- यह मुख्य रूप से राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा लागू किया जाता है, जो रसायन और उर्वरक मंत्रालय के तहत एक स्वतंत्र नियामक निकाय है।
- NPPA औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश (DPCO) के तहत दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमतों (Maximum Retail Prices – MRP) को निर्धारित करता है।
- DPCO राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (NLEM) में शामिल दवाओं पर लागू होता है, जिसे स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा तैयार किया जाता है।
- NLEM में वे दवाएं शामिल होती हैं जिन्हें सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना जाता है और जिन पर सरकार मूल्य नियंत्रण लागू कर सकती है।
- मूल्य निर्धारण आमतौर पर ‘बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण’ (Market-Based Pricing) पद्धति का उपयोग करके किया जाता है, जहां NLEM में शामिल दवाओं के लिए औसत बाजार मूल्य के आधार पर अधिकतम मूल्य निर्धारित किया जाता है।
- सरकार का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि जीवन रक्षक दवाएं सभी वर्गों के लोगों के लिए उचित मूल्य पर उपलब्ध हों, जिससे स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में सुधार हो सके।
- जन औषधि परियोजना जैसी पहलें भी सस्ती दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| दवाओं का अत्यधिक मूल्य निर्धारण | यह मरीजों को आर्थिक रूप से कमजोर करता है और उन्हें अपनी संपत्ति बेचने पर मजबूर करता है। |
| न्यायालय का हस्तक्षेप | सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाया है और दवाओं के मूल्य नियंत्रण की आवश्यकता पर बल दिया है। |
| मूल्य नियंत्रण तंत्र | न्यायालय ने सभी आवश्यक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने का सुझाव दिया है। |
| जन औषधि केंद्र | इन केंद्रों के माध्यम से सस्ती दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने का सुझाव दिया गया है। |
| MRP और PTR में भारी अंतर | दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और खुदरा विक्रेता को मूल्य (PTR) के बीच बड़ा अंतर मुनाफाखोरी को दर्शाता है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- दवाओं की अत्यधिक कीमतें स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच को बाधित करती हैं, विशेषकर गरीब और कमजोर वर्गों के लिए।
- यह नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार (Right to Health) का उल्लंघन करता है, जो जीवन के अधिकार (Right to Life) का एक अभिन्न अंग है।
- मरीजों को आवश्यक दवाओं के लिए अपनी संपत्ति बेचने पर मजबूर होना पड़ता है, जिससे गरीबी का दुष्चक्र बढ़ता है।
आर्थिक महत्व
- दवाओं की उच्च कीमतें परिवारों के स्वास्थ्य व्यय को बढ़ाती हैं, जिससे उनकी बचत और निवेश क्षमता प्रभावित होती है।
- यह स्वास्थ्य बीमा (Health Insurance) योजनाओं पर भी दबाव डालता है, क्योंकि दावों की राशि बढ़ जाती है।
- एक स्वस्थ कार्यबल की कमी से उत्पादकता प्रभावित होती है, जिसका व्यापक आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
शासन और नियामक महत्व
- सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप सरकार की नियामक भूमिका और मूल्य नियंत्रण नीतियों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है।
- यह दवा मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से, न्यायालय सरकार को नागरिकों के कल्याण के लिए अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए प्रेरित करता है।
चुनौतियाँ
1. दवा मूल्य निर्धारण की जटिलता
- दवाओं की अनुसंधान और विकास (R&D) लागत, पेटेंट अधिकार और उत्पादन लागत मूल्य निर्धारण को जटिल बनाती है।
- फार्मास्युटिकल कंपनियों और खुदरा विक्रेताओं के बीच मार्जिन का निर्धारण एक चुनौती है, जिससे मुनाफाखोरी को बढ़ावा मिल सकता है।
यूपीएससी लिंक: स्वास्थ्य क्षेत्र, नियामक मुद्दे
2. नियामक तंत्र की कमियाँ
- वर्तमान मूल्य नियंत्रण तंत्र सभी आवश्यक दवाओं को कवर नहीं करता है, जिससे कई दवाएं अनियंत्रित रहती हैं।
- नियामक निकायों की निगरानी और प्रवर्तन क्षमता में कमी है, जिससे नियमों का उल्लंघन होता है।
यूपीएससी लिंक: सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप, नियामक निकाय
3. बाजार की विफलताएँ
- दवा बाजार में सूचना विषमता (Information Asymmetry) होती है, जहाँ मरीजों को दवाओं की वास्तविक लागत और प्रभावशीलता की जानकारी नहीं होती।
- कुछ दवाओं के लिए सीमित प्रतिस्पर्धा एकाधिकार (Monopoly) या अल्पाधिकार (Oligopoly) की स्थिति पैदा कर सकती है, जिससे कीमतें बढ़ जाती हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय अर्थव्यवस्था, बाजार संरचना
4. जन स्वास्थ्य पर प्रभाव
- उच्च कीमतों के कारण मरीज अक्सर आवश्यक दवाओं को छोड़ देते हैं या कम खुराक लेते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर भी बोझ डालता है, क्योंकि अनुपचारित बीमारियाँ अधिक गंभीर हो सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन, स्वास्थ्य
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अत्यधिक MRP | दवाओं का MRP उनके वास्तविक उत्पादन लागत से कई गुना अधिक होता है, जिससे खुदरा विक्रेताओं को अनुचित लाभ मिलता है। |
| नियामक निष्क्रियता | सरकार और संबंधित प्राधिकरणों की ओर से मूल्य निर्धारण में अनियमितताओं पर कार्रवाई की कमी। |
| स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच | अत्यधिक कीमतों के कारण गरीब और मध्यम वर्ग के लिए आवश्यक दवाओं तक पहुँच मुश्किल हो जाती है। |
| नैतिक और कानूनी मुद्दे | सर्वोच्च न्यायालय ने इसे ‘जबरन वसूली’ और ‘दिनदहाड़े डकैती’ करार दिया है, जो नैतिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से गंभीर है। |
| बाजार में पारदर्शिता की कमी | दवाओं की लागत संरचना और मूल्य निर्धारण प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP)
आगे की राह
- सभी आवश्यक दवाओं को राष्ट्रीय आवश्यक दवाओं की सूची (National List of Essential Medicines – NLEM) में शामिल करके मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाना।
- दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (Drug Price Control Order – DPCO) के प्रभावी कार्यान्वयन और प्रवर्तन को सुनिश्चित करना।
- दवाओं के MRP और PTR के बीच के अंतर को तर्कसंगत बनाने के लिए एक स्पष्ट नीति विकसित करना।
- जन औषधि केंद्रों के नेटवर्क का विस्तार करना और उनकी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना ताकि सस्ती दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।
- दवा मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र स्थापित करना, जिसमें फार्मा कंपनियों की लागत संरचना का ऑडिट शामिल हो।
- दवाओं के अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ जेनेरिक दवाओं (Generic Medicines) के उत्पादन और उपयोग को प्रोत्साहित करना।
- स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को मजबूत करना और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal Health Coverage) की दिशा में कदम बढ़ाना ताकि मरीजों पर वित्तीय बोझ कम हो।
- उपभोक्ता जागरूकता बढ़ाना ताकि मरीज सस्ती जेनेरिक दवाओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकें और उनका उपयोग कर सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
दवा मूल्य नियंत्रण · आवश्यक दवाएँ · जन औषधि केंद्र · उपभोक्ता संरक्षण · न्यायिक सक्रियता · स्वास्थ्य का अधिकार · फार्मास्यूटिकल उद्योग · नैतिक शासन · राजकोषीय नीति · सामाजिक न्याय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन का अधिकार और स्वास्थ्य का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 38’, ‘note’: ‘राज्य लोक कल्याण को बढ़ावा देगा’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 47’, ‘note’: ‘राज्य का कर्तव्य, जन स्वास्थ्य में सुधार’}
अवधारणा प्रवाह
दवाओं का अत्यधिक मूल्य निर्धारण → मरीजों पर भारी वित्तीय बोझ → सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप → मूल्य नियंत्रण की आवश्यकता पर बल → सरकार की नियामक भूमिका पर सवाल → सस्ती दवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करने की मांग
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में दवाओं की कीमतें केवल फार्मा कंपनियों द्वारा निर्धारित की जाती हैं और सरकार का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होता।
2. जन औषधि केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित ऐसे केंद्र हैं जो सस्ती दरों पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराते हैं।
3. आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (National List of Essential Medicines – NLEM) में शामिल दवाओं की कीमतें मूल्य नियंत्रण तंत्र के तहत विनियमित होती हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि भारत में सरकार आवश्यक दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करती है। कथन 2 सही है, जन औषधि केंद्र सस्ती जेनेरिक दवाएं प्रदान करते हैं। कथन 3 सही है, NLEM में शामिल दवाओं की कीमतें मूल्य नियंत्रण के अधीन होती हैं।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा निकाय भारत में दवाओं की कीमतों को विनियमित करने के लिए जिम्मेदार है?
- भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission of India – CCI)
- भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research – ICMR)
- राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (National Pharmaceutical Pricing Authority – NPPA)
- भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (Food Safety and Standards Authority of India – FSSAI)
उत्तर: राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (National Pharmaceutical Pricing Authority – NPPA) — राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने और लागू करने के लिए जिम्मेदार एक सरकारी नियामक एजेंसी है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में दवाओं की अत्यधिक कीमतें एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता का विषय हैं। इस संदर्भ में, सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों का विश्लेषण करते हुए, दवा मूल्य नियंत्रण तंत्र को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक उपायों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** दवाओं की अत्यधिक कीमतों की समस्या और सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों (जैसे ‘जबरन वसूली’, ‘दिनदहाड़े डकैती’) का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **समस्या का विश्लेषण:**
* दवाओं की कीमतों में भारी अंतर (विनिर्माता से खुदरा विक्रेता तक)।
* आवश्यक दवाओं की पहुंच और सामर्थ्य का मुद्दा।
* स्वास्थ्य पर नागरिकों के वित्तीय बोझ का प्रभाव (संपत्ति बेचने पर मजबूर होना)।
* मौजूदा मूल्य नियंत्रण तंत्र की सीमाएं (कुछ दवाओं का दायरे से बाहर होना)।
3. **सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों का महत्व:**
* न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) के माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित करना।
* स्वास्थ्य के अधिकार (Right to Health) पर जोर।
* सार्वजनिक हित याचिका (PIL) का महत्व।
4. **प्रभावी मूल्य नियंत्रण के लिए आवश्यक उपाय:**
* **दायरे का विस्तार:** सभी आवश्यक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाना।
* **पारदर्शिता:** दवाओं की लागत, मार्जिन और खुदरा मूल्य निर्धारण में अधिक पारदर्शिता।
* **नियामक सुदृढ़ीकरण:** राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) जैसी संस्थाओं को और अधिक अधिकार और संसाधन प्रदान करना।
* **जेनेरिक दवाओं को प्रोत्साहन:** प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (PMBJP) के तहत जन औषधि केंद्रों का विस्तार और प्रचार।
* **जागरूकता अभियान:** उपभोक्ताओं को जेनेरिक दवाओं और उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित करना।
* **कठोर दंड:** अत्यधिक मूल्य निर्धारण और मुनाफाखोरी के खिलाफ सख्त कानूनी प्रावधान और उनका प्रभावी प्रवर्तन।
* **अनुसंधान और विकास:** सस्ती दवाओं के अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना।
5. **निष्कर्ष:** स्वास्थ्य सेवा को अधिक सुलभ और न्यायसंगत बनाने के लिए सरकार, नियामक निकायों और न्यायपालिका के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: Times of India
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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