24 Oct मध्य प्रदेश में नर्मदा माइक्रो सिंचाई परियोजना: 72 हजार किसानों को मिलेगा लाभ
✎ जल राज्य सूची का विषय है (प्रविष्टि 17), अंतरराज्यीय नदियों पर संघ की विधायी शक्ति अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के माध्यम से प्रयुक्त होती है; उद्वहन सिंचाई पंप द्वारा ऊँचे खेतों तक जल पहुँचाती है, जबकि माइक्रो सिंचाई…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत की प्रमुख नदियाँ, नर्मदा बेसिन और सिंचाई के भौगोलिक आधार) | GS Paper II — शासन और संघवाद (जल एक राज्य विषय; अंतरराज्यीय नदी जल का संघीय ढाँचा; प्रत्यक्ष लाभ अंतरण की शासन-व्यवस्था) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था और कृषि (सिंचाई विस्तार, सूक्ष्म सिंचाई, फसल बीमा और कृषि-जोखिम प्रबंधन)
- Prelims: उद्वहन सिंचाई (Lift Irrigation) और गुरुत्वाकर्षण सिंचाई में अंतर, माइक्रो सिंचाई (Micro Irrigation): ड्रिप और स्प्रिंकलर पद्धति, सरदार सरोवर बांध और नर्मदा नदी (उद्गम: अमरकंटक, मध्य प्रदेश), अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 262 — अंतरराज्यीय नदियों के जल-विवाद, सातवीं अनुसूची — राज्य सूची की प्रविष्टि 17 (जल), प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), सिंचित क्षेत्र और सकल बोए गए क्षेत्र में सिंचित हिस्से का अनुपात
- Essay: जल-सुरक्षा की चुनौती: सिंचाई विस्तार, भूजल दोहन और जल-उपयोग दक्षता, कृषि में जल-बचत तकनीकों की भूमिका और छोटे किसानों की आजीविका
त्वरित पुनरावृत्ति: जल राज्य सूची का विषय है (प्रविष्टि 17), अंतरराज्यीय नदियों पर संघ की विधायी शक्ति अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के माध्यम से प्रयुक्त होती है; उद्वहन सिंचाई पंप द्वारा ऊँचे खेतों तक जल पहुँचाती है, जबकि माइक्रो सिंचाई बूँद-बूँद या फुहार से जल-उपयोग दक्षता बढ़ाती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश के धार जिले के सरदारपुर में 24 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री ने 2,387.60 करोड़ रुपये की नर्मदा-झाबुआ-पेटलावद-थांदला-सरदारपुर माइक्रो उद्वहन सिंचाई परियोजना का उद्घाटन किया। समाचार रिपोर्ट के अनुसार इससे धार और झाबुआ जिलों के 260 गांवों की 57,422 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी और लगभग 72 हजार किसानों को लाभ मिलने की संभावना है। इसी कार्यक्रम में 188 विकास कार्यों का भूमिपूजन और लोकार्पण हुआ तथा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत 317.86 करोड़ रुपये की राशि लाभार्थी किसानों के खातों में भेजी गई। यह समाचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उद्वहन सिंचाई के माध्यम से नर्मदा जल को पठारी और कम सिंचित क्षेत्र तक पहुँचाने का व्यावहारिक उदाहरण है, साथ ही यह राज्य-स्तरीय जल-अवसंरचना और केंद्र-प्रायोजित फसल बीमा के बीच की शासन-कड़ी को भी दिखाता है।
पृष्ठभूमि
- संविधान के अनुसार जल राज्य सूची का विषय है (सातवीं अनुसूची, राज्य सूची की प्रविष्टि 17); फिर भी अंतरराज्यीय नदियों के नियमन के लिए संघ सरकार को विधि बनाने की शक्ति प्राप्त है। इसी आधार पर अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 बना और नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना हुई।
- नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर पश्चिम की ओर बहती है और खंभात की खाड़ी में अरब सागर में गिरती है। सरदार सरोवर बांध गुजरात में स्थित है, जबकि इसके जल से मध्य प्रदेश की कई सिंचाई परियोजनाएँ जुड़ी हैं।
- भारत में गुरुत्वाकर्षण सिंचाई का विस्तार सीमित है, क्योंकि नदी का तल प्रायः खेतों से नीचे होता है। ऐसे क्षेत्रों में पंप द्वारा पानी ऊपर उठाकर नहरों, पाइपलाइनों या जलाशयों तक पहुँचाने की उद्वहन सिंचाई अपनाई जाती है।
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना वर्ष 2016 में खरीफ मौसम से लागू हुई। इसमें प्राकृतिक आपदा, कीट-रोग आदि से फसल-हानि की स्थिति में बीमा सहायता दी जाती है और लाभ का भुगतान प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से होता है।
- भारत में सिंचित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा भूजल पर निर्भर है, जिससे कई क्षेत्रों में भूजल-स्तर गिरने की समस्या सामने आई है। इसलिए सतही जल के उपयोग और सूक्ष्म सिंचाई जैसी जल-बचत तकनीकों पर नीतिगत बल बढ़ा है।
उद्वहन सिंचाई क्या है?
- उद्वहन सिंचाई (Lift Irrigation) में पंपों और पाइपलाइनों की सहायता से नदी, जलाशय या नहर के जल को ऊँचाई पर स्थित खेतों तक पहुँचाया जाता है।
- यह गुरुत्वाकर्षण सिंचाई से भिन्न है, जिसमें जल ढलान के सहारे स्वाभाविक रूप से बहता है।
- उद्वहन सिंचाई में ऊर्जा की लागत अधिक होती है, इसलिए इसकी व्यवहार्यता में बिजली आपूर्ति और रखरखाव की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।
- माइक्रो सिंचाई (Micro Irrigation) में ड्रिप (बूँद-बूँद) और स्प्रिंकलर (फुहार) पद्धति से पौधों की जड़ों तक सीमित मात्रा में जल पहुँचाया जाता है, जिससे जल-हानि घटती है।
- माइक्रो सिंचाई से जल-उपयोग दक्षता बढ़ती है और खारे या कम उपजाऊ क्षेत्रों में भी खेती संभव होती है, पर इसकी प्रारंभिक लागत अधिक होती है।
- सिंचाई की भौतिक परिसंपत्तियों के लिए सार्वजनिक निवेश, जल-वितरण संरचना और कमान क्षेत्र (Command Area) का विकास साथ-साथ आवश्यक है।
- सिंचित क्षेत्र का विस्तार कृषि उत्पादकता, फसल-विविधीकरण और ग्रामीण रोजगार से सीधा संबंधित है, इसलिए इसे कृषि-नीति का केंद्रीय घटक माना जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| परियोजना का स्वरूप: नर्मदा-झाबुआ-पेटलावद-थांदला-सरदारपुर माइक्रो उद्वहन सिंचाई परियोजना (Narmada-Jhabua-Petlawad-Thandla-Sardarpur Micro Lift Irrigation Project) | नदी के जल को पंपों के माध्यम से ऊंचाई वाले पठारी और पहाड़ी क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता है, जहां गुरुत्वाकर्षण से सिंचाई संभव नहीं होती। इसमें नहर की जगह पाइपलाइन और सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों का उपयोग होता है। |
| लागत और कार्यक्षेत्र: 2,387.60 करोड़ रुपये, धार और झाबुआ जिलों के 260 गांव | बड़े पैमाने की सार्वजनिक निवेश परियोजना है, जो दो जिलों के भू-भाग को एक साथ सिंचाई सुविधा देती है। |
| सिंचित होने वाला क्षेत्र: 57,422 हेक्टेयर | इससे लगभग 72 हजार किसानों के लाभान्वित होने का अनुमान है। वर्षा-निर्भर खेती वाले क्षेत्र में रबी और खरीफ दोनों फसलों के लिए जल की उपलब्धता बढ़ती है। |
| जल स्रोत: नर्मदा नदी और सरदार सरोवर बांध से संबद्ध जल-व्यवस्था | नर्मदा घाटी परियोजना के जल का उपयोग मालवा और निमाड़ के पठारी भागों में हो रहा है, जिससे जल-संसाधन के क्षेत्रीय वितरण में संतुलन आने की संभावना है। |
| कार्यक्रम के साथ जुड़े 188 विकास कार्य और 317.86 करोड़ रुपये का प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana) भुगतान | सिंचाई के साथ सड़क, जल-आपूर्ति और अन्य अवसंरचना कार्यों को जोड़कर ग्रामीण विकास का समेकित दृष्टिकोण दिखाया गया है। बीमा भुगतान फसल-जोखिम प्रबंधन का संकेत है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- सिंचाई से फसल-सघनता (Cropping Intensity) बढ़ती है, यानी एक ही खेत में वर्ष में एक से अधिक फसलें ली जा सकती हैं। इससे कृषि आय में वृद्धि की संभावना होती है।
- वर्षा पर निर्भरता घटने से उत्पादन में अनिश्चितता कम होती है, जिससे ग्रामीण उपभोग और स्थानीय बाज़ार को स्थिरता मिलती है।
- सिंचित क्षेत्र बढ़ने से कृषि-आधारित प्रसंस्करण और कोल्ड चेन जैसी संबद्ध गतिविधियों के लिए आधार बनता है।
सामाजिक महत्व
- स्थिर आय से किसान परिवारों में ग्रामीण-शहरी प्रवास (Migration) की प्रवृत्ति घटने की संभावना रहती है। सरकार ने भी पलायन रोकने को परियोजना के उद्देश्यों में गिना है।
- सिंचाई के साथ पेयजल और अन्य विकास कार्यों की योजना होने से ग्रामीण जीवन-स्तर के कई आयाम एक साथ प्रभावित होते हैं।
संसाधन और पर्यावरणीय महत्व
- सूक्ष्म सिंचाई (Micro Irrigation) से जल की प्रति इकाई उत्पादकता बढ़ती है और खेतों तक पहुंचने वाले जल की हानि कम होती है।
- नहर-आधारित पारंपरिक सिंचाई की तुलना में पाइपलाइन-आधारित वितरण से वाष्पीकरण और रिसाव में कमी आती है, जो जल-संरक्षण के लक्ष्य से मेल खाता है।
संघवाद और शासन संबंधी महत्व
- जल राज्य सूची का विषय है, इसलिए ऐसी परियोजनाएं राज्य सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी के अंतर्गत आती हैं। अंतर-राज्यीय नदी के जल के उपयोग में केंद्र की भूमिका भी रहती है।
- केंद्र प्रायोजित योजनाओं और राज्य की परियोजनाओं के बीच समन्वय का यह एक उदाहरण है, जिसमें फसल बीमा भुगतान भी शामिल है।
चुनौतियाँ
1. उच्च परिचालन लागत और ऊर्जा निर्भरता
- उद्वहन सिंचाई (Lift Irrigation) में जल को ऊपर उठाने के लिए बिजली की लगातार आवश्यकता होती है। बिजली की लागत या आपूर्ति में अनिश्चितता से संचालन प्रभावित हो सकता है।
- पंप, पाइपलाइन और वितरण-ढांचे के रखरखाव में लगातार व्यय होता है, जिसकी व्यवस्था बजट और उपयोगकर्ता-शुल्क के संतुलन पर निर्भर करती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: ऊर्जा और अवसंरचना; सार्वजनिक वित्त और राजकोषीय प्रबंधन
2. जल-वितरण की समानता और जल-उपभोक्ता संगठन
- ऊपरी और निचले भाग के किसानों तक जल पहुंचने में असमानता उत्पन्न हो सकती है, जिससे सामाजिक तनाव की स्थिति बन सकती है।
- किसानों की भागीदारी से जल-उपभोक्ता संगठन बनाना और जल-शुल्क का न्यायपूर्ण निर्धारण आवश्यक है, ताकि परियोजना की स्थिरता बनी रहे।
यूपीएससी लिंक: GS-2: स्थानीय शासन और पंचायती राज की भूमिका; GS-3: जल प्रबंधन
3. भूजल का अति-दोहन और जल-सुरक्षा
- सिंचाई क्षेत्र बढ़ने पर किसान भूजल पर अधिक निर्भर हो सकते हैं। यदि नहर-आधारित जल के साथ भूजल-नियमन नहीं हुआ, तो भूजल स्तर में गिरावट का जोखिम बढ़ता है।
- सूक्ष्म सिंचाई का लाभ तभी पूरा मिलता है जब फसल-चयन भी जल-उपयोग की दृष्टि से उपयुक्त हो।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण और संसाधन संरक्षण; जल सुरक्षा
4. फसल-विविधीकरण और बाज़ार संपर्क
- सिंचाई से उत्पादन बढ़ने पर भंडारण, परिवहन और मूल्य-प्राप्ति की व्यवस्था न होने पर किसान को कम दाम मिलने की समस्या आ सकती है।
- जल-गहन फसलों पर अत्यधिक झुकाव से मिट्टी की उर्वरता और फसल-विविधता पर दबाव बढ़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: कृषि विपणन और खाद्य प्रसंस्करण; सतत कृषि
5. जोखिम प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन
- अनियमित वर्षा और सूखे की बढ़ती आवृत्ति के बीच सिंचाई के साथ फसल बीमा का संयुक्त उपयोग जोखिम प्रबंधन के लिए आवश्यक है।
- फसल बीमा दावों के समय पर निपटान और सटीक फसल-आकलन पर भरोसा बनाए रखना चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: जलवायु परिवर्तन का कृषि पर प्रभाव; आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| परिचालन ऊर्जा लागत | पंपिंग के लिए बिजली की निरंतर आपूर्ति और उसका वित्तीय भार परियोजना की दीर्घकालिक व्यवहार्यता को प्रभावित कर सकता है। |
| जल-वितरण में असमानता | ऊंचाई और दूरी के आधार पर जल की उपलब्धता में अंतर से किसानों के बीच असंतोष की स्थिति बन सकती है। |
| भूजल पर बढ़ता दबाव | सिंचित क्षेत्र के विस्तार के साथ भूजल के अति-दोहन का जोखिम रहता है। |
| बाज़ार और भंडारण अवसंरचना | उत्पादन बढ़ने पर मूल्य-समर्थन, भंडारण और परिवहन की कमी से लाभ सीमित हो सकता है। |
| जल-गहन फसल-प्रतिरूप | एक ही प्रकार की जल-गहन फसलों पर निर्भरता से मिट्टी और जल-संसाधन पर दीर्घकालिक दबाव बनता है। |
| रखरखाव और जल-शुल्क | पाइपलाइन और पंप व्यवस्था के रखरखाव के लिए धन-व्यवस्था और किसानों की शुल्क-भुगतान क्षमता का संतुलन आवश्यक है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana) — समाचार में 317.86 करोड़ रुपये का भुगतान इसी योजना के अंतर्गत किसानों के खातों में स्थानांतरित होने का उल्लेख है।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana) — सूक्ष्म सिंचाई और खेत तक जल पहुंचाने के उद्देश्य से इसका प्रत्यक्ष संबंध है।
आगे की राह
- उद्वहन सिंचाई के लिए सौर ऊर्जा और ऊर्जा-कुशल पंपों के उपयोग को प्राथमिकता देकर परिचालन लागत घटाई जाए।
- जल-उपभोक्ता संगठनों को सशक्त बनाकर जल-शुल्क, वितरण-कार्यक्रम और रखरखाव में किसानों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
- सिंचित क्षेत्र के साथ भूजल-स्तर की नियमित निगरानी और भूजल-नियमन को जोड़ा जाए।
- जल-बचत करने वाली फसलों और मिट्टी-स्वास्थ्य आधारित फसल-योजना को प्रोत्साहित किया जाए।
- सिंचाई लाभ के साथ भंडारण, शीत-भंडारण, प्रसंस्करण और बाज़ार-संपर्क की व्यवस्था विकसित की जाए।
- फसल बीमा दावों के निपटान में डिजिटल सत्यापन और समय-सीमा का पालन सुनिश्चित किया जाए।
- परियोजना के प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन, जैसे सिंचित क्षेत्र, फसल-उत्पादकता और आय में वृद्धि, नियमित रूप से किया जाए।
- अंतर-राज्यीय नदी-जल के उपयोग में संबंधित प्रावधानों और जल-आवंटन के नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
उद्वहन सिंचाई (Lift Irrigation) · सूक्ष्म सिंचाई (Micro Irrigation) · अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद · अनुच्छेद 262 (Article 262) · संघ सूची प्रविष्टि 56 और राज्य सूची प्रविष्टि 17 · प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana) · जल-ऊर्जा संबंध (Water-Energy Nexus) · भूजल दोहन (Groundwater Overexploitation) · राष्ट्रीय जल नीति, 2012 (National Water Policy, 2012) · प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana) · जल-संघवाद (Water Federalism) · सामान्य संपत्ति संसाधन प्रबंधन (Common-Pool Resource Governance)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुसूची 7, राज्य सूची की प्रविष्टि 17 — जल, सिंचाई और जल-भंडारण का राज्य का विषय होना।
- अनुसूची 11, प्रविष्टि 3 — लघु सिंचाई और जल-प्रबंधन में पंचायतों की भूमिका।
अवधारणा प्रवाह
नर्मदा नदी और सरदार सरोवर बांध से जल की उपलब्धता बढ़ती है। → उद्वहन पंप और पाइपलाइन के माध्यम से जल को ऊंचाई वाले पठारी क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता है। → सूक्ष्म सिंचाई से 57,422 हेक्टेयर भूमि सिंचित होती है और जल-हानि घटती है। → फसल-सघनता और उत्पादकता बढ़ने से लगभग 72 हजार किसानों की आय में सुधार की संभावना बनती है। → आय में स्थिरता से ग्रामीण पलायन घटने और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होने की दिशा बनती है। → बीमा भुगतान और रखरखाव-व्यवस्था के साथ परियोजना की दीर्घकालिक व्यवहार्यता सुनिश्चित होती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान की राज्य सूची की प्रविष्टि 17 में जल को शामिल किया गया है।
2. संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अंतर्गत अंतर्राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास पर संघ का नियंत्रण संसद द्वारा विधि से घोषित सीमा तक होता है।
3. संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर्राज्यीय नदियों के जल से संबंधित विवादों के न्यायनिर्णयन की व्यवस्था करता है।
4. संसद विधि द्वारा ऐसे विवादों में उच्चतम न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय की अधिकारिता को अपवर्जित कर सकती है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी चार
उत्तर: सभी चार — कथन 1 सही है: जल राज्य सूची की प्रविष्टि 17 में है। कथन 2 सही है: संघ सूची की प्रविष्टि 56 अंतर्राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास को संसद के नियंत्रण में रखती है। कथन 3 और 4 सही हैं: अनुच्छेद 262(1) संसद को न्यायनिर्णयन की व्यवस्था का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 262(2) उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता के अपवर्जन की शक्ति देता है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों (ड्रिप और स्प्रिंकलर) से पारंपरिक प्रवाह सिंचाई की तुलना में जल की बचत होती है।
कारण (R): सूक्ष्म सिंचाई में जल सीधे पौधों की जड़ क्षेत्र तक पहुंचाया जाता है, जिससे वाष्पीकरण और वहन-हानि कम होती है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, किंतु R गलत है।
- A गलत है, किंतु R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — सूक्ष्म सिंचाई में जल को बूंद-बूंद या फुहार के रूप में सीधे जड़ क्षेत्र में दिया जाता है, इसलिए खुले क्षेत्र में वाष्पीकरण और नहर-वहन की हानि घटती है। अतः R, A की सही व्याख्या है। यह पद्धति भारत सरकार की प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ घटक से भी जुड़ी है।
Q3. निम्नलिखित सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए:
सूची-I
A. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना
B. राष्ट्रीय जल नीति
C. नर्मदा जल विवाद अधिकरण
सूची-II
1. अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के अंतर्गत गठित
2. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित योजना
3. वर्ष 2012 में अंगीकृत नीति दस्तावेज़
नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर चुनिए:
- A-2, B-3, C-1
- A-1, B-2, C-3
- A-3, B-1, C-2
- A-2, B-1, C-3
उत्तर: A-2, B-3, C-1 — प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत है (A-2)। राष्ट्रीय जल नीति का अंगीकरण वर्ष 2012 में हुआ (B-3)। नर्मदा जल विवाद अधिकरण की स्थापना अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के अंतर्गत हुई थी (C-1)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ नर्मदा घाटी से जुड़ी उद्वहन सिंचाई परियोजनाएं जैसी बड़ी अंतर्-क्षेत्रीय जल योजनाएं कृषि उत्पादकता और सिंचित क्षेत्र बढ़ाने का सशक्त साधन मानी जाती हैं, किंतु इनसे ऊर्जा व्यय, भूजल दोहन और जल-संघवाद से जुड़ी चुनौतियां भी उभरती हैं। उद्वहन सिंचाई के संदर्भ में इन दोनों पक्षों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि अंतर्राज्यीय नदी जल के बंटवारे में संविधान के अनुच्छेद 262 और संसद द्वारा निर्मित विधिक ढांचा किस सीमा तक विवादों के समाधान में प्रभावी रहा है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की रूपरेखा: (1) भूमिका: मध्य प्रदेश की नर्मदा-झाबुआ उद्वहन सिंचाई परियोजना (लगभग 2,387.60 करोड़ रुपये, धार और झाबुआ जिलों में लगभग 57,422 हेक्टेयर सिंचाई क्षमता, लगभग 72,000 किसान लाभार्थी) को उदाहरण के रूप में लें।
(2) संवैधानिक ढांचा: जल राज्य सूची की प्रविष्टि 17 में है; अंतर्राज्यीय नदियों का विनियमन और विकास संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अधीन है; अनुच्छेद 246 के अंतर्गत विषय-वितरण; अनुच्छेद 262 के अंतर्गत संसद द्वारा न्यायनिर्णयन और उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता का अपवर्जन।
(3) विधिक संस्थाएं: अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956; नर्मदा जल विवाद अधिकरण (1969 में गठित) और उसका पंचाट; सरदार सरोवर परियोजना के संदर्भ में नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण; नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2000) में उच्चतम न्यायालय का निर्णय, जिसमें पुनर्वास की शर्तों के साथ बांध की ऊंचाई बढ़ाने की अनुमति दी गई।
(4) उद्वहन सिंचाई की समालोचना: ऊर्जा-गहन होने से परिचालन लागत और बिजली-सब्सिडी का दबाव; जल-ऊर्जा संबंध (Water-Energy Nexus); पर्यावरणीय प्रवाह और पारिस्थितिकी पर प्रभाव; पंप-आधारित सिंचाई से भूजल दोहन का जोखिम; केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों से अति-दोहित क्षेत्रों का संदर्भ।
(5) सूक्ष्म सिंचाई और नीति-उपाय: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (हर खेत को पानी, प्रति बूंद अधिक फसल), राष्ट्रीय जल नीति, 2012 की जल-उपयोग दक्षता की सिफारिशें; ड्रिप और स्प्रिंकलर से जल-बचत।
(6) जल-संघवाद और सहकारिता: अंतर्राज्यीय परियोजनाओं में राज्यों के बीच समन्वय की चुनौती; एलिनॉर ओस्ट्रॉम के सामान्य संपत्ति संसाधन प्रबंधन के सिद्धांत का प्रयोग (उपयोगकर्ता-संस्थाओं की भूमिका, जल उपभोक्ता संघ)।
(7) संतुलित दृष्टिकोण: उत्पादकता-समर्थक दृष्टि बनाम पर्यावरण-समर्थक दृष्टि; दक्षता बनाम समता (छोटे और सीमांत किसानों तक पहुंच)। निष्कर्ष में ऐसा समन्वित मॉडल सुझाएं जिसमें सूक्ष्म सिंचाई, मांग-आधारित जल प्रबंधन, भूजल नियमन और अंतर्राज्यीय समन्वय तंत्र साथ चलें।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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